Tuesday, 27 August 2024

राजस्थान के लोक-देवता रामदेव जी ---

भाद्रपद शुक्ल दशमी के दिन लोक देवता बाबा रामदेव जी के मेले का समापन होता है| जैसलमेर जिले में उनका स्थान एक जागृत स्थान है जिसकी प्रत्यक्ष अनुभूति मैंने स्वयं वहाँ की है|

१५वीं शताब्दी के आरम्भ में भारत में विदेशी आक्रांताओं द्वारा लूट-खसोट के कारण स्थिति बड़ी खराब थी| समाज में दुर्भाग्य से छुआछूत भी फैल गई थी| ऐसे विकट समय में पश्चिमी मारवाड़ में जैसलमेर के समीप पोकरण नामक प्रसिद्ध नगर के पास रुणिचा नामक स्थान में तोमर वंशीय राजपूत और रुणिचा के शासक अजमाल जी के घर भाद्रपद शुक्ल द्वितीया वि.स. १४०९ के दिन बाबा रामदेव जी अवतरित हुए, जिन्होने अत्याचार और छुआछूत का सफलतापूर्वक विरोध किया| बाबा रामदेव ने अपने अल्प जीवन के तेंतीस वर्षों में वह कार्य कर दिखाया जो सैकडो वर्षों में भी होना सम्भव नही था| राजस्थान के जनमानस में पाँच वीरों की प्रतिष्ठा है, जिन में बाबा रामदेव जिन्हें "रामसा पीर" भी कहते हैं, का विशेष स्थान है ...
"पाबू हडबू रामदेव माँगळिया मेहा |
पांचू वीर पधारजौ ए गोगाजी जेहा ||"
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बाबा रामदेव ने डाली बाई नामक एक दलित कन्या को अपने घर बहन-बेटी की तरह रख कर पालन-पोषण किया था| बाबा रामदेव पोकरण के शासक भी रहे| लेकिन उन्होंने राजा बनकर नहीं, अपितु जनसेवक बनकर गरीबों, दलितों, असाध्य रोगग्रस्त रोगियों व जरुरत मंदों की सेवा की| उन्होने भाद्रपद शुक्ला एकादशी वि.स.१४४२ को जीवित समाधी ले ली| बाबा रामदेव के भक्त दूर- दूर से रुणिचा उनके दर्शनार्थ और आराधना करने आते हैं| वे अपने भक्तों के दु:ख दूर करते हैं, और उन की मनोकामना पूर्ण करते हैं। हर वर्ष लगने वाले मेले में तो लाखों की संख्या में एकत्र होने वाले भक्तों की भीड़ से उनकी महत्ता व उनके प्रति जन समुदाय की श्रद्धा का आंकलन आसानी से किया जा सकता है|
२८ अगस्त २०२०

सत्य की खोज मनुष्य की एक शाश्वत जिज्ञासा है ---

विकल्प -- अनेकता में होता है, एकता में नहीं। परमात्मा में पूर्ण समर्पण को ही -- निर्विकल्प कहते हैं। निर्विकल्प में कोई अन्य नहीं होता। समभाव से परमात्मा में पूर्ण रूप से समर्पित अधिष्ठान -- निर्विकल्प समाधि है। पृथकता के बोध की समाप्ति का होना -- निर्विकल्प में प्रतिष्ठित होना है। निर्विकल्प समाधि में ही हम कह सकते है -- "शिवोहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि", क्योंकि तब कल्याणकारी ब्रह्म से अन्य कोई नहीं है। परमात्मा की अनंतता, व उससे भी परे की अनुभूति, और पूर्ण समर्पण -- निर्विकल्प समाधि है। . हमारा पुनर्जन्म भगवान की इच्छा से नहीं, हमारी स्वयं की इच्छा से होता है। हमारे मन में छिपी कामनाएँ ही हमारे पूनर्जन्म का कारण हैं, न कि भगवान की इच्छा। यह शत-प्रतिशत सत्य है। आत्मा की शाश्वतता, कर्मफलों की प्राप्ति, और पुनर्जन्म -- ये तीनों ही शाश्वत सत्य हैं -- जिन पर हमारा सनातन धर्म आधारित है। चूंकि हमारा सनातन धर्म -- सत्य पर आधारित है, इसीलिए वह कभी नष्ट नहीं हो सकता। संसार मे यदि सभी हिंदुओं की हत्या कर भी दी जाये तो भी सनातन धर्म नष्ट नहीं हो सकता, क्योंकि जिन अपरिवर्तनीय सत्य शाश्वत सिद्धांतों पर यह खड़ा है उनको फिर कोई मनीषी अनावृत कर देगा। संसार में यदि कहीं कोई सुख-शांति है तो वह इन मूलभूत सत्य सिद्धांतों के कारण ही है। जहाँ पर इन सत्य सिद्धांतों की मान्यता नहीं है, वहाँ अशांति ही अशांति है। राग-द्वेष व अहंकार से मुक्ति -- वीतरागता कहलाती है। यह वीतरागता और सत्यनिष्ठा ही मोक्ष का हेतु है। एकमात्र सत्य -- भगवान हैं। भगवान से परमप्रेम और समर्पण -- सत्यनिष्ठा कहलाते है। .

