Monday, 16 September 2024

पाप-पुण्य और धर्म-अधर्म क्या हैं? ---

सर्वप्रथम भगवान हमारा आत्म-समर्पण सचेतन रूप से बिना किसी शर्त के पूर्ण रूप से स्वीकार करें, और स्वयं को हमारे में सचेतन पूर्ण रूप से व्यक्त करें। बाकी की बातें जैसे धर्म-अधर्म और पाप-पुण्य --- ये सब गौण, महत्वहीन व छलावा मात्र हैं। इस छलावे में अब और नहीं आ सकते। वे कब तक छिपेंगे ?? प्रकट तो उनको होना ही पड़ेगा। आज नहीं तो कल। लेकिन अब और अधिक प्रतीक्षा नहीं कर सकते। हमें उनकी आवश्यकता अभी और इसी समय है।

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स्वर्ग -- एक प्रलोभन है, और नर्क -- एक भय है। इसी तरह पाप-पुण्य और धर्म-अधर्म भी हमारे और भगवान के मध्य एक बाधा यानि अवरोध है। इन सब से ऊपर तो उठना ही होगा, जिसके बिना काम नहीं चलेगा। तब ही दिखाई देगा कि इन पाप-पुण्य और धर्म-अधर्म रूपी पर्वतों के उस पार क्या है। इन से पार तो जाना ही पड़ेगा। तब तक हम अपनी साधना नहीं छोड़ेंगे। वास्तव में अपनी साधना भगवान स्वयं ही तो कर रहे हैं। हमारा साधक होने का भाव एक मिथ्या प्रलोभन और छल है। साधक, साधना और साध्य वे स्वयं हैं। दृष्टि, दृष्टा और दृश्य भी वे स्वयं हैं।
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पुनश्च: ----- कल्पना कीजिये कि किसी ने हमारे सिर पर जलते हुए कोयलों से भरी परात रख दी है। उस समय की पीड़ा से मुक्त होने के लिए हम कैसे तड़प उठते हैं; वैसी ही तड़प हमारे हृदय में भगवान को पाने की हर समय हो।
न स्त्री न पुरुष, न पापी न पुण्यात्मा, हम शाश्वत आत्मा हैं जो परमात्मा की एक छवि मात्र है।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ सितंबर २०२४

Saturday, 14 September 2024

भूमा ही सुख है, अल्प में सुख नहीं है ---

 अन्तःकरण पर कभी कभी हमारा कोई अधिकार नहीं रहता। कूटस्थ में सर्वव्यापी पुरुषोत्तम की चेतना में सब कुछ खो जाता है। सांस लेते हैं तो सारी सृष्टि हमारे साथ सांस लेती है। ध्यान करते हैं तब सारी सृष्टि हमारे साथ ध्यान करती है। कोई भी या कुछ भी हमारे से पृथक नहीं रहता। क्या इसे ही 'अपरोक्षानुभूति' कहते है?

