लगभग ४५ वर्ष पूर्व मुझे एक सिद्ध महात्मा ने कहा था कि मेरे सारे आध्यात्मिक संकल्प-विकल्प, आकांक्षाएँ, और भागदौड़ व्यर्थ हैं, जिनका तब तक कोई लाभ नहीं है, जब तक कर्मों के सारे बंधन न कट जाएँ| उन्होने यह भी कहा कि एक एकांत कक्ष की व्यवस्था कर लो और वहाँ एकांत में शिव का ध्यान करो, जिन की कृपा से सारे कर्मफलों से मुक्त होकर जीवनमुक्त हो जाओगे| काश! उनकी बात मैं ठीक से समझ पाता| मेरा उनसे बहुत लंबा वार्तालाप हुआ था| जो भी प्रश्न मेरे मन में आते, बिना पूछे ही उनका उत्तर वे तुरंत दे देते|
Thursday, 24 March 2022
जब तक कर्मों के सारे बंधन न कट जाएँ, तब तक मुक्ति संभव नहीं है ---
अन्य भी अनेक ईश्वर को उपलब्ध महात्माओं से मेरा सत्संग हुआ है| सब ने भक्ति, और समर्पण पर ही उपदेश दिये हैं|
.
गीता में भगवान श्रीकृष्ण का निम्न उपदेश दसों बार पढ़ा है और समझने का स्वांग भी रचा है, पर कभी व्यवहार में परिवर्तित नहीं कर पाया ---
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी| विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि||१३:११||"
.
हे प्रभु अब किसी कामना का जन्म ही न हो| बस सिर्फ तुम ही तुम रहो| आज तुम्हारी बात मैं समझ पाया हूँ| तुम्हारे से अन्य कोई नहीं है| जो तुम हो वह ही मैं हूँ| तुम ने जहां भी मुझे रखा है, वहीं तुम हो| तुम में और मुझ में कहीं कई अंतर नहीं है| ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२५ मार्च २०२१
Wednesday, 23 March 2022
आनंदमय होना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है ---
आनंदमय होना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है ---
.
जीवन की संपूर्णता व विराटता को त्याग कर हम लघुता को अपनाते हैं तो निश्चित रूप से विफल होते हैं| जो हम ढूँढ़ रहे हैं या जो हम पाना चाहते हैं, वह तो हम स्वयं हैं| हम यह शरीर नहीं, परमात्मा की सर्वव्यापकता हैं| श्रुति भगवती कहती है -- "ॐ खं ब्रह्म|" खं का अर्थ होता है आकाश-तत्व यानि ब्रह्म (परमात्मा) की सर्वव्यापकता| उस के समीप यानि एक होकर हम सुखी हैं, और उस से दूर होकर दुःखी| भगवान सनत्कुमार का देवर्षि नारद को कहा हुआ यह अमर वाक्य भी श्रुतियों में है कि -- "यो वै भूमा तत् सुखं नाल्पे सुखमस्ति|" भूमा यानि व्यापकता, विराटता में सुख है, अल्पता में सुख नहीं है| हमें उस भूमा-तत्व यानि परमात्मा की अनंतता के साथ एक होना पड़ेगा, उस से कम नहीं| वही हमारा वास्तविक स्वरूप है|
.कामायनी महाकाव्य की इन पंक्तियों में कवि जयशंकर प्रसाद ने भी “भूमा” शब्द का प्रयोग किया है, जिसका अर्थ बड़ा दार्शनिक है …..
“जिसे तुम समझे हो अभिशाप, जगत की ज्वालाओं का मूल,
ईश का वह रहस्य वरदान, कभी मत इसको जाओ भूल |
विषमता की पीडा से व्यक्त हो रहा स्पंदित विश्व महान,
यही दुख-सुख विकास का सत्य यही “भूमा” का मधुमय दान |”
.
भूमा तत्व की अनुभूति बहुत गहरे ध्यान में सभी साधकों को होती है| बहुत गहरे ध्यान में साधक पाता है कि सब सीमाओं को लांघ कर उसकी चेतना सारे ब्रह्मांड की अनंतता में विस्तृत हो गयी है, और वह समष्टि यानि समस्त सृष्टि के साथ एक है| परमात्मा की उस अनंतता के साथ एक होना “भूमा” है जो साधना की पूर्णता भी है| मनुष्य का शरीर एक सीमा के भीतर है अर्थात् भूमि है| इस सीमित शरीर का जब विराट से सम्बन्ध होता है तो यह ‘भूमा’ है|
.
