Thursday, 26 December 2024

उपनिषदों के स्वाध्याय में बड़ा आनंद है, पूरा ब्रह्मज्ञान है उनमें ---

उपनिषदों के स्वाध्याय में बड़ा आनंद है। पूरा ब्रह्मज्ञान है उनमें। लेकिन मुझ में भावुकता बहुत अधिक है, भक्ति की जरा-जरा सी बातों पर भावुक हो जाता हूँ। भावुकता में कभी ध्यानस्थ हो जाता हूँ, और कभी आँखों से आंसुओं की झड़ी लग जाती है। सब लोग पूछते हैं कि रो क्यों रहे हो? मेरा एक ही उत्तर होता है कि "बहुत तेज जुकाम लगी हुई है"। आजकल तो भक्ति के अतिरिक्त अन्य कुछ समझ में भी नहीं आता, और अच्छा भी नहीं लगता। मेरा स्वभाव भक्ति-प्रधान है। अनेक ऐसे विषय हैं जो अभी समझ में आ रहे हैं।

दो प्रश्न हैं जिनका मैं अति संक्षिप्त में उत्तर देना चाहता हूँ।
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(प्रश्न १) मुझे भारत से प्रेम क्यों है ?
(उत्तर) भारत में ही हर काल-खंड में धर्म व परमात्मा की सर्वोत्तम व सर्वोच्च अभिव्यक्ति हुई है। ईश्वर के सभी अवतारों ने भारत में ही जन्म लिया है। भारत -- त्यागी तपस्वियों, संत महात्माओं, व विरक्त ज्ञानियों की भूमि रहा है। धर्म का प्रचार प्रसार व ज्ञान भारत से ही विश्व को हुआ है। परमात्मा से अहेतुकी परम प्रेम (सम्पूर्ण भक्ति), व अनन्य भक्ति की अवधारणा -- विश्व को भारत की ही देन है।
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(प्रश्न २) मुझे परमात्मा से प्रेम क्यों है?
(उत्तर) इसका कोई उत्तर नहीं है। यह जन्मजात है। भगवान से भक्ति (परमप्रेम) मेरा स्वभाव है। यह परमात्मा की मुझ पर विशेष कृपा है।
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(प्रश्न ३) मुझे सनातन-धर्म से प्रेम क्यों है?
(उत्तर) सनातन धर्म ही एकमात्र धर्म है जो हमें परमात्मा की प्राप्ति ही नहीं, उनके साथ एक कर भी सकता है। धर्म के दस लक्षण हैं, जिन को धारण करने से अभ्युदय (सर्वतोमुखी पूर्ण विकास) और निःश्रेयस (सब तरह के दुःखों और पीड़ाओं से मुक्ति) की सिद्धि होती है। यह धर्म सृष्टि के आदि काल से ही शाश्वत और सनातन है। लिखने को और भी बहुत कुछ है, लेकिन इस समय इतना ही पर्याप्त है।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ दिसंबर २०२२

Wednesday, 25 December 2024

दो अति महान व्यक्तित्व जिनकी तत्कालीन शासकों ने उनकी सत्यनिष्ठ विचारधारा के कारण सदा उपेक्षा ही की, और वे बिना किसी सरकारी मान्यता के Unsung Heros की तरह हमारे मध्य से चले गए ---

 दो अति महान व्यक्तित्व जिनकी तत्कालीन शासकों ने उनकी सत्यनिष्ठ विचारधारा के कारण सदा उपेक्षा ही की, और वे बिना किसी सरकारी मान्यता के Unsung Heros की तरह हमारे मध्य से चले गए ---

