Thursday, 30 January 2025

कूटस्थ, उपास्य और उपासना :---

 कूटस्थ, उपास्य और उपासना :---

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"ॐ गुरुभ्यो नमः॥" "ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥" "ॐ शांति शांति शांति॥" "हरिः ॐ॥"
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यह "कूटस्थ" शब्द मुझे इसलिए बहुत अधिक प्रिय लगता है क्योंकि इस शब्द का प्रयोग भगवान श्रीकृष्ण ने अनेक बार किया है। यह भगवान श्रीकृष्ण का ही शब्द है। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कूटस्थ हैं, क्योंकि वे सर्वत्र होते हुए भी कहीं दिखाई नहीं देते।
जो साधक योग-साधना करते हैं, उनके लिए भी यह शब्द बहुत अधिक प्रिय है, क्योंकि वे कूटस्थ सूर्य-मण्डल में ही विस्तार-क्रम से परमात्मा का ध्यान करते हैं, और उन्हें जो भी आध्यात्मिक अनुभूतियाँ होती हैं, वे कूटस्थ में ही होती हैं। सारे ज्ञान की प्राप्ति भी कूटस्थ में ही होती है। कूटस्थ ही भगवान हैं, और भगवान ही कूटस्थ हैं, क्योंकि वे कूट रूप से सर्वत्र हैं, लेकिन कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होते।
जो सर्वत्र हैं लेकिन कहीं भी दिखाई नहीं देते, वे कूटस्थ हैं।
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उन्हें जानने की विद्या गुरुमुखी है जो गुरु की कृपा से ही प्राप्त होती है। श्रौत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सिद्ध गुरु से उपदेश व आदेश लेकर बिना तनाव के दोनों नेत्रों के गोलकों को नासामूल के समीप लाकर, भ्रूमध्य में दृष्टी स्थिर कर, खेचरी या अर्धखेचरी मुद्रा में प्रणव की ध्वनि को सुनते हुए उसी में सर्वव्यापी ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करने की साधना नित्य नियमित यथासंभव अधिकाधिक करनी चाहिए। समय आने पर गुरुकृपा से विद्युत् की चमक के समान एक देदीप्यमान ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होगी। उस ब्रह्मज्योति का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने के बाद उसी की चेतना में निरंतर रहने की साधना करें। यह ब्रह्मज्योति अविनाशी है, इसका कभी नाश नहीं होता। लघुत्तम जीव से लेकर ब्रह्मा तक का नाश हो सकता है, पर इस ज्योतिर्मय ब्रह्म का कभी नाश नहीं होता। यही कूटस्थ है, और इसकी चेतना ही कूटस्थ चैतन्य है; जिसमें स्थिति योगमार्ग की एक अति उच्च उपलब्धी है। गीता में भगवान कहते हैं --
"द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१५:१६॥"
इस लोक में क्षर (नश्वर) और अक्षर (अनश्वर) ये दो पुरुष हैं, समस्त भूत क्षर हैं और 'कूटस्थ' अक्षर कहलाता है॥
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साहित्यिक दृष्टि से इस शब्द के अनेक अर्थ हो सकते हैं, लेकिन भक्त/साधकों के लिए इसका एक ही अर्थ है --
भगवान के ज्योतिर्मय रूप के दर्शन और अनाहत नाद का श्रवण।
धन्य हैं वे सब साधक जिन्हें भगवान की कूटस्थ ज्योति के दर्शन होते हैं। भगवान के दर्शन कूटस्थ ज्योतिर्मयब्रह्म रूप में ही होते हैं। उस के साथ जो अक्षरब्रह्म सुनाई देता है, उस में दीर्घकाल तक स्थित होकर तैलधारा के समान उसका श्रवण निरंतर अधिकाधिक करना चाहिये। वह अक्षर अव्यक्त होने के कारण किसी प्रकार भी बतलाया नहीं जा सकता, और किसी भी प्रमाण से प्रत्यक्ष नहीं किया जा सकता। वह आकाश के समान सर्वव्यापक है और अव्यक्त होने से अचिन्त्य और कूटस्थ है।
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उपास्य :--