सत्य की खोज -- मनुष्य की एक शाश्वत जिज्ञासा है, वह शाश्वत जिज्ञासा ही इन सत्य सनातन सिद्धांतों को पुनः अनावृत कर देगी। भौतिक देह की मृत्यु के समय जैसे विचार हमारे अवचेतन मन में होते हैं, वैसा ही हमारा पुनर्जन्म होता है। हमारे पुनर्जन्म का कारण हमारे अवचेतन में छिपी हुई सुप्त कामनाएँ हैं, न कि भगवान की इच्छा।
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हम अपनी भक्ति के कारण ही कहते हैं कि यह सृष्टि भगवान की है, अन्य कोई कारण नहीं है। हम भगवान के अंश हैं अतः भगवान ने हमें भी अपनी सृष्टि रचित करने की छूट दी है। भगवान की सृष्टि में कोई कमी नहीं है। कमी यदि कहीं है तो वह अपनी स्वयं की सृष्टि में है। ये चाँद-तारे, ग्रह-नक्षत्र, और प्रकृति -- भगवान की सृष्टि है, और हमारे चारों ओर का घटनाक्रम -- हमारी स्वयं की सृष्टि है, भगवान की नहीं।
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(१) हमारे सामूहिक विचार ही घनीभूत होकर हमारे चारों ओर सृष्ट हो रहे हैं। जिन व्यक्तियों की चेतना जितनी अधिक उन्नत है, उनके विचार उतने ही अधिक प्रभावी होते हैं। अतः हमारे चारों ओर की सृष्टि -- हमारी स्वयं की सृष्टि है, भगवान की नहीं।
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(२) हम जो कुछ भी हैं, वह अपने स्वयं के ही अनेक पूर्व जन्मों के विचारों और भावों के कारण हैं, न कि भगवान की इच्छा से। हमारे विचार और भाव ही हमारे कर्म हैं, जिनका फल निश्चित रूप से मिलता है। इन कर्मफलों से हम मुक्त भी हो सकते हैं, जिसकी एकमात्र विधि गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बताई है। अन्य कोई विधि नहीं है।
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(३) प्रकृति के नियमों के अनसार कुछ भी निःशुल्क नहीं है। हर चीज की कीमत चुकानी पड़ती है। बिना कीमत चुकाये मुफ्त में कुछ भी नहीं मिलता। कुछ भी प्राप्त करने के लिए निष्ठा पूर्वक परिश्रम करना पड़ता है। हमारी निष्ठा और परिश्रम ही वह कीमत है। भगवान को प्राप्त करने के लिए भी भक्ति, समर्पण, श्रद्धा-विश्वास, लगन, और निष्ठा रूपी कीमत चुकानी होती है। मुफ्त में भगवान भी नहीं मिलते।
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कभी मैं भिखारियों की भीड़ देखता हूँ तो उनमें मुझे कई तो पूर्व जन्मों के बड़े-बड़े हाकिम (प्रशासक) दिखाई देते हैं, जिनसे कभी दुनियाँ डरती थी। उनकी मांगने की आदत नहीं गई तो भगवान ने इस जन्म में उनकी नियुक्ति (duty) यहाँ लगा दी। जो जितने बड़े घूसखोर, कामचोर, ठग, छल-कपट करने वाले, दूसरों का अधिकार छीनने वाले, और पाप-कर्म में रत रहने वाले अत्याचारी हैं -- उन को ब्याज सहित सब कुछ बापस चुकाना पड़ेगा। प्रकृति उन्हें कभी क्षमा नहीं करेगी। नर्क की भयानक यातनाओं के रूप में उनसे उनके पापकर्म की कीमत बसूली जाएगी।
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आप सब के हृदय में प्रतिष्ठित परमात्मा को मैं नमन करता हूँ। वे ही मेरे प्राण और अस्तित्व हैं। ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२८ अगस्त २०२१
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पुनश्च :--- "कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा।"
इसमें ईश्वर मात्र दृष्टा हैं। करुणानिधान होने के कारण मनुष्य को सही मार्ग दिखाने का प्रयास करते हैं लेकिन हस्तक्षेप नहीं करते। कर्मफल में उनकी कोई भूमिका नहीं होती है।

