Tuesday, 17 December 2024

राष्ट्रहित में ---

 राष्ट्रहित में ---

-
जब तक इस शरीर को धारण कर रखा है तब तक मैं सर्वप्रथम भारतवर्ष का एक विचारशील नागरिक हूँ| भारतवर्ष में ही नहीं पूरे विश्व में होने वाली हर घटना का मुझ पर ही नहीं सब पर प्रभाव पड़ता है| आध्यात्म के नाम पर भौतिक जगत से मैं तटस्थ नहीं रह सकता|
.
पर यदि भारत, भारत ही नहीं रहेगा तब धर्म भी नहीं रहेगा, श्रुतियाँ-स्मृतियाँ भी नहीं रहेंगी, यानि वेद आदि ग्रन्थ भी नष्ट हो जायेंगे, साधू-संत भी नहीं रहेंगे, सदाचार भी नहीं रहेगा और देश की अस्मिता ही नष्ट हो जायेगी| इसी तरह यदि धर्म ही नहीं रहा तो भारत भी नहीं रहेगा| दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं| अतः राष्ट्रहित हमारा सर्वोपरि दायित्व है| धर्म के बिना राष्ट्र नहीं है, और राष्ट्र के बिना धर्म नहीं है| सनातन धर्म ही भारत है और भारत ही सनातन धर्म है|
.
सिन्धु नदी के तट पर ऋषियों को वेदों के दर्शन हुए थे| आज सिन्धु नदी के तट पर कहीं पर भी वेदों की ध्वनि नहीं सुनाई देती| भारतवर्ष की अस्मिता सनातन धर्म है, वही इसकी रक्षा कर सकता है| भारतवर्ष की रक्षा न तो मार्क्सवाद कर सकता है, न समाजवाद, न धर्मनिर्पेक्षतावाद न सर्वधर्मसमभाववाद और न अल्पसंख्यकवाद| यदि सनातन धर्म ही नष्ट हो गया तो भारतवर्ष भी नष्ट हो जाएगा| भारत के बिना सनातन धर्म भी नहीं है, और सनातन धर्म के बिना भारत भी नहीं है|
.
विश्व का भविष्य भारतवर्ष से है, और भारत का भविष्य सनातन धर्म से है| यदि सनातन धर्म ही नष्ट हो गया तो यह संसार भी नष्ट हो जायेगा|
.
भारत की वर्तमान शासन व्यवस्था लोकतंत्रीय संसदीय शासन की है| पर आज लोकतंत्र का स्थान भीड़तंत्र ने ले लिया है| संसद को चलाने में प्रति मिनट २५ लाख रूपये खर्च होते हैं| सांसदों को अत्यधिक वेतन, आर्थिक लाभ, निःशुल्क भव्य निवास, निःशुल्क वाहन, निःशुल्क यात्रा, निःशुल्क फोन, जीवन भर की पेंशन और अन्य दुनिया भर की सुविधाएँ दी जाती हैं| ये सब करदाताओं के पैसों से है | यदि इनका दुरुपयोग होता है तो ये सब बंद होनी चाहिएँ|
.
सांसद को उतने ही दिन का वेतन मिलना चाहिए जितने दिन वह संसद में आकर शांति से अपना काम करता है| शोरगुल व हो-हल्ला करने वालों को बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए और उस दिन के लिए उसे कुछ भी पैसा नहीं मिलना चाहिए| अपने जीवन यापन और पेंशन की व्यवस्था भी वे खुद ही करें| हम सोचते हैं कि ये लोग देश का भला करेंगे पर पिछले कुछ दिनों से जो कुछ भी हो रहा है उससे पूरा देश निराश हुआ है|
.
इसका विरोध कीजिये जो हर प्रबुद्ध नागरिक का दायित्व है| हमें क्या आवश्यकता है ऐसी व्यवस्था व ऐसे लोगों की जो देशहित में कार्य करने की बजाय अपने दल के हित में और अपने व्यक्तिगत हित में करते हैं? ज़रा जरा सी असंगत बातों पर संसद को ठप्प कर देना क्या उनको शोभा देता है? यह अधर्म नहीं तो और क्या है?
.
भारत माता की जय |
जयतु वैदिकी संस्कृतिः जयतु भारतम् | ---जय श्रीराम--- ॐ ॐ ॐ ||
१८ दिसंबर २०१५

भगवान को हम दे ही क्या सकते हैं? सब कुछ तो उनका ही दिया हुआ है .....

