Wednesday, 8 January 2025

हम भगवान को प्रिय बनें ---

 हम भगवान को प्रिय बनें ---

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हरिः चरणों में आश्रय ही मेरी रक्षा कर रहा है, मुझ अकिंचन के पास और कुछ भी नहीं है। उनका चरणों का ध्यान तो मैं भ्रूमध्य में करता हूँ, लेकिन उनके चरणों के दर्शन प्रकाश रूप में मुझे सहस्त्रारचक्र में होते हैं। उनकी अनुभूति सारे विश्व में होती है। यही मेरा जीवन है। मुझ में यह जीवन भगवान ही जी रहे हैं, वे चाहते हैं कि यह जीवन मैं एक देवता की तरह जीऊँ, न कि एक अकिंचन मनुष्य की तरह।
भारत में वह दिन भी शीघ्र ही आयेगा जब बच्चों को वेदविरुद्ध शिक्षा नहीं दी जायेगी, बालक को बचपन से ही भगवान से प्रेम करने व भगवान का ध्यान करने का प्रशिक्षण दिया जाएगा। ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
०९ जनवरी २०२४

Tuesday, 7 January 2025

पूर्ण समर्पण ---

 पूर्ण समर्पण ---

वर्तमान क्षण, आने वाले सारे क्षण, और यह सारा अवशिष्ट जीवन परमात्मा को समर्पित है। वे स्वयं ही यह जीवन जी रहे हैं। यह भौतिक, सूक्ष्म और कारण शरीर, इन के साथ जुड़ा अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार), सारी कर्मेन्द्रियाँ, ज्ञानेंद्रियाँ व उनकी तन्मात्राएँ, पृथकता का बोध, और सम्पूर्ण अस्तित्व -- परमशिव को समर्पित है। वे ही पुरुषोत्तम हैं, वे ही वासुदेव हैं, और वे ही श्रीहरिः हैं। सारे नाम-रूप और सारी महिमा उन्हीं की है। इस देह से ये सांसें भी वे ही ले रहे हैं, इन आँखों से वे ही देख रहे हैं, और इस हृदय में भी वे ही धडक रहे हैं।
सर्वत्र समान रूप से व्याप्त (वासुदेव) भगवान गीता में कहते हैं --
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥"
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जो सन्मार्ग के पथिक हैं, उन्हें उनके उपदेशों (गीता) का यह सार नहीं भूलना चाहिए -- (वर्तमान क्षणों में मेरी चेतना में यह पुरुषोत्तम-योग, गीता का सार है)
"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥१५:१॥
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥१५:२॥
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥१५:३॥
ततः पदं तत्परिमार्गितव्य यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥१५:४॥
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥१५:५॥
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
(पुरुषोत्तम-योग के उपरोक्त उपदेशों के भावार्थ व उन के अनेक भाष्यों का स्वाध्याय और निदिध्यासन इस लेख के जिज्ञासु पाठक स्वयं करेंगे)
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श्रुति भगवती यह बात बार-बार अनेक अनेक स्थानों पर कहती है --
"प्रणवो धनु: शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत॥"
भावार्थ -- प्रणव धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है। उसका सावधानी पूर्वक वेधन करना चाहिए और बाण के समान तन्मय हो जाना चाहिए।
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श्रुति भगवती के उपदेशों का सार उपनिषदों व गीता में है। जिस के भी हृदय में परमात्मा को पाने की अभीप्सा है, वह इनका स्वाध्याय अवश्य करेगा॥
मैंने जो कुछ भी लिखा है, वह परमात्मा से प्राप्त प्रेरणा से ही लिखा है। मेरा इसमें कुछ भी नहीं है। सारा श्रेय व सारी महिमा परमात्मा की है।
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मेरे इस भौतिक शरीर का स्वास्थ्य अधिक लिखने की अनुमति नहीं देता है। इस जीवन के जितने भी अवशिष्ट क्षण हैं, वे सब परमात्मा परमशिव को समर्पित है।
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'परमशिव' एक गहरे ध्यान में होने वाली अनुभूति है जो बुद्धि का विषय नहीं है। अपनी आत्मा में रमण ही परमात्मा का ध्यान है। भक्ति का जन्म पहले होता है। फिर सारा ज्ञान अपने आप ही प्रकट होकर भक्ति के पीछे पीछे चलता है।
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इसी तरह परा-भक्ति के साथ साथ जब सत्यनिष्ठा हो, तब भगवान का ध्यान अपने आप ही होने लगता है। जब भगवान का ध्यान होने लगता है, तब सारे यम-नियम -- भक्त के पीछे-पीछे चलते हैं। भक्त को यम-नियमों के पीछे भागने की आवश्यकता नहीं है। यम-नियम ही भगवान के भक्त से जुड़कर धन्य हो जाते हैं।
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ॐ तत्सत् !! किसको नमन करूँ? सर्वत्र तो मैं ही मैं हूँ। जहाँ मैं हूँ, वहीं भगवान हैं। जहाँ भगवान हैं, वहाँ अन्य किसी की आवश्यकता नहीं है।
कृपा शंकर
८ जनवरी २०२३