अजपा-जप में हम भूमा तत्व का ही ध्यान करते हैं| जो योगमार्ग के ध्यान साधक हैं, उन्हें पहली दीक्षा अजपा-जप की दी जाती है| सिद्ध गुरु के मार्गदर्शन में साधक भ्रूमध्य में ज्योतिर्मय ब्रह्म के कूटस्थ सूर्यमंडल का ध्यान करते हैं, जो सर्वव्यापक अनंत है| फिर हर सांस के साथ “हं” और “सः” बीजमंत्रों के साथ उस अनंतता यानि “भूमा” का ही ध्यान करते हैं|
.
हम निरंतर प्रगति करते रहें| जीवन में परमात्मा की आनंददायक अनुभूति, तृप्ति और संतुष्टि -- प्राप्त करनी है तो परमात्मा के प्रति पूर्ण प्रेम और समर्पण का भाव विकसित करें| यथासंभव अधिकाधिक ध्यान साधना करें, और निरंतर परमात्मा का स्मरण करें| यदि संभव हो तो प्रातःकाल में तारों के छिपने से पूर्व, और संध्याकाल में तारों के उगने से पूर्व, अपने आसन पर बैठ जाएँ, और प्राणायाम, गायत्री जप, व ध्यान साधना का आरंभ कर दें| हर समय परमात्मा का स्मरण करें, और जीवन के हर कार्य का उन्हें कर्ता बनाएँ| यदि कर्ताभाव अवशिष्ट है तो अपना हर कार्य परमात्मा की प्रसन्नता के लिए ही करें| रात्रि को सोने से पूर्व कुछ देर तक बहुत गहरा ध्यान करें, और जगन्माता की गोद में निश्चिंत होकर एक छोटे बालक की तरह सो जाएँ| दिन का आरंभ परमात्मा के ध्यान से करें, और पूरे दिन उन का स्मरण रखें|
.
उन्नत ध्यान साधना :---
पूर्ण प्रेम यानि पूर्ण भक्ति से भगवान की विराट अनंतता का ध्यान किया जाता है| सर्वदा भाव यही रखें कि भगवान अपना ध्यान स्वयं कर रहे हैं, हम तो निमित्त-मात्र हैं| हर समय अपनी चेतना आज्ञाचक्र से ऊपर रखें| सहस्त्रार चक्र में श्रीगुरु-चरणों का ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में ध्यान और नाद-श्रवण करें| फिर अपना संपूर्ण ध्यान ब्रह्मरंध पर केंद्रित करके ब्रह्म में लीन हो जाएँ| धीरे-धीरे अनुभूति होगी कि हमारी चेतना इस शरीर से बाहर है, तब अपनी चेतना को संपूर्ण ब्रह्मांड में फैला दें, और अनंतता रूपी अपने वास्तविक स्वरूप का ध्यान करें| आगे का, और अब तक का सारा मार्गदर्शन भगवान स्वयं करेंगे| पात्रता यही है कि हम में सत्यनिष्ठा, परमप्रेम, उत्साह और तत्परता हो|
.
ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ मार्च २०२१
Sunday, 20 March 2022
बंद आँखों के अंधकार के पीछे क्या है?
बंद आँखों के अंधकार के पीछे क्या है?
.ये आँखें जब बंद होती हैं, चेतना सहस्त्रार-चक्र में रहती है, मेरुदंड उन्नत, ठुड्डी भूमि के समानान्तर, और दृष्टिपथ भ्रूमध्य की ओर रहता है, तब इन आंखों के अंधकार के पीछे कोई अंधकार ही नहीं रहता| वहाँ तो मेरे स्थान पर, परम ज्योतिर्मय साक्षात् वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण अपनी मनमोहक छवि के साथ, पद्मासन में ध्यानस्थ बैठे हुए दिखाई देते हैं| मेरा साधना करने का, साधक होने का, या कुछ भी होने का भ्रम -- मिथ्या हो जाता है| भगवान अपनी साधना स्वयं ही करते हैं| मेरी भूमिका एक निमित्त मात्र से अधिक कुछ भी नहीं है|
.
