Saturday, 8 February 2025

मानसिक आरती :--

 मानसिक आरती :--- (यह एक महात्मा द्वारा बताई हुई विधि है).

कई बार हम यात्रा में या घर से बाहर हों या किसी अन्य परिस्थितिवश अपने इष्ट देव की आरती उतारने में असमर्थ हों तो मानसिक रूप से निम्न प्रकार से आरती उतारें ......
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बाह्यान्तर कुम्भक में यानि बलपूर्वक पूरी साँस बाहर निकाल कर पेट को भीतर की ओर खींच लें| भ्रूमध्य में अपने इष्ट देव का ध्यान करें| जितनी देर साँस बाहर रख सकें उतनी देर तक रखें और हाथ जोडकर इष्टदेव को नमन करें| फिर साँस सामान्य रूप से चलने दें और परिस्थिति जितनी और जैसी अनुमति देती है वैसे ही भ्रूमध्य में पूर्ण श्रद्धा भक्ति से इष्टदेव का नमन और ध्यान करें| यह मानस पूजा है| आत्मस्वरूप परमात्मा को सदा याद रखें|
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
९ फरवरी २०१६

सारे अरब कई सौ वर्षों तक तुर्कों के गुलाम थे ---

सारे अरब कई सौ वर्षों तक तुर्कों के गुलाम थे। तुर्की का कोई खलीफा कभी हज करने नहीं गया। एक बार सऊदी अरब के बादशाह ने तुर्की से आजादी मांगी। तुर्की की फौज सऊदी बादशाह को और वहाँ के मुख्य इमाम को जंजीरों से बांधकर कुस्तुनतुनिया (इस्तांबूल) ले आई। वहाँ की मुख्य शाही मस्जिद हागिया सोफिया के सामने सऊदी बादशाह की गर्दन कलम कर दी गई। हजारों की भीड़ ने तालियाँ बजाईं और पटाखे छोड़े। मुख्य इमाम की गर्दन वहाँ के मुख्य बाजार में कलम की गई।

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तुर्कों के हरम यूरोप की गोरी त्वचा वाली युवतियों से भरे रहते थे। हर साल यूरोप में दूर दूर से, यहाँ तक कि आइसलैंड तक से तुर्क लोग असंख्य गोरे लोगों को पकड़ कर ले आते, और सब को गुलाम बना दिया जाता।
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उस्मानिया सल्तनत के आधीन, अधिकांश पूर्वी यूरोप, मध्य एशिया, पूरा अरब, फिलिस्तीन, और उत्तरी अफ्रीका के सारे देश थे। मध्य एशिया के डाकू खुद को तुर्क ही बताते थे। उज्बेकिस्तान के डकैत स्वयं को मुगल कहते थे। उज्बेकिस्तान के ही एक हत्यारे डकैत मुगल बाबर ने भारत पर आक्रमण किया था।
९ फरवरी २०२३

सच्चिदानंद परमात्मा के साथ हम एक हैं ---

 सच्चिदानंद परमात्मा के साथ हम एक हैं। वे ही हमारे स्वरूप हैं, जिनकी चेतना में दिन-रात निरंतर बने रहना ही हमारी साधना, उपासना, ध्यान और आनंद है ---

