Saturday, 29 October 2022

दो साँसों के बीच के सन्धिक्षण सर्वसिद्धिप्रद हैं ---

 दो साँसों के बीच के सन्धिक्षण सर्वसिद्धिप्रद हैं। परमात्मा ही साँस ले रहे हैं। यह रहस्यों का रहस्य है। एक समय आता है जब - परमात्मा, गुरु और स्वयं में कोई भेद नहीं रहता। मेरे सद्गुरु, परमात्मा, और मैं -- हम तीनों एक हैं। इनमें कोई भेद नहीं है। परमात्मा कहीं बाहर नहीं, मेरा स्वयं का अस्तित्व है। मैं यह शरीर नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि की अनंतता और परमप्रेम हूँ। मैं कुछ भी नहीं हूँ, और सर्वस्व भी हूँ। सारी समस्याओं का स्थायी समाधान आध्यात्मिक साधना द्वारा ही किया जा सकता है। ॐ तत्सत् !!

कृपा शंकर
२८ सितंबर २०२२

नवार्ण मंत्र :---

नवार्ण मंत्र :---
इन दिनों कुछ मंचों पर "नवार्ण मंत्र" के ऊपर चर्चा चल रही है। मैं बड़ी विनम्रता से अपने विचार व्यक्त करने का दुःसाहस कर रहा हूँ। यदि मेरी बात बुरी लगे तो मेरे इस लेख को मत पढ़ना। मैं जो भी लिख रहा हूँ वह मेरा अनुभव है कोई कपोल-कल्पना नहीं।
(१) नवार्ण मंत्र की पूरी विधि गीता-प्रेस गोरखपुर की पुस्तक में दी हुई है। मैं यहाँ सिर्फ अपना अनुभव ही जोड़ रहा हूँ।
(२) मंत्र का आरंभ निष्काम साधना में "ॐ" के संपुट से ही करना चाहिए। सकाम का मुझे पता नहीं। कभी सकाम साधना की भी नहीं है।
(३) कर्ता भाव से मुक्त होकर निमित्त मात्र होकर ही साधना करें। कूटस्थ में पूर्ण स्थिति हो। वहीं रहते रहते कुछ देर तक क्रिया करें।
यह भाव रखें कि सारी साधना स्वयं भगवती कर रही है। हम साक्षी मात्र हैं।
(४) फिर महासरस्वती के वाग्भव बीज मंत्र "ऐं" का जाप मूलाधार चक्र (ब्रहमग्रन्थि) पर करें। (इसका उच्चारण "अईम्" होता है)
(५) फिर महालक्ष्मी के बीज मंत्र "ह्रीं" का जाप अनाहत चक्र (विष्णु ग्रंथि) पर करें।
(६) फिर महाकाली के बीज मंत्र "क्लीं" का जाप आज्ञा चक्र (रुद्र ग्रंथि) पर करें।
(७) यह भाव रखें कि इन तीनों ग्रंथियों का भेदन हो रहा है। भगवती के ये तीनों रूप जागृत हो रहे हैं।
(८) फिर सहस्त्रार चक्र में आकर "चामुंडाय विच्चे" से मंत्र का समापन करें। कुछ क्षणों तक सहस्त्रार चक्र में ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान प्रणव मंत्र के साथ करें।
(९) फिर ॐ का मानसिक जाप करते हुए पुनश्च नीचे मूलाधार चक्र में जाकर पूरी विधि का प्रारम्भ करें।
(१०) इस साधना का एकमात्र उद्देश्य भगवती की प्रसन्नता है। किसी भी तरह की कोई कामना न हो।
इस मंत्र से होने वाले लाभ :---
(१) महाकाली सारी दुष्वृत्तियों व काम-वासना का नाश करती है।
(२) महालक्ष्मी सारे सद्गुण प्रदान करती हैं।
(३) महासरस्वति आत्म-ज्ञान प्रदान करती है।
पुनश्च :--
आप सब में गुरु महाराज और जगन्माता को नमन !!
॥ ॐ ऐं गुरवे नमः॥"
॥इति॥
किसी भी तरह का संदेह हो तो भगवती से प्रार्थना करें। मैं किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाऊँगा। इतना समय मेरे पास नहीं है। धन्यवाद !!
🌹🙏🌹
मैंने आज तक जितनी भी साधना की है वह निष्काम भाव से की है। कभी कुछ भी नहीं चाहा है, चाहूँगा भी नहीं। सारे फल और सारी कामनाएँ भगवान वासुदेव को समर्पित है। एकमात्र लाभ यही हुआ कि भगवान हर समय मुझे याद करते हैं। मेरी इतनी औकात नहीं है कि भगवान को याद कर सकूँ।
ॐ ॐ ॐ !!
🌹🙏🌹
महाकाली का बीजमंत्र "क्लीं" बहुत अधिक शक्तिशाली है। यह भगवान श्रीकृष्ण का भी बीजमंत्र है, और कामदेव का भी। इसके विधिवत् जप से मनुष्य की काम-वासना का शमन भी होता है। इसका जप (ॐ क्लीं) अनेक परंपराओं में है।
ॐ ऐं गुरवे नमः !! सभी को नमन !!
२९ सितंबर २०२२

