Friday, 24 January 2025

भाग्यशाली हैं वे लोग, भगवान जिन की परीक्षा लेता है ---

भाग्यशाली हैं वे लोग, भगवान जिन की परीक्षा लेता है| भगवान को भी पता है कि उनकी परीक्षा में कोई पास नहीं हो सकता, फिर भी वे मानते ही नहीं हैं, छोटे बच्चे की तरह जिद कर लेते हैं कि परीक्षा लेनी ही है|
अब वे ही जानें, परीक्षा लेने वाले भी वे ही हैं, देने वाले वाले भी वे ही हैं, और पास-फेल करने वाले भी वे ही हैं|
यहाँ तो भगवती के श्रीचरणों में आश्रय लेकर पड़ा हूँ, जो कुछ भी भगवान को करना है, वे करें| वे चाहे जितना भी घमासान करें, फिर भी वे निकटतम से भी अधिक निकट, और प्रियतम से भी अधिक प्रिय हैं| भगवान को भी इतनी बड़ी सृष्टि में कहीं कोई ठिकाना नहीं मिला, जो मेरे ही हृदय में आकर छिपे हुए हैं|
२४ जनवरी २०२१

भगवान श्रीराम के ध्यान से जीवन में निर्भीकता आती है, सारी कायरता, दब्बूपन और सभी कमज़ोरियाँ दूर होती हैं ---

भगवान श्रीराम के ध्यान से जीवन में निर्भीकता आती है, सारी कायरता, दब्बूपन और सभी कमज़ोरियाँ दूर होती हैं। वे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, वे परमब्रह्म परमात्मा विष्णु के अवतार हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के १० वें अध्याय के ३१ वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं को ही शस्त्रधारी राम बताया है --"रामः शस्त्रभृतामहम्"। तत्वरूप में राम और शिव में भी कोई भेद नहीं है। राम नाम (रां) और ओंकार (ॐ) के जप का फल भी एक ही है। राम नाम के जप से चेतना ऊर्ध्वगामी और विस्तृत होती है। अपने विवेक के प्रकाश में पूर्ण भक्ति के साथ उन पुरुषोत्तम का ध्यान और मानसिक जप अपने कूटस्थ सूर्यमण्डल में करें। इस सृष्टि में कुछ भी निराकार नहीं है। ज्योतिर्मय ब्रह्म को ही निराकार कहते हैं। किसी भी रूप में पूर्ण भक्ति के साथ उनका ध्यान करें। ॐ तत्त्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ जनवरी २०२४

Wednesday, 22 January 2025

परमात्मा की ओर उठी दृष्टि अब उठी ही रहे, नीचे न आने पाये ---

 परमात्मा की ओर उठी दृष्टि अब उठी ही रहे, नीचे न आने पाये ---

.
भगवान से एक बार प्रेम कर लो, फिर सब कुछ वे ही करेंगे, कभी छोड़ेंगे नहीं; जकड़ कर सदा साथ रखेंगे। यह मेरा पक्का वादा है। हम एक निमित्त मात्र हैं, कर्ता नहीं। हम केवल उस यजमान की तरह हैं जो यज्ञ को संपन्न होते हुए देखता है, जिस की उपस्थिति यज्ञ की प्रत्येक क्रिया के लिये आवश्यक है। सारी क्रियाएँ तो जगन्माता स्वयं सम्पन्न कर के यज्ञरूप में परमात्मा को अर्पित करती है। कर्ताभाव और पृथकता का बोध, एक भ्रम है। परमशिव ही सर्वस्व हैं।
.
वेद और वेदांगों को समझना मेरी बौद्धिक क्षमता से परे है। ब्रह्मसूत्र जैसे ग्रंथ भी मुझे समझ में नहीं आते। अब तो उनको समझने का प्रयास करना भी छोड़ दिया है, क्योंकि सारे प्रश्न तिरोहित हो गये हैं; कोई शंका या संदेह नहीं है। कोई जिज्ञासा भी अब नहीं रही है, यह सीमित मन अब शांत है। कोई पीड़ा या व्याकुलता नहीं रही है, जीवन में पूर्ण संतुष्टि है।
.
प्रकृति में कुछ भी निःशुल्क नहीं है। हर चीज का शुल्क देना पड़ता है, यानि मूल्य चुकाना पड़ता है। भगवान की कृपा भी मुफ्त में नहीं मिलती, उसकी भी कीमत चुकानी पड़ती है। वह कीमत है -- "हमारे ह्रदय का पूर्ण प्रेम, और हमारे आचार-विचार में पवित्रता"।
.
ह्रदय के सिंहासन पर परम प्रिय स्वयं बिराजमान हैं, अन्य कोई आकर्षण नहीं रहा है। उनका मनोहारी रूप इतना आकर्षक है, जिसे शब्दों में व्यक्त करना असंभव है। बस, वे सदा बिराजमान रहें, और कुछ भी नहीं चाहिये। ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ जनवरी २०२५