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परम सत्य तो यह है कि परमात्मा स्वयं ही यह सृष्टि बन गए हैं। उन्होंने तीन गुणों (सत् रज तम) की रचना की जिनसे यह सृष्टि उनकी प्रकृति चला रही है। वे स्वयं इन सब से परे है, और हमें भावातीत और त्रिगुणातीत होने को कहते हैं। एक २४ वोल्ट के बल्ब को यदि करोड़ों वोल्ट की बिजली के साथ जोड़ दिया जाये तो वह तुरंत फट जाएगा। वैसे ही हम उनके तेज को सहन नहीं कर सकते। उनको जानने की पात्रता हमें स्वयं में विकसित करनी पड़ेगी, जिसके लिए अनेक जन्मों तक साधना भी करनी पड़ सकती है।
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जैसे पृथ्वी -- चंद्रमा को साथ लेकर सूर्य की परिक्रमा करती है, वैसे ही हम सारी सृष्टि, यानि सारे ब्रह्मांड के साथ एक होकर परमात्मा का ध्यान करते हैं। सबसे पहले हमें ध्यान में इस नश्वर भौतिक शरीर की चेतना से ऊपर उठना पड़ेगा। सारा ब्रह्मांड ही हमारा शरीर है, यह नश्वर देह नहीं। परमात्मा स्वयं ही हमें अपना निमित्त बनाकर स्वयं ही सारी साधना करते है। कर्ताभाव से मुक्त हुये बिना हम साधना में विशेष प्रगति नहीं कर सकते। ध्यान में हमें यह भाव करना होगा कि सारा ब्रह्मांड ही हमारा शरीर है, और हम सारे ब्रह्मांड के साथ एक हैं। जब हम साँस लेते हैं, तब सारा ब्रह्मांड ही हमारे साथ साँस लेता है।
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अनेक साधनाएं हैं, अनेक सिद्धान्त हैं, अनेक मार्ग हैं, जिनका मुझे ज्ञान नहीं है। मुझे उतना ही अल्प और सीमित ज्ञान है जितना गुरु रूप में स्वयं परमात्मा ने बोध कराया है। श्रुतियों (वेद) को मैं अंतिम प्रमाण मानता हूँ, लेकिन मुझ में उनको समझने की योग्यता नहीं है। वेदांगों को समझे बिना वेदों को समझना असंभव है। वेदों को समझने के लिए वेदांगों का ज्ञान होना आवश्यक है। परमात्मा की परम कृपा से न्यूनतम जितना आवश्यक है उतना ही समझने की पात्रता मुझे परमात्मा ने प्रदान की है। परमात्मा को जानने की न्यूनतम पात्रता तो उन्होने मुझे प्रदान की है, और इसके लिए साधना का मार्ग भी बताया है। लेकिन करना या न करना स्वयं मुझ के प्रयासों पर निर्भर है।
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समत्व ही ज्ञान है। जिसने समत्व को प्राप्त किया, वही ज्ञानी है। समत्व में अधिष्ठित होना ही समाधि है। उस स्थिति को प्राप्त करने के लिए हमें निःस्पृह, वीतराग और स्थितप्रज्ञ होना पड़ेगा।
भक्ति (परमप्रेम) ईंधन का काम करती है। जैसे बिना ऊर्जा रूपी ईंधन के गाड़ी नहीं चलती, वैसे ही बिना भक्ति रूपी ईंधन के हम आध्यात्म में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते।
कामनाओं से मुक्त होना ही निःस्पृहता है। किसी भी तरह की आकांक्षा का न होना, और उसके स्थान पर अभीप्सा का होना आवश्यक है।
राग-द्वेष और अहंकार से मुक्ति को वीतरागता कहते है।
इंद्रियों के विषयों से विरक्त हुए बिना प्रज्ञा स्थिर नहीं हो सकती। सच्चिदानंद परमात्मा की अनुभूतियों के बिना इंद्रियों के विषयों से वैराग्य भी संभव नहीं है। इसीलिए भगवान हमें समय समय पर अपनी अनुभूतियाँ कराते रहते हैं। परमात्मा की अनुभूतियाँ होने के पश्चात वैराग्य आवश्यक है। अन्यथा भगवान की इच्छा का बहाना बनाते हुए भगवान पर ही दोषारोपण करते करते जीवन निकल जायेगा। गीता में भगवान कहते हैं --
"प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥२:५५॥"
श्रीभगवान् ने कहा -- हे पार्थ? जिस समय पुरुष मन में स्थित सब कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा से ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है? उस समय वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है॥
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एक साधक होने के लिए सर्वप्रथम हमें एक भक्त, निःस्पृह, वीतराग और स्थितप्रज्ञ होना आवश्यक है। इस विषय पर गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बहुत अच्छी तरह से मार्गदर्शन दिया है। वह सब तभी समझ में आएगा, जब हमें भगवान से प्रेम होगा। प्रेम के साथ साथ श्रद्धा-विश्वास और सत्यनिष्ठा भी आवश्यक है। यही हमारी रक्षा करेगा। अन्यथा भटकाव और महाविनाश निश्चित है।
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जहां पर और जिस भी स्थिति में हम हैं, वहीं से हम साधना का आरंभ करें। इसी समय से हम भक्ति, निःस्पृहता, वीतरागता, और स्थितप्रज्ञता का अभ्यास आरंभ करें, तभी हम कैवल्य पद को प्राप्त कर सकेंगे। कैवल्य पद को प्राप्त करना ही परमात्मा की प्राप्ति का द्वार है। कैवल्य को ही हम दूसरे शब्दों में ब्राह्मीस्थिति, निर्विकल्प-समाधि, और कूटस्थ-चैतन्य आदि शब्दों से व्यक्त करते हैं।
एक बार इस मार्ग पर हम अग्रसर होंगे तभी आगे का मार्गदर्शन प्राप्त होगा।
हम अभी इसी समय से स्थितप्रज्ञ होने का उपाय करें, तभी समत्व की स्थिति प्राप्त होगी, और तभी ईश्वर की चेतना में हम स्वयं को प्रतिष्ठित कर पायेंगे।
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योगमार्ग में हम ध्यान-साधना का आरंभ हम कुछ हठयोग, अजपाजप और नादानुसंधान से करते हैं। तत्पश्चात कुछ गोपनीय साधनाएँ हैं। इस विषय को इससे अधिक और समझाना वर्तमान स्थिति में मेरे लिए संभव नहीं है, क्योंकि मेरा स्वास्थ्य इसकी अनुमति नहीं देता। स्वास्थ्य संबंधी कारणों से अति शीघ्र कुछ दिनों में कुछ लिखना भी मुझे बंद करना होगा। आप सब में मेरे परमप्रिय परमात्मा को नमन !! भगवान सदा हमारी रक्षा करें।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
९ फरवरी २०२५

