Wednesday, 9 November 2022

अपनी चेतना को परमात्मा से जोड़िए, जीवात्मा से नहीं; हम जीव नहीं शिव हैं ---

 अपनी चेतना को परमात्मा से जोड़िए, जीवात्मा से नहीं; हम जीव नहीं शिव हैं

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अर्धोन्मीलित नयनों में जब भगवान स्वयं प्रत्यक्ष रूप से कूटस्थ हमारे समक्ष हैं, तब उन्हें इधर-उधर ढूँढ़ने की क्या आवश्यकता है? उन्हें अपनी पलकों में बंदी बना लीजिये। कूटस्थ-चैतन्य में वे ही परमशिव हैं, वे ही विष्णु हैं, और वे ही सर्वव्यापक ज्योतिर्मय ब्रह्म हैं। जो वे हैं, वही हम हैं। कहीं कोई अंतर नहीं है। हम भगवान से पृथक नहीं हो सकते, उनके साथ एक हैं। हमारे माध्यम से भगवान स्वयं को व्यक्त कर रहे हैं।
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ध्यान के आसन पर हम स्थिर होकर सुख से बैठे हैं। जितना स्थान इस आसन ने घेर रखा है वह हमारा सिंहासन है। ऊपर का सारा ब्रह्मांड -- जहाँ तक हमारी कल्पना जाती है, हम स्वयं हैं, यह भौतिक शरीर नहीं। ऊपर का सारा आकाश और उससे भी परे जो कुछ है, वह अनंतता और पूर्णता हम स्वयं हैं। यह सृष्टि हमारे ही विचारों का घनीभूत रूप है।
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इस देह के मेरुदंड में सूक्ष्म रूप से सभी देवी-देवता बिराजमान हैं। मेरुदंड की सुषुम्ना नाड़ी में भगवती कुंडलिनी विचरण कर रही हैं। वे ही प्राण तत्व हैं। जब तक वे इस देह में विचरण कर रही हैं, तब तक यह देह जीवंत है। जिस क्षण वे इस देह को त्याग देंगी, उसी क्षण यह देह मृत हो जाएगी; और जीवात्मा को उस समय के भावों के अनुरूप तुरंत दूसरी देह मिल जाएगी।
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अपनी चेतना को परमात्मा से जोड़िए, जीवात्मा से नहीं। हम जीव नहीं शिव हैं। कमर को बिलकुल सीधी रखें। साँसे दोनों नासिकाओं से चल रही हों। दृष्टि भ्रूमध्य में स्थिर हो, और चेतना ब्रह्मांड के उच्चतम बिन्दु पर हो। अब ब्रह्मरंध्र के मार्ग से अपनी चेतना को इस देह से बाहर ले आइये, और जितना ऊपर उठ सकते हैं, उतना ऊपर उठ जाइए। और ऊपर उठिये, और ऊपर उठिये, लाखों करोड़ों प्रकाश-वर्ष ऊपर उठ जाइए। उठते रहो, उठते रहो। अंत में एक आलोकमय जगत है जहाँ दूध के समान सफ़ेद ही सफ़ेद प्रकाश है। वह क्षीर-सागर है, जहाँ भगवान विष्णु का निवास है। जो विष्णु हैं, वे ही शिव हैं; जो शिव हैं, वे ही विष्णु हैं। जैसे हमारे भाव होते हैं, उसी के अनुरूप वे हमें प्रतीत होते हैं। वहाँ एक पंचकोणीय नक्षत्र के दर्शन होते हैं। उसका भी भेदन कर हम स्वयं परमशिव के साथ एक हो जाते हैं।
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जब भी भगवान का आदेश हो तब इस शरीर में बापस लौट आइये, लेकिन अपने परमशिव रूप में ही रहें। आप जीव नहीं शिव हो। निरंतर एक सफ़ेद प्रकाश -- एक ज्योति हमारे समक्ष रहेगी, उसमें और कोई नहीं, स्वयं पुरुषोत्तम हैं। वे ही आप स्वयं हो। निरंतर उन्हीं की चेतना में रहो। जब मृत्यु आती है तब उसे स्वीकार कीजिये। जो नारकीय जीवन हम जी रहे हैं, उससे तो अच्छा है कि हम परमात्मा का स्मरण करते करते यह देह ही छोड़ दें। जब तक जीवन है, उसमें परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो।
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१ नवंबर २०२२
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जैसा भगवान ने चाहा वह उन्होने लिखवा दिया। कोई प्रश्न है तो प्रत्यक्ष परमात्मा से पूछिए, वे निश्चित रूप से उत्तर देंगे। मैं न तो कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करूंगा और न किसी प्रश्न का उत्तर दूंगा। यह आपके और परमात्मा के मध्य का मामला है। मैं बीच में कहीं भी नहीं हूँ।