संसार में सबसे तालमेल कैसे बैठाकर रखें ?

 संसार में सबसे तालमेल कैसे बैठाकर रखें ?

.
यह एक बहुत बड़ी समस्या है, जिसका समाधान बड़ा कठिन है। भगवान से प्रार्थना की तो भगवान ने एक बड़ा सुंदर उपाय बता दिया। भगवान कहते हैं कि --
"परमप्रेममय होकर शत्रु-मित्र, सगे-संबंधी, परिचित-अपरिचित, सभी में, यहाँ तक कि स्वयं में भी मुझ परमात्मा को ही देखो। किसी के प्रति भी घृणा व द्वेष मत रखो।
युद्धभूमि में शत्रु का संहार भी प्रेममय रहते हुए बिना किसी घृणा व द्वेष के करो। अपने हरेक कर्म के पीछे कर्ता परमात्मा को बनाओ और स्वयं निमित्त मात्र बन कर रहो।"
.
चारों ओर चाहे कितना भी घना अंधकार हो, लेकिन एक परम ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में एक दिव्य आलोक के दर्शन ध्यान में सभी साधकों को सूक्ष्म जगत से भी परे होते हैं। वही हमारा लक्ष्य और उपास्य है। उसी का ध्यान होता है, और उसी की साधना होती है। साधना में इधर-उधर अन्यत्र कहीं भी दृष्टि न हो। इसका बहुत गहरा अभ्यास करना पड़ेगा कि मेरे हर विचार में परमात्मा हो, हालाँकि कोई मेरे विचार से सहमत नहीं होगा। हो सकता है लोग मेरी हंसी भी उड़ायें, मुझे मूर्ख, बेवकूफ, अनाड़ी और पागल भी कहें; लेकिन सब स्वीकार्य है।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२३ जनवरी २०२३

क्या बताएँ? किसको बताएँ? कोई अन्य है ही नहीं, यह स्वयं का संवाद स्वयं से ही है ---

 क्या बताएँ? किसको बताएँ? कोई अन्य है ही नहीं, यह स्वयं का संवाद स्वयं से ही है ---

.
इसे आकांक्षा कहें या अभीप्सा? कुछ समझ में नहीं आ रहा है। जो कुछ भी अब तक समझ लिया है वह पर्याप्त है। अब और कुछ नया जानने, समझने व पाने की इच्छा भी नहीं रही है। सार्थकता सिर्फ भगवान को जानने में है। भगवान तो अनंत हैं, उनको जितना जान लिया है, जितना समझ लिया है, उसी में रमण करते रहें, उतना ही पर्याप्त है। इससे अधिक और कुछ नहीं चाहिए। किसी अन्य से कोई संवाद भी नहीं करना है, कोई अन्य है भी नहीं। घूम फिर कर हम स्वयं -- स्वयं से ही मिलते और बात करते रहते हैं।
.
भगवान की आराधना क्या है? स्वयं के अहंकार की सीमितता यानि पृथकता के बोध को -- परमप्रेममय होकर स्वयं की सर्वव्यापक अनंतता में समर्पण ही भगवान की आराधना है। यह मेरी समझ है।
लगभग ग्यारह वर्ष पूर्व आचार्य सियारामदास नैयायिक वैष्णवाचार्य ने विष्णु-पुराण और अनेक उपनिषदों व ग्रन्थों से उद्धृत कर एक बहुत विस्तृत लेख लिखा था, जिसमें "भगवान" शब्द के अर्थ को समझाया गया था। यदि उनका लिखा वह लेख कहीं से मिल जाये तो उसे अवश्य पढ़ें।
.
व्यवहारिक दृष्टि से भगवान की कृपा से ही हम भगवान को जान सकते हैं। सारी साधनाएँ व तपस्या आदि भी हम भगवान की कृपा से ही कर सकते हैं। अतः भगवान की कृपा कैसे हो? इसी विषय पर विचार करें। मेरा अनुभव मेरा है जो भगवान की कृपा से मुझे प्राप्त हुआ है, वह दूसरों के किसी काम का नहीं है। अतः जैसा भी आपके समझ में आता है उसी के अनुसार भगवान की आराधना करें।
.
लेकिन यह याद रखें की दूसरों को ठग कर, दूसरों के गले काट कर, दूसरों को हानि पहुंचा कर, और झूठ बोलकर हम भगवान की कृपा को नहीं पा सकते। भगवान को समझने के लिए वीतराग और स्थितप्रज्ञ होना होगा।
उन सभी महान आत्माओं को नमन जिन्हें भगवान से प्रेम है। प्रेम में कोई मांग नहीं, सिर्फ समर्पण होता है। मांग में व्यापार होता है, कोई भक्ति नहीं।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२३ जनवरी २०२४