अब बस उन्हीं को देखता रहूँ, उनकी छवि को ही निहारता रहूँ, और कुछ भी नहीं| वे ही मेरे सर्वस्व हैं| यह अस्तित्व उन्हीं को समर्पित है| मैं कोई साधक नहीं, उनका एक अकिंचन सेवक मात्र हूँ| धन्य हैं मेरी गुरु-परंपरा के गुरु, जिन्होने मुझ अकिंचन पर असीम कृपा की है| आप सब की जय हो|
.
ॐ स्वस्ति || ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२० मार्च २०२१ समय २३:४८
Wednesday, 2 March 2022
स्वयं का आंकलन कर लेना चाहिए कि हम कहाँ खड़े हैं ---
आजकल का जैसा खराब समय चल रहा है, उसमें हमें एक बार बड़े ध्यान से गीता के १६वें अध्याय "देव असुर संपदा विभाग योग" का स्वाध्याय कर के स्वयं का आंकलन कर लेना चाहिए कि हम कहाँ खड़े हैं। उसके बाद गीता में से ही अन्यत्र ढूंढ़ कर स्वयं के उद्धार का उपाय भी करना चाहिए। भगवान को सदा अपने हृदय में रखें। निकट भविष्य में ही आने वाले बहुत अधिक कठिन समय में हमारी रक्षा निश्चित रूप से होगी। सिर्फ भगवान ही हमारी रक्षा कर सकते हैं।
.
पुनश्च: ॥ कुछ सुझाव देना चाहता हूँ जिसके लिए कृपया बुरा न मानें ---
(१) नियमित साधना दृढ़ता से करें। हर समय भगवान का चिंतन करें, और भगवान में दृढ़ आस्था रखें। जीवन सादा और विचार उच्च हों। अपने आसपास का वातावरण पूर्णतः सात्विक रखें।
(२) हर तरह के नशे का पूर्णतः त्याग करें। जो भगवान को प्रिय है, वैसा ही भोजन, भगवान को निवेदित कर के ही ग्रहण करें।
(३) भगवान ने हमें विवेक दिया है| निज विवेक के प्रकाश में सारे कार्य परमात्मा की प्रसन्नता के लिए ही करें।
परमात्मा हमारी बुद्धि को तदानुसार प्रेरित करेंगे, फिर जो भी होगा वह हमारे भले के लिए ही होगा। सभी को शुभ कामनाएँ और नमन !
कृपा शंकर
२ मार्च २०२२
अब किस से, किस की, और क्या शिकायत करूँ? ---
अब किस से, किस की, और क्या शिकायत करूँ?
मेरे अब तक के निजी अनुभव और सोच-विचार से - समस्या कहीं बाहर नहीं, समस्या तो मैं स्वयं हूँ।
निज जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो, यही एकमात्र समाधान और सत्य है। अन्य सब एक मृगतृष्णा और भटकाव है।











यह संसार मेरा नहीं, परमात्मा का है, और उनके बनाए हुए नियमों के अनुसार उनकी प्रकृति चलाती रहेगी। निज जीवन में परमात्मा की प्राप्ति ही जीवन का उद्देश्य और सबसे बड़ी सेवा है। ॐ ॐ ॐ !!
.



(मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार) का।


.



.
ॐ तत्सत्। ॐ ॐ ॐ !! 













कृपा शंकर
३ मार्च २०२२
शिवलिंग पूजा का महत्व :---
शिवलिंग पूजा का महत्व :---
.