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हमारा स्वधर्म है -- परमात्मा की अभीप्सा, परमात्मा से परमप्रेम और परमात्मा को पूर्ण समर्पण।
हम इस नश्वर भौतिक देह, अन्तःकरण, इंद्रियों और उनकी तन्मात्राओं से परे शाश्वत आत्मा हैं। अपने स्वधर्म का पालन निरंतर हम करते रहें। विश्व में जो कुछ भी हो रहा है उससे विचलित न हों, और कूटस्थ-चैतन्य/ब्राह्मी-स्थिति में निरंतर रहने कि साधना करते रहें। जीवन में जो बड़ी-बड़ी भूलें कीं, उन्हें तो अब सुधारा नहीं जा सकता। उन्हें भूल जाना ही ठीक है।
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"मुझे पतझड़ों की कहानियाँ, न सुना सुना के उदास कर
वो नही मिला तो मलाल क्या, जो गुज़र गया सो गुज़र गया
उसे याद करके ना दिल दुखा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया
तू खिज़ाँ का फूल है मुस्कुरा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया" (बद्र)
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मैं तो एक फूल हूँ, मुरझा गया तो मलाल क्यों
तुम तो एक महक हो, जिसे हवाओं में समाना है (अज्ञात)
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हम परमात्मा के उद्यान के एक अप्रतिम पुष्प हैं, जो अपने स्वामी की विराटता के साथ एक है। सामने परमात्मा की ज्योतिर्मय अनंतता है। उससे भी परे स्वयं सच्चिदानंद परमशिव हैं। जब उपास्य परमशिव अपनी भव्यतम अभिव्यक्ति में स्वयं समक्ष हैं, तब कैसी उदासी और कैसी अप्रसन्नता?
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"तपस्वी! क्यों इतने हो क्लांत? वेदना का यह कैसा वेग?
आह! तुम कितने अधिक हताश, बताओ यह कैसा उद्वेग!
जिसे तुम समझे हो अभिशाप, जगत की ज्वालाओं का मूल;
ईश का वह रहस्य वरदान, कभी मत इसको जाओ भूल।
विषमता की पीड़ा से व्यस्त हो रहा स्पंदित विश्व महान;
यही दु:ख सुख विकास का सत्य यही 'भूमा' का मधुमय दान। (प्रसाद)
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वास्तव में 'भूमा' का आंशिक बोध ही अब तक के इस जीवन की उच्चतम उपलब्धि है। 'भूमा' के साथ अभेद ही इस जीवन की पूर्णता होगी। हमारी व्यथा का कारण भी 'भूमा' के साथ पूरी तरह एक न हो पाना ही है। 'भूमा' से कम कुछ भी हमें सुखी नहीं कर सकता।
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ब्रह्मविद्या के प्रथम आचार्य भगवान सनतकुमार ने अपने प्रिय शिष्य देवर्षि नारद को 'भूमा' का साक्षात्कार करा कर ही देवर्षि बना दिया था।
श्रुति भगवती कहती है --
"यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति भूमानं भगवो विजिज्ञास इति॥" (छान्दोग्योपनिषद्‌ ७/२३/१)
अर्थात - ‘जो भूमा (महान् निरतिशय) है, वही सुख है, अल्प में सुख नहीं है। भूमा ही सुख है और भूमा को ही विशेष रूप से जानने की चेष्टा करनी चाहिये।
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‘अल्प’ और ‘भूमा’ क्या है, इसको बतलाती हुई श्रुति भगवती फिर कहती है --
"यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाऽथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम्॥" (छान्दोग्योपनिषद्‌ ७/२३/२)
अर्थात -- ‘जहाँ अन्य को नहीं देखता, अन्य को नहीं सुनता, अन्य को नहीं जानता, वह भूमा है और जहाँ अन्य को देखता है, अन्य को सुनता है, अन्य को जानता है, वह अल्प है। जो भूमा है, वही अमृत है और जो अल्प है, वह मरणशील (नश्वर) है।’
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यह ब्रह्मज्ञान है जिसे पाना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। यही आत्म-साक्षात्कार है, यही परमात्मा की प्राप्ति है। इसे पाकर ही हम कह सकते है --
शिवोहं शिवोहं / अहं ब्रह्मास्मि !! ॐ ॐ ॐ !!
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मैं शिव हूँ, ये नश्वर भौतिक, सूक्ष्म, और कारण शरीर नहीं। मैं यह अन्तःकरण (मन बुद्धि चित्त अहंकार) भी नहीं हूँ। न ही मैं ये इंद्रियाँ और उनकी तन्मात्राएँ हूँ। मैं अनंत, विराट, असीम, पूर्णत्व, और परमशिव हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ सितंबर २०२३

जीवन में हम एक-दूसरे के रूप में स्वयं से ही मिलते रहते हैं ---

 >>> जीवन में हम एक-दूसरे के रूप में स्वयं से ही मिलते रहते हैं। हम सब में जो व्यक्त है, वही परमात्मा है।  हम उन के साथ एक हैं।

