Monday, 24 January 2022

वाणलिंग क्या होता है? ----

 वाणलिंग क्या होता है? ----

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ओंकारेश्वर के पास में एक "धावड़ी कुंड" नामक स्थान था। वह किसी युग में वाणासुर नाम के एक परम शिवभक्त असुर राक्षस का यज्ञकुंड हुआ करता था। उसने भगवान शिव को प्रसन्न कर के यह वरदान प्राप्त किया कि इस यज्ञकुंड से नर्मदा जी प्रवाहित हों, और यहाँ से निकले शिवलिंग सबसे अधिक पवित्र हों।
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उसका यज्ञकुंड बहुत विशाल था, जिसमें ऊंची-नीची और घुमावदार बहुत सारी चट्टानें थीं। नर्मदा जी बहुत अधिक वेग से वहाँ से बहने लगीं, और वहाँ की ऊंची-नीची-घुमावदार चट्टानों से टूट टूट कर असंख्य शिवलिंग बनने लगे। वैसे तो नर्मदा का हर पत्थर शिवलिंग है जिनको किसी प्राण-प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन धावड़ी कुंड से निकला शिवलिंग वाणलिंग कहलाता है और सबसे अधिक पवित्र माना जाता है।
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नर्मदा पर बांध बनने से अब तो वह धावड़ी कुंड पानी में डूब गया है, अतः वाणलिंग मिलने बंद हो गए हैं। लेकिन जब पानी का स्तर थोड़ा नीचे होता है तब आसपास के गांवों के कुछ गोताखोर तैराक आपसे कुछ रुपये लेकर गोता लगाकर नीचे से एक विलक्षण शिवलिंग ला देंगे।
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वाणलिंग की पहिचान ---
वाणलिंग को एक तराजू में चावलों से चार-पाँच बार तौला जाता है। जितनी बार भी तोलोगे उतनी ही बार चावलों का परिमाण अलग अलग होगा। यही उसकी पहिचान है। नर्मदा तट पर तपस्या करने वाले अनेक साधु अपनी जटा में वाणलिंग बांध कर रखते हैं। उसकी नित्य पूजा कर बापस अपनी जटा में बांध लेते हैं।
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एक बार घर में वाणलिंग स्थापित करने के बाद उसकी नित्य पूजा होनी चाहिए। घर में रखे वाणलिंग की पूजा न करने से गृहस्थ को पाप लगता है और उसका अनिष्ट होता है।
१० जनवरी २०२२

अपनी कमियों व कर्मों के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं, भगवान नहीं ---

 अपनी कमियों व कर्मों के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं, भगवान नहीं ---

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भगवान की कोई इच्छा या अनिच्छा नहीं होती, उनकी कृपा सब पर बराबर है। हम अपनी असफलता/असमर्थता/असहायता के लिए भगवान को दोष देते हैं, यह गलत है। यह झूठ है कि -- वही होता है जैसी भगवान की इच्छा होती है। यहाँ भगवान की कोई इच्छा या अनिच्छा नहीं है, यह सृष्टि अपने नियमों के अनुसार चल रही ही। प्रकृति अपने नियमों से कोई समझौता नहीं करती। उन नियमों को न समझना हमारा अज्ञान है। जिसे हम नहीं समझते, उसे अपना भाग्य कह देते हैं। उस दुर्भाग्य या सौभाग्य के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं, भगवान नहीं।
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गुरुकृपा से मैंने कर्मफलों व पुनर्जन्म को बहुत अच्छी तरह से समझा है, और बहुत कुछ अनुभूत किया है जो अनिर्वचनीय है। मेरी भी अपनी सीमाएँ हैं, विवशता है। अपनी अनुभूतियों को शब्द देने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है। इसमें दोष किसी अन्य का या भगवान का नहीं है; मेरे अपने ही कर्मों का ही है, जिन का फल मैं भुगत रहा हूँ। अपने कई अनुभवों को मैं व्यक्त करना चाहता हूँ, लेकिन अपनी स्वयं कि कमजोरियों के कारण नहीं कर सकता। भगवान ने तो अपनी परमकृपा कर के अपने कई रहस्य मुझ पर अनावृत किए हैं -- जिनकी मुझमें पात्रता थी भी या नहीं, मुझे नहीं पता।
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सब बंधनों को तोड़ने का एकमात्र उपाय है - भगवान की भक्ति (परमप्रेम) और समर्पण; जैसा भगवान ने गीता में बताया है ---
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
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इस से अधिक कुछ लिखने की आंतरिक अनुमति मुझे नहीं है। आप सब में परमात्मा को नमन !! ॐ तत्सत् !! हरिः ॐ !!
कृपा शंकर
११ जनवरी २०२२ (23:32hrs.)

