Sunday, 25 August 2024

मन में बुरे विचार न आयें, विचारों पर नियंत्रण रहे, कोई अनावश्यक और फालतू बातचीत न हो, निरंतर सकारात्मक चिंतन हो, और परमात्मा की स्मृति हर समय बनी रहे। इसके लिए हमें क्या करना चाहिए ?

 मैं जो लिखने जा रहा हूँ इसे गंभीरता से लें, हँसी में न उड़ायें। यदि आप इसे गंभीरता से लेंगे और निरंतर अभ्यास करेंगे तो आपका इतना अधिक कल्याण होगा, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।

जहाँ तक हो सके दिन में अधिकांश समय "अर्ध खेचरी मुद्रा" में रहें। अपनी जीभ को ऊपर की ओर मोड़ कर के रखने का अभ्यास करें। जीभ ऊपर की मोड़ कर जितनी भी पीछे मुड़ सकती है, उतनी ही पीछे मोड़ कर और तालू से सटाकर रखें। इसका कई दिनों तक अभ्यास करना पड़ता है।
साथ-साथ मन ही मन भगवान के किसी प्रिय बीज मंत्र का भी जप करते रहें। गीता में भगवान श्रीकृष्ण मूर्धा में ओंकार का जप करने को कहते हैं, वह यही विधि है। इसका विकल्प है "रां" का जप। दोनों का फल एक ही है।
जो मानसिक जप आप करते हैं, आंतरिक रूप से वह कानों में सुनना चाहिए। लेकिन गलती से भी किसी अन्य को सुनाई नहीं देना चाहिए।
उज्जयी प्राणायाम का अभ्यास भी करना चाहिए, जो साधना में बहुत सहायक है।
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सिर्फ पानी पीते समय, भोजन करते समय, बात करते समय, और सोते समय ही जीभ को सीधी रखें। जहाँ तक हो सके नाक से ही सांस लें। हठयोग में अनेक विधियाँ हैं जिनसे नासिका सदा खुली रहती हैं। यदि कोई मेडिकल समस्या है तो किसी अच्छे ENT सर्जन से उपचार करवाएँ।
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उपरोक्त अभ्यास से बुरे विचार आने बंद हो जाएँगे, भगवान की स्मृति हर समय बनी रहेगी, और आप आनंद से भर जाएँगे। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२५ अगस्त २०२४

जन्माष्टमी की मोहरात्रि पूरी सृष्टि के लिए मंगलमय हो ---

 भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मेरे चैतन्य में निरंतर हो रहा है। मैं कैसे वर्णन करूँ? अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों का ऐश्वर्य जिनका अंशमात्र हैं, ऐसे तेज:स्वरूप वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण हर समय निरंतर मेरे समक्ष हैं। उनका रूप इतना तेजस्वी है कि उनकी ओर देखा भी नहीं जा रहा है। मैं तृप्त हूँ, मैं धन्य हूँ उन्हें पाकर !! वे मेरे प्राण हैं, इससे अधिक कुछ भी नहीं कह सकता।

सभी प्राणियों के लिए जन्माष्टमी की मोहरात्रि शुभ और मंगलमय हो॥
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२५ अगस्त २०२४

हम चाह कर भी आध्यात्मिक साधना क्यों नहीं कर पाते? हम भगवान का भजन करना चाहते हैं, लेकिन नहीं कर पाते। इसका कारण क्या है?