 भगवान को हम दे ही क्या सकते हैं? सब कुछ तो उनका ही दिया हुआ है .....

.
भगवान को हम दे ही क्या सकते हैं? सब कुछ तो उनका ही दिया हुआ है| हाँ, पर एक चीज ऐसी भी है जो सिर्फ हमारे ही पास है और भगवान भी उसे हमसे बापस पाना चाहते हैं| उस के अतिरिक्त अन्य कुछ भी हमारे पास अपना कहने को नहीं है| वह सिर्फ हम ही उन्हें दे सकते हैं, कोई अन्य नहीं| और वह है ..... हमारा अहैतुकी परम प्रेम||
.
इस समस्त सृष्टि का उद्भव परमात्मा के संकल्प से हुआ है और वे ही है जो सब रूपों में स्वयं को व्यक्त कर रहे है| कर्ता भी वे है और भोक्ता भी वे ही है|
वे स्वयं ही अपनी सृष्टि के उद्भव, स्थिति और संहार के कर्ता है| जीवों की रचना भी उन्हीं के संकल्प से हुई है| सारे कर्मों के कर्ता भी वे ही है और भोक्ता भी वे ही है| सृष्टि का उद्देष्य ही यह है कि हम अपनी सर्वश्रेष्ठ सम्भावना को व्यक्त कर पुनश्चः उन्हीं की चेतना में जा मिलें| यह उन्हीं की माया है जो अहंकार का सृजन कर हमें उन से पृथक कर रही है| इस संसार के सारे दु:ख और कष्ट इसी लिए हैं कि हम परमात्मा से अहंकारवश पृथक हैं, और इनसे मुक्ति भी परमात्मा में पूर्ण समर्पण कर के ही मिल सकती है| वे भी सोचते हैं कि कभी न कभी तो कोई उनकी संतान उनको प्रेम अवश्य करेगी| वे भी हमारे प्रेम के बिना दु:खी हैं चाहे वे स्वयं सच्चिदानंद हों|
भगवान हम से प्रसन्न तभी होंगे जब हम अपना पूर्ण अहैतुकी परम प्रेम उन्हें समर्पित कर दें| अन्य कोई मार्ग नहीं है उन को प्रसन्न करने का|
.
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ ||
१८ दिसंबर २०१६