मैं आत्मप्रेरणावश अपनी सीमित बुद्धि से इस विषय पर चर्चा छेड़ रहा हूँ जिस का मुझे तनिक आभास मात्र ही है| मनीषीगण इस पर और प्रकाश डालें|
शिवरात्रि का पावन पर्व आने वाला है| उससे पूर्व ही इस विषय पर जितनी चर्चा हो जाये उतना ही अच्छा है|
हिन्दू धर्म के आलोचक अज्ञानतावश शिवपूजा का एक अश्लील अर्थ लगाकर आलोचना करते है| अतः सही अर्थ बता देना आवश्यक है|
"लिंग" शब्द का अर्थ होता है --- "चिन्ह" या "प्रतीक"|
मैंने कही पढ़ा है ---
"न लिंगं लिंगमिथ्याहु: यस्मिन् सर्वे प्रलीयन्ते तल्लिंगम लिंगमुच्यते|"
जिसके अन्दर सब का लय होता है ---- स्थूल, सूक्ष्म और कारण जगत का जिस तुरीय चेतना में लय होता है उस तुरीय चेतना का प्रतीक ---- शिवलिंग है|
जिस अनंत और परम चैतन्य रूप शिव तत्व का ध्यान की गहराइयों में आभास होता है उस शिव तत्व का स्थूल प्रतीक है शिवलिंग|
जिन से सकल जड़ व चेतन पदार्थों की सृष्टि हुई है, जिन की द्वीप्ति से यह विश्व प्रकाशित है, उस परम शिव तत्व का प्रतीक है शिवलिंग|
"यं प्रपश्यन्ति देवेशं भक्त्यानुग्रहिणो जना:|
तमाहुरेकं कैवल्यं शंकरं दु:खतस्करं ||"
यहाँ "दु:खतस्करं" शब्द का प्रयोग हुआ है| तस्कर शब्द का अर्थ है -- चोर या हरण करे वाला| जो अपने भक्तों के दु:खों और कष्टों का हरण कर लेते है उन परम कैवल्य स्वरुप परम तत्व का प्रतीक है -- शिवलिंग|
ॐ नमः शिवाय|
३ मार्च २०१३
विश्व की भारत से अपेक्षाएँ ----
विश्व की भारत से अपेक्षाएँ --------
==============
(यह लेख जब मैं लिख रहा था उस समय रूस और युक्रेन में तनाव की स्थिति थी | अब रुसी सेना क्रीमिया से बापस चली गयी है | पर रूस ने दिखा दिया है वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगा| काश! ऐसा साहस हमारे देश में भी होता|)
(इस लेख में मैं स्वभाववश अपने कुछ अनुभव और विचार लिख रहा हूँ|)
रूस और युक्रेन में अगर क्रीमिया को लेकर यदि युद्ध हुआ तब यह एक भयानक त्रासदी होगी जिसका भारत पर भी बुरा असर पड़ेगा | मैं रूस में भी खूब रहा हु और युक्रेन में भी | क्रीमिया के भी कुछ मित्र रहे है | रूस और युक्रेन की संस्कृतियों में इतनी समानता रही है कि अंतर कर पाना अति कठिन है | पूर्व सोवियत संघ के दिनों से ही रूस, युक्रेन और बेलारूस के लोगों में अत्यधिक घनिष्ठता रही है | मैं कल्पना भी नहीं कर सकता की रूस और युक्रेन कभी लड़ भी सकते हैं क्या | दोनों भारत के मित्र देश भी हैं |
दोनों में सनातन धर्म का बहुत तेजी से प्रचार प्रसार हो रहा है| रूस को तो मैं भविष्य का हिन्दू देश मानता हूँ| हिन्दू धर्म का प्रचार प्रसार इसी तरह स्वतः होता रहा तो अगले ५०-६० वर्षों में रूस एक हिन्दू देश होगा| ईसाईयत के आने से पूर्व रूस में सनातन धर्म था जिसके अवशेषों को पहिले तो चर्च ने फिर साम्यवादियों ने नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी| रुसी भाषा की व्याकरण संस्कृत से प्रभावित है|
लिथुआनिया जैसे देश की भाषा की व्याकरण पर तो संस्कृत का बहुत अधिक प्रभाव है|
रूस के तातारिस्तान गणराज्य के तातार मुसलमान तो स्वयं को भारतीयों का वंशज मानते हैं|