प्रकृति तो माया है, और भगवान मायापति हैं। भगवान की माया अति दुस्तर है। उसी का नाम "कूट" है। उस "कूट" नामक माया में जो अधिष्ठाता के रूप में कुछ भी क्रिया न करते हुये स्थित हैं, उनका नाम कूटस्थ है। इस प्रकार कूटस्थ होने के कारण वे अचल, ध्रुव अर्थात् नित्य है। वे हमारे उपास्य हैं।
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उपासना :--
उपास्य वस्तु को शास्त्रोक्त विधि से बुद्धि का विषय बना कर उसके समीप पहुँच कर तैलधारा के तुल्य समान वृत्तियों के प्रवाह से दीर्घकाल तक उसमें स्थित रहने को "उपासना" कहते हैं।
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जिन भक्तों को कूटस्थ ज्योतिर्मयब्रह्म के दर्शन होते हैं, वे भगवान की कृपा से उनकी माया के आवरण और विक्षेप से परे चले जाते हैं। उनकी स्थाई स्थिति कूटस्थ चैतन्य में हो जाती है। कूटस्थ में दिखाई देने वाला पञ्चकोणीय श्वेत नक्षत्र पञ्चमुखी महादेव का प्रतीक है। यह एक नीले और स्वर्णिम आवरण से घिरा हुआ दिखाई देता है, जिसके चैतन्य में स्थित होकर साधक की देह शिवदेह हो जाती है, और वह जीव से शिव भी हो सकता है। इस श्वेत नक्षत्र की विराटता - क्षीरसागर है, जिसका भेदन और जिसके परे की स्थिति योग मार्ग की उच्चतम साधना और उच्चतम उपलब्धि है। इसका ज्ञान भगवान की परम कृपा से किसी सिद्ध सद्गुरु के माध्यम से ही होता है।
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आज्ञाचक्र ही योगी का ह्रदय है, भौतिक देह वाला ह्रदय नहीं। आरम्भ में ज्योति के दर्शन आज्ञाचक्र से थोड़ा सा ऊपर जहाँ होता है, वह स्थान कूटस्थ बिंदु है। आज्ञाचक्र का स्थान Medulla Oblongata यानि मेरुशीर्ष है जो खोपड़ी के ऊपर मध्य में पीछे की ओर है। यह जीवात्मा का निवास है।
गुरुकृपा से धीरे धीरे सहस्त्रार में स्थिति हो जाती है। सामान्यतः एक उन्नत साधक की चेतना आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य उत्तरा-सुषुम्ना में रहती है।
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चेतावनी :-- कुसंग का त्याग और यम-नियमों का पालन अनिवार्य है, अन्यथा तुरंत पतन हो जाता है। जब इस ज्योति पर साधक ध्यान करता है तब कई बार वह ज्योति लुप्त हो जाती है, यह 'आवरण' की मायावी शक्ति है जो एक बहुत बड़ी बाधा है। इस ज्योति पर ध्यान करते समय 'विक्षेप' की मायावी शक्ति ध्यान को छितरा देती है। इन दोनों मायावी शक्तियों पर विजय पाना साधक के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। ब्रह्मचर्य, सात्विक भोजन, सतत साधना और गुरुकृपा से एक आतंरिक शक्ति उत्पन्न होती है जो आवरण और विक्षेप की शक्तियों को कमजोर बना कर साधक को इस भ्रामरी गुफा से पार करा देती है।
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आवरण और विक्षेप का प्रभाव समाप्त होते ही साधक को धर्मतत्व का ज्ञान होता है| यहाँ आकर कर्ताभाव समाप्त हो जाता है और साधक धीरे धीरे परमात्मा की ओर अग्रसर होने लगता है। हम सब को परमात्मा की अनन्य पराभक्ति प्राप्त हो, और हम सब उन के प्रेम में निरंतर मग्न रहें इसी शुभ कामना के साथ इस लेख को विराम देता हूँ।
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इस लेख को लिखने से पहिले मैंने संबंधित विषय का गीता के शंकर भाष्य से स्वाध्याय किया, और गुरु महाराज, व भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना की। उनकी कृपा से ही यह लेख लिख पाया, अन्यथा मुझ अकिंचन में कोई योग्यता नहीं है।
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ॐ नमः शिवाय !! ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
३१ जनवरी २०२३