मेरे आज्ञाकारी शिष्य, मेरे अनुयायी, मेरे मित्र, और मेरी संतान कौन हैं? ---

 मेरे आज्ञाकारी शिष्य, मेरे अनुयायी, मेरे मित्र, और मेरी संतान कौन हैं? ---

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मेरे विचार ही अब मेरे आज्ञाकारी शिष्य, अनुयायी और मेरी संतान बन गए हैं। उन्हें मैं सजाऊँगा, संवारूंगा, और सर्वश्रेष्ठ बनाऊँगा। मुझे उन पर गर्व है कि वे परमशिव से प्रेम करने लगे हैं। उन्होने मेरा सदा साथ दिया है। उनके भरोसे ही मैं अब निश्चिंत होकर जीवित रहते हुए ही इस भौतिक देह की चेतना से भी बहुत ऊपर उठ सकता हूँ। रात्री में जब तक भगवान की गहनतन अनुभूति न हो तब तक मुझे सोना नहीं चाहिए। यह शरीर याद दिलाएगा कि मैं थक गया हूँ, और विश्राम की आवश्यकता है। लेकिन मुझे उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिए, क्योंकि मैं यह शरीर नहीं हूँ। अधिक से अधिक क्या होगा? कुछ भी नहीं, क्योंकि इस शरीर का साथ तो तब तक नहीं छूट सकता जब तक इसके साथ रहने का प्रारब्ध है। लेकिन भगवान का नियमित ध्यान नहीं करने से भगवान को पाने की अभीप्सा ही समाप्त हो सकती है। नित्य नियमित परमशिव में स्थित रहने की उपासना अति अनिवार्य है। इस संसार में सबसे अधिक सुंदर कौन है? जिस के हृदय में भगवान के प्रति कूट कूट कर प्रेम भरा पड़ा है, वही इस संसार का सबसे अधिक सुन्दर व्यक्ति है, चाहे उस की भौतिक शक्ल-सूरत कैसी भी हो। जिसके हृदय में भगवान से प्रेम नहीं हैं है, वह सबसे अधिक वीभत्स और भयावह है।
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"तेरे भावे जो करे भलो-बुरो संसार। नारायण तू बैठ के अपनो भुवन बुहार॥"
मेरे वश में कोई बात नहीं है तो मैं अपनी कमी को ढकने के लिए कभी सृष्टिकर्ता को दोष न दूँ। जो करेगा सो भरेगा। भगवान की चेतना में किया गया हरेक कार्य शुभ ही है। मेरा कार्य भगवान का प्रकाश फैलाना है, न कि अंधकार। जितना अधिक मैं भगवान का ध्यान करता हूँ, उतना ही अधिक मैं स्वयं का ही नहीं, पूरी समष्टि का उपकार करता हूँ। यही एकमात्र और सबसे बड़ी सेवा है जो मैं कर सकता हूँ। किसी भी परिस्थिति में निज विवेक से सर्वश्रेष्ठ कर्म करना मेरा अधिकार व कर्त्तव्य है। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१३ जनवरी २०२२

उत्तरायण और दक्षिणायण अब कहीं बाहर नहीं, मेरे सूक्ष्म शरीर में ही हरेक साँस के साथ घटित हो रहे हैं ---

 उत्तरायण और दक्षिणायण अब कहीं बाहर नहीं, मेरे सूक्ष्म शरीर में ही हरेक साँस के साथ घटित हो रहे हैं। मेरे सूक्ष्म शरीर में सहस्त्रार-चक्र -- उत्तर दिशा है; मूलाधार -- दक्षिण दिशा है; भ्रूमध्य -- पूर्व दिशा है; और बिन्दु जहाँ शिखा रखते हैं -- वह पश्चिम दिशा है। आज्ञा-चक्र मेरा आध्यात्मिक हृदय है। सुषुम्ना की ब्रह्मनाड़ी मेरा परिक्रमा पथ है।