>>> परमात्मा का ध्यान और उससे प्राप्त आनंद सर्वोच्च सत्संग है।

>>> सूक्ष्म देह में मेरुदंडस्थ सुषुम्ना नाड़ी ही पूजा की वेदी और मंडप है, जहाँ भगवान वासुदेव स्वयं बिराजमान हैं।
>>> सहस्त्रार-चक्र में दिखाई दे रही ज्योति "विष्णुपद" है। इसका ध्यान -- गुरु-चरणों का ध्यान है। इसमें स्थिति -- श्रीगुरुचरणों में आश्रय है।
>>> कुंडलिनी महाशक्ति का सहस्त्रार और ब्रह्मरंध्र से भी ऊपर उठकर अनंत महाकाश से परे परमशिव से स्थायी मिलन जीवनमुक्ति और मोक्ष है। यही अपने सच्चिदानंद रूप में स्थित हो जाना है।
>>> जब यह दृढ़ अनुभूति हो जाये कि मैं यह भौतिक शरीर नहीं, एक शाश्वत आत्मा हूँ, उसी समय हमारा स्वयं का पिंडदान हो जाता है। मूलाधारस्थ कुंडलिनी "पिंड" है। गुरु-प्रदत्त विधि से बार-बार कुंडलिनी महाशक्ति को मूलाधार-चक्र से उठाकर सहस्त्रार में भगवान विष्णु के चरण-कमलों (विष्णुपद) में अर्पित करना यथार्थ "पिंडदान" है। इसे श्रद्धा के साथ करना स्वयं का श्राद्ध है।
>>> अपने सच्चिदानंद रूप में स्थित हो जाना मोक्ष है। परब्रह्म ही जीव और जगत् के सभी रूपों में व्यक्त है। वही जीवरूप में भोक्ता है और वही जगत रूप में भोग्य।
>>> आत्मा शाश्वत है। जीवात्मा अपने संचित व प्रारब्ध कर्मफलों को भोगने के लिए बार-बार पुनर्जन्म लेती है। मनुष्य जीवन का लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति है। जब तक ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती तब तक संचित और प्रारब्ध कर्मफलों से कोई मुक्ति नहीं है। ये सनातन नियम हैं जो इस सृष्टि को चला रहे हैं। यह हमारा सनातन धर्म है।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१४ सितंबर २०२३

Thursday, 12 September 2024

बांग्लादेश और बंगाल की समस्या का एकमात्र स्थायी समाधान ----- कूटनीतिक और सैनिक हस्तक्षेप द्वारा बांग्लादेश का विभाजन भारत को करना ही होगा। अन्य कोई समाधान नहीं है --

बांग्लादेश का उत्तरी भाग हिंदुओं को, और दक्षिणी भाग मुसलमानों को मिले। जितना भयंकर नरसंहार हिन्दुओं का हुआ है, और जितना भयंकर पाशविक अत्याचार हिन्दू महिलाओं पर हुआ है, उसके पश्चात किसी भी तरह का भाईचारा उन नरपिशाचों के साथ संभव नहीं है। बांग्लादेश का विभाजन ही एकमात्र विकल्प है, जो शीघ्रातिशीघ्र कर देना चाहिए। यह भारत की सुरक्षा के लिए भी आवश्यक है।

