(प्रश्न): भारत के मूस्लिम समाज में "खान" शब्द का प्रचलन कैसे हुआ?
Saturday, 29 October 2022
भारत के मूस्लिम समाज में "खान" शब्द का प्रचलन कैसे हुआ? ----
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(उत्तर): दक्षिण भारत के कुछ अति अति अल्प भागों में इस्लाम का आगमन अरब व्यापारियों के साथ हुआ था। लेकिन इस्लाम मुख्यतः मध्य एशिया, विशेषकर उज्बेकिस्तान के आक्रमणकारियों के द्वारा अफगानिस्तान के मार्ग से भारत में आया था। ये स्वयं को तुर्क कहते थे। तुर्की की सल्तनत-ए-उस्मानिया के प्रति उनमें बहुत सम्मान था। "हान" से अपभ्रंस होकर बने "खान" शब्द का तत्कालीन प्रचलित अर्थ था -- "महाराजाधिराज", "महाराजा" आदि। १२वीं तथा १३वीं सदी ई. में तुर्क लोग "खान" शब्द का प्रयोग राज्य के सर्वोच्च अधिकारी के लिए किया करते थे। यह शब्द सत्ता के शिखर पर बैठे व्यक्ति के लिए ही प्रयुक्त होता था। बाद में अफगानिस्तान में स्वयं के नाम के साथ "खान" लिखने का एक प्रचलन सा चल पड़ा था। इस तरह भारत के पठानों में खान शब्द सामान्य हो गया, और अनेक लोग अपने नाम के साथ "खान" लिखने लगे।
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आज से ३४ वर्ष पूर्व सन १९८८ में मध्य एशिया के दो तातार मुसलमान विद्वानों से मेरी भेंट और चर्चा यूक्रेन के ओडेसा नगर में हुई थी। उन्होने मुझे बड़े सम्मान से अपने घर पर निमंत्रित किया और सप्रमाण कई बातें बताईं। उनमें से एक तो अति वृद्धा विदुषी महिला डेन्टिस्ट डॉक्टर थी जो चीन की जेलों में एक राजनीतिक वंदी के रूप में १० वर्ष बिता चुकी थी। उसके स्वर्गीय पति मंचूरिया में एक व्यापारी थे। अपनी खोई हुई बेटी उसे यूक्रेन के ओडेसा नगर में मिली। फिर वह भी वहीं बस गई। अब तो वह विदुषी महिला जीवित नहीं है, लेकिन उसकी विद्वता और ज्ञान बहुत अधिक था। उस ने रूसी भाषा में लिखी इतिहास की अनेक पुस्तकें दिखाईं और बताया कि इस्लाम के आगमन से पूर्व पूरे मध्य एशिया में बौद्ध मत था, और बौद्ध मत से पूर्व सनातन हिन्दू धर्म था।
॥इति॥
प्रकृति के अटल शाश्वत नियम ---
प्रकृति के अटल शाश्वत नियम ---
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पुनर्जन्म/मृत्यु, दुःख/सुख, यश/अपयश, हानि/लाभ आदि में भगवान का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है। यह कार्य हमारे पूर्व के कर्मों के अनुसार प्रकृति अपने नियमों से करती है। प्रकृति के नियमों को न जानना हमारा अज्ञान है। जब तक भगवत्-प्राप्ति नहीं होती तब तक कर्मफलों को भोगने के लिए किसी न किसी रूप में पुनर्जन्म होता ही रहेगा। इसे कोई नहीं रोक सकता।
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हमारा पुनर्जन्म होगा या नहीं ? इसे जानने का एक सीधा सा तरीका है। यदि किसी भी व्यक्ति में भौतिक मृत्यु के समय कुछ कामना हो जैसे -- opposite sex के प्रति आकर्षण, किसी से बदला लेने की भावना, या कुछ सांसारिक लाभ प्राप्त करने की इच्छा आदि, --- तो उसका पुनर्जन्म निश्चित है।
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पुनर्जन्म न हो, इसका उपाय श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है। सत्यनिष्ठा, भक्ति और समर्पण के संस्कारों के साथ, किशोरावस्था से ही किसी बालक में Opposite sex के प्रति आकर्षण की दिशा यदि परमात्मा की ओर मोड़ दी जाये, तो वह इस जन्म में ही परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। विषय-वासनाओं के चिंतन के स्थान पर हरिःचिंतन करें। यदि वेदान्त-वासना जागृत हो जाये तो अन्य कुछ चाहिये भी नहीं।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१६ सितंबर २०२२