निकट भविष्य में भारत को एक बड़े युद्ध में उतरना पड़ सकता है ---

 निकट भविष्य में भारत को एक बड़े युद्ध में उतरना पड़ सकता है ---

.
मैं जो लिखने जा रहा हूँ वह कोई ज्योतिषीय गणना नहीं, वर्तमान विश्व की समसामयिक परिस्थितियों पर आधारित एक यथार्थ आंकलन है, जो सही भी हो सकता है और गलत भी। लेकिन हमें किसी भी परिस्थिति का सामना करने को तैयार रहना चाहिए।
भारत अपने आप को चाहे कितना भी अहिंसा का पुजारी, शांतिप्रिय और गांधीवादी सिद्ध करना चाहे, लेकिन भारत युद्ध से बच नहीं सकता। निकट भविष्य में भारत को एक भयानक युद्ध में उतरना ही पड़ सकता है। युद्ध हिंसा से ही जीते जाते हैं, अहिंसा से नहीं। समय आने पर हिंसक भी होना ही पड़ता है।
.
मुझे लगता है कि भारत पर युद्ध -- भारत के कुछ पड़ोसी (चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश) ही थोपेंगे। चीन की यात्रा मैं तीन-चार बार कर चुका हूँ। वहाँ का खानपान ही ऐसा है कि लोगों की सोच ही महा तामसिक है। वे कीड़े-मकोड़े आदि (जो कुछ भी चलता-फिरता है) सब कुछ खा जाते हैं। वहाँ का घी और मक्खन भी जानवरों की चर्बी से बनाया जाता है। उनका भरोसा नहीं किया जा सकता। वे कुत्ते का मांस तक खाते हैं। चीन में हजारों भारतीय काम भी करते हैं, और व्यापार भी। वे अपना खाना खुद बनाकर खाते हैं। आप चीन से आये किसी भी भारतीय को पूछ सकते हैं।
.
इस बात की पूरी संभावना है कि अवसर मिलते ही चीन -- पाकिस्तान और बांग्लादेश को भड़का कर उनको अपने साथ लेकर भारत से एक युद्ध छेड़ेगा। यह युद्ध बड़ा भयानक और निर्णायक होगा। संभावना है कि म्यांमार पर भी चीन -- सैनिक आक्रमण कर के अपना अधिकार कर सकता है, क्योंकि चीन के समक्ष म्यामार एक निरीह देश है। बांग्लादेश में वहाँ के कट्टरपंथियों ने वहाँ के हिंदुओं की हत्या करना आरंभ कर दिया है। उसमें अब और तेजी आयेगी। पाकिस्तान में बहुत मुश्किल से १% हिन्दू बचे हैं, वे भी मार दिये जा सकते हैं। हालत बहुत अधिक गंभीर हो जायेगी। विवश होकर भारत को सैनिक हस्तक्षेप करना ही होगा।
.
अमेरिका के होने वाले राष्ट्रपति ट्रंप ने चीन को अपना शत्रु नंबर एक बताया है। चीन ने अमेरिका में अपने एक लाख से अधिक युवा अविवाहित पूरी तरह से प्रशिक्षित पुरुष व महिला सैनिकों की घुसपैठ करा दी है। उनका उद्देश्य समय आने पर अमेरिका को पूरी तरह से तोड़ना है। अंततः अमेरिका और चीन में भी युद्ध होना निश्चित है, जिसमें चीन के सात टुकड़े हो सकते हैं।
.
भारत में भी चीन और पाकिस्तान के बहुत अधिक समर्थक हैं। वे यहाँ गृह-युद्ध की सी स्थिति उत्पन्न कर सकते हैं। उनसे निपटने की भी तैयारी सभी राष्ट्रप्रेमियों को करनी पड़ेगी। जो कुछ भी विनाश होना है वह अगले एक वर्ष के भीतर भीतर हो जाएगा। फिर नवसृजन का युग आरंभ होगा। ऐसा होता आया है और होता ही रहेगा।
.
यह एक आंकलन मात्र है वर्तमान परिप्रेक्ष्य में। लेकिन सजग रहना हमारा काम है। सभी को मंगलमय शुभ कामनाएँ। हरिः ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२ दिसंबर २०२४

"ब्रह्मशक्ति" शब्द से मेरा क्या तात्पर्य है? ---

मैं समस्त दैवीय शक्तियों, सप्त चिरंजीवियों, सिद्ध योगियों और तपस्वी महात्माओं का आवाहन और प्रार्थना करता हूँ कि उनके आध्यात्म-बल से भारत में एक ब्रह्मशक्ति का तुरंत प्राकट्य हो। भारत के सभी आंतरिक और बाह्य शत्रुओं का नाश हो। समय आ गया है -- "इस राष्ट्र भारत में धर्म की पुनःस्थापना और वैश्वीकरण हो।" ॐ स्वस्ति !!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ दिसंबर २०२४