भारत कभी किसी भी कालखंड में किसी का गुलाम नहीं था ---

 भारत कभी किसी भी कालखंड में किसी का गुलाम नहीं था। जिन विदेशियों ने भारत में शासन किया वह कुछ भारतियों के सहयोग से ही किया। कुछ अदूरदर्शी व स्वार्थी भारतीयों के सहयोग के बिना कोई भी विदेशी सत्ता भारत में नहीं रह सकती थी। भारतीयों ने कभी भी पराधीनता स्वीकार नहीं की और सर्वदा अपने स्वाभिमान के लिए संघर्ष करते रहे। भारत में अंग्रेजों का शासन भी कुछ भारतीय जमींदार, स्वार्थी शासक वर्ग, और कुछ ढोंगी राजनेताओं के कारण ही था, जिन्होने लोभवश या किसी विवशता में अंग्रेजों की आधीनता स्वीकार की और बड़ी क्रूरता से जनभावनाओं को दबाकर रखा।

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सन १८५७ ई. के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के समय अंग्रेजों ने एक योजना बनाई थी कि भारत से सारे भारतीयों की हत्या कर दी जाये और सिर्फ गोरी चमड़ी वाले यूरोपीय लोगों को ही यहाँ रहने दिया जाये, और कुछ भारतीयों को गोरों के गुलाम के रूप में जीवित रखा जाये। वे ऐसा काम दोनों अमेरिकी महाद्वीपों और ऑस्ट्रेलिया में कर चुके थे।
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१८५७ के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के समय इसी नरसंहार के लिए अंग्रेजों ने जनरल जेम्स जॉर्ज स्मिथ नील (General James George Smith Neill), जनरल सर हेनरी हेवलॉक (General Sir Henry Havelock), और फील्ड मार्शल हेनरी हयूग रोज़ (Field Marshal Henry Hugh Rose) को ज़िम्मेदारी सौंपी थी। ये तीनों ही नरपिशाच हत्यारे थे। अंग्रेजों ने इन नरपिशाच हत्यारों की स्मृति में अंडमान द्वीप समूह में तीन द्वीपों के नाम रखे।
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इन नराधम हत्यारे अंग्रेज़ सेनापतियों ने १८५७ में भारत के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम को निर्दयता से कुचला और करोड़ों भारतीयों का नरसंहार किया। इन राक्षसों ने १८५७ के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम का बदला लेने के लिए व्यापक नर-संहार किया था जो विश्व के इतिहास में सबसे बड़ा नरसंहार था। एक करोड से अधिक निर्दोष भारतीयों की पेड़ों से लटका कर या गोली मार कर हत्याएँ की गयी थीं। दो माह के भीतर भीतर इतना बड़ा नर-संहार विश्व इतिहास में कहीं भी नहीं हुआ है|