विराट पुरुष की आराधना ---

 विराट पुरुष की आराधना ---

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मैं मूर्तिपूजा का समर्थक हूँ। भगवान का विग्रह होना चाहिए। "विग्रह" प्राणमय यानि जीवंत होता है। "प्रतिमा" शब्द गलत है, प्रतिमा प्राणहीन होती है। सही शब्द है -- "विग्रह" या "मूर्ति", क्योंकि वे प्राणमय होते हैं, उनमें प्राण होता है।
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(मैं वही कहूँगा जिस का मैं अनुभव कर रहा हूँ, कोई रटी-रटाई बात या दूसरों को प्रसन्न करने के लिए नहीं कह रहा। मुझे पता है कि जो मैं कहने जा रहा हूँ, इसके लिए लोग मुझे गालियाँ भी देंगे, मेरी हंसी भी उड़ायेंगे, और उनका वश चले तो मुझे सूली पर भी चढ़ा देंगे, क्योंकि इस से उनके अहंकार को तृप्ति मिलती है। लेकिन जब तक मुझ पर ईश्वर की कृपा है, मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।)
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श्वेताश्वतरोपनिषद् के तीसरे अध्याय का चौथा मंत्र कहता है --
"वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्‌।
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥"
अर्थात् -- मैं उस परम पुरुष को जान गया हूँ जो सूर्य के समान देदीप्यमान है और समस्त अन्धकार से परे है। जो उसे अनुभूति द्वारा जान जाता है वह मृत्यु से मुक्त हो जाता है। जन्म-मृत्यु के चक्र से छुटकारे का कोई अन्य मार्ग नहीं है।
(तमसः परस्तात् आदित्यवर्णम् एतत् महान्तं पुरुषम् अहं वेद। तमेव विदित्वा अतिमृत्युम् एति अयनाय अन्यः पन्थाः न विद्यते॥)
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अयोध्या के प्रख्यात वैदिक विद्वान डॉ देवीसहाय पाण्डेय ने "परमपुरुष परमात्मा का स्वरूप" शीर्षक के अंतर्गत अपने एक लेख में इसका पद्यानुवाद भी किया है -
"मुझे उस परम पुरुष का ज्ञान
जो कि आदित्यवर्ण द्युतिमान।
तमस से दूर भास्वरित रूप
परम ज्योतिर्मय परम अनूप।
नहीं कोई उसका उपमान।।
प्रभामय रूप यही अम्लान
सदा सर्वोपरि परम महान।
नहीं है तम का तनिक विधान।।
जिसे होगा यह रूप प्रतीत
मृत्यु को वही सकेगा जीत।
नहीं है अन्य पन्थ - सन्धान।।"
अर्थात् - मैं इस अत्यंत महान, अनुपम, आदित्य- वर्ण विराट पुरुष को जानता हूँ। वह अंधकार से परे है। उसे जान लेने पर मृत्यु पर विजय मिल जाती है। आश्रय प्राप्ति हेतु अथवा मोक्ष हेतु अन्य कोई उपाय नहीं है।
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अभी प्रश्न उठता है कि उस विराट पुरुष को कैसे जानें? कैसे उसका ध्यान करें?
गुरु के उपदेश व आदेश के अनुसार भ्रूमध्य पर ध्यान करते करते एक दिन एक ब्रह्मज्योति मेरे ध्यान में प्रकट हुई, जो सारे ब्रह्मांड में व्याप्त हो गई। सारा ब्रह्मांड, सारी सृष्टि उसमें समाहित हो गई। उस दिन के अनुभव से मुझे ज्ञात हुआ कि मैं यह भौतिक देह नहीं, बल्कि परमात्मा की अनंतता हूँ। यह अनंतता ही मेरा शरीर है। सारी आकाश-गंगाएँ, अपने ग्रहों-उपग्रहों सहित सारे नक्षत्र, मेरी ही विराट देह के भाग हैं। मुझे उस विराट-पुरुष की ही आराधना करनी है, और उस विराट-पुरुष में ही स्वयं को समर्पित करना है। अब तो उसी का ध्यान मुझसे होता है। इससे अधिक समझने की बौद्धिक क्षमता मुझ में नहीं है। मेरी आस्था है कि यही उस विराट-पुरुष का विग्रह है जिसका मुझे सदा ध्यान करना चाहिए, उसी की उपासना करनी चाहिए, और उसी में स्थित रहना चाहिए। बाहर की मूर्तियाँ प्रतीकात्मक हैं। उनकी भी पूजा होनी चाहिए। वास्तविक विग्रह यानि वास्तविक मूर्ति तो परमात्मा की यह अनंत विराटता ही है।
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हंसः योग (अजपा-जप) (हंसवति ऋक) करते रहो। कुंभक की अवधि में विराट-पुरुष का और भी गहरा ध्यान करो। फिर अनाहत नाद के रूप में प्रणव की ध्वनि के साथ निदिध्यासन करते रहो। अपनी चेतना को भौतिक देह से जितने अधिक समय तक हो सके बाहर ही रखो। बीच बीच में अपने भौतिक शरीर को भी देख लो और यह भाव करो की में यह भौतिक शरीर नहीं, विराट पुरुष हूँ।
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घनीभूत प्राण-ऊर्जा (कुंडलिनी) जागृत हो जाये तो उसे बार-बार परमशिव को अर्पित करते रहो। इस विराटता से परे का अस्तित्व "परमशिव" है। पूर्ण रूपेण परमशिव को समर्पित होकर उनसे एकाकार होना ही हमारी उपासना का लक्ष्य होना चाहिए। मन परमात्मा में मग्न हो जाये। सारा ब्रह्मांड, सारी सृष्टि, सारी अनंतता, मेरी देह है, जिस के माध्यम से स्वयं परमात्मा साँसें ले रहे हैं। मैं नहीं हूँ, मेरा कोई अस्तित्व नहीं है, सब कुछ परमात्मा ही है। मैं तो निमित्त मात्र हूँ, यह निमित्त भी परमात्मा ही है। पृथकता का बोध एक भ्रम है।
"ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शन्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च॥ ॐ नमः शिवाय !!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
०२ नवंबर २०२२