भगवान ही भक्ति हैं, भगवान ही भक्त हैं, भगवान ही क्रिया और कर्ता हैं --- .

 भगवान ही भक्ति हैं, भगवान ही भक्त हैं, भगवान ही क्रिया और कर्ता हैं ---

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भूल कर भी कभी साधक, उपासक, भक्त या कर्ता होने का मिथ्या भाव मन में नहीं आना चाहिए| मैं यह बात अपनी निज अनुभूतियों से लिख रहा हूँ, कोई मानसिक कल्पना नहीं है| एक बार ध्यान करते करते एक भाव-जगत में चला गया, जहाँ कोई अदृश्य शक्ति मुझसे पूछ रही थी कि तुम्हें क्या चाहिए| स्वभाविक रूप से मेरा उत्तर था कि आपके प्रेम के अतिरिक्त मुझे अन्य कुछ भी नहीं चाहिए| मुझे उत्तर मिला कि -- "प्रेम का भी क्या करोगे? मैं स्वयं सदा तुम्हारे समक्ष हूँ, मेरे से अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है|" तत्क्षण मुझे मेरी अभीप्सा (तड़प, अतृप्त प्यास) का उत्तर मिल गया| एक असीम वेदना शांत हुई| अगले ही क्षण मैं फिर बापस सामान्य चेतना में लौट आया| वास्तव में हमें परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं चाहिए| वे हैं तो सब कुछ हैं, उनके बिना कुछ भी नहीं है|
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वे निरंतर हमारे हृदय में हैं| वे निकटतम से भी अधिक निकट, और प्रियतम से भी अधिक प्रिय हैं| वे सदा हमारे हृदय में हैं| भगवान कहते हैं ---
"ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति| भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया||१८:६||"
" उमा दारु जोषित की नाईं| सबहि नचावत रामु गोसाईं||" (श्रीरामचरितमानस)
हम सब कठपुतलियाँ हैं भगवान के हाथों में| कठपुतली में थोड़ा मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार डाल दिया है, जो हमें दुःखी कर रहा है|
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निमित्त मात्र होने के लिए भगवान कह रहे हैं ---
"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् |
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ||११:३३||"
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अब और कहने के लिए कुछ भी नहीं बचा है| अंत में थोड़ा अति-अति संक्षेप में प्राणतत्व और परमशिव का अपना अनुभव भी साझा कर लेता हूँ| परमात्मा का मातृ रूप जिसे हम अपनी श्रद्धानुसार कुछ भी नाम दें, वे भगवती आदिशक्ति -- प्राण-तत्व के रूप में हमारी सूक्ष्म देह के मेरुदंड की सुषुम्ना नाड़ी में सभी चक्रों को भेदते हुए विचरण कर रही हैं| जब तक उनका स्पंदन है, तभी तक हमारा जीवन है| वे ही साधक हैं, और वे ही कर्ता हैं| जिनका वे ध्यान कर रही हैं, उनको मैं मेरी श्रद्धा से परमशिव कहता हूँ, आप कुछ भी कहें| परमशिव एक अनुभूति है जो गहरे ध्यान में इस भौतिक देह के बाहर की अनंतता से भी परे होती है| वह अवर्णणीय है|
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सारी साधना वे जगन्माता, भगवती, आदिशक्ति ही स्वयं कर के परमशिव को अर्पित कर रही हैं| हम तो साक्षीमात्र हैं उस यजमान की तरह जिस की उपस्थिति इस यज्ञ में आवश्यक है| और कुछ भी नहीं| वे ही गुरु रूप में प्रकट हुईं और मार्गदर्शन किया| वे ही इस जीवात्मा का विलय परमशिव में एक न एक दिन कर ही देंगी| और कुछ भी नहीं चाहिए| उन परमशिव और जगन्माता को नमन !!
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३० जनवरी २०२१

Wednesday, 29 January 2025

पुरुषोत्तम ---

 पुरुषोत्तम ---

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उपनिषदों का सार श्रीमद्भगवद्गीता है, तो श्रीमद्भगवद्गीता का सार उसका १५वाँ अध्याय (पुरुषोत्तम योग) है। १५ वें अध्याय का भी सार उसका १५ वाँ श्लोक है। दूसरे शब्दों में गीता का सार उसके १५ वें अध्याय का १५ वाँ श्लोक है --
"सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥१५:१५॥"
अर्थात् - मैं ही समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (उनका अभाव) होता है। समस्त वेदों के द्वारा मैं ही वेद्य (जानने योग्य) वस्तु हूँ तथा वेदान्त का और वेदों का ज्ञाता भी मैं ही हूँ॥
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गीता के स्वाध्याय और परमात्मा के ध्यान की आदत पड़ गई है, जिनके बिना जीवन सूना सूना और व्यर्थ लगता है। परमात्मा से प्रेम और उनकी ध्यान-साधना के बिना तो एक दिन भी जीवित रहने की मैं कल्पना भी नहीं कर सकता। आज यदि मैं जीवित हूँ तो परमात्मा से प्रेम के कारण ही जीवित हूँ, अन्यथा एक दिन भी जीने की इच्छा नहीं है। वास्तव में भगवान स्वयं ही मेरे माध्यम से यह जीवन जी रहे हैं।
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योगी लोग कूटस्थ सूर्यमंडल में पुरुषोत्तम का ध्यान करते हैं। मेरे जैसे अकिंचन साधकों की भी यही उपासना है। ये पुरुषोत्तम ही मेरे जीवन हैं। ये ही परमशिव हैं, ये ही विष्णु हैं, और ये ही वेदान्त के ब्रह्म हैं। ध्यान में मैं उनके साथ एक हूँ। भगवान पुरुषोत्तम को ही यह जीवन समर्पित है, जिन्हें मैं परमशिव कहता हूँ।
(इससे पूर्व भगवान यह समझा चुके हैं कि गुणातीत होकर अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति द्वारा ही हम उन्हें प्राप्त हो सकते हैं)
ॐ गुरुभ्यो नमः !! ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
३० जनवरी २०२३