ईश्वर को प्राप्त करने का हठ भी बहुत गलत है ---
ईश्वर को प्राप्त करने का हठ भी बहुत गलत है। ऐसा हठ नहीं करना चाहिए। क्या पता हमारा यह भौतिक शरीर -- ईश्वर के तेज को सहन करने में समर्थ है या नहीं। एक २४ वोल्ट के बल्ब को करोड़ों वोल्ट की विद्युत के साथ जोड़ देने से उस बल्ब की क्या हालत होगी, वैसी ही हालत हमारी देह की भी हो सकती है।
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एक निजी अनुभूति है जिसे बताने की मुझे आंतरिक अनुमति है। आज प्रातः के ध्यान में जब मेरी चेतना सूक्ष्म जगत में थी, तब किसी सूक्ष्म जगत की एक अदृश्य महान आत्मा ने ही मुझसे एक बात कही। उसने कहा कि तुम्हारा यह शरीर ईश्वर की आंशिक चेतना को सहन करने में भी असमर्थ है। ईश्वर की अनुभूति अपने आप ही होने दो, कोई हठ मत करो, अन्यथा यह शरीर रूपी साधन ही नष्ट हो जाएगा। कहने वाले के शब्द बहुत स्पष्ट और प्रभावी थे, अभी तक मुझे ज्यों के त्यों याद हैं।
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पूरी बात समझ में आ गई। अब कोई जल्दी नहीं है। भगवान मिलें या न मिलें, सब कुछ उन पर निर्भर है। मैं उनके प्रति समर्पित हूँ। उन की पूर्ण कृपा मुझ अकिंचन पर है। भगवान से भी कुछ नहीं चाहिए। उनकी उपस्थिती का आभास ही मेरा आनंद और सत्संग है।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१७ सितंबर २०२२
ईश्वर की उपासना --- अपने आप में ही सबसे बड़ी सेवा है ---
ईश्वर की उपासना --- अपने आप में ही सबसे बड़ी सेवा है, जो हम अपने धर्म, राष्ट्र, समाज, और सभी प्राणियों की कर सकते हैं। हमारे अस्तित्व में निरंतर परमात्मा की अभिव्यक्ति हो। हम जहाँ भी हैं, जो भी हैं, वहीं सर्वश्रेष्ठ और सुन्दरतम हैं। हमारी उपस्थिति ही परमात्मा का प्रमाण है। भगवान स्वयं हमारे माध्यम से सारा कार्य कर रहे हैं।
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अन्तर्मन में यह जानने की कभी एक जिज्ञासा थी कि देवताओं को स्वयं के अस्तित्व का बोध कैसा होता है? बात आई-गई हो गई, मुझे याद ही नहीं था कि ऐसी भी मेरी कभी कोई जिज्ञासा हुई थी। आज प्रातः उठते ही गुरुकृपा कहो या हरिःकृपा; वह अनुभूति भगवान ने करा ही दी। लगभग आधे घंटे तक मैं निर्विकल्प समाधि में देवत्व की चेतना में था। उस समय के भाव और अनुभूतियाँ शब्दों में व्यक्त नहीं हो सकतीं। उस समय मैं कोई मनुष्य नहीं स्वयं देवता था। यह अनुभूति जीवन में पहली बार हुई और अति आनंददायक थी। थोड़ी देर पश्चात पुनश्च मनुष्य की पीड़ादायक चेतना में लौट आया।
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निमित्तमात्र होकर कूटस्थ सूर्यमण्डल में पुरुषोत्तम का ध्यान करते करते अपने आप ही क्रिया-योग साधना होने लगती है। यज्ञ में यजमान की तरह, मैं तो एक निमित्त मात्र हूँ। कर्ता और भोक्ता तो भगवान स्वयं हैं। भगवान कहते है --
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥"
अर्थात् - सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो॥ (Abandoning all duties, take refuge in Me alone: I will liberate thee from all sins; grieve not.)
