Wednesday, 1 January 2025

"आवरण, विक्षेप और दीर्घसूत्रता -- ये आध्यात्मिक साधक के सबसे बड़े शत्रु हैं। इन पर कैसे विजय पायें ?

 आज मैंने फ़ेसबुक और व्हाट्सएप्प पर मित्रों से एक प्रश्न पूछा था कि -- "आवरण, विक्षेप और दीर्घसूत्रता -- ये आध्यात्मिक साधक के सबसे बड़े शत्रु हैं। इन पर कैसे विजय पायें ?? मित्रों/शुभचिंतकों से उत्तर अपेक्षित हैं।" --

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इन जिज्ञासाओं का समाधान -- रामचरितमानस, भगवद्गीता, और उपनिषदों के स्वाध्याय से तुरंत हो जाता है। इसका उत्तर -- भक्ति और प्रार्थना है।
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रही ध्यान की बात तो इसमें कोई जटिलता नहीं है। भक्ति-सूत्रों में देवर्षि नारद जी ने भक्त की तीन अवस्थाएँ बताई हैं --
"यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति , स्तब्धो भवति, आत्मारामो भवति।"
तो यह "आत्मारामो भवति" वाली स्थिति यानि आत्माराम हो जाना ही भगवान का ध्यान है। जो अपनी आत्मा में रमण करता है, वह आत्माराम है।
भगवान की भक्ति कोई जटिल विषय नहीं है। यह स्वभाविक और हमारी विशुद्ध प्रकृति है।
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भगवान की माया के दो अस्त्र हैं -- आवरण और विक्षेप। यह दीर्घसूत्रता - एक तरह का आवरण ही है। जहाँ भक्ति होती है, वहाँ माया काम नहीं कर सकती। भक्ति में कोई मांग नहीं होती, सिर्फ समर्पण होता है। जहाँ मांग होती है, वह व्यापार होता है, भक्ति नहीं। भक्तों के गुरु तो स्वयं श्रीहनुमान जी, और भगवान श्रीराधाकृष्ण अपने आप ही हो जाते हैं।
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हाँ, जब हम भूमा-तत्व का ज्ञान पाना चाहते है, और भूमा का ध्यान करना चाहते हैं, तब अवश्य एक ब्रह्मनिष्ठ श्रोत्रीय आचार्य गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है। यह योग और वेदान्त का विषय है। भक्ति की उच्च अवस्थाओं में भी सद्गुरु की आवश्यकता है, ताकि कोई भटकाव नहीं हो। उपनिषदों का स्वाध्याय ईशावास्योपनिषद से आरंभ करना चाहिए। फिर केनोपनिषद, और फिर अपनी अपनी रुचि के अनुसार अन्य उपनिषद। साथ साथ श्रीमद्भगवद्गीता का भी समय समय पर स्वाध्याय करते रहें।
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परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति आप सब को मैं नमन करता हूँ। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२ जनवरी २०२२ . पुनश्च :-- परमात्मा का ध्यान करते समय बंद आँखों से घर-परिवार, सगे-संबंधी सब, यहाँ तक कि यह शरीर भी लुप्त हो जाता है। सारे संबंध छूट जाते हैं। लेकिन ध्यान के पश्चात आँख खुलते ही फिर उनसे मोह जागृत हो जाता है। यह माया का "आवरण" है। इस आवरण से परमात्मा का ध्यान करने की इच्छा ही समाप्त हो जाती है।
जब ध्यान करने की इच्छा होती है, या ध्यान करने बैठते हैं, तब याद आता है कि इस से भी अधिक महत्वपूर्ण कुछ और काम करना है। वह काम भी पूर्ण नहीं होता, और भटकाव में ध्यान का समय और भाव सब चला जाता है। यह माया का "विक्षेप" है जो कोई साधना नहीं करने देता।
परमात्मा का ध्यान करने का समय होता है तब सोचते हैं कि अभी इतनी जल्दी क्या है, बहुत समय पड़ा है, बाद में कर लेंगे। पर वह "बाद में" कभी नहीं आता। इसे दीर्घसूत्रता कहते हैं। यह एक प्रमाद है जिसे भगवान सनत् कुमार ने मृत्यु बताया है।