हम कौन हैं? ---

 हम कौन हैं? ---

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हम यह भौतिक देह नहीं, बल्कि सम्पूर्ण अस्तित्व और परमात्मा के साथ एक हैं, वैसे ही जैसे महासागर में जल की एक बूँद। जल की यह बूँद जब तक महासागर से जुड़ी हुई है, अपने आप में स्वयं ही महासागर है। पर महासागर से दूर होकर वह कुछ भी नहीं है। वैसे ही परमात्मा से दूर होकर हम अस्तित्वहीन हैं।
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परमात्मा ने समष्टि में अपना प्रकाश फैलाने और अपने ही अन्धकार को दूर करने का दायित्व हमें दिया है। उनकी लीला में हमारी पृथकता का बोध -- माया के आवरण के कारण एक भ्रममात्र है। हमारा स्वभाव परम प्रेम है। हम स्वयं परमप्रेम हैं।
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परमात्मा के संकल्प से यह सृष्टि बनी है। हम उनके अमृतपुत्र और उनके साथ एक हैं। जो कुछ भी परमात्मा का है वह हमारा है। हम कोई भिखारी नहीं हैं। परमात्मा को पाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। परमात्मा का संकल्प ही हमारा संकल्प है। प्रकृति की प्रत्येक शक्ति हमारा सहयोग करने को बाध्य है।
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मैं परमात्मा का सर्वव्यापी प्रकाश और प्रणव की सर्वव्यापी सूक्ष्मतम ध्वनि हूँ। मैं और मेरे प्रभु एक हैं। कहीं कोई भेद नहीं है। जो मैं हूँ, वह ही आप हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३ नवंबर २०२२

इस संसार में सबसे अधिक दया का पात्र कौन है?

 (प्रश्न) :-- इस संसार में सबसे अधिक दया का पात्र कौन है?