वे सब नरपिशाच जो बांग्लादेश में हिंदुओं का नरसंहार और हिन्दू महिलाओं व बच्चियों के साथ दुराचार कर रहे हैं, प्रकृति उन्हें कभी क्षमा नहीं करेगी। उनका सर्वनाश होगा। वहाँ की घटनाओं से पूरे विश्व का हिन्दू समाज और पूरा भारत क्षुब्ध और आहत है। जो इस घटना पर मौन और तटस्थ हैं वे भी दंड के भागी होंगे। .
बांग्लादेश और बंगाल की समस्या का एकमात्र स्थायी समाधान :---
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इसके लिए बहुत बड़ा राजनीतिक, कूटनीतिक और सैनिक साहस चाहिए जो हमारे सौभाग्य से हमारी वर्तमान केंद्र सरकार में है। हमें बहुत बड़ा कदम उठाना पड़ेगा। बंगाल और बांग्लादेश दोनों का नीचे बताए हुये अनुसार विभाजन करना पड़ेगा।
(1) सर्वप्रथम बंगाल का विभाजन दो भागों में करना होगा उत्तरी बंगाल और दक्षिणी बंगाल।
बंगाल के दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, कूचबिहार, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, और मालदा --- इन छह जिलों को बंगाल से पृथक कर एक केंद्र शासित राज्य बनाना होगा।
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बाकी तेरह जिले -- मुर्शिदाबाद, वीरभूम, पुरुलिया, बांकुड़ा, बर्धमान, नादिया, हुगली, हावड़ा, पश्चिमी मिदिनापुर, पूर्वी मिदिनापुर, उत्तर चौबीस परगना, दक्षिण चौबीस परगना, और कोलकाता -- इन सब को मिलाकर वर्तमान बंगाल राज्य हो।
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(2) बांग्लादेश के रंगपुर और राजशाही -- इन दो जिलों का सीमावर्ती भूभाग अधिग्रहण कर इनमें बांग्लादेश के हिंदुओं को बसाया जाये। इस भूभाग को बंगाल के केंद्र शासित राज्य में मिला दिया जाये। इससे भारत की सामरिक स्थिति भी बहुत अधिक मजबूत हो जाएगी। चिकननेक का क्षेत्र बहुत मजबूत हो जाएगा और आसाम से आना-जाना भी बहुत अधिक आसान हो जाएगा।
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(3) बहुत दृढ़ राजनीतिक निर्णय लेकर सारे रोहिंगिया और अवैध रूप से आए बांग्लादेशियों को पकड़ पकड़ कर भारत से बाहर निकाल दिया जाये।
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बांग्लादेश और बंगाल की समस्या यही स्थायी समाधान मेरे दिमाग में आता है। अन्य कोई समाधान नहीं है। ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
८ अगस्त २०२४

भक्त या साधक होने का भाव एक अहंकार है ---

 हम निमित्त मात्र ही हो सकते हैं, कर्ता और भोक्ता केवल परमात्मा हैं।

गीता में भगवान कहते है --
"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व, जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव, निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥११:३३॥"
भावार्थ -- इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो; शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो। ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त ही बनो॥ (बायें हाथसे भी बाण चलानेका अभ्यास होनेके कारण अर्जुन सव्यसाची कहलाता है।)
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मेरे पाठकों में सब प्रबुद्ध विद्वान मनीषी हैं जो वेदान्त-दर्शन और भक्ति को अच्छी तरह समझते हैं। अतः मुझे कुछ और कहने की आवश्यकता नहीं है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ अगस्त २०२४
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(१) भगवान का स्मरण हर समय कैसे करें? (२) समभाव में स्थिति कैसे हो?

 उपरोक्त प्रश्न सबसे अधिक कठिन प्रश्न हैं। समत्व में स्थिति तो श्रीमद्भगवद्गीता का सार है। भगवान वासुदेव को नमन करता हुआ मैं अकिंचन अपनी अत्यल्प बुद्धि से इस विषय में प्रवेश करता हूँ। भगवान वासुदेव मेरे चैतन्य में, मेरे हृदय में सर्वदा स्थित रहें।