महाभारत में अर्जुन तो एक बहाना है, श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश वास्तव में भगवान ने व्यक्तिगत रूप से हमें ही दिये हैं ---

 महाभारत में अर्जुन तो एक बहाना है, श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश वास्तव में भगवान ने व्यक्तिगत रूप से हमें ही दिये हैं। इस शरीर में हमने जन्म लिया था तब तक हम भगवान के साथ थे। जब यह शरीर शांत हो जाएगा, तब फिर से भगवान के साथ ही रहेंगे। इस जन्म में भगवान ही माता-पिता, भाई-बहिन, सभी सगे-संबंधियों, और मित्रों के रूप में आये, व हमें अपना प्रेम दिया। हमारा एकमात्र संबंध भगवान के साथ है।

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हमें एक बहाना यानि निमित्त बनाकर हमारा सारा काम भगवान ही कर रहे हैं। वे ही सारी सांसें ले रहे हैं, इस हृदय में वे ही धडक रहे हैं, इन पैरों से वे ही चल रहे हैं, इन आँखों से वे ही देख रहे हैं, इस मन से वे ही सोच रहे हैं, इन हाथों से वे ही सारा काम कर रहे हैं, हमारी सारी इंद्रियों के कार्य भगवान स्वयं कर रहे हैं। वे ही सारी तन्मात्राएँ हैं। हम तो एक साक्षी मात्र हैं, वास्तव में साक्षी भी वे ही हैं, हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। दो साँसों के मध्य का संधिकाल वास्तविक संध्या है। उनमें भगवान का स्मरण रहे। जब कुंभक लग जाता है, वह कुंभक काल -- समाधि का प्रवेशद्वार है। बाहरी कुंभक की अवधि जितनी दीर्घ होगी उतना अच्छा है। हमारे सारे अवगुण और गुण भगवान के हैं। वे ही यह मैं बन गए हैं। अपनी पृथकता का बोध उन्हें समर्पित कर दें।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ जनवरी २०२४

Tuesday, 31 December 2024

आध्यात्मिक साधना क्या होती है ?

 आध्यात्मिक साधना क्या होती है ?

आध्यात्मिक साधना का अर्थ है आत्म-साधना यानि स्वयं की अपनी आत्मा को जानना और अपनी सर्वोच्च क्षमताओं का विकास करना| मनुष्य के जब पापकर्मफल क्षीण होने लगते हैं और पुण्यकर्मफलों का उदय होता है तब परमात्मा को जानने की एक अभीप्सा जागृत होती है और करुणा व प्रेमवश परमात्मा स्वयं एक सद्गुरु के रूप में मार्गदर्शन करने आ जाते हैं| स्वयं के अंतर में इस सत्य का बोध तुरंत हो जाता है|

साधक को उसकी पात्रतानुसार ही मार्गदर्शन प्राप्त होता है जिसका अतिक्रमण नहीं हो सकता| ये पंक्तियाँ लिखने का मेरा उद्देश्य यही है कि साधना के मार्ग में किसी भी प्रकार का लालच व अहंकार .... पतन का कारण हो जाता है| परमात्मा के सिवाय अन्य किसी भी लाभ की आकांक्षा नहीं होनी चाहिए, अन्यथा पतन सुनिश्चित है|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ जनवरी २०१९

जनवरी के महीने को "जनवरी" क्यों कहते है ?

 जनवरी के महीने को "जनवरी" क्यों कहते है?