Friday, 7 February 2025

भगवान स्वयं ही उनके रूप में आए थे ---

भगवान स्वयं ही उनके रूप में आए थे ---

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मुझे मेरे प्रियजनों के निधन व उन से वियोग की कभी-कभी बड़ी पीड़ा हो जाया करती थी| भगवान की कृपा से एक दिन मुझे अनुभूति हुई कि भगवान स्वयं ही उनके रूप में मेरे समक्ष आए थे|
मेरे माता-पिता, बड़े भाई, सभी संबंधी, मित्र/शत्रु सब भगवान की ही लीला के रूप थे| जब भगवान सदा मेरे साथ हैं तो भगवान में वे भी सदा मेरे साथ ही हैं|
पृथकता का बोध एक भ्रम है| सारी सृष्टि भगवान की चेतना से चैतन्य है| उनके सिवाय अन्य कुछ या कोई भी नहीं है|
भगवान से पृथकता का बोध ही हमारे सब दुःखों/कष्टों का कारण है| स्वयं भगवान ही इन आँखों से देख रहे हैं, और इस ह्रदय से सभी को अपना प्रेम दे रहे हैं| मैं नहीं हूँ, मेरा कोई पृथक अस्तित्व नहीं है|
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
७ फरवरी २०२१

अद्वैत वेदान्त एक अनुभूति है जो बुद्धि से परे है ---

 अद्वैत वेदान्त एक अनुभूति है जो बुद्धि से परे है ---

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बुद्धि से हम अनुमान ही लगा सकते हैं। जब हमारी चेतना मेरुदंडस्थ सभी चक्रों को पार करती हुई सहस्त्रार में प्रवेश करती है, तभी हमें अद्वैत की अनुभूति हो सकती है। अद्वैत वेदान्त एक अनुभूति है जो बुद्धि से परे है।
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अजपा-जप (जिसे वेदों में हँसवतीऋक कहा गया है) (हँसः योग) का अभ्यास हमें नित्य नियमित करना चाहिए, इसके अभ्यास से आगे के प्रकाशमय द्वार स्वतः ही खुलते जाते हैं। कहीं भी अंधकार नहीं रहता। प्रणव का जप, कुंडलिनी जागरण, आज्ञाचक्र का भेदन, ब्रह्मरंध्र की प्रतीति, सूक्ष्म जगत में प्रवेश, ब्रह्मज्योति के दर्शन, अनंतता की अनुभूति, पंचमुखी महादेव और परमशिव की अनुभूतियाँ -- सब स्वतः ही गुरुकृपा से होने लगते हैं। हम जीवभाव से शिवभाव में स्थित हो जाते हैं। तभी हम "शिवोहं" और "अहं ब्रह्मास्मि" कहने के अधिकारी बनते हैं। यही अद्वैत वेदान्त है। इसे समझने के लिए भगवान की उपासना करनी पड़ती है।
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अद्वैत वेदान्त के आचार्य भगवान आचार्य गौड़पाद हैं, जिन्होंने "माण्डूक्यकारिका" नामक ग्रन्थ की रचना की। इनके शिष्य आचार्य गोविंदपाद थे, जो आचार्य शंकर के गुरु थे। आचार्य शंकर ने अपने परम गुरु के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए, सर्वप्रथम भाष्य 'माण्डुक्यकारिका' पर ही लिखा था।
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गौडपादाचार्य का माण्डूक्यकारिका में अद्वैत के साधक के प्रति सन्देश --
"न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः।
न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता॥३२॥"
(अवधूतोपनिषद् का ११वां मंत्र भी यही कहता है।