Tuesday, 28 January 2025

इस समय जिस तरह से हमारी अस्मिता (हिंदुत्व) पर प्रहार हो रहा है, मुझे लगता है मुझे कुछ ऐतिहासिक तथ्यों को भी उजागर करना ही होगा ---

 इस समय जिस तरह से हमारी अस्मिता (हिंदुत्व) पर प्रहार हो रहा है, मुझे लगता है मुझे कुछ ऐतिहासिक तथ्यों को भी उजागर करना ही होगा|

करणी सेना के विरुद्ध यदि सरकार करवाई करती है तो सभी हिन्दुओं को एकजूट होना होगा| यह सभी हिन्दुओं के स्वाभिमान की बात है|
क्या भंसाली ने ये तथ्य भी फिल्माये हैं?..
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(1) अल्लाउद्दीन खिलजी अपने चाचा जलालुद्दीन खिलजी को मारकर गद्दी पर बैठा था| उसने अपने चाचा के सर को काटकर अपने महल के दरवाजे पर टंगवा दिया था ताकि लोग आतंकित हों|
(2) उसने अपने पुरुष प्रेमी मलिक कफूर को हिंजड़ा घोषित कर के अपना सेनापति भी बना दिया था| वास्तव में अल्लाउद्दीन खिलजी का ही प्रेमी मलिक कफूर था| वह वास्तव में हिंजड़ा नहीं था| अल्लाउद्दीन को पुरुषों से प्रेम करवाने का बहुत शौक था| उसने अपने हरम में हज़ारों निरीह हिन्दू महिलाओं के साथ साथ अनेक निरीह सुन्दर लड़के भी रखे हुए थे जिनका यौन शोषण करने के बाद उनको बलात् हिजड़ा बना दिया जाता था|
(3) अल्लाउद्दीन के बाद उसका बेटा जब गद्दी पर बैठा तब वह लड़कियों के ही कपड़े पहिनता था, लड़कियों की ही तरह दरबार में नाचता था| उसने अपनी हीन भावना को छिपाने के लिए हरम में एक हज़ार से ऊपर निरीह मजबूर हिन्दू स्त्रियों को रखा हुआ था| कुछ राजपूतो ने उसका वध करने के लिए उसका विश्वास प्राप्त किया और उसको एक दिन अकेले में घेर लिया| वह भागकर अपने हरम की एक हज़ार औरतों में छिप गया| पर राजपूतों ने उसको ढूँढ ही लिया और उसका वध कर दिया| इससे पहिले उन्होंने मलिक कफूर को भी ऐसे ही अकेले में ढूँढ कर मार दिया था|
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(4) अल्लाउद्दीन के समय लाखों हिन्दुओं की हत्याएं और नरसंहार हुआ था| लाखों हिन्दू भारत छोड़कर दक्षिण-पूर्वी एशिया में शरणार्थी होकर चले गए थे|
सारे हिन्दू शासक बिखरे हुए थे, उनमें एकता नहीं थी| अल्लाउद्दीन ने एक एक कर के उत्तरी भारत के प्रायः सभी राजाओं को हरा दिया था| जैसलमेर के किले में उस के सेनापती मलिक कफूर को बंदी भी बना लिया गया था पर वह अपनी धूर्तता से छूट गया|
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(5) रणथम्बोर के किले की दो वर्ष तक अल्लाउद्दीन ने घेरेबंदी कर के रखी थी| वहाँ के हिन्दू राजा हमीर चौहान ने कभी पराजय नहीं मानी| जब किले में खाद्य सामग्री समाप्त हो गयी तब वहाँ की मातृशक्ति ने जौहर की तैयारी कर ली और राजपुरोहित को छोड़कर सभी पुरुष अंतिम युद्ध के लिए अल्लाउद्दीन की फौज पर टूट पड़े| राजा हमीर उस युद्ध में पराजित नहीं हुए थे जैसे की पढ़ाया जाता है| अल्लाउद्दीन पराजित होकर भाग गया था| शाम का समय था| राजा हमीर के बचे हुए सैनिक बापस किले में लौट रहे थे| कुछ सैनिकों ने भूलवश अल्लाउद्दीन की फौज के झंडे अपने हाथों में ले रखे थे| ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था| ऊपर से रानियों ने अल्लाउद्दीन की फौज के झंडे देखकर सोचा कि राजा हमीर पराजित हो गए हैं और आतताई फौज आ रही है| किले की हज़ारों महिलाऐं अपने बच्चों के साथ किले की जौहर बावड़ी की जलती हुई प्रचंड अग्नि में कूद पडीं और स्वयं को भस्म कर लिया| राजा हमीर ने जब देखा कि पूरी मातृशक्ति नहीं रही है तब उसने भी अपने इष्ट देव भगवान शिव के मन्दिर में जाकर अपना भी सर काटकर अपने इष्टदेव को चढ़ा दिया| २९ जनवरी २०१७