हरिः तुम हरो जन की पीर ---

"हरिः" शब्द के अनेक गहन अर्थ हैं। जो हमारी कामनाओं, वासनाओं, पीड़ाओं, और दुःखों को चुपचाप हर ले (यानि चोरी कर ले), वे "हरिः" हैं। वे कब हमारे दुःखों का शमन कर देते हैं, हमें पता ही नहीं चलता।
इसी तरह "श्री" शब्द के भी अनेक गहन अर्थ हैं। हम श्वास लेते हैं, वह "श" है। उसके साथ अग्नि बीज "र" और शक्ति बीज "ई" लगा देने से वह "श्री" हो गया। श्वास रूपी अग्नि की शक्ति "श्री" है।
गहरे ध्यान में सुषुम्ना में जब कुंडलिनी शक्ति जागृत होकर ऊपर उठती है, तब हsssss की बड़ी सूक्ष्म ध्वनि सुनाई देती है। इसी तरह जब कुंडलिनी नीचे की ओर जाती है तब रिःइइइइइ की सूक्ष्म ध्वनि सुनाई देती है। मेरे लिए यही हरिःनाम है। इसी में लगन लग जाती है।
कुंभक की अवस्था में जब सांस रुक जाती है तब ध्यान में अपने आप ही ओंकार की ध्वनि सुनाई देने लगती है, जो सुनाई देते ही रहती है। जब तक न चाहो तब तक बंद ही नहीं होती। मेरे लिए यह ही "श्रीहरिः" है। यह उनका निराकार रूप है।
साकार रूप में वे भगवान श्रीकृष्ण हैं। भगवान वासुदेव (जो सर्वत्र समान रूप से व्याप्त हैं, वे ही श्रीहरिः हैं।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२९ सितंबर २०२२

अपनी अपनी समझ ---

 अपनी अपनी समझ ---

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आध्यात्म में किसी भी विषय पर सबकी समझ अलग अलग होती है। जिनके जीवन में सतोगुण प्रधान होता है उनकी समझ अलग होती है। जिन में रजोगुण प्रधान है उनकी समझ अलग होती है। तमोगुण वालों की समझ अलग होती है।
ज्ञान और भक्ति की बातें सतोगुणी ही समझ सकते हैं। अच्छे कर्म की बातें रजोगुणी ही समझ सकते हैं। तमोगुणी लोगो को मार-काट के अलावा और कुछ भी समझ में नहीं आता। उल्टा-सीधा वे अपना स्वयं का मत ही दूसरों पर थोपना चाहते हैं।
इसलिए प्रयास यही होना चाहिए कि हमारे में सतोगुण का विकास हो। यह सत्संग और साधना द्वारा ही संभव है।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२९ सितंबर २०२२