(शरणागति क्या होती है, यह भी भगवान की कृपा से ही समझ में आता है).
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सृष्टि का संचालन भगवान की प्रकृति अपने नियमानुसार करती है। नियमों को न समझना हमारा अज्ञान है। भगवान का आदेश है --
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
अर्थात् - " इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो। मुझ में अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए, निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥"
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भगवान कहते हैं --
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात जो सबमें मुझको देखता है और सबको मुझमें देखता है उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता।
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इससे अधिक और कुछ लिखना इस समय मेरे लिए संभव नहीं है। आप सब को अपने साथ लेकर ही भगवान वासुदेव अपने स्वयं का ध्यान करते हैं। आप सब पर उनकी परम कृपा है। ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ सितंबर २०२२
प्रार्थना योग्य कौन है? ---
प्रार्थना योग्य कौन है?
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प्रार्थना उसी की की जाती है जिसके प्रति श्रद्धा हो। श्रद्धा के बिना किया हुआ कोई भी साधना कभी सफल नहीं हो सकती। श्रद्धा के बिना किया हुआ कोई लौकिक कर्म भी कभी सफल नहीं होता। श्रद्धा किसी गलत दिशा में हो तो निराशा ही हाथ लगती है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं --
"श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥४:३९॥"
अर्थात् - श्रद्धावान्, तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान को प्राप्त करके शीघ्र ही वह परम शान्ति को प्राप्त होता है॥
"अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥४:४०॥"
अर्थात् - अज्ञानी तथा श्रद्धारहित और संशययुक्त पुरुष नष्ट हो जाता है, (उनमें भी) संशयी पुरुष के लिये न यह लोक है, न परलोक और न सुख॥
"योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥४:४१॥"
अर्थात् - जिसने योगद्वारा कर्मों का संन्यास किया है, ज्ञानद्वारा जिसके संशय नष्ट हो गये हैं, ऐसे आत्मवान् पुरुष को, हे धनंजय ! कर्म नहीं बांधते हैं॥
"तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥४:४२॥"
इसलिये अपने हृदय में स्थित अज्ञान से उत्पन्न आत्मविषयक संशय को ज्ञान खड्ग से काटकर, हे भारत ! योग का आश्रय लेकर खड़े हो जाओ॥
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रामचरितमानस के मंगलाचरण में लिखा है --
"भवानी शंकरौ वन्दे,श्रद्धा विश्वास रुपिणौ।
याभ्यां बिना न पश्यन्ति,सिद्धा: स्वन्तस्थमीश्वरं॥"
अर्थात् - मैं भवानी और शंकर की वन्दना करता हूँ, जो श्रद्धा और विश्वास के रूप में सबके हृदय में वास करते हैं। बिना श्रद्धा और विश्वास के सिद्ध भी अपने अंदर बैठे ईश्वर को नहीं देख सकते हैं।
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इसलिए मैं यही बात कहना चाहता हूँ की जिस विषय में श्रद्धा हो, वहीं अपना मन लगायें। यदि भगवान में श्रद्धा नहीं हो तो बेकार की बातों से यहाँ अपना समय नष्ट न करें। मेरा यह फेसबुक पेज सिर्फ श्रद्धावानों के लिए है। मैं भी इस भौतिक शरीर में जीवित हूँ तो भगवान में श्रद्धा के कारण ही हूँ। भगवान में श्रद्धा ही मेरा जीवन है।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१९ सितंबर २०२२