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नील के नेतृत्व में अंग्रेज़ सेनाएँ इलाहाबाद से कानपुर की ओर चल पड़ीं। इलाहाबाद से कानपुर तक के मार्ग में नील ने हर गाँव में सार्वजनिक नर-संहार किया, और लाखों निरीह भारतीयों की हत्या की। उसे मार्ग में जो भी भारतीय मिलता उसे वह निकटतम पेड़ पर फांसी दे देता। इलाहाबाद से कानपुर तक के मार्ग में पड़ने वाले हरेक गाँव को जला दिया गया, ऐसा कोई भी पेड़ नहीं था जिस पर किसी असहाय भारतीय को फांसी पर नहीं लटकाया गया हो। बाद में नरसंहार के लिए वह लखनऊ गया जहाँ भारतीय वीरों ने उसे मार डाला। उस नर-पिशाच की स्मृति में अंग्रेजों ने अंडमान में एक द्वीप का नाम Neil Island रखा। उस नर-पिशाच का नाम वर्तमान भाजपा सरकार ने सत्ता में आने के बाद ही हटवाया। इस नर-पिशाच ने बिहार में भी लाखों भारतीयों की हत्या की थी। बिहार में कुंवर सिंह के क्षेत्र में आरा और गंगा नदी के बीच के एक गाँव में इस राक्षस ने वहाँ के सभी ३५०० लोगों की हत्याएँ की। फिर बनारस के निकट के एक गाँव में जाकर वहाँ के सभी ५५०० लोगों की हत्याएँ करवाई। यह जहाँ भी जाता, गाँव के सभी लोगों को एकत्र कर उन्हें गोलियों से भुनवा देता।
हेवलॉक के नेतृत्व में अँगरेज़ सेना ने झाँसी की रानी को भागने को बाध्य किया और उनकी ह्त्या की। इस राक्षस ने झांसी के आसपास के क्षेत्रों में लाखों भारतीयों की हत्याएँ करवाई थीं।
रोज ने कानपुर की ३ लाख की जनसंख्या में से लगभग दो लाख सत्तर हज़ार नागरिकों की ह्त्या करवा कर कानपुर नगर को श्मसान बना दिया था। यह एक भयानक हत्यारा था। कानपुर के पास के एक गाँव कालपी की तो पूरी आबादी को ही क़त्ल कर दिया गया। वहाँ किसी पशु-पक्षी तक को भी जीवित नहीं छोड़ा गया।
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उपरोक्त तीनों अँगरेज़ सेनाधिकारियों में से हरेक ने अपनी सेवा काल में लाखों भारतीयों की हत्याएँ की, इसलिए उन्हें अंग्रेज सरकार ने खूब सम्मानित किया।
केंद्र में वर्तमान सरकार ने रोज द्वीप का नाम नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वीप, नील द्वीप का नाम शहीद द्वीप और हैवलॉक द्वीप का नाम स्वराज द्वीप रख दिया है।
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नेताजी सुभाषचंद्र बोस भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे। ३० दिसंबर १९४३ को नेताजी ने पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना मैदान में राष्ट्रीय ध्वज फहराया था और भारत की स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी। अनेक देशों ने उनकी सरकार को मान्यता भी दे दी थी। पर द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की पराजय के कारण उन्हें भारत छोड़कर ताईवान और मंचूरिया होते हुए रूस भागना पडा जहाँ शायद उन की ह्त्या कर दी गयी। उन की ह्त्या के पीछे स्वतंत्र हो चुके भारत की सरकार की भी सहमति थी। ताईवान में वायुयान दुर्घटना में उनकी मृत्यु की झूठी कहानी रची गयी। आज़ाद हिन्द फौज का खजाना जवाहार लाल नेहरू ने अपने अधिकार में ले लिया था। वह कहाँ गया उसे वे ही जानें।
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !
कृपा शंकर
२८ अगस्त २०२३