भारत के महानतम स्वतन्त्रता सेनानी, परम देशभक्त, प्रथम प्रधानमंत्री, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर कोटि-कोटि नमन !! जय हिन्द !!

 भारत के महानतम स्वतन्त्रता सेनानी, परम देशभक्त, प्रथम प्रधानमंत्री, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर कोटि-कोटि नमन !! जय हिन्द !!

.
भारत के विभाजन का किसी को क्या अधिकार था? क्या इसके लिए कोई जनमत संग्रह करवाया गया था? जो लोग इसके लिए जिम्मेदार थे वे अब तक तो नर्कगामी हो गए होंगे, पर उन को दिये गए सभी सम्मान बापस लिए जाएँ, और उनकी आधिकारिक रूप से सार्वजनिक निंदा की जाये| उन के कारण ३५ लाख से अधिक निर्दोष लोगों की हत्याएँ हुईं, करोड़ों लोग विस्थापित हुए, और लाखों महिलाओं और बच्चों पर दुराचार हुए| विभाजन के लिए जिम्मेदार लोग मनुष्य नहीं, साक्षात नर-पिशाच हत्यारे थे|
.
भारत को निर्दयता से पूरी तरह लूट कर अँगरेज़ भारत से इसलिए गए क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अंग्रेजी सेना की कमर टूट चुकी थी, और भारत के सैनिकों ने अँगरेज़ अधिकारियों को अभिवादन करना व उनके आदेश मानना बंद कर दिया था| १९४६ के नौसेना विद्रोह के बाद भारत के क्रांतिकारियों और आजाद हिन्द फौज से अँगरेज़ बहुत बुरी तरह डर गए थे, अतः उन्होंने भारत को छोड़ने में ही अपनी भलाई समझी| जाते जाते वे भारत का जितना नुकसान कर सकते थे, उतना कर गए और कैसे भी जोड़तोड़ कर के भारत की सत्ता एक काले अँगरेज़ को सौंप गए जिस के लिए ब्रिटिश हित ही सर्वोपरी था|
जय हिन्द, जय भारत ! वन्दे मातरम !!
२३ जनवरी २०२४

Tuesday, 21 January 2025

जो गुज़र गया सो गुज़र गया, उसे याद करके ना दिल दुखा --- .