एक दिव्य अनुभुति जो २४ सितंबर २०२२ को हुई ---
दिनांक २४ सितंबर २०२२
आज का दिन बड़ा शुभ दिन है। लगता है कि ग्रह-नक्षत्र सभी अनुकूल हैं। आने वाला हर दिन इसी की तरह मंगलमय, शुभ और अनुकूल रहे।
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आज प्रातः उठते ही एक विराट पर्वतमाला के दर्शन हुये जो पता नहीं कहाँ है। उन पर्वतों पर बहुत मोटी बर्फ ही बर्फ जमी हुई थी। फिर एक भूकंप आया और सारी बर्फ टूट कर नीचे की ओर गिरने लगी। बड़ी भयानक ध्वनि के साथ हिम-स्खलन (Avalanche) हुआ और मैं उस विराट हिमराशि में पता नहीं कहाँ लुप्त हो गया। चारों ओर हिम ही हिम, और कुछ भी नहीं। बड़ा ही आनंददायक अनुभव था।
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उस विराट हिम-राशि के रूप में स्वयं परमात्मा आए और मुझ अकिंचन को पता नहीं स्वयं में कहाँ विलीन कर दिया। हे प्रभु, आपकी जय हो। बहुत बड़ी कृपा की है आप ने। आप की यह कृपा सदा बनी रहे। आप की जय हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ सितंबर २०२२
सती सावित्री ---
सती सावित्री ---
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सती सावित्री की अमर कथा महाभारत के वनपर्व में आती है, जिसे मार्कन्डेय ऋषि ने महाराजा युधिष्ठिर को सुनाई थी। अपनी आध्यात्मिक चेतना से इस युग में महर्षि श्रीअरविंद ने अङ्ग्रेज़ी भाषा के महानतम महाकाव्य "SAVITRI" की रचना कर के सावित्री के नाम को वर्तमान काल में फिर से अमर कर दिया है।
महाभारत के अनुसार मद्र देश के राजा अश्वपति ने अपनी पुत्री सावित्री का विवाह सत्यवान से कर दिया था, जो शाल्व देश के राजा द्युमत्सेन के पुत्र थे।
शाल्व राज्य महाभारत काल में भारत का एक पश्चिमी राज्य था। इसकी दो राजधानियाँ थीं -- शोभा और मत्रिकावती। महाभारत में शाल्व वंश का वर्णन है। इतिहासकारों ने इस वंश के आठवीं सदी तक के इतिहास को भी खोज निकाला है।
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मैं जो लिखने जा रहा हूँ, वह विवादास्पद असत्य या सत्य कुछ भी हो सकता है। मेरी बात यदि असत्य या कोई भ्रम लगे तो इसे एक गल्प समझकर भूल जाना; यदि इसमें सत्य का कुछ अंश लगे तो इस पर विचार करना।
एक दिन मैं ध्यान कर रहा था। मन में यह जानने की जिज्ञासा हुई कि सत्यवान की असमय हुई मृत्यु के पश्चात सावित्री और मृत्यु के देवता यमराज के मध्य संवाद कहाँ किस स्थान पर हुआ था? यह प्रश्न मन में अनेक बार कई दिनों तक आया। एक बार अचानक ही एक दृश्य मानस पटल पर उतरा। एक लंबी बर्फ से ढकी पर्वतमाला के पूर्व दिशा की ओर के एक वन का दृश्य दिखाई दिया। वह पर्वतमाला आग्नेय दिशा से वायव्य दिशा की ओर जा रही थी। पता नहीं इस तरह के पर्वत कहाँ है?
भारत के पश्चिम-उत्तर में कश्यप सागर (Caspian Sea) से लेकर कृष्ण सागर (Black Sea) तक की लगभाग १०० कि.मी. लंबी काकेशस पर्वत शृंखला अवश्य है। इसके पूर्व में रूस है, और पश्चिम में अज़रबेज़ान, आर्मेनिया और जॉर्जिया हैं। यह क्षेत्र भी कभी भारत का ही भाग रहा होगा। मुझे लगता है वह घटना इसी क्षेत्र में कहीं हुई होगी।
२८ सितंबर २०२२
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