. "ब्रह्मशक्ति" शब्द से मेरा क्या तात्पर्य है? ---

.
राष्ट्र की ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व की सबसे बड़ी आवश्यकता इस समय सत्य-सनातन-धर्म की पुनःप्रतिष्ठा और वैश्वीकरण है। इसके लिए भारत में एक ब्रह्मशक्ति का प्राकट्य परमावश्यक है। ब्रह्मशक्ति का अर्थ है -- हमारी भक्ति और आध्यात्मिक साधना के प्रभाव से प्रकट हुई एक ईश्वरीय शक्ति, जो हमारे चारों ओर छाये हुये अंधकार को दूर करने में हमारी सहायता करे। इसके लिए हमें ईश्वर की उपासना करते हैं।
.
सूक्ष्म जगत के कुछ अदृश्य महात्माओं का मुझे संरक्षण और मार्गदर्शन प्राप्त है। वे मुझे भटकने नहीं देते। भटक भी जाता हूँ तो बापस खींचकर ईश्वरीय मार्ग पर ले आते हैं। वे ही प्रेरणा दे रहे हैं कि मुझे अपना शेष सारा जीवन परमात्मा की उपासना में ही व्यतीत करना चहिए। बौद्धिक स्तर पर मुझे किसी भी तरह का कोई संशय नहीं है, हर चीज स्पष्ट है। मुझे कहा गया है कि अपने अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) का परमात्मा को पूर्ण समर्पण ही परमात्मा की प्राप्ति है। मुझे यह भी कहा गया है कि जन्म-जन्मांतरों से मेरे अवचेतन मन में छिपे सारे कुसंस्कार, सारे पाप और सारी कमियाँ भी भगवत्-प्राप्ति से नष्ट हो जायेंगी। भगवत्-प्राप्ति ही आत्म-साक्षात्कार है जो मेरी सबसे बड़ी और एकमात्र आवश्यकता है।
.
अपने दिन का आरंभ, समापन और पूरा दिन परमात्मा की चेतना में ही व्यतीत करें। भगवान ने हम सब को विवेक दिया है। उस ईश्वर-प्रदत्त विवेक के प्रकाश से ही मार्गदर्शन प्राप्त करें और जीवन के सारे कार्य संपादित करें।
ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
३ दिसंबर २०२४

सत्य को जानने की शाश्वत जिज्ञासा ही धर्म है ---

 सत्य को जानने की शाश्वत जिज्ञासा ही धर्म है ---

.
परमात्मा ही एकमात्र सत्य हैं। अपने विवेक से निर्णय कीजिये कि सत्य और असत्य क्या है। पहले देवों और असुरों में आपस में युद्ध होते थे। कभी देवता प्रबल हो जाते थे, कभी असुर। उसी तरह यह सृष्टि--प्रकाश और अंधकार का खेल है। वैसे ही धर्म और अधर्म हैं।
.
जो हमें परमात्मा का साक्षात्कार करवा दे, वही धर्म है। जो हमें परमात्मा से दूर ले जाये वह अधर्म है। बाकी सब बुद्धि-विलास है। जो अधर्म हैं, वे एक आसुरी शक्ति के द्वारा चलाये जा रहे हैं, परमात्मा के द्वारा नहीं। एक असुर है जो असत्य का संचालन कर रहा है। उस असुर का होना भी सृष्टि संचालन के लिए आवश्यक है, लेकिन उसकी प्रबलता न्यूनतम हो। इस प्रश्न पर विचार कीजिये कि मैं कौन हूँ? उस वास्तविक "मैं" की खोज ही परमात्मा की खोज है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
०९ दिसंबर २०२४

