Sunday, 24 November 2024

स्वयं को मुझ में व्यक्त करो ---

स्वयं को मुझ में व्यक्त करो। (Reveal Thyself unto me)। एक बार अनुभूति हुई कि सामने एक महासागर आ गया है, तो बिना किसी झिझक के मैंने उसमें छलांग लगा दी और जितनी अधिक गहराइयों में जा सकता था उतनी गहराइयों में चला गया। फिर सांस लेने की इच्छा हुई तो पाया कि सांस तो स्वयं महासागर ले रहा है, सांसें लेने का मेरा भ्रम मिथ्या है। फिर भी पृथकता का यह मिथ्या बोध क्यों? यही तो जगत की ज्वालाओं का मूल है।

शिवो भूत्वा शिवं यजेत्” --- जीवन में हम क्या बनना चाहते हैं, और क्या प्राप्त करना चाहते हैं? यह सब की अपनी अपनी सोच है। इस जीवन के अपने अनुभवों और विचारों के अनुसार इस जीवन में मैं जो कुछ भी प्राप्त करना चाहता हूँ, वह तो शिवभाव में मैं स्वयं हूँ। स्वयं से परे अन्य कुछ है ही नहीं। कृपा शंकर २३ नवंबर २०२४

सम्पूर्ण भारत में तमोगुणी विचारधाराओं का सम्पूर्ण नाश हो, और रजोगुण व सतोगुण में निरंतर वृद्धि हो ---

सम्पूर्ण भारत में तमोगुणी विचारधाराओं का सम्पूर्ण नाश हो, और रजोगुण व सतोगुण में निरंतर वृद्धि हो। अधर्म के नाश, व धर्म की विजय के लिए प्रकृति यदि महाविनाश भी करती है, तो उसका स्वागत है।

यह पृथ्वी राक्षसों व राक्षसी विचारधारा से मुक्त हो। भगवान श्रीराम ने भी प्रतिज्ञा की थी कि -- "निसिचर हीन करहुँ महि भुज उठाई पन कीन्ह”॥ (भगवान श्रीराम ने अपनी भुजा उठाकर प्रण किया था कि वे पृथ्वी को राक्षसों से मुक्त कर देंगे।) वही संकल्प हम दुहरा रहे हैं।
धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों मे सद्भावना हो, और विश्व का कल्याण हो --- इसके लिए नित्य प्रार्थना करते हैं। अब शरणागत भाव से समर्पित होकर भगवान से और भी अधिक प्रार्थना करेंगे।
पूरे भारत में राष्ट्रभक्ति जागृत हो। सभी भारतीय सत्यनिष्ठ, कार्यकुशल और धर्मावलम्बी बनें। भारत में कहीं भी अधर्म न रहे।
धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों मे सद्भावना हो, और विश्व का कल्याण हो।
धर्म उन्हीं की रक्षा करेगा, जो धर्म की रक्षा करेंगे। धर्म का पालन ही धर्म की रक्षा है। हम एक शाश्वत आत्मा हैं। आत्मा के स्वधर्म का पालन कीजिए। वर्तमान में चल रहे, और अति शीघ्र ही आने वाले विकट समय में धर्म ही हमारी सदा रक्षा करेगा। परमात्मा की शरणागति लेकर समर्पित भाव में रहें। नित्य नियमित आध्यात्मिक उपासना करते रहें। आपका कोई अहित नहीं होगा। सदा याद रखें कि हमारा लक्ष्य केवल परमात्मा हैं।
ॐ तत्सत् !! हरिः ॐ॥ २२ नवंबर २०२४

भगवान के पास किसी को कुछ भी देने के लिए कोई सामान नहीं है ---

भगवान के पास किसी को कुछ भी देने के लिए कोई सामान नहीं है। जो कुछ भी हमें दिखाई दे रहा है या नहीं दिखाई दे रहा है -- वह सब कुछ तो वे स्वयं हैं। उनके सिवाय कुछ भी या कोई भी अन्य नहीं है। हाँ, हमारे पास एकमात्र सामान हमारा "अन्तःकरण" है, और कुछ भी सामान हमारे पास नहीं है। वह उनको समर्पित करने के पश्चात उनमें और हमारे में भी कोई भेद नहीं है।