 इसके सिर्फ दो ही कारण हैं, कोई तीसरा कारण नहीं है।

पहला कारण तो है हमारे जीवन में तमोगुण का प्रभाव।
दूसरा कारण है बाहरी नकारात्मक परिस्थितियाँ, और उनके कारण हमारा गलत स्वभाव।
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तमोगुण से तो हमें मुक्त होना ही पड़ेगा। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने तमोगुण के लक्षण बताए हैं। यदि हम तमोगुण से ग्रस्त हैं तो हमें भगवान की विशेष कृपा, कुसंग के त्याग, और निरंतर सत्संग की आवश्यकता है। यह तमोगुण किसी भी परिस्थिति में हमें भजन नहीं करने देता।
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कई बार बाहरी परिस्थितियाँ भी हमें भजन नहीं करने देतीं, जैसे घर-परिवार का गलत वातावरण आदि।
आज से ५६ वर्ष पूर्व मैं किसी प्रशिक्षण हेतु दो वर्ष के लिए रूस (सोवियत संघ) गया था। उस समय मार्क्सवादी साम्यवाद अपने चरम पर था। रूसी भाषा का मुझे बहुत अच्छा ज्ञान था। वहाँ के नागरिकों के लिए किसी भी तरह की कोई धार्मिक आस्था की अनुमति नहीं थी। यदि कोई भी व्यक्ति किसी धार्मिक आस्था में विश्वास रखता पाया जाता तो उसे पकड़ कर विखंडित-व्यक्तित्व का मनोरोगी घोषित कर पागलखाने में डाल दिया जाता। वहाँ से कोई भाग्यशाली ही जीवित बापस लौटता था।
यह बात सारे पूर्व सोवियत संघ और सभी साम्यवादी देशों में थी।
आज से ४३ वर्ष पूर्व उत्तरी कोरिया जाने का अवसर मिला था २० दिनों के लिए। वहाँ भी मेरा रूसी भाषा का ज्ञान बहुत काम आया। वहाँ तो भगवान का नाम लेने पर गोली ही मार देते थे। यह बात सत्य है, कोई कपोल-कल्पना नहीं।
चीन का भी मैंने भ्रमण किया है। वहाँ भी लोग भगवान का नाम लेने से ही डर जाते थे। सबसे बुरा हाल तो पूर्वी यूरोप में रोमानिया का था। जब वहाँ का राष्ट्रपति चाउसेस्को था उस समय पूरे देश का राष्ट्रीय चरित्र ही नष्ट हो गया था। पूरा देश ही चरित्रहीन और भ्रष्ट हो गया था। मार्क्सवाद जहां जहां जिन जिन देशों में भी गया, वहाँ एक महाविनाश के अवशेष छोड़ता गया।
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ऐसे देशों में जन्म लेना ही नर्क की यंत्रणा भोगना होता है। दुनियाँ के कई इस्लामी मज़हबी और ईसाई रिलीजियस देशों का भी भ्रमण मैंने किया है। वहाँ कोई आध्यात्म नहीं है। वे देश भी घोर नर्ककुंड हैं। वहाँ जन्म लेना भी नर्क की यंत्रणा भोगना है।
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हम लोगों ने कई जन्मों में कई पुण्य किए होंगे, जो भारत में जन्म मिला। अंत में यह वाक्य लिखकर इस लेख को समाप्त करता हूँ कि जिसने भारतवर्ष में जन्म लेकर भी भगवान का भजन नहीं किया, वह अभागा है।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
झुंझुनूं (राजस्थान)
२५ अगस्त २०२३

Tuesday, 26 March 2024

भ्रामरी-गुफा का रहस्य ---

गुरु की आज्ञा से हम जब भ्रूमध्य पर ध्यान करते हैं, तब बंद आँखों के अंधकार के पीछे शनैः शनैः गुरुकृपा से एक दिन विद्युतप्रभा के सदृश एक ब्रहमज्योति ध्यान में प्रकट होती है। उस ब्रह्मज्योति के सर्वव्यापी प्रकाश को हम 'ज्योतिर्मय ब्रह्म' कहते हैं जिसका ध्यान किया जाता है। उसमें सारी सृष्टि समाहित होती है। उसे "कूटस्थ" कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने इस शब्द का प्रयोग श्रीमद्भगवद्गीता में अनेक बार किया है। कूटस्थ पर ध्यान करते करते आरंभ में धीरे-धीरे भ्रमर-गुंजन की सी एक ध्वनि सुनाई देने लगती है। उस ध्वनि को 'अनाहत नाद' कहते हैं, जिसे सुनते हुए गुरु-प्रदत्त बीजमंत्र का मानसिक जप करते हैं। अनाहत-नाद की ध्वनि का रूप भी हर चक्र पर पृथक-पृथक होता है। यह आध्यात्मिक साधना, गुरु की आज्ञा से गुरु के निर्देशन में ही की जाती है।