किस चीज ने मुझे इस संसार से बांध रखा है? मैं कैसे व क्यों जीवित हूँ? ---

 किस चीज ने मुझे इस संसार से बांध रखा है? मैं कैसे व क्यों जीवित हूँ? ---

.
मेरे और इस संसार के मध्य की कड़ी -- ये सांसें हैं। जिस क्षण ये सांसें चलनी बंद हो जायेंगी, उसी क्षण इस संसार से मेरे सारे संबंध टूट जायेंगे।
ये सांसें चल रही हैं, इसके पीछे सुषुम्ना में विचरण कर रही प्राण शक्ति भगवती कुंडलिनी हैं। वे ही मेरा प्राण हैं। परमशिव से एकाकार होने तक वे विचरण करती रहेंगी। जिस जन्म में या जब भी वे परमशिव से मिल कर एकाकार हो जायेंगी, उसी क्षण यह जीवात्मा जीवनमुक्त हो जायेगी।
.
जन्म-मरण और जीवन -- ये सब मेरे वश में नहीं हैं। अनेक जन्मों के संचित कर्मफलों के प्रारब्ध को भोगने के लिए हमें यह जीवन मिलता है। लेकिन अब सारा परिदृश्य और धारणा बदल गयी है। जिन्होंने इस समस्त सृष्टि की रचना की है वे जगन्माता ही यह जीवन जी रही हैं। मेरे और इस संसार के मध्य की कड़ी --ये सांसें, जगन्माता का मुझे सबसे बड़ा उपहार है। ये साँसें प्राणशक्ति के स्पंदन और संचलन की प्रतिक्रिया मात्र हैं। जिस क्षण जगन्माता की प्राणशक्ति का यह स्पंदन/संचलन रुक जाएगा, उसी क्षण ये साँसें भी रुक जायेंगी, और यह देह निष्प्राण हो जायेगी।
.
परमात्मा को उपलब्ध होने का माध्यम/साधन भी ये साँसें ही हैं। अतः इन्हें व्यर्थ न जाने दें। कई रहस्य हैं जो जगन्माता के अनुग्रह से ही अनावृत होते हैं। वे रहस्य -- रहस्य ही रहें तो ठीक है। यह भी एक रहस्य है।
.
हमारा स्वास्थ्य (स्व+स्थ) हमारे विचारों पर निर्भर है। हम जैसा सोचते हैं, वैसे ही बन जाते हैं। हम आलोकमय होंगे तो पूरी सृष्टि आलोकित होगी। हम सब स्वस्थ, प्रसन्न और परमात्मा की चेतना में रहें। सभी में साक्षात नारायण को नमन। ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० दिसंबर २०२४