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(१) मेरी दृष्टि में इस शताब्दी में वैदिक परंपरा के महानतम दार्शनिक -- स्व.श्री रामस्वरूप अग्रवाल (१९२० - २६ दिसंबर १९९८) थे। उनसे बड़ा कोई दार्शनिक भारत में पिछली एक शताब्दी में कोई दूसरा नहीं हुआ। वे अपने नाम के साथ अग्रवाल नहीं लिखते थे, सिर्फ रामस्वरूप ही लिखते थे। उनका जन्म सं १९२९ में हरियाणा के सोनीपत में एक गर्ग गौत्रीय अग्रवाल परिवार में हुआ था। वे जीवन भर अविवाहित रहे। दिल्ली में उन्होंने अर्थशास्त्र का अध्ययन किया, लेकिन सारा जीवन धर्म, ज्ञान, और सामाजिक चिंतन में ही व्यतीत किया। वे एक बहुत ही उच्च स्तर के महान योगसाधक भी थे।
उनका निधन २६ दिसंबर १९९८ को हुआ। आज उनकी २४ वीं पुण्यतिथि पर उनको सादर नमन और श्रद्धांजलि।
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उनके प्रमुख शिष्य श्री सीताराम गोयल (१६ अक्टूबर १९२१ - ३ दिसंबर २००३) थे, जिन्हें मैं इस शताब्दी का महानतम इतिहासकार कहता हूँ। इनका जन्म भी हरियाणा में हुआ था। सन १९५१ से १९९८ तक श्री सीताराम गोयल ने ३० से अधिक पुस्तकें और सैंकड़ों लेख लिखे। बेल्जियन विद्वान कोएनराड एल्स्ट ने लिखा है कि गोयल की बातों का या उनकी पुस्तकों में दिए तथ्यों का आज तक कोई खंडन नहीं कर सका है।
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वर्तमान में भारतीयता के प्रति जो इतनी सजगता देखने में आ रही है, उसका श्रेय मैं श्री गोयल के लेखन को देता हूँ। वे एक महान कर्मयोगी थे। दिल्ली में उन्होंने "वॉयस ऑफ इंडिया" नाम के प्रकाशन की स्थापना की, जो अभी भी चल रहा है। उपरोक्त दोनों महान विभूतियों का साहित्य वहीं पर उपलब्ध है।
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श्री रामस्वरूप जी का पुण्य स्मरण स्वयं में एक पुण्य कर्म है। उन्हें शत शत नमन।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२६ दिसंबर २०२२

भगवान के भजन के लिए यह मौसम बहुत अच्छा है (बुढ़ापा सबसे खराब चीज है)

 भगवान के भजन के लिए यह मौसम बहुत अच्छा है (बुढ़ापा सबसे खराब चीज है)

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"दुनिया भी अजब सराय फानी देखी,
हर चीज यहां की आनी जानी देखी।
जो आके ना जाये वो बुढ़ापा देखा,
जो जा के ना आये वो जवानी देखी।।"
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पिछले दो दिनों से बड़ी भयंकर शीत-लहर चल रही है। बाहर बर्फीली हवाएँ चल रही हैं। पहाड़ों में बर्फ गिरती है तो भौगोलिक कारणों से उनकी शीत लहर सीधी इधर ही आती है।
Electric Room Heater का उपयोग शयन कक्ष में करना पड़ रहा है। इटली की हमारी एक सत्संगी बहिन ने एक बिजली से गरम होने वाली गद्दी भी भेज रखी है, जिसे बिस्तर की चद्दर के नीचे लगाते ही बिस्तर गरम हो जाता है। बुढ़ापे में सर्दी सहन नहीं होती। यह बुढ़ापा बहुत खराब चीज है।
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यमराज भी सर्दी के मौसम में ही बड़े-बूढ़ों पर अपनी परम कृपा करते हैं। अभी उनकी कृपा नहीं चाहिए। कुछ भजन-बंदगी-साधना-तपस्या तो की ही नहीं है, इसलिए यम महाराज का यहाँ क्या काम? जब भगवान के भजनों से हृदय तृप्त हो जाएगा, तब भगवान के संकेत मात्र से यह संसार छोड़ देंगे। यमराज महाराज इधर आने का कष्ट न उठायें। वैसे भी उनका यहाँ स्वागत नहीं है -- "चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥"
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर पाहि माम्।
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्ष माम्॥
रत्नसानुशरासनं रजताद्रिश्रृङ्गनिकेतनं
शिञ्जिनीकृतपन्नगेश्वरमच्युतानलसायकम् ।
क्षिप्रदग्धपुरत्रयं त्रिदशालयैरभिवन्दितं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः।।"
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दिन-रात भगवान का चिंतन हो। अन्य कोई बात चेतना में न रहे। तब बाहर के मौसम से कोई अंतर नहीं पड़ेगा। भगवान का चिंतन करते करते ही उनकी चेतना में ब्रह्मरंध्र के मार्ग से सूर्यमंडल में एक दिन गमन हो जायेगा।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ दिसंबर २०२२

हमारे जीवन का प्रथम, अंतिम और एकमात्र लक्ष्य/उद्देश्य -- "ईश्वर की प्राप्ति" है ---

 हमारे जीवन का प्रथम, अंतिम और एकमात्र लक्ष्य/उद्देश्य -- "ईश्वर की प्राप्ति" है। इसके लिए कोई से भी साधन हों -- भक्ति, योग, तंत्र आदि सब स्वीकार्य हों।