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पूरे विश्व में भगवान श्रीगणेश की पूजा हुआ करती थी। रोम साम्राज्य में भगवान श्रीगणेश को "जेनस" कहते थे। वे सबसे बड़े रोमन देवता थे। अपने देवता जेनस के नाम पर रोमन साम्राज्य ने वर्ष के प्रथम माह का नाम "जनवरी" रखा। किसी भी शुभ कार्य के आरंभ से पूर्व बुद्धि के देवता "जेनस" की पूजा होती थी।
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जेनस से ही अंग्रेजी का "Genius" शब्द बना है।
आंग्ल कलेंडर में पहले १० महीने हुआ करते थे और वर्ष का आरंभ मार्च से होता था। भारतीयों की नकल कर के रोमन साम्राज्य ने दो माह और जोड़ दिए। जेनस देवता के नाम पर जनवरी, और फेबुआ देवता के नाम पर फरवरी नाम के दो महीने और जोड़कर आंग्ल वर्ष को १२ माह का कर दिया।
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अंग्रेजों की सबसे बड़ी संस्कृति है -- "धूर्तता"। उनसे बड़ा कोई अन्य धूर्त नहीं है। उन्होंने भी इसी कलेंडर को अपनाया और बड़ी धूर्तता और क्रूरता से भारत में और पूरे विश्व में अपना कलेंडर थोप दिया। परिस्थितियों के वश हम ग्रेगोरी नाम के पोप (Pope Gregory XIII) द्वारा बनाए हुए इस ईसाई ग्रेगोरियन कलेंडर को मानने को बाध्य हैं।
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१ जनवरी २०२३
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पुनश्च :-- ग्रेगोरियन कलेंडर से पूर्व जूलियन कलेंडर हुआ करता था। अक्टूबर १५८२ में पोप ग्रेगोरी XIII ने इसे लागू कराया।

भगवान ने हमारी रचना क्यों की? वे हम से क्या चाहते हैं? यह सारा प्रपंच क्यों?

 भगवान ने हमारी रचना क्यों की? वे हम से क्या चाहते हैं? यह सारा प्रपंच क्यों?

सृष्टिकर्ता को हम कैसे जान सकते हैं? क्या यह संभव है? कर्ता हम हैं या प्रकृति?
ये दुःख/सुख, अभाव/प्रचूरता, घृणा/प्रेम, राग/द्वेष, और भय/लोभ/अहंकार आदि क्यों? इस जीवन का क्या उद्देश्य है?
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उपरोक्त सारे प्रश्न शाश्वत हैं? इन पर भारत में जितनी चर्चा हुई है, उतनी तो अन्यत्र कहीं भी नहीं हुई हैं। उपनिषदों में इन सब के उत्तर मिल भी सकते हैं, और नहीं भी। आज हम इस संसार में हैं, कुछ समय पश्चात चले जाएँगे। संसारी व्यक्तियों से प्रश्न करो तो सबका उत्तर रटा-रटाया होता है, किसी का मौलिक उत्तर नहीं होता।
कोई कहता है गुरु करो। गुरु ही सब बात बताएगा। कोई कहता है हमारी विचारधारा में आ जाओ, तो ठीक है, तुम्हें ये ये लाभ मिलेंगे, अन्यथा नर्क की शाश्वत अग्नि मिलेगी। यहाँ यह भी भय पर आधारित एक व्यापार है।
श्रीमद्भगवद्गीता में और अन्य शास्त्रों में जिसे तमोगुण बताया है, लगता है वह तमोगुण ही इस संसार को चला रहा है। कहीं कहीं रजोगुण है। सतोगुण तो कहीं दिखाई ही नहीं देता।
फिर श्रीमद्भगवद्गीता के सांख्य योग में भगवान हमें तीनों गुणों से परे जाने को क्यों कहते हैं? --
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥२:४५॥"
यहाँ भगवान हमें निस्त्रेगुण्य होने को कहते हैं, लेकिन साथ में चार शर्तें भी लगा देते हैं कि पहले निर्द्वंद्व, नित्यसत्वस्थ, निर्योगक्षेम, और आत्मवान बनो। फिर आगे की बात करो।
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ये सब बातें एक सामान्य मनुष्य के वश की बात नहीं है। यह संसार ऐसे ही चलता रहेगा, जैसा अब तक चलता आया है। थक-हार कर हम आत्म-संतुष्टि के लिए तरह तरह की बातें कहते हैं, जैसे --
"उमा दारु जोषित की नाईं। सबहि नचावत रामु गोसाईं॥"
यह कोई उत्तर नहीं है। प्रश्न यहाँ बना रहता है कि "क्यों?"
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१ जनवरी २०२४