निज आत्मा में श्रद्धा-विश्वास हो ---

 निज आत्मा में श्रद्धा-विश्वास हो ---

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जिसकी जैसी भी श्रद्धा है, वह उसी पर अडिग रहे। इस सृष्टि में जो कुछ भी प्राप्त होता है, वह निज श्रद्धा से ही होता है। बिना श्रद्धा-विश्वास के कोई भी कार्य सफल नहीं हो सकता।
"जहाँ है श्रद्धा वहाँ है प्रेम, जहाँ है प्रेम वहीं है शांति।
जहाँ होती है शांति, वहीं विराजते हैं ईश्वर।
जहाँ विराजते हैं ईश्वर, वहाँ किसी अन्य की आवश्यकता ही नहीं है।"
''भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ।
याभ्यां बिना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥" (रा.मा.बालकाण्ड २)
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श्रद्धा-विश्वास निज आत्मा में हो, अन्यत्र कहीं भी नहीं। सत्य का अनुसंधान स्वयं में करें, कहीं बाहर नहीं। गीता में भगवान कहते हैं --
"श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥४:३९॥"
"अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥४:४०॥"
अर्थात् -- श्रद्धावान्, तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान को प्राप्त करके शीघ्र ही वह परम शान्ति को प्राप्त होता है॥४:३९॥
अज्ञानी तथा श्रद्धारहित और संशययुक्त पुरुष नष्ट हो जाता है, (उनमें भी) संशयी पुरुष के लिये न यह लोक है, न परलोक और न सुख॥४:४०॥
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किसी में बुद्धिभेद उत्पन्न कर उसकी श्रद्धा को भंग नहीं करना चाहिए। दूसरों को सुधारने का प्रयास -- निज आचरण से ही होना चाहिए। भगवान कहते हैं --
"न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्॥
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्॥३:२६॥
अर्थात - ज्ञानी पुरुष कर्मों में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न न करे, स्वयं (भक्ति से) युक्त होकर कर्मों का सम्यक् आचरण कर उनसे भी वैसा ही कराये॥
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इस से अधिक और लिखने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि जो भी इस लेख को पढ़ रहे हैं, वे सब विवेकशील समझदार मनीषी हैं। परमात्मा के सर्वश्रेष्ठ साकार रूप आप सब को नमन।
"ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव। यद् भद्रं तन्न आ सुव॥"
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ सितंबर २०२२

जो भी साधनाएँ मेरे माध्यम से नहीं हो रही हैं, या हो रही हैं, उन सब की अकर्ता और कर्ता -- भगवती महाकाली हैं ---

 जो भी साधनाएँ मेरे माध्यम से नहीं हो रही हैं, या हो रही हैं, उन सब की अकर्ता और कर्ता -- भगवती महाकाली हैं ---