 जो गुज़र गया सो गुज़र गया, उसे याद करके ना दिल दुखा ---

.
किशोरावस्था से ही मेरे जीवन का एक स्वप्न था जो कभी साकार नहीं हुआ। विगत जन्मों में अधिक अच्छे कर्म नहीं किये थे इसलिए इस जन्म में बहुत अधिक संघर्ष और बहुत अधिक कष्टों का सामना करना पड़ा। लेकिन अब कोई क्षोभ या मलाल नहीं है।
.
"वो नही मिला तो मलाल क्या, जो गुज़र गया सो गुज़र गया
उसे याद करके ना दिल दुखा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया
मुझे पतझड़ों की कहानियाँ, न सुना सुना के उदास कर
तू खिज़ाँ का फूल है, मुस्कुरा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया" (बद्र)
.
वो स्वप्न साकार नहीं हुआ तो क्या हुआ? दूसरा स्वप्न दिखाई दे गया। दूसरा स्वप्न तो अकल्पनीय और बहुत अधिक भव्य था। अब तीसरा स्वप्न देख रहा हूँ जो बहुत अधिक रुक्ष और नीरस भी है, व मधुर भी है।
.
मैं तो एक फूल हूँ, मुरझा गया तो मलाल क्यों
तुम तो एक महक हो, जिसे हवाओं में समाना है
मसला गया तो क्या हुआ, मैं तो ख़ुशी में चूर हूँ
कुचला गया तो क्या हुआ, मैं तो चमन का फूल हूँ
.
यथार्थतः मैं परमात्मा के उद्यान का एक अप्रतिम पुष्प हूँ, जो अपने स्वामी की विराटता के साथ एक है। जीवन की एक उच्चतम और अति दुर्लभ उपलब्धि अनायास स्वतः ही प्रकट हुई है। सामने परमात्मा की ज्योतिर्मय अनंतता है। उससे भी परे स्वयं सच्चिदानंद भगवान परमशिव हैं। जब उपास्य पुरुषोत्तम/वासुदेव/परमशिव अपनी भव्यतम अभिव्यक्ति में स्वयं समक्ष हों, तब कैसी उदासी और कैसी अप्रसन्नता ?
.
"तपस्वी! क्यों इतने हो क्लांत? वेदना का यह कैसा वेग?
आह! तुम कितने अधिक हताश, बताओ यह कैसा उद्वेग!
जिसे तुम समझे हो अभिशाप, जगत की ज्वालाओं का मूल;
ईश का वह रहस्य वरदान, कभी मत इसको जाओ भूल।
विषमता की पीड़ा से व्यस्त हो रहा स्पंदित विश्व महान;
यही दु:ख सुख विकास का सत्य यही 'भूमा' का मधुमय दान। (प्रसाद)
.
वास्तव में 'भूमा' का आंशिक बोध ही अब तक के इस जीवन की उच्चतम उपलब्धि है। 'भूमा' के साथ अभेद ही इस जीवन की पूर्णता होगी। मेरी व्यथा का कारण भी 'भूमा' के साथ अभी तक पूरी तरह एक न हो पाना ही है। 'भूमा' से कम कुछ भी मुझे सुखी नहीं कर सकता।
ब्रह्मविद्या के प्रथम आचार्य भगवान सनतकुमार ने अपने प्रिय शिष्य नारद को 'भूमा' का साक्षात्कार करा कर ही देवर्षि बना दिया था।
श्रुति भगवती कहती है --
"यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति भूमानं भगवो विजिज्ञास इति॥" (छान्दोग्योपनिषद्‌ ७/२३/१)
अर्थात - ‘जो भूमा (महान् निरतिशय) है, वही सुख है, अल्प में सुख नहीं है। भूमा ही सुख है और भूमा को ही विशेष रूप से जानने की चेष्टा करनी चाहिये।
.
‘अल्प’ और ‘भूमा’ क्या है, इसको बतलाती हुई श्रुति फिर कहती है --
"यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाऽथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम्॥" (छान्दोग्योपनिषद्‌ ७/२३/२)
अर्थात -- ‘जहाँ अन्य को नहीं देखता, अन्य को नहीं सुनता, अन्य को नहीं जानता, वह भूमा है और जहाँ अन्य को देखता है, अन्य को सुनता है, अन्य को जानता है, वह अल्प है। जो भूमा है, वही अमृत है और जो अल्प है, वह मरणशील (नश्वर) है।’
.
यह ब्रह्मज्ञान है जिसे पाना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। यही आत्म-साक्षात्कार है, यही परमात्मा की प्राप्ति है। इसे पाकर ही हम कह सकते है --
शिवोहं शिवोहं !! अहं ब्रह्मास्मि !! ॐ ॐ ॐ !!
मैं शिव हूँ, ये नश्वर भौतिक, सूक्ष्म, और कारण शरीर नहीं। मैं यह अन्तःकरण (मन बुद्धि चित्त अहंकार) भी नहीं हूँ। न ही मैं ये इंद्रियाँ और उनकी तन्मात्राएँ हूँ॥
मैं अनंत, विराट, असीम, पूर्णत्व, और परमशिव हूँ। ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ जनवरी २०२३