मैं किन किन से मित्रता और प्रेम-व्यवहार करूँ/रखूँ ?

 (प्रश्न) : मैं किन किन से मित्रता और प्रेम-व्यवहार करूँ/रखूँ ?

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(उत्तर) : हमारे एकमात्र शाश्वत मित्र और संबंधी सिर्फ भगवान ही हो सकते हैं, अन्य कोई नहीं। उनका साथ कभी भी नहीं छूट सकता -- इस जन्म से पूर्व भी वे ही साथ थे, और मृत्यु के बाद भी वे ही साथ रहेंगे। उनसे यदि मित्रता है तो सारी सृष्टि स्वतः ही हमारी मित्र और संबंधी है। यह सारा विश्व और सारी सृष्टि वे स्वयं ही हैं। वे ही यह विश्व बन गए हैं।
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विष्णु सहस्त्रनाम का आरंभ "ॐ विश्वं विष्णु:" शब्दों से होता है। इन तीन शब्दों में ही सारा सार आ जाता है। आगे सब इन्हीं का विस्तार है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह पूरी सृष्टि यानि सम्पूर्ण ब्रह्मांड ही विष्णु है। जो कुछ भी सृष्ट या असृष्ट है, वह सब विष्णु है। हम विष्णु में विष्णु को ढूंढ रहे हैं। ढूँढने वाला भी विष्णु है। एक महासागर की बूंद, महासागर को ढूंढ रही है। यह बूंद समर्पित होकर स्वयं महासागर हो जाती है।
"ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः।
भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥१॥"
जिसका यज्ञ और आहुतियों के समय आवाहन किया जाता है उसे वषट्कार कहते हैं। भूतभव्यभवत्प्रभुः का अर्थ भूत, वर्तमान और भविष्य का स्वामी होता है। सब जीवों के निर्माता को भूतकृत् कहते हैं, और सभी जीवों के पालनकर्ता को भूतभृत्। आगे कुछ बचा ही नहीं है। "ॐ विश्वं विष्णु: ॐ ॐ ॐ" --- बस इतना ही पर्याप्त है पुरुषोत्तम के गहरे ध्यान में जाने के लिए॥
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
८ जनवरी २०२४

जीसस क्राइस्ट के खतनोत्सव को हम नववर्ष के रूप में मना रहे हैं ---

आज जीसस क्राइस्ट के खतनोत्सव को हम नववर्ष के रूप में मना रहे हैं। जनवरी का महिना भगवान श्रीगणेश के नाम पर है। पूरे विश्व में भगवान श्रीगणेश की पूजा हुआ करती थी। रोम साम्राज्य में भगवान श्रीगणेश को "जेनस" कहते थे। वे सबसे बड़े रोमन देवता थे। अपने देवता जेनस के नाम पर रोमन साम्राज्य ने वर्ष के प्रथम माह का नाम "जनवरी" रखा। किसी भी शुभ कार्य के आरंभ से पूर्व बुद्धि के देवता "जेनस" की पूजा होती थी। जेनस से ही अंग्रेजी का "Genius" शब्द बना है। आंग्ल कलेंडर में पहले १० महीने हुआ करते थे और वर्ष का आरंभ मार्च से होता था। भारतीयों की नकल कर के रोमन साम्राज्य ने दो माह और जोड़ दिए। जेनस देवता के नाम पर जनवरी, और फेबुआ देवता के नाम पर फरवरी नाम के दो महीने और जोड़कर आंग्ल वर्ष को १२ माह का कर दिया गया।