जिन माँ के प्रकाश से सारी आकाश-गंगाएँ, उनके नक्षत्रमंडल और सारा ब्रह्मांड प्रकाशित हैं, उन माँ का नाम -- पता नहीं "काली" क्यों रख दिया? वे समस्त अस्तित्व हैं। सृष्टि, स्थिति और संहार -- उन की अभिव्यक्ति है। माँ के वास्तविक सौन्दर्य को तो गहन ध्यान में तुरीय चेतना में ही अनुभूत किया जा सकता है। उनकी साधना जिस साकार विग्रह रूप में की जाती है, वह प्रतीकात्मक है ---
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"माँ के विग्रह में चार हाथ है। अपने दो दायें हाथों में से एक से माँ सृष्टि का निर्माण कर रही है, और एक से अपने भक्तों को आशीर्वाद दे रही है। माँ के दो बाएँ हाथों में से एक में कटार है, और एक में कटा हुआ नरमुंड है जो संहार और स्थिति के प्रतीक हैं। ये प्रकृति के द्वंद्व और द्वैत का बोध कराते हैं। माँ के गले में पचास नरमुंडों की माला है जो वर्णमाला के पचास अक्षर हैं। यह उनके ज्ञान और विवेक के प्रतीक हैं। माँ के लहराते हुए काले बाल माया के प्रतीक हैं। माँ के विग्रह में उनकी देह का रंग काला है, क्योंकि यह प्रकाशहीन प्रकाश और अन्धकारविहीन अन्धकार का प्रतीक हैं, जो उनका स्वाभाविक काला रंग है। किसी भी रंग का ना होना काला होना है जिसमें कोई विविधता नहीं है। माँ की दिगंबरता दशों दिशाओं और अनंतता की प्रतीक है। उनकी कमर में मनुष्य के हाथ बंधे हुए हैं, वे मनुष्य की अंतहीन वासनाओं और अंतहीन जन्मों के प्रतीक हैं। माँ के तीन आँखें हैं जो सूर्य चन्द्र और अग्नि यानि भूत भविष्य और वर्तमान की प्रतीक हैं। माँ के स्तन समस्त सृष्टि का पालन करते हैं। उनकी लाल जिह्वा रजोगुण की प्रतीक है जो सफ़ेद दाँतों यानि सतोगुण से नियंत्रित हैं। उनकी लीला में एक पैर भगवान शिव के वक्षस्थल को छू रहा है जो दिखाता है कि माँ अपने प्रकृति रूप में स्वतंत्र है पर शिव यानि पुरुष को छूते ही नियंत्रित हो जाती हैं। माँ का रूप डरावना है क्योंकि वे किसी भी बुराई से समझौता नहीं करती, पर उसकी हँसी करुणा की प्रतीक है।"
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सौम्य रूप में वे भगवती सीता हैं, और उग्र रूप में महाकाली।
हारिणीं सर्वदुःखानां प्रत्यूहव्यूहदारिणीम्।
महाकालीमहं वन्दे साक्षात् सीतास्वरूपिणीम्॥
सम्पूर्ण दुःखों की संहारिका, विघ्नवृृन्द को विद्ध्वस्त करने वाली,साक्षात्
सीतास्वरूपिणी भगवती महाकाली की मैं वन्दना करता हूँ॥

ब्राह्मण बालकों में क्या संस्कार दें ?

 मेरे कुछ आध्यात्मिक मित्र हैं जो ध्यान-योग व श्रीविद्या के बड़े निष्ठावान साधक हैं। उन्होने भगवती की कृपा से अपने आध्यात्मिक और लौकिक दोनों ही क्षेत्रों में बड़ी उन्नति की है। मेरा यह मानना है कि हमें अपने बालकों को उचित समय पर --

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(१) उपनयन संस्कार करवा कर दिन में दो बार संध्या गायत्री व प्राणायाम करने की आदत डालनी चाहिए। उनके साथ साथ हम स्वयं भी करें।
(२) उन्हें संस्कृत भाषा का मूलभूत आवश्यक ज्ञान व शुद्ध उच्चारण करना अवश्य सिखवायें।
(३) उन्हें वैदिक श्रीसूक्त कंठस्थ करवाएँ, जिसका वे नित्य दिन में कम से कम एक बार पाठ करें। बाद में वे वैदिक पुरुषसूक्त, रुद्रसूक्त, भद्रसूक्त और सूर्यसूक्त का भी पाठ कंठस्थ याद कर सकते हैं। इन वेदमंत्रों का नित्य नियमित पाठ उन्हें बहुत तेजस्वी/ओजस्वी बनाएगा।
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इतना तो मैं कह सकता कि वे बालक निश्चित रूप से धर्मरक्षक व सत्यनिष्ठ बनेंगे। हम स्वयं भी अपने धर्म की रक्षा करने में समर्थ होंगे। धर्म का पालन ही धर्म की रक्षा है।
ॐ तत्सत् !!
३० सितंबर २०२२
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आपसे प्रार्थना है कि इस प्रस्तुति को साझा भी करें, चाहें तो कॉपी/पेस्ट भी कर सकते हैं। इस का खूब प्रचार करें, चाहे अपने ही नाम से करें। मुझे कोई आपत्ति नहीं है।