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वह प्रकाश-पुंज, भ्रमर की तरह डोलता है जिसके मध्य के स्थित बिन्दु को प्रतीकात्मक रूप से 'भ्रामरी गुफा' कहते हैं। उसमें स्वाभाविक रूप से प्रवेश करते हैं, तब बड़ी दिव्य अनुभूतियाँ और आनंद की प्राप्ति होती है। भगवान की माया भी उस समय अति सक्रिय हो जाती है। माया के दो अस्त्र होते हैं -- एक तो है आवरण, और दूसरा है विक्षेप। आवरण कहते हैं अज्ञान के उस पर्दे को जो सत्य का बोध नहीं होने देता। जब हम किसी बिन्दु पर मन को एकत्र करते हैं, तब अचानक ही कोई दूसरा विचार आकर हमें भटका देता है। उस भटकाव को जो हमें एकाग्र नहीं होने देता, विक्षेप कहते हैं। जब तक हमारे मन में किसी भी तरह का कोई लोभ और अहंकार हैं, तब तक यह माया उसी अनुपात में हमें आवरण और विक्षेप के रूप में बाधित करती रहेगी। इस से पार जाने के लिए भक्ति और समर्पण का आश्रय लेना पड़ता है। बिना भक्ति के कोई प्रगति नहीं हो सकती। यह शाश्वत नियम है जो भ्रामरी गुफा का रहस्य है।
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माया को महाठगिनी कहा गया है जो आवरण और विक्षेप के रूप में हमें ठगती रहती है। हमारे मन में जितना अधिक लोभ और अहंकार है, माया भी उसी अनुपात में हमें उतना ही दुःखी करती है। अतः भगवान की भक्ति का आश्रय लें। अपने लोभ, अहंकार और राग-द्वेष पर जिसने विजय पा ली, वह वीतराग ही वास्तव में सच्चा विजयी है। इससे भी आगे की अवस्था -- स्थितप्रज्ञता है।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२६ मार्च २०२४

Saturday, 21 January 2023

हमारा 'लोभ' और 'अहंकार' -- हमारे सबसे बड़े शत्रु हैं ---

 हमारा 'लोभ' और 'अहंकार' -- हमारे सबसे बड़े शत्रु हैं; हमारी 'भक्ति' और 'सत्यनिष्ठा' -- हमारे सबसे बड़े मित्र हैं --- (यह बहुत अधिक महत्वपूर्ण और गंभीर लेख है)