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अंग्रेजों की सबसे बड़ी संस्कृति है -- "धूर्तता"। उनसे बड़ा कोई अन्य धूर्त नहीं है। उन्होंने इस कलेंडर को अपनाया और बड़ी धूर्तता और क्रूरता से भारत में और पूरे विश्व में अपना कलेंडर थोप दिया। परिस्थितियों के वश हम ग्रेगोरी नाम के पोप (Pope Gregory XIII) द्वारा बनाए हुए इस ईसाई ग्रेगोरियन कलेंडर को मानने को बाध्य हैं। ग्रेगोरियन कलेंडर से पूर्व जूलियन कलेंडर हुआ करता था। अक्टूबर १५८२ में पोप ग्रेगोरी XIII ने वर्तमान ईसाई कलेंडर को लागू करवाया।
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अब हमें चाहिये कि हम आत्म-साधना यानि स्वयं की अपनी आत्मा को जानने और अपनी सर्वोच्च क्षमताओं का विकास करना आरंभ करें। जब हमारे पापकर्मफलों का क्षय होने लगता है, तब पुण्यकर्मफलों का उदय होता है, और परमात्मा को जानने की एक अभीप्सा जागृत होती है। अपनी करुणा व प्रेमवश -- भगवान स्वयं एक सद्गुरु के रूप में मार्गदर्शन करने आ जाते हैं। हमारे अंतर में इस सत्य का बोध भी तुरंत हो जाता है। हर साधक को उसकी पात्रतानुसार ही मार्गदर्शन प्राप्त होता है, जिसका अतिक्रमण नहीं हो सकता। हमारा लोभ और अहंकार हमारे पतन का सबसे बड़ा कारण है। हम अपना लोभ व अहंकार परमात्मा को अर्पित कर दें, अन्यथा पतन सुनिश्चित है। सभी को मंगलमय शुभ कामनाएँ !! आपके जीवन में शुभ ही शुभ हो !!ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ जनवरी २०२५
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प्रमाण :--- Luke 2:21-38 King James Version (KJV)
And when eight days were accomplished for the circumcising of the child, his name was called JESUS, which was so named of the angel before he was conceived in the womb.

जब तक कर्ताभाव है, कोई भी आध्यात्मिक सिद्धि नहीं मिल सकती ---

 जब तक कर्ताभाव है, कोई भी आध्यात्मिक सिद्धि नहीं मिल सकती ---

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जो भी साधना हम करते हैं वह हमारे स्वयं के लिये नहीं अपितु भगवान के लिये ही करते है। उसका उद्देश्य व्यक्तिगत मुक्ति नहीं, बल्कि "आत्म समर्पण" ही है। अपने समूचे ह्रदय और शक्ति के साथ अपने आपको भगवान के हाथों में सौंप दो। कोई शर्त मत रखो, कोई चीज़ मत मांगो, यहाँ तक कि योग में सिद्धि भी मत मांगो।
न केवल कर्ताभाव, कर्मफल आदि बल्कि कर्म तक को उन्हें समर्पित कर दो। साक्षीभाव या दृष्टाभाव तक उन्हें समर्पित कर दो। साध्य भी वे हैं, साधक भी वे हैं, और साधना भी वे ही हैं। सभी को मंगलमय शुभ कामनाएँ !! आपके जीवन में शुभ ही शुभ हो !!
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२ जनवरी २०२५

जब तक हम इस भौतिक शरीर की चेतना में हैं तब तक हम पाशों में बंधे हुए पशु हैं ---

 जब तक हम इस भौतिक शरीर की चेतना में हैं तब तक हम पाशों में बंधे हुए पशु हैं। पूर्ण भक्ति से परमात्मा की अनंतता का ध्यान और समर्पण ही हमें मुक्त कर सकता है। परमात्मा की ज्योतिर्मय अनंतता का ध्यान करें। सदा परमात्मा की चेतना में रहें। हमारे में लाखों कमियाँ होंगी, उन सभी अवगुणों व गुणों को परमात्मा में समर्पित कर दें। हमारा कोई पृथक अस्तित्व नहीं है। परमात्मा को हम निरंतर स्वयं में व्यक्त करें। हम उनके साथ एक हैं, हम स्वयं परमशिव हैं। जिस ऊर्जा और प्राण से यह ब्रह्मांड निर्मित हुआ है वह ऊर्जा और प्राण हम स्वयं हैं। हम ही ऊर्जा का हर कण, उसका प्रवाह, गति, स्पंदन और आवृति हैं। हम ही इस सृष्टि के प्राण हैं। भगवान के प्रति हमारा समर्पण पूर्ण हो।