भावार्थ -- किसी का (निरोध) लय नहीं है, किसी की उत्पत्ति नहीं है, कोई आबद्ध (बँधा) हुआ नहीं है, कोई साधक नहीं है, कोई (मुमुक्षु) अर्थात् मोक्ष को प्राप्त करने वाला नहीं है तथा कोई मुक्त भी नहीं है, यही वास्तविक स्थिति है॥
There is no dissolution, no birth, none in bondage, none aspiring for wisdom, no seeker of liberation and none liberated. This is the absolute truth.
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सादर सप्रेम नमन !! ॐ शिव !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
७ फरवरी २०२३

हमारे पतन का कारण हमारे जीवन में तमोगुण की प्रधानता थी --

 किसी भी कालखंड में जब भी हमारा पतन हुआ, उसका मुख्य और एकमात्र कारण हमारे जीवन में तमोगुण की प्रधानता का होना था। हमारी जो भी प्रगति हो रही है, वह तमोगुण का प्रभाव घटने, और रजोगुण में वृद्धि के कारण हो रही है।

सार्वजनिक जीवन में सतोगुण की प्रधानता तो बहुत दूर की बात है, निज जीवन में हमें सतोगुण का ही चिंतन और ध्यान करना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता के सांख्ययोग नामक दूसरे अध्याय के स्वाध्याय से यह बात ठीक से समझ में आती है। वास्तव में गीता का आधार ही उसका सांख्य योग नामक अध्याय क्रमांक २ है, जिसे समझ कर ही हम आगे की बातें समझ सकते हैं।
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हमें अपनी चेतना के ऊर्ध्व में परमात्मा के सर्वव्यापी परम ज्योतिर्मय कूटस्थ पुरुषोत्तम का ही ध्यान करना चाहिए। जो बात मुझे समझ में आती है, वही लिखता हूँ। ज्ञान का एकमात्र स्त्रोत तो स्वयं परमात्मा हैं, बाकी सब से केवल सूचना ही प्राप्त होती है। कूटस्थ का अर्थ होता है परमात्मा का वह ज्योतिर्मय स्वरूप जो सर्वव्यापी है लेकिन प्रत्यक्ष में कहीं भी इंद्रियों से दिखता नहीं है। उसका कभी नाश नहीं होता। योगमार्ग में ध्यान में दिखाई देने वाली ज्योति और नाद को "कूटस्थ" कहते हैं।
ॐ परमात्मने नमः !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
६ फरवरी २०२५

राष्ट्रसेवा/देशसेवा/समाजसेवा किसे कहते हैं ?

(प्रश्न) : राष्ट्रसेवा/देशसेवा/समाजसेवा किसे कहते हैं?

(उत्तर) : ---
(१) लौकिक दृष्टि से अपने कर्तव्य-कर्म को यानि हर अच्छे कार्य को पूर्ण सत्यनिष्ठा से सम्पन्न करना ही राष्ट्र, देश, व समाज की सेवा है।
(२) धार्मिक दृष्टि से हमारे जिस कार्य से तमोगुण का ह्रास हो, व सतोगुण में वृद्धि हो, वह सबसे बड़ी सेवा है जो हम राष्ट्र, देश व समाज के लिए कर सकते हैं।
(३) आध्यात्मिक दृष्टि से आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) यानि भगवत्-प्राप्ति ही समष्टि की सबसे बड़ी सेवा है। समष्टि में राष्ट्र, देश व समाज ही नहीं, सम्पूर्ण सृष्टि आ जाती है।
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ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
७ फरवरी २०२५