जैसे जैसे मैं अपने आध्यात्म मार्ग पर आगे बढ़ रहा हूँ ---

 जैसे जैसे मैं अपने आध्यात्म मार्ग पर आगे बढ़ रहा हूँ, निज चेतना से द्वैत की भावना शनैः शनैः समाप्त हो रही है| जड़ और चेतन में अब कोई भेद नहीं दिखाई देता| अब तो कुछ भी जड़ नहीं है, सारी सृष्टि ही परमात्मा से चेतन है| कण कण में परमात्मा की अभिव्यक्ति है| इस भौतिक संसार की रचना जिस ऊर्जा से हुई है, उस ऊर्जा का हर कण, हर खंड और हर प्रवाह परमात्मा की ही अभिव्यक्ति है|

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वर्त्तमान में संसार के जितने भी मत-मतान्तर व मज़हब हैं, उन सब से परे श्रुति भगवती का कथन है ..... "सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत | अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत ||छान्दोग्योपनिषद्.३.१४.१||
अर्थात यह ब्रह्म ही सबकुछ है| यह समस्त संसार उत्पत्तिकाल में इसी से उत्पन्न हुआ है, स्थिति काल में इसी से प्राण रूप अर्थात जीवित है और अनंतकाल में इसी में लीन हो जायेगा| ऐसा ही जान कर उपासक शांतचित्त और रागद्वेष रहित होकर परब्रह्म की सदा उपासना करे| जो मृत्यु के पूर्व जैसी उपासना करता है, वह जन्मांतर में वैसा ही हो जाता है|
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कुछ भी मुझ से परे नहीं है| मेरे मन से ही मेरी यह सृष्टि है| मेरा मन ही मेरे बंधन का कारण है और यही मेरे मोक्ष का कारण होगा| उस चैतन्य की सत्ता के साथ मैं एक हूँ, उस से परे सिर्फ माया है| ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ जनवरी २०१८