(उत्तर) :-- इस संसार में सबसे अधिक दया का पात्र ब्राह्मण है।
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ब्राह्मण - कोई जाति नहीं, हिन्दू वर्ण-व्यवस्था का एक वर्ण है। ब्राह्मण का स्वधर्म ही है - भगवत्-प्राप्ति। अनेक जन्मों के पुण्यों के फलवरूप, किसी का भारतभूमि में, हिन्दू धर्म में, और ब्राह्मण कुल में जन्म होता है। ब्राह्मण कुल में जन्म होता ही है -- ब्रह्म, यानि परमात्मा को जानने के लिए। यस्क मुनि की निरुक्त के अनुसार - "ब्रह्म जानाति ब्राह्मण:" अर्थात् ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म (अंतिम सत्य, ईश्वर या परम ज्ञान) को जानता है। ब्राह्मण का अर्थ है "ईश्वर का ज्ञाता"।
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जिसने ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी भगवान की भक्ति नहीं की, उसकी सदगति नहीं होती। उसे अनेक कष्टप्रद योनियों में भटकने के बाद, अनेक कष्टमय जन्मों के उपरांत ही फिर से ब्राह्मण वर्ण मिलता है। इसीलिए ब्राह्मण दया का पात्र है। मेरे जैसे अनेक ब्राह्मण भटके हुए हैं जो अब होश में आ रहे हैं। अतः उन सब को जिनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ है, निरंतर नाम-स्मरण, और संध्या-साधना (गायत्री-जप, प्राणायाम और ध्यान) करनी ही चाहिए।
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अपना स्वधर्म (भगवत्-प्राप्ति) न छोड़ें। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते है --
"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३:३५॥"
अर्थात् -- सम्यक् प्रकार से अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म का पालन श्रेयष्कर है; स्वधर्म में मरण कल्याणकारक है (किन्तु) परधर्म भय को देने वाला है॥
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श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने ब्राह्मण का धर्म बताया है --
"शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥१८:४२॥"
अर्थात् -- शम, दम, तप, शौच, क्षान्ति, आर्जव, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिक्य - ये ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं॥
अनेक आचार्यों ने उपरोक्त श्लोक की बहुत ही विषद व्याख्या की है। विभिन्न आचार्यों के भाष्यों का स्वाध्याय करें।
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हमारे कूटस्थ में एक परम ब्रह्म-ज्योति निरंतर प्रज्ज्वलित है, और ओंकार का नाद निरंतर निःसृत हो रहा है। उसमें स्वयं का विलय करते हुए, कूटस्थ-चैतन्य यानि श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान द्वारा बताई हुई ब्राह्मी स्थिति में रहने की साधना करें। यह ब्राह्मण-धर्म है।
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उपरोक्त बातें लिखने की प्रेरणा भगवान से मिल रही थी, इसलिए उन्होने लिखवा दीं; अन्यथा मुझ अकिंचन में कोई सामर्थ्य नहीं है।
"ॐ नमो ब्रह्मण्य देवाय गोब्राह्मण हिताय च।
जगत् हिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
३ नवंबर २०२१
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पुनश्च :--- ब्रह्मचर्य ही हमें ब्राह्मण बनाता है। बिना ब्रह्मचर्य के ब्राह्मणत्व संभव नहीं है। सद्आचरण और सद् विचार भी ब्रह्मचर्य के अंतर्गत आते हैं। ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए हम नियमित गायत्रीजप, प्राणायाम और ध्यान साधना करते हुए अपने धर्म पर अडिग रहें। धर्म का पालन ही धर्मरक्षा है, और धर्म ही हमारी रक्षा कर सकता है। ॐ ॐ ॐ !!

मैं नहीं, मेरा नहीं, सब कुछ वे ही हैं ---

 मैं नहीं, मेरा नहीं, सब कुछ वे ही हैं ---

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स्वयं को यह भौतिक देह मानना, व इसकी सुख-सुविधा और ख्याति की चिंता और प्रयास में लगे रहना ही अहंकार है। अब पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, स्वर्ग-नर्क, अच्छा-बुरा आदि में कोई रुचि नहीं रही है। एकमात्र आकर्षण मेरे समक्ष सदा बिराजमान कूटस्थ ब्रह्म का ही है। कूटस्थ में भगवान की उपस्थिती का आभास हर समय रहता है। उन्हीं में पूर्ण समर्पण हो, यही एकमात्र अभीप्सा है।
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पिछले जन्मों के कर्मफलों को भुगतने के लिए ही हम सब इस संसार में जन्म लेते हैं, और नए कर्मों की सृष्टि भी अनायास ही हो जाती है। मुझे इस बात का आभास है कि इस जीवन में मेरा यहाँ कितना समय और अवशिष्ट है, लेकिन उसकी चर्चा नहीं करूंगा।
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परमात्मा के चिंतन और ध्यान में ही सारा समय व्यतीत हो, इस की प्रेरणा मुझे सूक्ष्म जगत से मेरे पूर्व जन्मों के गुरु दे रहे हैं। इसलिए भगवान को ही सब कुछ समर्पित कर दिया है। न तो मैं हूँ, और न कुछ मेरा है। सब कुछ परमात्मा हैं, जो इस समय भी मेरे कूटस्थ-चैतन्य में मेरे समक्ष हैं। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
४ नवंबर २०२२