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आगे की बात एक गोपनीय परम रहस्य है जिसे मैं रहस्य ही रखना चाहता हूँ। परमशिव भी एक रहस्य हैं। अपना रहस्य वे स्वयं ही अनावृत करें तभी ठीक है।मेरे प्रारब्ध कर्मफल मुझे बापस इस देह में ले आते हैं। अभीप्सा तो परमशिव में उन के साथ ही हर समय स्थायी रूप से रहने की है, पर लौटना पड़ता है। यही मेरी पीड़ा है। आज नहीं तो कल, रहना तो उनके साथ ही है। इस मायाजाल से मुक्त करना या न करना, उन की समस्या है, मेरी नहीं। मैं तो अपने भाव-जगत में उनके साथ निश्चिंत होकर एक हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ जनवरी २०२२

आप सब को उत्तरायण की मंगलमय शुभ कामनाएँ ---

 आप सब को उत्तरायण की मंगलमय शुभ कामनाएँ प्रेषित करते हुए मैं अपने हृदय के अंतरतम विचारों को भी सभी के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ ---

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मैं स्वयं को जलाकर ही उस प्रकाश को उत्पन्न कर रहा हूँ, जो मेरे लिए परमात्मा के मार्ग को आलोकित कर रहा है। मेरे और परमात्मा के मध्य का मार्ग -- मेरे हृदय का परमप्रेम व अभीप्सा है, और सबसे बड़ी बाधा -- सत्यनिष्ठा का अभाव है। जिन्हें मैं ढूँढ़ रहा हूँ, वह तो मैं 'स्वयं' हूँ, और वह 'स्वयं' ही मुझे ढूँढ़ रहा है।
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परमात्मा ही परम सत्य है जिसकी खोज से पूर्व मुझे अपने भीतर असत्य के उन सभी अवरोधों को दूर कर देना चाहिए, जिन्होंने मुझे परमात्मा से पृथक कर रखा है। जो भी अनावश्यक विचार हैं, वे पतझड़ के पत्तों की तरह जितनी शीघ्र गिर जाये, उतना ही अच्छा है।
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कुछ भी कहने से पूर्व मैं विचार करूँ कि जो मैं कहने जा रहा हूँ, क्या यह सत्य है, आवश्यक है, और प्रिय है? अनावश्यक और अप्रिय विचारों का मेरे चित्त में जन्म ही न हो। मेरे हृदय में सब के प्रति सद्भावना हो, और मेरी अभिव्यक्ति अपने उच्चतम स्तर पर हो।
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मैं ही वह आकाश हूँ, जहाँ मैं विचरण करता हूँ। चारों ओर छाई हुई शांति का साम्राज्य भी मैं स्वयं ही हूँ। आप में और मुझ में कोई अंतर नहीं है। जो आप हैं, वह ही मैं हूँ। जब तक हमारे पैरों में लोहे की जंजीरें बंधी हुई हैं तब तक हम असहाय हैं। सर्वोपरी आवश्यकता उन सब बंधनों से मुक्त होना है जिन्होंने हमें असहाय बना रखा है।
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मंगलमय शुभ कामनाएँ और सप्रेम नमन॥ ॐ तत्सत्॥
कृपा शंकर
१३ जनवरी २०२२

