Tuesday, 7 June 2022

आलस्य, अकर्मण्यता, चिंता और भय की स्थिति वास्तव में नर्क है ---

आलस्य, अकर्मण्यता, चिंता और भय की स्थिति वास्तव में नर्क है| अपने "अच्युत" स्वरूप को भूलकर "च्युत" हो जाना ही प्रमाद है, और इसी का नाम "मृत्यु" है| जहाँ अपने अच्युत भाव से च्युत हुए उसी क्षण हम मर चुके हैं| यह परम सत्य है| 'प्रमादो वै मृत्युमहं ब्रवीमि' .... यह उपदेश ब्रह्मविद्या के प्रथम आचार्य भगवान सनत्कुमार का है जिसे उन्होनें अपने प्रिय शिष्य देवर्षि नारद को 'भूमा विद्या' के नाम से दिया| आध्यात्मिक मार्ग पर प्रमाद ही हमारा सब से बड़ा शत्रु है| उसी के कारण हम काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर्य नामक नर्क के छः द्वारों में से किसी एक में अनायास ही प्रवेश कर जाते हैं| आत्मज्ञान ही ब्रह्मज्ञान है, यही भूमा-विद्या है| जो इस दिशा में जो अविचल निरंतर अग्रसर है, वही महावीर है और सभी वीरों में श्रेष्ठ है|

.
जब तक मन में राग-द्वेष है तब तक जप, तप, ध्यान, पूजा-पाठ आदि का कोई विशेष लाभ नहीं है| भगवान और गुरु महाराज सदा हमारी रक्षा करें|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
७ जून २०१९

Saturday, 28 May 2022

सारी इच्छायें भगवान को समर्पित कर दें, और अपने आत्म-स्वरूप में रहें ---

 सारी इच्छायें भगवान को समर्पित कर दें, और अपने आत्म-स्वरूप में रहें ---

.
भगवान एक प्रवाह हैं, जो निरंतर हमारे माध्यम से प्रवाहित हो रहे हैं। सबसे बड़ी और सबसे महान सेवा जो हम इस जन्म में कर सकते हैं वह है "ईश्वर की प्राप्ति"। ईश्वर को समर्पण किया जाता है, न की उनसे कुछ मांग। स्वयं के अस्तित्व का ईश्वर में पूर्ण समर्पण तभी होता है जब हम कामनाओं से पूर्णतः मुक्त होते हैं। हमारे अन्तःकरण में जितनी इच्छाएँ उत्पन्न होती हैं, उतने ही हमारे दुःख बढ़ जाते हैं। जैसे-जैसे इच्छाएँ शान्त होने लगती हैं, वैसे-वैसे दुःख की मात्रा भी कम होने लगती हैं।
.
परमात्मा को पाने की अभीप्सा आत्मा द्वारा होती है। अभीप्सा हमें मुक्त करती है। कामना का जन्म मन में होता है, यह हमें बंधन में डालती है। यह भाव हर समय बना रहना चाहिए कि परमात्मा निरंतर मेरे साथ एक हैं। वे एक पल के लिए भी मेरे से पृथक नहीं हो सकते। भगवान हैं, यहीं पर हैं, सर्वत्र हैं, इसी समय हैं, सर्वदा हैं, वे ही सब कुछ हैं, और सब कुछ वे ही हैं। वे ही मेरे हृदय में धडक रहे हैं, वे ही इन नासिकाओं से सांसें ले रहे हैं, इन पैरों से वे ही चल रहे हैं, इन हाथों से वे ही हर कार्य कर रहे हैं, इन आँखों से वे ही देख रहे हैं, इस मन और बुद्धि से वे ही सोच रहे हैं, मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व वे ही हैं। सारा ब्रह्मांड, सारी सृष्टि वे ही हैं। वे परम विराट और अनंत हैं। मैं तो निमित्त मात्र, उन का एक उपकरण, और उनके साथ एक हूँं। भगवान स्वयं ही मुझे माध्यम बना कर सारा कार्य कर रहे हैं| कर्ता मैं नहीं, स्वयं भगवान हैं। सारी महिमा भगवान की है। भगवान ने जहाँ भी रखा है और जो भी दायित्व दिया है उसे मैं नहीं, स्वयं भगवान ही निभा रहे हैं। वे ही जगन्माता हैं, वे ही परमपुरुष हैं। मैं उन के साथ एक हूँ। कहीं कोई भेद नहीं है।
.
“शिवो भूत्वा शिवं यजेत्”– अर्थात् शिव होकर ही शिव की आराधना कीजिये।
आत्मा नित्य मुक्त है, सारे बंधन हमने ही अपने ऊपर अपने अंतःकरण द्वारा थोप रखे हैं। चित्त की वृत्तियाँ क्या हैं, यह मैंने कल लिखा था। चित्त की वृत्तियों का स्पंदन ही संसार का स्वरूप धारण करता है। चित्त की वृत्तियों का निरोध (नियंत्रण) प्राण-तत्व द्वारा होता है। चित्त के स्पन्दन से ही सांसारिक पदार्थों की अनुभूतियाँ होती हैं। चित्त का स्पंदन प्राण-तत्व के आधीन है। घनीभूत प्राण-तत्व (कुंडलिनी महाशक्ति) को साधते हुए आकाश-तत्व (सूक्ष्म जगत की अनंतता और विस्तार) से भी परे परमशिव का ध्यान करते हैं। कुंडलिनी महाशक्ति का परमशिव से मिलन ही "योग" है।
.
जहाँ भी भगवान ने हमें रखा है, वहीं उनको आना ही पड़ेगा। अतः सदा आनंदमय रहें। परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्तियाँ आप सब को मैं नमन करता हूँ॥
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ मई २०२२