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सम्पूर्ण सृष्टि भगवत्-चेतना में है। कोई भी या कुछ भी उन से पृथक नहीं है। वे अपनी साधना स्वयं कर रहे हैं। हम निरंतर उनकी चेतना में रहें।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३ जनवरी २०२५

अनंत स्वरूप वेदान्त के सूर्य को प्रणाम ---

अनंत स्वरूप वेदान्त के सूर्य को प्रणाम ---

हमारी सब की आयु एक ही है -- और वह है "अनंत"। हम यह देह नहीं, परमात्मा की सर्वव्यापी चेतना हैं। हमारा स्वभाव "प्रेम" है, और हम स्वयं साक्षात परमात्मा के प्रेम की पूर्ण अभिव्यक्ति हैं। रात-दिन निरंतर परमात्मा के प्रेम में डूबे रहो और स्वयं वह दिव्य प्रेम बन जाओ। हम सब यह नश्वर देह नहीं, एक दिव्य परम तत्व हैं। वीतराग/स्थितप्रज्ञ होकर कूटस्थ-चैतन्य/ब्राह्मीस्थिति में रहो। अन्य सब बातें गौण हैं। कूटस्थ ही गुरु है। .
हम प्रेममय हो जायें, यही भगवान की भक्ति है। अन्य है ही कौन?
(भक्ति कोई क्रिया नहीं है, यह एक अवस्था यानि स्थिति है)
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मैं किसे पाने के लिए तड़प रहा हूँ? यह अतृप्त प्यास और असीम वेदना किसके लिए है? मेरे से अन्य तो कोई है भी नहीं। भक्ति-सूत्रों के अनुसार परमप्रेम ही भक्ति है। हम जब परमप्रेममय हो जाते हैं, यही भगवान की भक्ति करना होता है। भक्ति कोई क्रिया नहीं है, यह एक अवस्था यानि स्थिति है।
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यह एक मिथ्या भ्रम है कि हम किसी की भक्ति कर रहे हैं। हम भक्त हो सकते हैं, लेकिन किसी की भक्ति कर नहीं सकते। परमात्मा कोई वस्तु या कोई व्यक्ति नहीं है जो आकाश से उतर कर आयेगा, और कहेगा कि भक्त, वर माँग। वह कोई सिंहासन पर बैठा हुआ, दयालू या क्रोधी व्यक्ति भी नहीं है जो दंडित या पुरस्कृत करता है। परमात्मा हमारी अपनी स्वयं की ही एक उच्चतम चेतना है। यह एक अनुभूति का विषय है, जिसका मैंने अनुभव किया है।
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हम निमित्त मात्र ही नहीं, इतने अधिक प्रेममय हो जायें कि स्वयं में ही परमात्मा की अनुभूति हो। परमात्मा और स्वयं में कोई भेद न रहे। हमारा अस्तित्व ही परमात्मा का अस्तित्व हो जाए। यही परमात्मा की प्राप्ति है, यही आत्म-साक्षात्कार है। भगवान कोई ऊपर से उतर कर आने वाले नहीं, हमें स्वयं को ही परमात्मा बनना पड़ेगा। सदा शिवभाव में रहो। हम परमशिव हैं, यह नश्वर मनुष्य देह नहीं।
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लौकिक रूप से ही हम कह सकते हैं कि भगवान को अपना पूर्ण प्रेम दो। यथार्थ में वह लौकिक प्रेम हम स्वयं हैं। हमें स्वयं को ही सत्यनिष्ठ और परमप्रेममय बनना होगा। सत्यनिष्ठा कभी व्यर्थ नहीं जाती। सदा वर्तमान में रहें। परमात्मा हम स्वयं हैं। हमारा परमात्मा के रूप में जागृत होना ही परमात्मा की प्राप्ति है।
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"मिलें न रघुपति बिन अनुरागा, किएँ जोग तप ग्यान बिरागा॥" रां रामाय नमः॥ श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥ श्रीमते रामचंद्राय नमः॥ जय जय श्रीसीताराम॥
शिवोहं शिवोहं शिवोहं शिवोहं !! अहं ब्रह्मास्मि !!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
४ जनवरी २०२५