शोकगीत के रूप में लिखी गई हिन्दी भाषा की एक प्रसिद्ध साहित्यिक रचना ---

 शोकगीत के रूप में लिखी गई हिन्दी भाषा की एक प्रसिद्ध साहित्यिक रचना ---

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बसंत पंचमी के दिन सन १८९९ में जन्मे हिन्दी के प्रसिद्ध कवि पं.सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" ने अपनी पुत्री सरोज की मृत्यु पर "सरोज स्मृति" नाम का शोकगीत एक बहुत लंबी कविता के रूप में लिखा था| उन्हें अपनी प्रिय पुत्री के निधन पर इतनी गहरी वेदना हुई जिसकी करुणात्मक अभिव्यक्ति मर्माहत कर देने वाले काव्य के रूप में उन्होने की है| उनके वेदनात्मक गहन भावों का और शब्दों का चयन इतना अनुपम है कि उसकी किसी भी साहित्य में कोई बराबरी नहीं हो सकती| ऐसा शोक-गीत हिन्दी में दूसरा नहीं है| इस कविता में जीवन के संघर्ष से छनकर आयी हुई साहस, विद्रोह, वात्सल्य, अवसाद और ग्लानि की मिली-जुली अनुभूतियाँ उद्भूत होती हैं| कहीं-कहीं से कुछ पंक्तियाँ उद्धृत कर रहा हूँ ..... (पूरी कविता बहुत अधिक लंबी है)
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मुझ भाग्यहीन की तू संबल
युग वर्ष बाद जब हुई विकल
दुःख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूँ आज, जो नही कही
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अस्तु मैं उपार्जन को अक्षम
कर नहीं सका पोषण उत्तम
कुछ दिन को, जब तू रही साथ,
अपने गौरव से झुका माथ,
पुत्री भी, पिता-गेह में स्थिर,
छोड़ने के प्रथम जीर्ण अजिर।
आँसुओं सजल दृष्टि की छलक
पूरी न हुई जो रही कलक
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मुझ भाग्यहीन की तू सम्बल
युग वर्ष बाद जब हुई विकल,
दुख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!
हो इसी कर्म पर वज्रपात
यदि धर्म, रहे नत सदा माथ
इस पथ पर, मेरे कार्य सकल
हो भ्रष्ट शीत के-से शतदल!
कन्ये, गत कर्मों का अर्पण
कर, करता मैं तेरा तर्पण!
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यहाँ लेखक ने अपनी पुत्री सरोज का तर्पण अपने सारे संचित अच्छे कर्मों का उसे अर्पण कर के किया है| आज उनकी यह रचना सामने आई जिसे आंशिक रूप से पढ़कर ही मैं भावुक हो उठा| एक पिता द्वारा दिए गए तर्पण से उच्च तर्पण हो ही नहीं सकता|

शब्दार्थों पर नहीं, आध्यात्मिक अर्थों पर विचार करें ---

 शब्दार्थों पर नहीं, आध्यात्मिक अर्थों पर विचार करें कि --

(१) हरिःकृपा क्या होती है? तथा
(२) "श्रीहरिः" व "हरिःॐ" का अर्थ क्या होता है?
इन प्रश्नों का उत्तर सरल नहीं है। आप अपनी सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा का उपयोग करेंगे तब जाकर आप को समझ में आयेगा। "हरिः" भी एक अनुभूति है, और "ॐ" भी एक अनुभूति है जो बहुत गहरे ध्यान में होती हैं।
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आंशिक रूप से नहीं, अपनी समग्रता में भगवान का अनुसंधान कीजिये। हमारा जन्म ही भगवत्-प्राप्ति के लिए हुआ है, जो अंततः सभी को होगी। सब पर भगवान श्रीहरिः की कृपा बनी रहे। हमारा एकमात्र संबंध भगवान से है, क्योंकि इस जन्म से पूर्व भगवान ही हमारे साथ थे, और इस जन्म के पश्चात भी भगवान ही हमारे साथ होंगे। वे ही माँ-बाप, सगे-संबंधियों, व मित्रों के रूप में आये। वह भगवान का ही प्रेम था जो इन सब के माध्यम से हमें प्राप्त हुआ। एक दिन अचानक ही बिना किसी पूर्व सूचना के, सब कुछ यहीं छोड़कर उनके पास जाना ही पड़ेगा, अतः अभी से उनसे मित्रता कर लो। बाद में मित्रता का अवसर नहीं मिलेगा।
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दूसरों का धन ठगने, उनको लूटने, या उनका गला काटने के लिये भगवान का नाम मत लो, अन्यथा नर्क की भयावह यंत्रनाएँ आपकी प्रतीक्षा कर रही हैं। । कोई भी बचाने नहीं आयेगा।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! हरिःॐ !!
कृपा शंकर
२९ जनवरी २०२४
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पुनश्च: --- मेरे पास लगभग नित्य ही किसी न किसी दुःखी व्यक्ति का फोन आता है। उनको मैं कुछ कह भी नहीं सकता, उनके लिए प्रार्थना ही कर सकता हूँ।धोखाधड़ी और दुःख-कष्टों का शिकार मैं भी हूँ। लेकिन सब कुछ "श्री कृष्ण-समर्पण" कर के मैं प्रसन्न हूँ।
जय शंकर प्रसाद की कालजयी रचना "कामायनी" की ये पंक्तियाँ सदा याद रखो --
"जिसे तुम समझे हो अभिशाप,
जगत की ज्वालाओं का मूल;
ईश का वह रहस्य वरदान,
कभी मत इसको जाओ भूल॥"