हमारे हर विचार, हर सोच, और हर भाव का स्त्रोत केवल परमात्मा है ---

 >>> अपने हर विचार, हर सोच, और हर भाव के पीछे यह अनुभूत करो कि इन सब का स्त्रोत केवल परमात्मा है। न तो मैं कुछ सोच रहा हूँ, और न कुछ चिंतन कर रहा हूँ। परमात्मा ही एकमात्र कर्ता हैं, उन्हीं का एकमात्र अस्तित्व है। वे ही एकमात्र चिंतक हैं।

अपने साक्षी या निमित्त मात्र होने के भाव को भी तिरोहित कर दो, निमित्त भी वे स्वयं ही हैं। "मेरा कोई अस्तित्व नहीं है। स्वयं परमात्मा ही यह "मैं" बन गए हैं। <<<
.
यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात जो मैंने पहले कभी भी नहीं कही थी, आज अपनी अंतर्रात्मा से कह रहा हूँ। इसकी सिद्धि में समय लग सकता है, लेकिन इसमें यदि सिद्धि मिल गई तो आप इस पृथ्वी पर चलते-फिरते देवता बन जाओगे। जिस पर आपकी दृष्टि पड़ेगी, और जो आपके दर्शन करेगा, वे निहाल हो जाएँगे। जहाँ भी आपके चरण पड़ेंगे, वह भूमि पवित्र हो जाएगी। देवता भी आपको देखकर आनंदित होंगे, और नृत्य करेंगे। आप की सात पीढ़ियों का उद्धार हो जाएगा। जिस कुल/ परिवार में आपने जन्म लिया है, वह आपको पाकर धन्य हो जाएगा।
.
इसके लिए परमात्मा का ध्यान/उपासना/सत्संग करना होगा। सात्विक भोजन करना होगा। कुसंग का त्याग करना होगा। यह भूल जाइए कि आप एक जीव है। आप जीव नहीं शिव हो। उस परमशिवभाव को व्यक्त करना ही इस जीवन का उद्देश्य है।
ॐ तत्सत् !! जय हिन्दू राष्ट्र !!
कृपा शंकर
११ मई २०२२

विश्व बड़ी तेजी से संकट की ओर बढ़ रहा है ---

 विश्व बड़ी तेजी से संकट की ओर बढ़ रहा है। जिस तरह से अमेरिका व इंग्लैंड द्वारा NATO के माध्यम से यूक्रेन को भड़का कर और उसे शस्त्रास्त्रों की आपूर्ति कर के रूस पर युद्ध थोपा जा रहा है, उसमें निकट भविष्य में एक ऐसी स्थिति आ सकती है कि रूस बाध्य होकर अपनी दुर्धर्ष हाइपरसोनिक मिसाइलों से इंग्लैंड और अमेरिका पर हाइड्रोजन बमों की वर्षा कर सकता है। इसमें रूस को भी बहुत अधिक हानि होगी लेकिन इंग्लैंड और अमेरिका तो राख के ढेर में बदल जाएंगे। अमेरिका पर प्रहार करने को उत्तरी कोरिया और चीन भी अपनी कमर कस के बैठे हैं। युद्ध की स्थिति में उत्तरी कोरिया स्वयं के अस्तित्व को दांव पर लगाकर प्रशांत महासागर में अमेरिका के पश्चिमी तट, हवाई और गुआम द्वीप समूह का तो पूरा ही विनाश कर देगा। चीन भी ताइवान पर अधिकार करने के लिए युद्ध आरंभ कर देगा। इधर पश्चिम-एशिया में या तो ईरान ही रहेगा या इज़राइल। दोनों में से एक का नष्ट होना तो तय है। अरब देश इज़राइल का साथ देंगे। पाकिस्तान भी भारत के साथ बदमाशी कर सकता है। पाकिस्तान पर भरोसा करना गिरगिट पर भरोसा करना है। इस वर्ष के अंत तक यूरोप व एशिया के एक बहुत बड़े भूभाग और अमेरिका के विनाश के संभावना है। जापान और चीन के मध्य भी निकट भविष्य में युद्ध हो सकता है। महादेव की कृपा ने ही पहले भी कई बार बचाया है, और आगे भी वह ही बचा सकती है। अंततः भारत का पुनरोदय होगा। ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!