भारत में सनातन धर्म का वर्चस्व बढेगा तो मध्य एशिया उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा| भारत पर जिन मुगलों ने राज्य किया वे उज्बेकिस्तान से आये थे| आज पूरे मध्य एशिया में एक शुन्य की सी स्थिति है और वहां के लोग भारतवर्ष से बहुत अपेक्षाएँ रखते हैं| इस्लाम के आगमन से पूर्व पूरा मध्य एशिया बौद्ध था| वहाँ के विद्वान भी यह मानते हैं कि बौद्ध धर्म से पूर्व वहाँ सनातन धर्म था|
युक्रेन के घटनाक्रम का बुल्गारिया, रोमानिया और तुर्की जैसे श्याम सागर में स्थित पड़ोसी देशों पर भी असर पड़े बिना नहीं रहेगा| तुर्की और रोमानिया का भी मुझे बहुत अनुभव है|
रोमानिया जैसे कट्टर साम्यवादी देश में जब साम्यवाद के विरुद्ध जनविद्रोह हुआ, उस समय रूस ने वहाँ के कट्टर साम्यवादी तानाशाह चाऊशेस्को के विरुद्ध हुए विद्रोहियों का समर्थन किया था| उसी समय मैं समझ गया था की साम्यवाद अपनी अंतिम साँसे ले रहा है| रोमानिया में भ्रष्टाचार और नैतिक पतन अपने चरम पर था|
संयोग से मैं उस समय युक्रेन में ही था| उसके पूरे एक वर्ष बाद सोवियत संघ बिखर गया और रूस सहित सभी सोवियत गणराज्यों में साम्यवाद धराशायी हो गया| पूर्व सोवियत देशों की स्थिति यह थी कि साम्यवादी लोग अपने घरों में छिप गए थे| लोगों ने वहाँ के हर चौराहे पर लगी लेनिन और मार्क्स की विशाल मूर्तियों को तोड़ तोड़ कर नीचे गिरा दिया था| ऐसी स्थिति आ गयी थी कि सडक पर कोई साम्यवादी दल का सदस्य मिलता तो लोग उसकी पिटाई कर देते थे|
यह संयोग ही था कि रूस में ब्रेझनेव के समय में जब साम्यवाद अपने चरम उत्कर्ष पर था तब भी मैं उसका साक्षी था| सन १९६७ ई. में जब बोल्शेविक क्रांति की ५० वीं वर्षगाँठ मनाई जा रही थी तब मैं रूस में ही था| मेरी आयु भी उस समय १९-२० वर्ष की ही थी| उसके पूरे २०-२१ वर्ष बाद सोवियत संघ से साम्यवाद को धराशायी होते हुए भी वहीँ रहकर देखा|
कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि साम्यवाद जैसी भयावह आसुरी व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी|
साम्यवाद जहाँ जहाँ था वहाँ वहाँ उसने मानवीय मूल्यों के विनाश की एक बहुत बड़ी रेखा छोड़ दी|
साम्यवाद से मुक्त होने में पोलैंड, हंगरी, चेकोस्लोवाकिया और पूर्वी जर्मनी ने भी देरी नहीं की| युगोस्लाविया में गृहयुद्ध हुआ और वह देश भी बिखर गया| बचे खुचे को अमेरिका ने बर्बाद कर दिया|
चीन में माओ ने चाहे करोड़ों लोगों की हत्याएं की हों और निरंकुशता से राज्य किया हो पर उसने अपने देश के लिए एक काम बहुत अच्छा किया कि अपनी विचारधारा को चीनी राष्ट्रवाद से जोड़ दिया| चीन की वर्तमान प्रगति का रहस्य भी वहाँ का राष्ट्रवाद ही है|
भारत में साम्यवाद को लाने का श्रेय एम.एन. रॉय जैसे बुद्धिजीवियों को है जिहोनें इसे राष्ट्रवाद के विरुद्ध स्थापित किया| यह विचारधारा भारत में राष्ट्रवाद के विरुद्ध है|
चीन ने भी स्वयं को साम्यवाद से मुक्त कर लिया है| वहाँ "चीन की साम्यवादी पार्टी" नाम का एक गिरोह आतंक के जोर पर राज्य कर रहा है| मैं उस पार्टी को गिरोह ही कहूँगा क्योंकि वह बहुत क्रूर है| उसके सदस्य किसी भी तरह का विरोध सहन नहीं करते|
विएतनाम में साम्यवाद अपनी स्वाभाविक मौत मर गया है| क्यूबा में भी साम्यवाद ध्वस्त हो गया है|