हे अनंत, हे विराट, हे परमात्मा, तुम अब और अधिक छिप नहीं सकते ---

 हे अनंत, हे विराट, हे परमात्मा, तुम अब और अधिक छिप नहीं सकते ---

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तुम्हें इसी क्षण प्रकट होना ही पड़ेगा| तुमने हमें जहाँ भी रखा है वहीं तुम्हें आना ही पड़ेगा| अब शीघ्रातिशीघ्र स्वयं को प्रकट करो| तुम्हारे बिना अब और अधिक जीना संभव नहीं है| हमें प्रत्यक्ष साक्षात्कार चाहिए, कोई दार्शनिक अवधारणा या ज्ञान नहीं| अपनी माया के आवरण से बाहर आओ और विक्षेप उत्पन्न मत करो| अंततः हो तो तुम भक्त-वत्सल ही| अपनी संतानों की करुण पुकार सुनकर तुम को आना ही पड़ेगा|
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तुम्हीं साधक हो, तुम्हीं साधना हो और तुम्ही साध्य हो| तुम ही तुम हो, मैं नहीं| हे सच्चिदानंद, तुम्हें प्रणाम ! अब विलंब मत करो|
अन्यथा शरणं नास्ति, त्वमेव शरणं मम| तस्मात्कारुण्यभावेन, रक्षस्व परमेश्वर||
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ब्रह्मानंदं परम सुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं| द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम्||
एकं नित्यं विमलंचलं सर्वधीसाक्षीभूतम्| भावातीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि||
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वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्क: प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वंसर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥
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बाहर चाहे कितना भी अंधकार हो, मेरी चेतना में तो परम ज्योतिर्मय परमात्मा ही स्वयं हैं| आज की पूरी रात्रि ही नहीं, अवशिष्ट जीवन का हर पल उन्हीं को समर्पित है| उनके सिवाय अन्य कोई है ही नहीं, मैं भी नहीं|
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति| तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति||६:३०||
अर्थात् "जो पुरुष, मुझे सर्वत्र देखता है, और सब को मुझ में देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता, और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता||"
सारा जड़ और चेतन वे ही हैं| उनके सिवाय कोई अन्य है ही नहीं| यह मैं और मेरापन -- एक मिथ्या अहंकार है|
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! हरिः ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !! .
हम जहाँ हैं, वहीं भगवान हैं, वहीं सारे तीर्थ हैं, वहीं सारे संत-महात्मा हैं, कहीं भी किसी के भी पीछे-पीछे नहीं भागना है| भगवान हैं, यहीं हैं, इसी समय हैं, और सर्वदा हैं| वे ही इन नासिकाओं से सांस ले रहे हैं, वे ही इस हृदय में धड़क रहे हैं, वे ही इन आँखों से देख रहे हैं, और इस शरीर-महाराज और मन, बुद्धि व चित्त के सारे कार्य वे ही संपादित कर रहे हैं| उनके सिवाय अन्य किसी का कोई अस्तित्व नहीं है| बाहर की भागदौड़ एक मृगतृष्णा है, बाहर कुछ भी नहीं मिलने वाला| परमात्मा की अनुभूति निज कूटस्थ-चैतन्य में ही होगी|
बाहर बहुत भयंकर ठंड का प्रकोप चल रहा है| विगत रात्री में तापमान -४ डिग्री सेल्सियस तक गिर गया था| अभी भी बर्फीली हवायें चल रही हैं| ऐसे मौसम में न तो कहीं जाना है और न किसी से मिलना-जुलना है| घर पर ही कुछ व्यायाम करेंगे और भगवान का यथासंभव अधिकाधिक ध्यान करेंगे| सभी को शुभ कामनायें व नमन !
हम चाहे कितने भी ग्रन्थ पढ़ लें, कितने भी प्रवचन और उपदेश सुन लें, कितने भी साधुओं का संग करते रहें, कितना भी दान-पुण्य करें; इनसे परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती| इनसे हम पुण्यवान तो होंगे, कुछ अच्छे कर्म भी हमारे खाते में जुड़ेंगे; और कुछ नहीं|

वीतरागता यानि राग-द्वेष रूपी द्वन्द्वों और अहंकार से मुक्त होना हमारी पहली आवश्यकता है| इसके लिए भगवान कहते हैं

"संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः| योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति||५:६||"
अर्थात् हे महाबाहो ! योग के बिना संन्यास प्राप्त होना कठिन है; योगयुक्त मननशील पुरुष परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त होता है|| (Without concentration, O Mighty Man, renunciation is difficult. But the sage who is always meditating on the Divine, before long shall attain the Absolute..)