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हमारे जीवन के अंतिम काल यानि मृत्यु के समय की भावना ही पुनर्जन्म का कारण होती है, इसलिए गीता में भगवान श्रीकृष्ण हमें हर समय भगवान का स्मरण करते हुए साथ-साथ शास्त्राज्ञानुसार स्वधर्मरूप युद्ध भी करने का आदेश देते हैं। भगवान कहते हैं कि इस प्रकार मुझ वासुदेव में जिसके मन-बुद्धि अर्पित हैं, वे उनके ही यथाचिन्तित स्वरूप को ही प्राप्त होंगे; इसमें संशय नहीं है --
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
अर्थात् -- इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
Therefore meditate always on Me, and fight; if thy mind and thy reason be fixed on Me, to Me shalt thou surely come.
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भगवान ने यह नहीं कहा कि दिन में दो-ढाई घंटे मेरा स्मरण करना और बाकी समय संसार का काम करना। भगवान ने कहा है कि जो व्यक्ति समभाव को प्राप्त है, वह हर समय मुझे उपलब्ध है --
"जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥६:७॥"
अर्थात् -- शीत-उष्ण, सुख-दु:ख तथा मान-अपमान में जो प्रशान्त रहता है, ऐसे जितात्मा पुरुष के लिये परमात्मा सम्यक् प्रकार से स्थित है, अर्थात्, आत्मरूप से विद्यमान है॥
The Self of him who is self-controlled, and has attained peace is equally unmoved by heat or cold, pleasure or pain, honour or dishonour.
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आचार्य शंकर अपने भाष्य में कहते हैं -- जिस ने मन-इन्द्रिय आदि के संघातरूप इस शरीर को अपने वश में कर लिया है, और जो प्रशान्त है, जिसका अन्तःकरण सदा प्रसन्न रहता है, उस को भली प्रकार से सर्वत्र परमात्मा प्राप्त है; अर्थात् वह साक्षात् आत्मभाव से विद्यमान है। वह सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख एवं मान और अपमान में यानी पूजा और तिरस्कार में भी (सम हो जाता है)॥
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उपरोक्त स्थिति को प्राप्त करने के लिए हमें तप करना होगा, यानि साधना करनी होगी। हमें शरीर, मन और बुद्धि के द्वन्द्वों से ऊपर उठ कर अद्वय होना होगा। भगवान कहते हैं --
"इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः॥५:१९॥"
अर्थात् -- जिनका अन्तःकरण समता में स्थित है, उन्होंने इस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार को जीत लिया है; ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिये वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।
Even in this world they conquer their earth-life whose minds, fixed on the Supreme, remain always balanced; for the Supreme has neither blemish nor bias.
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परमात्मा से भिन्न स्वयं को समझना अज्ञान है। भगवान से भिन्न विषयों का चिंतन भी हमारे दुःखों का कारण है। गीता में भगवान कहते हैं --
"ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥२:६२॥"
"क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥२:६३॥"
अर्थात् - विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उसमें आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से इच्छा और इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता है॥
क्रोध से उत्पन्न होता है मोह और मोह से स्मृति विभ्रम। स्मृति के भ्रमित होने पर बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश होने से वह मनुष्य नष्ट हो जाता है॥
When a man dwells on the objects of sense, he creates an attraction for them; attraction develops into desire, and desire breeds anger.
Anger induces delusion; delusion, loss of memory; through loss of memory, reason is shattered; and loss of reason leads to destruction.
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संसार की वस्तुओं में दोष नहीं है, दोष तो उनके चिंतन में है। मनुष्य जीवन भर अपनी इच्छाओं के पीछे भागता रहता है। इच्छाओं की पूर्ति का सारा श्रेय मनुष्य स्वयं लेता है, और जब इच्छा की पूर्ति नहीं होती तब दोष भगवान को देने लगता है। कामनाएँ कभी पूर्ण नहीं होतीं।
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अपने दिन का आरंभ भगवान के ध्यान से करें। इस तरह से उठें जैसे जगन्माता की गोद में से सो कर उठ रहे हैं। प्रातः उठते ही लघुशंका आदि से निवृत होकर एक कंबल के आसन पर कमर सीधी रखते हुए पूर्व दिशा की ओर मुंह कर के बैठ जाएँ। आपको हठयोग के जितने भी प्राणायाम आते हैं, थोड़ी देर वे सब प्राणायाम करें। फिर अपनी गुरुपरंपरानुसार भगवान का गहनतम ध्यान करें।
रात्रि को सोने से पहिले भगवान का गहनतम ध्यान अपनी गुरुपरंपरानुसार कर के सोएँ। इस भाव से निश्चिंत होकर सोएँ जैसे जगन्माता की गोद में सो रहे हैं।
पूरे दिन भगवान को अपनी स्मृति में रखे। यह भाव रखें कि भगवान ही आपके माध्यम से सारा कार्य कर रहे हैं। जब भूल जाएँ तब याद आते ही भगवान का स्मरण फिर से करना आरंभ कर दें। गीता के निम्न ५ श्लोकों को एक बार समझ लें --
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥६:२४॥"
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥६:२५॥"
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥६:२६॥"
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥६:२९॥
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥ श्रीमते रामचंद्राय नमः॥
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१२ सितंबर २०२३