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अब इस समय साधना की सारी विधियों का महत्व समाप्त हो गया है। साधना की सारी पद्धतियाँ अब भूतकाल का विषय रह गयी हैं। वर्तमान में महत्व रहा है सिर्फ -- "परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभूतियों" का जो प्रेम और आनंद के रूप में अनुभूत और व्यक्त हो रही हैं।
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नदियों का प्रवाह महासागर की ओर होता है। लेकिन एक बार महासागर में मिलने के पश्चात नदियों का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो जाता है। फिर महासागर का ही अवशेष रहता है। जो जलराशि महासागर से मिल गई हैं, वह बापस नदियों में नहीं जाना चाहती हैं। इसी तरह अब सारे पंथों और सिद्धांतों का कोई महत्व नहीं रहा है। भगवान हैं, इसी समय है, यही पर हैं, हर समय और सर्वत्र हैं। वे हैं, बस यही महत्वपूर्ण है। भगवान की आनंद रूपी जलराशि में तैर रहे हैं, उनकी जलराशि बन कर उनके महासागर में विलीन हो गये हैं। यही भाव सदा बना रहे।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ दिसंबर २०२३

हम परमब्रह्म परमशिव परमात्मा की ब्राह्मी-चेतना, यानि कूटस्थ-चैतन्य में, प्रयासपूर्वक निरंतर बने रहेंगे ---

 हम परमब्रह्म परमशिव परमात्मा की ब्राह्मी-चेतना, यानि कूटस्थ-चैतन्य में, प्रयासपूर्वक निरंतर बने रहेंगे ---

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अंततः भगवत्-प्राप्ति/आत्म-साक्षात्कार/कैवल्य-मोक्ष ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य और सनातन-धर्म का सार है। परमात्मा ही हमारा लक्ष्य है। वे हर समय हमारे समक्ष अपने परम ज्योतिर्मय रूप में हैं। उनके पथ पर कहीं कोई अंधकार नहीं है। हमारी दृष्टि उन पर ही स्थिर रहे, हम उन्हीं की चेतना में सदा उनकी ओर ही अग्रसर रहें। राग-द्वेष व अहंकार से मुक्त होकर हम वीतराग होंगे। हमारी प्रज्ञा परमात्मा में स्थिर होगी और हम स्थितप्रज्ञ होंगे। हमारी चेतना निरंतर कूटस्थ-चैतन्य में होगी, और हम सदा ब्राह्मी-स्थिति में रहेंगे।
हम सदा हर समय परमब्रह्म परमात्मा के साथ एक हैं। उनमें और हमारे में कोई भेद नहीं है। अब इसी क्षण से जब भी समय मिलेगा तब, और विशेषकर रात्रि की निःस्तब्धता में यथासंभव अधिकाधिक समय गुरु प्रदत्त विधि से परमात्मा की उपासना/ध्यान आदि में ही व्यतीत करेंगे।
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हर समय परमात्मा का स्मरण करते हुए ही हमें अपनी उपासना की अवधि का समय भी बढ़ा कर २४ घंटों में से कम से कम ८ घंटों का करना है। अब से प्रतिदिन कम से कम ८ घंटे भगवान का विधिवत ध्यान करेंगे, जो दो टुकड़ों में भी कर सकते हैं। परमात्मा ही हमारा अपना स्वरूप है। हम यह मनुष्य शरीर नहीं, सर्वव्यापी परमात्मा के साथ एक हैं। हम अपनी चेतना के उच्चतम बिन्दु पर परमशिव परमात्मा के अनंत परम ज्योतिर्मय रूप का ध्यान करें। पृष्ठभूमि में मंत्र का श्रवण भी निरंतर होता रहे। हम स्वयं मंत्रमय और परम ज्योतिर्मय हैं। सबसे बड़े गुरु तो भगवान श्रीकृष्ण स्वयं हैं, वे जगतगुरु हैं। कभी तो वे अपनी त्रिभंग-मुद्रा में, या कभी शांभवी-मुद्रा में हर समय हमारे साथ रहते है।
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भारत को सबसे बड़ा खतरा अधर्म से है। हमारी साधना से ही धर्म की जय होगी, और अधर्म का नाश होगा। आज के दिन से ही भारत और सनातन धर्म की रक्षा के लिए अधिकाधिक साधना करें। किसी भी तरह के वाद-विवाद आदि में न पड़ें। हमारा लक्ष्य वाद-विवाद नहीं, परमात्मा की प्राप्ति है। भगवान का ध्यान हमें चिन्ता मुक्त कर देता है| तत्पश्चात हम केवल निमित्त मात्र बन जाते हैं| हमारे माध्यम से भगवान ही सारे कार्य करते हैं।
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भारतवर्ष में मनुष्य देह में जन्म लेकर भी यदि कोई भगवान की भक्ति ना करे तो वह अभागा है। भगवान के प्रति परम प्रेम, समर्पण और समष्टि के कल्याण की अवधारणा सिर्फ भारत की ही देन है। सनातन धर्म का आधार भी यही है। पहले निज जीवन में परमात्मा को व्यक्त करो, फिर जीवन के सारे कार्य श्रेष्ठतम ही होंगे। परमात्मा को पूर्ण ह्रदय से प्रेम करो, फिर सब कुछ प्राप्त हो जाएगा। धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ दिसंबर २०२४

यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ---

भगवान श्रीगणेश और जगन्माता को नमन करते हुए कुछ लिखने का प्रयास कर रहा हूँ। ध्यान-साधना का एकमात्र उद्देश्य है -- आत्म-साक्षात्कार यानि Self-Realization। एक बार परमात्मा की अनुभूति हो जाये तो साधक को उनसे परमप्रेम हो जाता है, और वह इधर-उधर अन्यत्र कहीं भी नहीं भागता। इस समय मध्यरात्रि है, और परमात्मा की चेतना में जो भी भाव आ रहे हैं, उन्हें ही यहाँ व्यक्त कर रहा हूँ।

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"मैं अनंतानांत समस्त सृष्टि और उससे भी परे जो कुछ भी सृष्ट और असृष्ट है, वह हूँ, और अपने परम ज्योतिर्मय रूप में सर्वत्र व्याप्त हूँ। सब जीवों में मैं ही उपासना कर रहा हूँ। पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म और सब नियम मेरी ही रचना है। मैं अनन्य हूँ। उत्तरायण और दक्षिणायन दोनों ही मेरे मन की कल्पना हैं। मैं उनसे बहुत परे हूँ।"
(टिप्पणी :-- आंतरिक उत्तरायण और दक्षिणायण -- यह साधनाजन्य अनुभूति का विषय है, बुद्धि का नहीं। अतः इस विषय को यहीं छोड़ रहा हूँ, और कुछ भी नहीं लिख रहा। मुझे मुक्ति या मोक्ष की कामना नहीं है, अतः दक्षिणायण का आंतरिक मार्ग ही पसंद है।)
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भगवान कहते हैं --
"अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥८:२१॥"
अर्थात् -- जो अव्यक्त अक्षर कहा गया है, वही परम गति (लक्ष्य) है। जिसे प्राप्त होकर (साधकगण) पुनः (संसार को) नहीं लौटते, वह मेरा परम धाम है॥
The wise say that the Unmanifest and Indestructible is the highest goal of all; when once That is reached, there is no return. That is My Blessed Home.
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भगवान कहते हैं --
"वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्॥८:२८॥"
अर्थात् -- योगी पुरुष यह सब (दोनों मार्गों के तत्त्व को) जानकर वेदाध्ययन, यज्ञ, तप और दान करने में जो पुण्य फल कहा गया है, उस सबका उल्लंघन कर जाता है और आद्य (सनातन), परम स्थान को प्राप्त होता है॥
The sage who knows this, passes beyond all merit that comes from the study of the scriptures, from sacrifice, from austerities and charity, and reaches the Supreme Primeval Abode."
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भगवान हमें अनात्मा से तादात्म्य हटाकर, मन को आत्मस्वरूप में एकाग्र करना सिखा रहे हैं। संसार में रहते हुए, और सांसारिक कार्य करते हुए भी सदा अक्षरपुरुष ब्रह्म के साथ अनन्य-भाव से तादात्म्य स्थापित कर आत्मज्ञान में स्थिर रहने का प्रयत्न हमें करते रहना चाहिए।
(इसके लिए साधना करनी पड़ती है)
यहाँ भगवान कहते हैं कि हमें हमारे में थोड़ी-बहुत अत्यल्प मात्रा में जो भी योग्यता है, हमें ध्यान-साधना का अभ्यास करना चाहिये। इससे हम सब फलों का उल्लंघन कर सकते हैं। इसके नित्य नियमित अभ्यास से विवेक और वैराग्य दोनों ही जागृत होते हैं। बाकी सब भगवान की कृपा पर निर्भर है। हमारे ऊपर भगवान की कृपा बनी रहे, इसका उपाय निरंतर करना चाहिए।
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मैं भगवान श्रीकृष्ण को नमन करता हूँ कि उनकी परम कृपा से ही यह सब लिख पाया, अन्यथा मुझमें कोई योग्यता नहीं है। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२५ दिसंबर २०२४

यदि जीसस क्राइस्ट हैं तो वर्तमान ईसाई रिलीजन से उनका कोई संबंध नहीं है। वर्तमान ईसाई रिलीजन मात्र एक चर्चवाद है --