इस संसार में न तो कोई खाली हाथ आता है, और न कोई खाली हाथ जाता है ---

 इस संसार में न तो कोई खाली हाथ आता है, और न कोई खाली हाथ जाता है ---

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कई लोग गीता का नाम लेकर और गीता का बता कर यह अज्ञान बाँटते हैं कि क्या लेकर आया था? और क्या लेकर जायेगा? यह एक राक्षसी और आसुरी ज्ञान है। इस तरह का ज्ञान बाँटने वाले आसुरी बुद्धि के असुर लोग हैं, जो अपना अधम आसुरी ज्ञान बाँट रहे हैं।
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पूर्वजन्मों में अर्जित कर्मफल और ज्ञान लेकर मनुष्य इस संसार में आता है। अपने विचारों और अनुभवों से अर्जित ज्ञान व कर्मफलों में और वृद्धि कर के, उनके साथ ही मनुष्य इस संसार से जाता है। न तो कोई खाली हाथ आया है और न कोई खाली हाथ जायेगा। स्वयं को यह शरीर मानना एक आसुरी भाव है। जो स्वयं को यह शरीर मानते हैं, वे दानव कहलाते हैं। उनका समाज दानव समाज है।
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अपनी तपस्या से सारे कर्मफलों को जो भस्म कर के जाता है वह जीवन-मुक्त पुरुष है। वह कर्मफलों से मुक्त होकर अपनी स्वतंत्र इच्छा से ही विचरण करता है। खाली हाथ यानि रिक्त होकर कोई नहीं जाता। जीवन-मुक्ति का उपाय श्रीमद्भगवद्गीता और उपनिषदों आदि शास्त्रों में बताया गया है, जिसके लिए स्वाध्याय और तपस्या करनी पड़ती है। अपनी कुटिल बुद्धि से कोई मोक्ष या जीवनमुक्ति नहीं पा सकता। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
०४ नवंबर २०२२

अपना हाथ उनके हाथ में थमा दो, और पकड़ कर रखो ---

अपना हाथ उनके हाथ में थमा दो, और पकड़ कर रखो। उनके हृदय में रहो। स्वयं के हृदय में कोई कुटिलता न हो, अन्यथा वे हाथ नहीं थामेंगे। स्वयं को उन्हीं के हाथों में सौंप दो।

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स्वर्ग और नर्क -- इन दोनों में कोई अंतर नहीं है। स्वर्ग में चार दिन अप्सराओं का डांस देखोगे, नर्क में चार दिन यातनाएँ भुगतोगे, फिर बापस आना तो इस मृत्यु लोक में ही है। उपाय ऐसे करो कि जीवनमुक्त हो जाओ। ये अप्सराओं का डांस तो फिल्मों में भी होता है। पूरा फिल्मीस्तान ही नर्क है।
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दूसरों को ठगने की प्रवृत्ति बिलकुल न हो। जिनमें दूसरों को ठगने, लूटने या पराये धन की कामना होती है उन पर भगवान की कृपा कभी नहीं होती। वे कितना भी पुण्य करें, वह किसी काम नहीं आता। ऐसे लोग नर्क के कीड़े बनते हैं। उनके पास जो कुछ भी है वह पहले के किए हुये पुण्यों का फल है, जो अस्थायी है। फिर जाना तो उनको पशुयोनी में ही है।
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परमात्मा को अपने हृदय में रखो, और सदा निरंतर उनके हृदय में रहो। परमात्मा को छोड़कर इधर-उधर कहीं भी मत झाँको। उन्हें भी आपके हृदय में रहकर प्रसन्नता होगी। ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
५ नवंबर २०२२