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जो यह "मैं" और "मेरा" है, वह भी सब कुछ भगवान ही हैं। कुछ बचा ही नहीं है। भगवान स्वयं को ही दे सकते हैं, और हम भी स्वयं को ही दे सकते हैं। मैं दुबारा कह रहा हूँ कि उनके सिवाय कोई भी या कुछ भी अन्य नहीं है।

भगवान से आजतक जितनी भी प्रार्थनाएँ की हैं, जो कुछ भी उनसे माँगा है, जितनी भी अभीप्सा थी, उनके साथ साथ सारी महत्वाकांक्षाएँ, अरमान, विचार, भाव, और सारे संकल्प -- अब महत्वहीन हैं। न तो मैं कोई याचक या मंगता-भिखारी हूँ, और भगवान भी कोई सेठ-साहूकर नहीं हैं।

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नारायण !! नारायण !! हरिःॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ नवंबर २०२२

गुरु के प्रति समर्पण कैसे हो?

  (प्रश्न) गुरु के प्रति समर्पण कैसे हो?

(उत्तर) जिस आध्यात्मिक चेतना में गुरुदेव स्थित हैं, महत्व उस आध्यात्मिक चेतना का है। गहनतम दीर्घ ध्यान करते हुए उस चेतना के साथ एक हो जाना चाहिए। यह गुरु के प्रति समर्पण है।
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भगवान कहते हैं --
"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥२:७२॥"
अर्थात् - यह ब्राह्मी स्थिति है, जिसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है।
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भगवान से यह संदेश है कि -- "सब कर्मों का सन्यास करके केवल ब्रह्म रूप से स्थित हो जाना है।" ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२४ नवंबर २०२२

जिन भी हिन्दू राजाओं ने मुगलों को अपना सहयोग दिया, उन्हें कुछ धन के अतिरिक्त और क्या मिला?

जिन भी हिन्दू राजाओं ने मुगलों को अपना सहयोग दिया, उन्हें कुछ धन के अतिरिक्त और क्या मिला? आमेर के मिर्जा राजा सवाई जयसिंह और उनके पुत्र राजा रामसिंह दोनों को मुगल बादशाह औरंगज़ेब ने विष देकर मरवा दिया था। यह था उनकी स्वामी-भक्ति का पुरस्कार। मध्य एशिया से आए सभी तुर्क बादशाहों ने हिन्दू राजाओं से संधि कर के उनके सहयोग से ही भारत के कुछ क्षेत्रों में अपना राज्य स्थापित किया था। उनके सहयोग के बिना वे एक दिन भी राज्य नहीं कर सकते थे।

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मध्य एशिया के इतिहास में इस्लाम के आगमन से पूर्व वहाँ हिन्दू बौद्धमत था। उससे भी पूर्व सनातन धर्म था। वर्तमान तुर्की -- तुरुष्क हिन्दू क्षत्रियों द्वारा शासित प्रदेश था।
महाभारत में जिस किरात जाति का उल्लेख है, वह ही अब मंगोल जाति कहलाती है। मंगोल राजा चंगेज़ खान और उसका पोता राजा कुबलई खान दोनों ही महान हिन्दू सम्राट थे। चंगेज़ खान का वास्तविक नाम गंगेश हान था, और उसके पोते कुबलई खान का वास्तविक नाम कैवल्य हान था। हान एक सम्मानसूचक उपाधि हुआ करती थी। "हान" शब्द का अपभ्रंस ही "खान" है। भगवान श्रीकृष्ण का एक नाम "कान्ह" है। कान्ह से अपभ्रंस होकर हान शब्द बना, और हान का अपभ्रंस खान हुआ। सभी मंगोल शासक अपने नाम के साथ सम्मानसूचक उपाधि "हान" लगाते थे।
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हिंदुओं के बौद्ध मत ने "अहिंसा" पर बहुत अधिक जोर दिया। अहिंसा नकारात्मक हो गई। शत्रु का बिलकुल भी प्रतिरोध न करने को अहिंसा मान लिया गया। लोगों ने शत्रु से अपने सिर कटवा दिये, या मतांतरित हो गए, लेकिन उनका प्रतिरोध नहीं किया, यही हिंदुओं के पतन का सर्वोपरि मुख्य कारण था।
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आज अहोम (असम) साम्राज्य के सेनानायक परमवीर योद्धा श्री लचित बोरफुकन की जयंती है। उनकी स्मृति को नमन !!
कृपा शंकर
२४ नवंबर २०२३
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पुनश्च: :-- पिछले डेढ़ हजार वर्षों में एक हिन्दू सम्राट कुबलई खान (कैवल्य हान) से अधिक पराक्रमी राजा इस पृथ्वी पर कोई अन्य नहीं हुआ। उसने बौद्ध मत अपना लिया था। उसकी एक ऐतिहासिक भूल से मंगोल साम्राज्य का पतन हो गया था। पृथ्वी के २०% भाग पर उसका साम्राज्य था। उसका साम्राज्य पूर्व में कोरिया से लेकर पश्चिम में कश्यप सागर तक, और उत्तर में साईबेरिया की बाईकाल झील से लेकर दक्षिण में विएतनाम तक था। चीनी लिपि का आविष्कार उसी ने करवाया था। उसी ने तिब्बत के प्रथम दलाई लामा को नियुक्त किया था। मार्को पोलो उसी के समय चीन गया था।