हे ईसाई मज़हब के प्रचारको, तुम लोग पूरे विश्व में एक असत्य का अंधकार फैला रहे हो। तुम लोग चाहो तो अपने मत में आस्था रखो, पर हमारे गरीब और लाचार हिंदुओं का धर्मांतरण मत करो। हमारे सनातन धर्म की निंदा और हम पर झूठे दोषारोपण मत करो। तुम लोगों ने भारत में सबसे अधिक अत्याचार और नरसंहार किये हैं। भारत का सबसे अधिक अहित तुम लोगों ने किया है।

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ईश्वर को प्राप्त करना हम सब का जन्मसिद्ध अधिकार है। सभी प्राणी ईश्वर की संतान हैं। जन्म से कोई भी पापी नहीं है। सभी अमृतपुत्र हैं परमात्मा के। मनुष्य को पापी कहना सबसे बड़ा पाप है। अपने पूर्ण ह्रदय से परमात्मा को प्यार करो। यह झूठ है कि जीसस क्राइस्ट में आस्था वालों को ही मुक्ति मिलेगी और अन्य सब नर्क की अग्नि में अनंत काल तक तड़पाये जाएँगे। तुम्हारा तथाकथित परमेश्वर झूठा और दूसरों को दुःखदायी है।
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यह जीसस क्राइस्ट का सबसे बड़ा उपदेश है जिसकी उपेक्षा कर ईसाईयों ने सिर्फ मारकाट और नर संहार ही किये हैं ---
Sermon on the Mount ..... He said ..... "But seek ye first the kingdom of God and His righteousness, and all these things shall be added unto you." Matthew 6:33 KJV.
अर्थात् .... पहिले परमात्मा के राज्य को ढूंढो, फिर अन्य सब कुछ तुम्हें स्वतः ही प्राप्त हो जाएगा।
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ईसाईयत में कर्मफलों का सिद्धांत .....
"He that leadeth into captivity shall go into captivity: he that killeth with the sword must be killed with the sword.
Revelation 13:10 KJV."
उपरोक्त उद्धरण प्राचीन लैटिन बाइबल की Revelation नामक पुस्तक के किंग जेम्स वर्ज़न से लिया गया है| एक धर्मगुरु अपने एक नौकर के कान अपनी तलवार से काट देता है जिस पर जीसस क्राइस्ट ने उसे तलवार लौटाने को कहा और उपरोक्त बात कही|
(विडम्बना है कि उसी जीसस क्राइस्ट के अनुयायियों ने पूरे विश्व में सबसे अधिक अत्याचार और नर-संहार किये).
All who will take up the sword will die by the sword.
Live by the sword, die by the sword.
जो दूसरों को तलवार से काटते हैं वे स्वयं भी तलवार से ही काटे जाते हैं ....
प्रकृति किसी को क्षमा नहीं करती| कर्मों का फल मिले बिना नहीं रहता।
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अपने कर्मों का फल सब को अवश्य मिलेगा। कोई इस से बच नहीं सकता। विश्व में अनेक अति गुप्त ईसाई संस्थाएँ हैं जो घोर कुटिलता और हिंसा से अभी भी पूरे विश्व पर अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहती हैं| ऐसी संस्थाओं से हमें अति सचेत रहना है| भारत की रक्षा तो भगवान ने ही की है, अन्यथा भारत तो उनके द्वारा अब तक नष्ट हो चुका होता।
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मेरे कई ईसाई मित्र हैं (रोमन कैथोलिक भी और प्रोटोस्टेंट भी) जिनके साथ मैं कई बार उनके चर्चों में गया हूँ और वहाँ की प्रार्थना सभाओं में भी भाग लिया है। दो बार इटली में वेनिस और कुछ अन्य नगरों में भी गया हूँ जहाँ खूब बड़े बड़े चर्च हैं जिनमें उपस्थिति नगण्य ही रहती है। यूरोप व अमेरिका के कई ईसाई पादरियों से मेरा परिचय रहा है। कुछ अमेरिकन व इटालियन ईसाई भक्तों से मैंने क्रिसमस पर Carols भी खूब सुने हैं। कुल मिलाकर मेरा अनुभवजन्य मत यही है कि जो जिज्ञासु ईसाई हैं उनको अपनी जिज्ञासाओं का समाधान सनातन हिन्दू धर्म में ही मिलता है, और इस बात की पूरी संभावना है कि विश्व के सारे समझदार ईसाई एक न एक दिन सनातन हिन्दू धर्म को ही अपना लेंगे।
कृपा शंकर
२५ दिसंबर २०२४