उत्तरी कोरिया में एक तानाशाही परिवार आतंक के जोर पर राज्य कर रहा है| उत्तरी कोरिया एक सैनिक किले की तरह है जहाँ के लोगों को बाहर की दुनिया का कुछ भी ज्ञान नहीं है| सन १९८० में २० दिनों के लिये वहाँ जाने का अवसर मिला था| वह देश पूरी तरह सेना के नियन्त्रण में था जहाँ किसी भी विदेशी को आम आदमी से बात करने का अधिकार नहीं था| पुलिस, अर्धसैनिक बलों और प्रशासन का कार्य भी सेना के ही आधीन था| भारत में जैसे प्रत्येक जिले का जिलाधीश एक प्रशासनिक अधिकारी होता है वैसे ही वहाँ सेना का एक कर्नल होता था| वहाँ के सभी अधिकारीयों को रुसी भाषा आती थी| रुसी भाषा के ज्ञान के कारण मुझे वहाँ बातचीत में कोई कठिनाई नहीं हुई|
यह भी एक संयोग ही था की जब कोरियाई युद्ध की चालीसवीं वर्षगाँठ मनाई जा रही थी तब मैं उत्तरी कोरिया में ही था|
वहाँ का एक दृश्य मैं कभी नहीं भूल सकता| जब श्रमिक लोग कहीं काम करते थे तो एक महिला ध्वनी वितारक यंत्र से उनके पीछे खड़ी होकर उनको खूब कठिन श्रम करने की भाषण द्वारा प्रेरणा देती, और साथ में बन्दूक ताने एक सिपाही भी खड़ा रहता| इसका अर्थ आप समझ सकते हैं|
साम्यवाद बचा है तो सिर्फ भारत के बंगाल और केरल प्रान्त में| जैसे सारी भौतिकवादी विचारधाराएँ ध्वस्त हुई हैं वैसे ही यह भी ध्वस्त हो जाएगा| पश्चिम का पूँजीवाद और भोगवाद भी धराशायी होगा|
सारी दुनिया एक तनाव, भय और असुरक्षा के भाव से ग्रस्त है| सब लोग सुख, शांति और सुरक्षा को ही ढूँढ रहे हैं जो उन्हें कहीं नहीं मिलती|
पश्चिम के कई ईसाई देशों में खूब जाने का अवसर भगवान ने दिया है, वहाँ भी लोगों को मैंने सुखी नहीं पाया| अपनी भौतिक व्यवस्थाओं से वे त्रस्त हैं|
कुछ इस्लामिक देशों जैसे मिश्र, सऊदी अरब, तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात, मोरक्को और बांग्लादेश में भी जाने का अवसर मिला है और वहाँ के जीवन को भी बहुत समीप से देखा है| वहाँ भी घोर आतंरिक अशांति है|
भारत से बहुत दूर दूर के देशों में भी ऐसे अनेक लोग मिले जिन्होंने चुपचाप भारत के योग, और वेदांत दर्शनों के बारे में मुझसे प्रश्न पूछे| घोर साम्यवादी व्यवस्था में जहाँ धर्म की चर्चा करना भी अपराध था, मैंने लोगों में सनातन हिन्दू धर्म के प्रति छिपी हुई रूचि पाई| १९६८ में लाटविया की राजधानी रीगा में एक एक लडकी ने मुझसे मित्रता कर छिपाकर भारत से योग दर्शन का साहित्य मँगवाने का अनुरोध किया जो उस समय असंभव था| युक्रेन में रहने वाले मध्य एशिया के दो मुसलमान परिवारों ने मुझे अपने घरों में सिर्फ हिन्दू धर्म के बारे में जानने के लिए भोजन पर निमंत्रित किया| उन्होंने बहुत परिश्रम कर पुस्तकों में पढ़ कर मेरे लिए शाकाहारी भोजन बनवाया|
उन्होंने भी हिन्दू धर्म पर मुझसे पुस्तकें माँगी जो उस समय एक असंभव कार्य था|
विश्व के अधिकाँश देशोंका मैंने भ्रमण किया है और अनेक तरह के लोगों से मिला हूँ| मैं इस निर्णय पर पहुंचा हूँ कि पूरा विश्व भारत से यह अपेक्षा करता है कि भारत एक आध्यात्मिक देश बने और आध्यात्म की ज्योति के दर्शन पूरे विश्व को कराये| अब यह भारत के लोगों पर निर्भर है कि वे कितने आध्यात्मिक बनते हैं|
इस लेख का मैं यहीं समापन करता हूँ| अगले लेख में लिखूँगा की पिछले सौ - सवा सौ वर्षों में विश्व में ऐसे क्या महत्वपूर्ण घटनाएँ हुई हैं जिन्होंने भारत पर गहरा प्रभाव डाला है|
जय सनातन वैदिक संस्कृति | जय भारत | जय श्री राम |
कृपा शंकर
३ मार्च २०१४
Subscribe to:
Posts (Atom)