Saturday, 23 November 2024

देरी से विवाह, और वर व बधू दोनों पक्षों की असामान्य अत्यधिक अपेक्षाएँ ---

 वर्तमान में सभी हिन्दू समाजों में एक बहुत बुरी सामाजिक बीमारी फैल रही है जो दिन प्रतिदिन बढ़ रही है --

"देरी से विवाह, और वर व बधू दोनों पक्षों की असामान्य अत्यधिक अपेक्षाएँ" ---
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इस समय स्थिति ऐसी है कि न तो विवाह योग्य लड़के मिल रहे हैं, और न विवाह योग्य लड़कियाँ। विवाह की आयु बढ़ती जा रही है। सभी की एक ही चिंता रहती है कि जीवन में पहले settle हो जाएँ और अच्छा career बनाएँ। फिर आर्थिक सुरक्षा के बारे में सोचते हैं, और अधिकाधिक पैसे देने वाली नौकरी या व्यवसाय के बारे में चिंतन करते हैं। इतने में विवाह योग्य आयु तो निकल जाती है। जिसका परिणाम होता है विवाह की संस्था से बाहर --- किसी को रखेल बनाना या बन जाना (Live-in relationship), किसी अधर्मी के साथ भाग जाना, या कुंठित जीवन व्यतीत करना।
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वर पक्ष कहने को तो कहता है कि हमें कुछ नहीं चाहिए, लेकिन दृष्टि रहती है -- धनवान और प्रभावशाली परिवार की लड़की की ओर जो विवाह में खूब धन ला सके, व उसके घरवाले विवाह में खूब खर्च कर सकें। समाज में पाखंड इतना भयंकर है कि स्वयं की बेटी के विवाह में तो दहेज-विरोधी हो जाएँगे और बेटे के विवाह में दहेज-समर्थक।
वधू-पक्ष भी चाहे कितना भी निर्धन हो, वह भी अपनी कन्या खूब पैसे वाले के घर ही देना चाहता है। लड़कों की तरह लड़कियों की भी अपेक्षा बहुत अधिक बढ़ गई है।
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आजकल व्यक्तियों की औसत आयु अधिकतम ७० से ७५ वर्ष की है। जो ७५ वर्ष से ऊपर की आयु के हैं, वे तो भगवान की विशेष कृपा से ही जीवित हैं।
३०-३५ वर्ष से ऊपर की लड़कियां कुआँरी बैठी है और ३५-४० वर्ष से ऊपर के लड़के जिनका विवाह नहीं हो रहा है। समाज के कर्ता-धर्ताओं की भी कुछ नहीं चल रही है।
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२५ वर्ष की आयु के पश्चात एक लड़की के लिए ससुराल पक्ष में स्वयं को ढालना बड़ा कठिन हो जाता है। ३० वर्ष की आयु के बाद एक लड़के के लिए भी नवविवाहिता के साथ तालमेल बैठाना बड़ा कठिन होता है।
परिणाम होता है -- घर में बहस, वाद विवाद, तलाक, और सिजेरियन ऑपरेशन द्वारा बच्चों का जन्म होना। इससे भविष्य में बहुत सारी बीमारियों का सामना करना पड़ता है।
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विवाह के लिए लड़की की आयु १८ से २२ वर्ष की होनी चाहिए, और लड़के की आयु २४ से २६ वर्ष।
पहले संयुक्त परिवारों में आपस में खूब प्रेम रहता था, आजकल एकाँकी परिवार हो गए हैं जो एक-दूसरे के दुख-सुख में काम नहीं आते। लगभग ६० वर्षों पूर्व की बातें याद है जब परिवार के नाई या नेवगण (नाई की पत्नी) ही उचित वर-वधू देखकर संबंध कर जाते थे जो सभी को मान्य होता था।
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प्रकृति के हिसाब से ३० वर्ष की आयु से अधिक तक अविवाहित रहना चिंता का विषय है। आजकल कोई मध्यस्थ भी नहीं बनना चाहता। क्योंकि मध्यस्थ को उलाहना ही उलाहना सहना पड़ता है। उसे कोई श्रेय नहीं मिलता। बिना किसी मध्यस्थ के अच्छे संबंध भी नहीं होते।
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आजकल हर लड़की चाहती है कि उसके होने वाले पति का स्वयं का घर हो, मोटर कार हो, घूमने-फिरने का शौक हो, तगड़ी कमाई हो, और घर में बूढ़े सास-ससुर न हो। आजकल हर लड़का सोचता है कि उसकी होने वाली पत्नी खूब सुंदर हो, सामाजिक हो और खूब धनवान माँ-बाप की बेटी हो।
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संबंध करते समय एक-दूसरे का स्वभाव (Nature) और साथ रहने की पात्रता (Compatibility) देखनी चाहिए। यह भी सामाजिक रूप से स्वीकार कर लेना चाहिए कि विवाह के पश्चात भी वे अपनी पढ़ाई करते रहेंगे। अधिक आयु में विवाह करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।
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कोई गलत बात कह गया हूँ तो क्षमा करना। आप सभी में परमात्मा को नमन॥
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२३ नवंबर २०२२