सत्यनिष्ठा से भक्ति, समर्पण और ध्यान-साधना तो स्वयं को ही करनी होगी| भूख लगने पर भोजन स्वयं को ही करना पड़ता है| आज व कल इन दो दिनों में गीता के पांचवें अध्याय का स्वाध्याय और भगवान का खूब ध्यान करें|

ॐ नमः शम्भवाय च, मयोभवाय च, नमः शंकराय च, मयस्कराय च, नमः शिवाय च, शिवतराय च|| ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||कृपा शंकर ३१ दिसंबर २०२०

देवता पुरुष डॉ.जीवनचंद जैन को श्रद्धांजलि !

८३ वर्ष की आयु में हमारे यहाँ के गरीबों के मसीहा और हर दृष्टि से मनुष्य देह में देवता, डॉ.जीवनचंद जैन नहीं रहे|
३१ दिसंबर २०१८ को उनके निधन पर शोक में आज हमारे यहाँ के और आसपास के सारे बाजार और सारे शिक्षण संस्थान स्वतः ही बंद हो गए हैं|
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गरीबों की जितनी सेवा और कल्याण के कार्य उनके स्वयं के द्वारा और उन की प्रेरणा से औरों के द्वारा हुए, वैसे मैंने अपने पूरे जीवन काल में अन्यत्र कहीं भी किसी अन्य के द्वारा होते हुए नहीं देखे| अपनी सारी आय को वे परोपकार में लगा देते थे| वे अपने आप में एक संस्था और राजस्थान के पूरे शेखावाटी क्षेत्र में किसी भी परिचय के मोहताज नहीं थे|
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उनका जन्म राजस्थान के करौली में हुआ था पर कर्मभूमि झुंझुनू ही थी| उनकी धर्मपत्नी स्व.डॉ.कुन्दनबाला जैन पिलानी के डॉ.नंदलाल ध्रुव की पुत्री थीं| वे भी अपने जीवनकाल में एक देवी थीं| पुनश्चः श्रद्धांजलि !

३१ दिसंबर २०१८ . डॉ.जैन मनुष्य देह में हर दृष्टी से एक देवता थे| उनके स्वयं के द्वारा और उनकी प्रेरणा से सैंकड़ों अन्य व्यक्तियों द्वारा जो सेवा कार्य मैनें होते हुए देखे हैं, उनकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता| उनकी धर्मपत्नी स्व.डॉ.कुंदनबाला जैन भी एक दैवीय व्यक्तित्व की धनी थीं| डॉ.जैन अपने समय के एक विख्यात मेडिकल सर्जन थे| उनसे गरीबों का दुःख देखा नहीं गया और अपनी सरकारी नौकरी छोड़कर प्राइवेट प्रैक्टिस करने लगे| पहली बार कोई मरीज उनके पास आता तो वे मात्र दस रुपया फीस का लेते और बाद में सिर्फ पांच रुपया| किसी के पास में वह भी नहीं होता तो कोई बात नहीं, उसके निःशुल्क इलाज़ की व्यवस्था हो जाती| जटिल से जटिल ऑपरेशन भी सिर्फ लागत मूल्य पर ही कर देते| दवाइयाँ भी सिर्फ आवश्यक और कम से कम लिखते थे| बहुत सस्ते में इलाज करा देते थे| उनकी प्रेरणा से हर वर्ष सैंकड़ों गरीबों का निःशुल्क इलाज होता था| हर वर्ष गरीबों को सैंकड़ों कम्बल. रजाइयाँ, स्वेटर आदि दी जाती थीं| अनेक महिलाओं को सिलाई की मशीनें देकर स्वावलंबी बनाया गया| और भी अनगिनित सेवा कार्य उनकी प्रेरणा से हो रहे थे|
राजस्थान के झुंझुनू जिले की एक महान हस्ती अब इस दुनियाँ में नहीं रही| डॉ.जीवनचंद जैन साहब को नमन !