कृपा शंकर
१२ मई २०२२

व्यवहार में कोई भक्ति, साधना/उपासना नहीं, तो सारा शास्त्रीय ज्ञान बेकार है ---

 बड़ा उच्च कोटि का व अति गहन अध्ययन/स्वाध्याय, शास्त्रों का पुस्तकीय ज्ञान, बड़ी ऊँची-ऊँची कल्पनायें, दूसरों को प्रभावित करने के लिए बहुत आकर्षक/प्रभावशाली लिखने व बोलने की कला, --- पर व्यवहार में कोई भक्ति, साधना/उपासना नहीं, तो सारा शास्त्रीय ज्ञान बेकार है।

.
अपना अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) परमात्मा को कैसे समर्पित करें?
यही हम सब की सबसे बड़ी समस्या है, अन्य सब गौण हैं। जब परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति होने लगे, तब सब नियमों से स्वयं को मुक्त कर परमात्मा का ही ध्यान करना चाहिए। हम नित्यमुक्त हैं। ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
१३ मई २०२२

हम अपने दिन का प्रारंभ और समापन भगवान के ध्यान से ही करें ---

हम अपने दिन का प्रारंभ और समापन भगवान के ध्यान से ही करें। हमारा मन सत्य को ही हृदय में रखे, और असत्य विषयों की कामना का परित्याग करे। परमात्मा ही एक मात्र सत्य है। केवल परमात्मा की ही अभीप्सा हो, अन्य किसी भी तरह की कामना न हो। गीता में भगवान कहते हैं -

"काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥३:३७॥"
अर्थात् - श्रीभगवान् ने कहा - रजोगुण में उत्पन्न हुई यह 'कामना' है, यही क्रोध है; यह महाशना (जिसकी भूख बड़ी हो) और महापापी है, इसे ही तुम यहाँ (इस जगत् में) शत्रु जानो॥
.
भगवान तो नित्य प्राप्त है, वे हमारा स्वरूप हैं। यह प्रतीति नहीं होनी चाहिए कि हमें कुछ मिला है। हमारे पास तीनों लोकों का राज्य और सारी सिद्धियाँ भी हों, तो भी किसी तरह का हर्ष न हो। मृत्यु के समय किसी भी तरह की शोक की भावना न आए। निन्दा और प्रसन्नता से कोई अंतर नहीं पड़ता। निन्दा शरीर की की जाती है, हमारे वास्तविक स्वरूप की नहीं। ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
१३ मई २०२२

गुरु की कृपा और आध्यात्मिक प्रगति हो रही है या नहीं ? ---

 गुरु की कृपा और आध्यात्मिक प्रगति हो रही है या नहीं ?

यदि गुरु के उपदेश हमारे जीवन में चरितार्थ हो रहे हैं, तो गुरुकृपा है, अन्यथा नहीं। यही एकमात्र मापदंड है।
सत्य के प्रति पूर्ण निष्ठा आध्यात्मिक प्रगति का एकमात्र मापदंड है.
.
यश की कामना और उस कामना की पूर्ती का प्रयास निश्चित रूप से हमें भगवान से दूर करता है। यश की कामना होनी ही नहीं चाहिए। यदि कहीं कोई महिमा है तो सिर्फ भगवान की है, हमारी नहीं, क्योंकि हम यह देह नहीं, शाश्वत आत्मा हैं जिसे हम स्वयं भूला बैठे हैं। स्वयं की इस देह रूपी नश्वर दुपहिया वाहन के नाम, रूप और अहंकार को महिमामंडित करने और इस का यश फैलाने के चक्कर में हम अनायास ही अत्यधिक अनर्थ कर बैठते हैं। अपने नाम के साथ तरह तरह की उपाधियों को जोड़ना भी एक अहंकार और यश का लोभ है। हर बात का श्रेय लेकर और आत्म-प्रशंसा कर के हम स्वयं के अहंकार को तो तृप्त कर सकते हैं, पर भगवान को प्रसन्न नहीं कर सकते। इस विषय पर अपने विवेक से सोचिये और सदा सतर्क रहिये। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१४ मई २०२२