Thursday, 21 November 2024

परमात्मा परम सत्य हैं। वे सत्यनारायण हैं, जिनका अनुसंधान हम स्वयं करें ---

 परमात्मा परम सत्य हैं। वे सत्यनारायण हैं, जिनका अनुसंधान हम स्वयं करें। जीवन का उद्देश्य ही सत्य की खोज है।

सारा मार्गदर्शन उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता व कुछ आगम ग्रन्थों में है। यदि उन्हें समझने में हम असमर्थ हैं तो किन्हीं ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय आचार्य की सहायता लें।
साधना के भी क्रम हैं। जैसे एक विद्यार्थी पहली कक्षा में है, एक पाँचवीं कक्षा में है, एक दसवीं में है, एक कॉलेज में है, -- सबकी पढ़ाई अलग अलग होती है। वैसे ही साधना के भी क्रम हैं। जो जिस स्तर पर है, उसे वैसा ही मार्गदर्शन मिलता है।
सबसे अधिक महत्वपूर्ण तो है कि हमारे हृदय में परमात्मा को पाने की एक अभीप्सा हो, और हम सत्यनिष्ठ हों। यदि हम अपनी पूर्ण सत्यनिष्ठा से परमात्मा से मार्गदर्शन की प्रार्थना करेंगे तो वे निश्चित रूप से हमारी सहायता करेंगे। यह मेरा निजी अनुभव है।
भगवान से जब भी मैंने मार्गदर्शन की प्रार्थना की है, मुझे भगवान से मार्गदर्शन मिला है। उनकी परम कृपा सदा मुझ अकिंचन पर रही है। उनका मार्गदर्शन मुझे निम्नतम से उच्चतम हर स्तर पर मिला है। इस समय भी वे मेरे चैतन्य हृदय में बिराजमान हैं। सभी को उनकी सहायता और मार्गदर्शन मिलेगा। यह उनका आश्वासन है।
हरिः ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ ॥
कृपा शंकर
२२ नवंबर २०२४