गीता जयंती ---

 गीता जयंती ---

.
ॐ श्रीपरमात्मने नमः !! मैं आप सब का एक सेवक मात्र हूँ, इसीलिए आप सब से केवल प्रार्थना ही कर सकता हूँ। अन्य कुछ भी मेरे बस की बात नहीं है। आज ५१६१ वीं "गीता-जयंती" पर भगवान श्रीकृष्ण को अपने हृदय में अवतरित अवश्य करें। गीता -- भारत का प्राण है, इस के उपदेशों ने ही भारत को अब तक जीवित रखा है। आज मोक्षदा एकादशी भी है, एकादशी का व्रत न कर सकें तो एक समय ही भोजन करें। एकादशी के दिन भोजन में चावल न लें।
"गीता जयंती" पर मैं इस सृष्टि के सभी प्राणियों में ही नहीं, समस्त जड़-चेतन में परमात्मा को नमन करता हूँ। वे ही यह सारी सृष्टि बन गए है। भगवान वासुदेव के सिवाय अन्य कोई या कुछ भी नहीं है। वे अनन्य हैं।
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥" (गीता)
अर्थात् - बहुत जन्मों के अन्त में (किसी एक जन्म विशेष में) ज्ञान को प्राप्त होकर कि 'यह सब वासुदेव है' ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है; ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है॥
.
गीता में भगवान ने सिर्फ तीन विषयों -- कर्म, भक्ति और ज्ञान -- पर ही उपदेश देते हुए सम्पूर्ण सत्य-सनातन-धर्म को इन में समाहित कर लिया है। धर्म के किसी भी पक्ष को उन्होंने नहीं छोड़ा है। हम कर्मफलों पर आश्रित न रहकर अपने कर्तव्य-कर्म करते रहें, यह उनकी शिक्षाओं का सार है। भगवान कहते हैं कि हमें अपने सारे संकल्प भगवान को समर्पित कर देने चाहियें। एकमात्र कर्ता वे स्वयं हैं, हम पूर्ण रूप से उनको समर्पित हों। कर्ता भाव से हम मुक्त हों। इन्द्रियों के भोगों तथा कर्मों व संकल्पों को त्यागते ही हम योगारूढ़ हो जाते हैं। हम स्वयं ही अपने मित्र हैं, और स्वयं ही अपने शत्रु हैं। जिसने अपने आप पर विजय प्राप्त कर ली है, उसे परमात्मा नित्य-प्राप्त हैं। हम ज्ञान-विज्ञान से तृप्त, जितेंद्रिय और विकार रहित (कूटस्थ) हों। हमारा मन निरंतर भगवान में लगा रहे। भूख और नींद पर हमारा नियंत्रण हो। हम निःस्पृह होकर अपने स्वरूप में स्थित रहें व तत्व से कभी विचलित न हों।
.
अपने मन को परमात्मा में स्थित करके फिर अन्य कुछ भी चिन्तन न करें। यह बड़ी से बड़ी साधना है। यह अस्थिर और चञ्चल मन जहाँ जहाँ विचरण करता है, वहाँ वहाँ से हटाकर इसको एक परमात्मा में ही लगायें। विक्षेप का कारण रजोगुण है। हम सर्वत्र यानि सभी प्राणियों में अपने स्वरूप को देखें, और सभी प्राणियों को अपने स्वरूप में देखें। भगवान कहते हैं --
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् -- जो सबमें मुझे देखता है, और सब को मुझ में देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता, और वह भी मेरे लिये अदृश्य नहीं होता।
.
जब हम भगवान को सर्वत्र, और सभी में भगवान को देखते हैं, तो भगवान कभी अदृश्य यानि परोक्ष नहीं होते। यहाँ दृष्टा कौन हैं? दृष्टा, दृश्य और दृष्टि -- सभी भगवान स्वयं हैं। हम कूटस्थ-चैतन्य यानि ब्राह्मी-स्थिति में निरंतर रहें। यह श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से भगवान का संदेश है। साथ साथ वे यह भी कहते हैं --
"ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥४:११॥"
अर्थात् - जो मुझे जैसे भजते हैं, मैं उन पर वैसे ही अनुग्रह करता हूँ; हे पार्थ सभी मनुष्य सब प्रकार से, मेरे ही मार्ग का अनुवर्तन करते हैं॥
.
अब हमें क्या करना चाहिए? इस विषय पर भगवान कहते है --
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
अर्थात् - इसलिये तू सब समय में मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। मेरे में मन और बुद्धि अर्पित करनेवाला तू निःसन्देह मेरे को ही प्राप्त होगा।
.
अंत में गीता का चरम श्लोक है जिसकी व्याख्या करने में सभी स्वनामधान्य महानतम भाष्यकार आचार्यों ने अपनी सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा का प्रदर्शन किया है --
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
अर्थात - सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो॥
.
वह हर क्षण मंगलमय है जब हृदय में भगवान के प्रति परमप्रेम उमड़े और हम परमप्रेममय हो जाएँ। गीता महात्म्य पर भगवान श्रीकृष्ण ने पद्म पुराण में कहा है कि भवबंधन (जन्म-मरण) से मुक्ति के लिए गीता अकेले ही पर्याप्त ग्रंथ है।
गीता के उपदेश हमें भगवान का ज्ञान कराते हैं। स्वयं भगवान पद्मनाभ के मुखारविंद से हमें गीता का ज्ञान मिला है।
गीता एक सार्वभौम ग्रंथ है। यह किसी काल, धर्म, संप्रदाय या जाति विशेष के लिए नहीं अपितु संपूर्ण मानव जाति के लिए है। इसे स्वयं श्रीभगवान ने अर्जुन को निमित्त बनाकर कहा है इसलिए इस ग्रंथ में कहीं भी श्रीकृष्ण उवाच शब्द नहीं आया है बल्कि श्रीभगवानुवाच का प्रयोग किया गया है। इसके छोटे-छोटे १८ अध्यायों में इतना सत्य, ज्ञान व गंभीर उपदेश हैं, जो मनुष्य को नीची से नीची दशा से उठाकर देवताओं के स्थान पर बैठाने की शक्ति रखते हैं।
.
गीता में अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति ---
"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥११:३८॥"
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥११:३९॥"
"नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥११:४०॥"
.
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ दिसंबर २०२४