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जीवन में जरा सी भी आध्यात्मिक प्रगति के लिए शत-प्रतिशत अनिवार्य आवश्यकता 'भक्ति' यानि परमात्मा के प्रति परमप्रेम है --
"मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा, किए जोग, तप, ज्ञान विरागा।"
दूसरी आवश्यकता -- सत्यनिष्ठा (Sincerity) है।
यदि भक्ति और सत्यनिष्ठा हमारे में है, तो बाकी सारे सद्गुण हमारे में स्वतः ही आ जायेंगे।
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हम क्या सोचते हैं, और कैसे लोगों के साथ रहते हैं, इसका सबसे अधिक प्रभाव हमारे ऊपर पड़ता है। जैसे लोगों के साथ रहेंगे, बिल्कुल वैसा ही हमारा चिंतन हो जाएगा, और हम वैसे ही हो जायेंगे। यही सत्संग की महिमा है।
"महत्सङ्गस्तु दुर्लभोऽगम्योऽमोघश्च" -- यानि महापुरुषों का संग दुर्लभ, अगम्य तथा अमोध है। इसलिए हमें सर्वदा सत्संग करना चाहिये।
संगति का असर पड़े बिना रहता नहीं है। जैसा हमारा चिंतन होता है, यानि जैसा भी हम सोचते हैं, वैसे ही बन जाते हैं।
योगसूत्रों में एक सूत्र आता है -- "वीतराग विषयं वा चित्तः"।
अर्थात् - किसी वीतराग व्यक्ति का निरंतर चिंतन हमारे चित्त को भी वीतराग (राग-द्वेष-अहंकार से परे) बना देता है।
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किसी भी परिस्थिति में कुसंग का त्याग करना चाहिए। "दुस्सङ्गः सर्वथैव त्याज्यः" -- क्योंकि कुसंग से ही काम, क्रोध, मोह, स्मृतिभ्रंश, बुद्धिनाश और अंततः सर्वनाश हो जाता है। "कामक्रोधमोहस्मृतिभ्रंशबुद्धिनाशकारणत्वात्"।
जो पतनोन्मुख है, और जो गलत लोगों का संग करता है, उसका साथ छोड़ देना चाहिए, चाहे वह स्वयं का गुरु ही क्यों ना हो।
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परमात्मा हमारे पिता हैं, तो माता भी हैं। रात्रि में परमात्मा का चिंतन करते करते उसी तरह सोयें जैसे एक छोटा बालक निश्चिंत होकर अपनी माँ की गोद में सोता है। सिर के नीचे तकिया नहीं, माँ का वरद-हस्त होना चाहिए।
दिन का आरंभ भगवान के ध्यान से करें, और पूरे दिन उन्हें अपनी स्मृति में रखें। हमारे बारे में कौन क्या कहता है, और क्या सोचता है, यह उसकी समस्या है, हमारी नहीं। इस पर थोड़ा गंभीरता से विचार करें।
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सभी को अनंत मंगलमय शुभ कामनाएँ। आप सबकी जय हो।
ॐ तत्सत्॥ 🌹🙏🕉🕉🕉🙏🌹
कृपा शंकर
६ जनवरी २०२३

भारत निश्चित रूप से विजयी होगा ---

असत्य और अंधकार की आसुरी/राक्षसी शक्तियों से सनातन-धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए हमें -- आध्यात्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, मानसिक, आर्थिक, व भौतिक -- हरेक दृष्टिकोण से सशक्त व संगठित होना होगा।

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देश में जो विदेशी समाचार/प्रचार तंत्र हैं, उनसे देश को मुक्त करना पड़ेगा। राष्ट्र भक्ति का वातावरण बनाना होगा। आने वाला समय कुछ अच्छा नहीं प्रतीत हो रहा है। भगवान से भी प्रार्थना करते रहें और निज विवेक से काम लें। भारत निश्चित रूप से विजयी होगा।
वास्तव में सनातन धर्म ही भारत है, और भारत ही सनातन धर्म है।
६ जनवरी २०२३

आत्मा का धर्म है -- परमात्मा की अभीप्सा, पूर्ण प्रेम और पूर्ण समर्पण ---

 आत्मा का धर्म है -- परमात्मा की अभीप्सा, पूर्ण प्रेम और पूर्ण समर्पण।

हम ये नश्वर देह, अन्तःकरण, इंद्रियाँ, और उनकी तन्मात्राओं से परे शाश्वत आत्मा हैं। अपने स्वधर्म का पालन निरंतर करते रहें।
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यह संसार परमात्मा की रचना है। विश्व में जो कुछ भी हो रहा है, उससे विचलित न हों; और कूटस्थ-चैतन्य / ब्राह्मी-स्थिति में निरंतर रहने कि साधना करते रहें। परमात्मा भी हमारे प्रेम के भूखे/प्यासे हैं, और हमसे मिलने को तरस रहे हैं। हम कब तक उनसे प्रतीक्षा करवायेंगे?
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तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
७ जनवरी २०२३