(१) सुख और दुःख का कारण क्या हैं ? (२) मन में किसी भी तरह की कामना का होना, सब पापों का मूल है​।

(१) ("ॐ खं ब्रह्म॥" (यजुर्वेद ४०/१७)

" ख" -- आकाश तत्व, यानि ब्रह्म, यानि सर्वव्यापी आत्मा का नाम है। "स' का अर्थ होता है "समीप", और "द" का अर्थ होता हो दूर। जो परमात्मा से समीप है, वह सुखी है। जो परमात्मा से दूर है, वह दुःखी है।
परमात्मा से दूरी "नर्क" है, और परमात्मा से समीपता "स्वर्ग" है। हमारा लोभ और अहंकार ही हमें परमात्मा से दूर करते हैं। नर्क के सबसे बड़े और आकर्षक द्वार का नाम "लोभ" है, और उससे अगला द्वार "अहंकार" है।
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(२) मन में किसी भी तरह की कामना का होना, सब पापों का मूल है​ --
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कोई कामना है तो वह स्वयं "श्रीराम" की हो, हमारी नहीं। सारा जीवन राम-मय हो, इधर-उधर कहीं भी, या पीछे मुड़कर देखने का अवकाश न हो। रां रां रां रां रां रां रां -- यह राम नाम की ध्वनि है जो सारे अस्तित्व में गूंज रही है। चाहे सारा ब्रह्मांड टूट कर बिखर जाये, इस ध्वनि को न भूलें। इसी में अपने सम्पूर्ण अस्तित्व का विसर्जन कर दें। यह जीवन निहाल हो जाएगा। जीवन में और कुछ भी नहीं चाहिए। "ॐ" और "रां" -- ये दोनों एक हैं, इनमें कोई भेद नहीं है। "कामना" (Desire) और "अभीप्सा" (Aspiration) -- इन दोनों शब्दों में दिन-रात का अंतर है। "अभीप्सा" कहते हैं -- परमात्मा के प्रति तड़प को, और "कामना" कहते है -- भोग्य पदार्थों के प्रति तड़प को। ये दोनों विपरीत बिन्दु हैं।
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राम, कृष्ण, और शिव आदि भगवान के नामों में कोई भेद नहीं है। यदि कहीं कोई भेद है तो वह हमारे मन में ही है, मन से बाहर कोई भेद नहीं है। भ्रू-मध्य में या आज्ञाचक्र में मानसिक रूप से एक दीपक जला दीजिये। उस दीपक के प्रकाश को सारे ब्रह्मांड में फैला दीजिये। कहीं कोई अंधकार नहीं है। उस दीपक के प्रकाश में "राम" नाम का जप कीजिये --- "ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ" या "रां रां रां रां रां"। उस दीपक का प्रकाश और कोई नहीं, हम स्वयं है। हम यह शरीर नहीं, वह सर्वव्यापी प्रकाश हैं। उस प्रकाश को ही ब्रह्मज्योति कहते हैं। वह "ब्रह्मज्योति" हम स्वयं हैं।
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जीवन का हर क्लेश, हर पीड़ा और हर दुःख दूर हो जाएगा। उस ब्रह्मज्योति के प्रकाश में इस मंत्र का निरंतर जप कीजिये ---
"ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः॥"
इस मंत्र के प्रकाश में कोई आपका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। बड़े से बड़ा ब्रह्मराक्षस, ब्रह्मपिशाच, भूत-प्रेत, शैतान और कोई भी दुष्टात्मा हो, आपका कोई अहित नहीं कर सकता। लेकिन यह मंत्र जपना तो स्वयं आपको ही पड़ेगा, किसी अन्य को नहीं। किसी अन्य से जप करवाने से कोई लाभ नहीं होगा।
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यदि और भी आगे बढ़ना है तो "गोपाल सहस्त्रनाम" में भगवान श्रीकृष्ण का एक मंत्र दिया है -- "ॐ क्लीं"। "गोपाल" रूप में भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान कीजिये और ऊपर बताई हुई ब्रह्मज्योति के प्रकाश में इस मंत्र का निरंतर जप कीजिये। यह मंत्र आपको विश्वविजयी बना देगा, लेकिन निष्काम भाव से ध्यान करें "गोपाल" रूप में भगवान श्रीकृष्ण का ही।
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आज श्रावण मास की नवमी है, और सोमवार है। बड़ा पवित्र और शुभ दिन है। और कुछ न कर सको तो प्रणव का जप करते करते भगवान शिव का ध्यान करो। एक बार कर लिया तो नित्य निरंतर करते रहो। भगवान शिव ही गुरु हैं। ॐ इति॥
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! गुरु ॐ !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ जुलाई २०२४

हम परमात्मा के साथ एक, और उनके अमृत पुत्र हैं ---

परमात्मा से पृथक हमारी कोई पहिचान नहीं है। जैसे विवाह के बाद स्त्री का वर्ण, गौत्र, और जाति वही हो जाती है, जो उसके पति की होती है; वैसे ही परमात्मा को समर्पण के पश्चात हमारी भी पहिचान वही हो जाती है, जो परमात्मा की है।

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हम यह शरीर नहीं, एक शाश्वत आत्मा हैं। यह शरीर तो एक वाहन है जो हमें इस लोकयात्रा के लिए मिला हुआ है। यह सारी सृष्टि ही परमात्मा का शरीर है। हम सब का धर्म "सनातन" है, जिसे इस सृष्टि की रचना के समय स्वयं परमात्मा ने रचा था। हम परमात्मा के साथ एक, और उनके अमृत पुत्र हैं। यह सत्य एक न एक दिन सभी को समझना ही पड़ेगा॥
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धर्म की जय हो। अधर्म का नाश हो। प्राणियों में सद्भावना हो। जीव का कल्याण हो। भारत माता की जय हो। हर हर महादेव ! महादेव महादेव महादेव !!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ जुलाई २०२४

हमारी सब की सबसे बड़ी पीड़ा ----

सृष्टि के आरंभ से ही भारत में शासन का सबसे बड़ा दायित्व "धर्म की रक्षा" रहा है। त्रेतायुग से सभी क्षत्रिय राजाओं ने "राम-राज्य की स्थापना" को ही अपना आदर्श माना है। धर्म सिर्फ एक ही है, और वह है "सनातन", जो मनु-स्मृति में दिये धर्म के दस लक्षणों को धारण करता है --

"धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्‌।।" (मनुस्मृति ६.९२)
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कणाद ऋषि के वैशेषिक-सूत्रों के अनुसार --
"यतो अभ्युदयः निःश्रेयस सिद्धि सधर्मः" जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस की सिद्धि हो वह धर्म है।
याज्ञवल्क्य ऋषि ने बृहदारण्यक में, व वेदव्यास जी ने भागवत-पुराण, पद्म-पुराण, और महाभारत आदि ग्रन्थों में धर्म-तत्व को बहुत अच्छी तरह से समझाया है।
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भारत में धर्म-शिक्षा के अभाव में धर्म का ह्रास बहुत तीब्रता से हो रहा है। भारत का वर्तमान शासन "धर्म-निरपेक्ष" और पश्चिम की ईसाई व्यवस्थाओं पर आधारित अधर्म-सापेक्ष है। यह व्यवस्था सदा नहीं रह सकती। इस समय तो हम भगवान से प्रार्थना के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं कर सकते। भगवान से यही प्रार्थना करते हैं कि भारत का शासन सत्यनिष्ठ, धर्मसापेक्ष और धर्माधारित हो। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२७ जुलाई २०२४
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पुनश्च: -- हमारी आध्यात्मिक साधना का एकमात्र उद्देश्य धर्म की पुनः स्थापना और वैश्वीकरण है। ईश्वर की उपासना से हमारा उद्देश्य अवश्य पूर्ण होगा। अन्य कुछ भी हमें नहीं चाहिए।

हे जगन्माता, हे परमशिव, अपनी माया के आवरण, विक्षेप और सब दुर्बलताओं से मुझे मुक्त करो। मेरे अन्तःकरण में आप स्वयं सदा निवास करो, इसे इधर-उधर कहीं भटकने मत दो। मैं आपकी शरणागत हूँ। मेरा निवास सदा आपके हृदय में हो, और आप सदा मेरे हृदय में रहो। ॐ ॐ ॐ !!
चारों ओर के नकारात्मक परिवेश का प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता। लेकिन अब भगवान का आश्वासन है, इसलिए निश्चिंत होकर ईश्वर की चेतना में रहते हुए उपासना कर सकता हूँ। किसी भी तरह का कोई रहस्य, अब रहस्य नहीं रहा है। कोई संशय नहीं है। गुरु-कृपा और हरिःकृपा -- पूर्णतः फलीभूत हो रही हैं। जैसे कल का सूर्योदय निश्चित है, वैसे ही इसी जीवनकाल में परमात्म लाभ भी अब सुनिश्चित है। सभी का कल्याण हो।




वर्ण-व्यवस्था ---

 वर्ण-व्यवस्था ---

"वर्ण" शब्द का सही अर्थ क्या हो सकता है? मेरी सोच के अनुसार --
(१) ब्राह्मण --- ब्रह्मचर्य और ब्रह्मज्ञान ही ब्राह्मणत्व है। ब्राह्मणत्व का आरम्भ ब्रह्मचर्य, और ब्राह्मणत्व की पूर्णता ब्रह्मज्ञान है। एक ब्रह्मचारी या ब्रह्मज्ञानी ही ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी है।
(२) क्षत्रिय --- जो अपने प्राणों की चिन्ता न कर, यथाशक्ति सभी निर्बलों की रक्षा, यानि क्षति से त्राण करता है, वह क्षत्रिय है। धर्म की रक्षा क्षत्रियों का मुख्य धर्म है।
(३) वैश्य --- जो समाज में सभी के कल्याण हेतु धन कमाता है, वह वैश्य है।
(४) शूद्र --- जो निःस्वार्थ भाव से समाज की सेवा करता है, वह शूद्र है।
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(५) चांडाल कौन है? आज के समय में एक पाँचवाँ वर्ण "चांडाल" भी है। आजकल के सारे तथाकथित "सेकुलर बुद्धिजीवियों" को चांडाल ही कहना चाहिए। ये काम ही चांडाल का कर रहे हैं।
वर्णाश्रम धर्म नहीं रहा है। भगवान ही अवतृत होकर इसकी पुनः स्थापना कर सकते हैं। और कुछ लिखना नहीं चाहता। सभी का मंगल हो।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
३० जुलाई २०२४