मकर संक्रांति/पोंगल के शुभ अवसर पर तीर्थराज त्रिवेणी संगम में स्नान करें ---

 मकर संक्रांति/पोंगल के शुभ अवसर पर तीर्थराज त्रिवेणी संगम में स्नान करें ---

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गुरु महाराज ने बलात् मुझे उठाकर तीर्थराज त्रिवेणी-संगम नामक अमृत-कुंड में बड़ी ज़ोर से अपनी पूरी ताकत लगाकर फेंक दिया, और स्वयं अदृश्य हो गये। अदृश्य होकर भी उन्होने सुनिश्चित किया कि मेरा जीवन उत्तरायण, धर्म-परायण व राममय हो जाये। अब तक तो वह त्रिवेणी-संगम बहुत पीछे छूट गया है। पता नहीं तब से अब तक गंगाजी में कितना पानी बह चुका है। वह त्रिवेणी-संगम था -- भ्रूमध्य में कूटस्थ-बिन्दु, जहाँ इड़ा भगवती गंगा, पिंगला भगवती यमुना, और सुषुम्ना भगवती सरस्वती नदियों का संगम होता है। इस तीर्थराज में स्नान करने से क्या मिला यह तो वे ही जानें, लेकिन मेरा जीवन तो धन्य हो गया है। अपनी चेतना को भ्रूमध्य में और उससे ऊपर रखना त्रिवेणी संगम में स्नान करना है। आने-जाने वाली हर सांस के प्रति सजग रहें, और निज चेतना का निरंतर विस्तार करते रहें।
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उस कूटस्थ-चैतन्य में हम अनंत, सर्वव्यापक, असम्बद्ध, अलिप्त व शाश्वत हैं। हमारे हृदय की हर धड़कन, हर आती जाती साँस, -- परमात्मा की कृपा है। हमारा अस्तित्व ही परमात्मा है। हम जीवित हैं सिर्फ परमात्मा के लिए ही। अब तो परमशिव परमात्मा ने सारा भार अपने ऊपर ले लिया है, वे जानें और उनका काम जानें।
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अब तक की यह यात्रा तरह तरह के भटकाओं और बाधाओं से भरी एक गड़बड़झाला की तरह थी, जिसे उनकी परम कृपा से ही पार कर पाये। खुद का बल कोई काम नहीं आया। अपने जीवन का ध्रुव, भगवान को ही बनाया, तो सारी बाधाएँ दूर हो गईं। गुरुजी के ही शब्दों में --
I have made thee polestar of my life
Though my sea is dark, and my stars are gone
Still, I see the path through thy mercy
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जब भी भगवान की याद आये वही सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त है। उसी क्षण स्वयं प्रेममय बन जाओ, यही सर्वश्रेष्ठ साधना है. अपनी व्यक्तिगत साधना/उपासना में एक नए संकल्प और नई ऊर्जा के साथ गहनता लायें। >>> रात्रि को सोने से पूर्व भगवान का ध्यान कर के निश्चिन्त होकर जगन्माता की गोद में सो जाएँ। >>> दिन का प्रारम्भ परमात्मा के प्रेम रूप पर ध्यान से करें। >>>पूरे दिन परमात्मा की स्मृति रखें। >>> यदि भूल जाएँ तो याद आते ही पुनश्चः स्मरण करते रहें। एक दिन पाओगे कि भवसागर तो कभी का पीछे निकल गया, कुछ पता ही नहीं चला।
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गीता में भगवान कहते हैं --
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥९:३४॥"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥१८:६५॥"
अर्थात् - "(तुम) मुझमें स्थिर मन वाले बनो; मेरे भक्त और मेरे पूजन करने वाले बनो; मुझे नमस्कार करो; इस प्रकार मत्परायण (अर्थात् मैं ही जिसका परम लक्ष्य हूँ ऐसे) होकर आत्मा को मुझसे युक्त करके तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥९:३४॥"
"तुम मच्चित, मद्भक्त और मेरे पूजक (मद्याजी) बनो और मुझे नमस्कार करो; (इस प्रकार) तुम मुझे ही प्राप्त होगे; यह मैं तुम्हे सत्य वचन देता हूँ,(क्योंकि) तुम मेरे प्रिय हो॥१८:६५॥"
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अभीप्सा, परमप्रेम और पूर्ण समर्पण -- यही वेदान्त है, यही ज्ञान है, यही भक्ति है, और यही सनातन धर्म है। बाकी सब इन्हीं का विस्तार है। इनके सिवाय मुझे तो अन्य कुछ भी दृष्टिगत नहीं होता। सर्वत्र भगवान वासुदेव हैं। वे ही श्रीराम हैं, वे ही परमशिव पारब्रह्म हैं, और वे ही सर्वस्व हैं। कहीं कोई पृथकता नहीं है। अन्य कुछ है ही नहीं। ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ जनवरी २०२२

मुझे सुधारने की कौशिस न करें ---

 जिनको मेरे विचार पसंद नहीं हैं, वे मुझे unfriend और block कर दें। मेरे लेख पढ़ कर अपना समय नष्ट न करें। मुझे मेसेन्जर पर वीडियो और अनावश्यक लेख और अभिवादन न भेजें। मैं उन्हें कभी नहीं देखता।

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मुझे सुधारने की कौशिस न करें। भारत के अनेक बड़े अच्छे-अच्छे विचारकों और ज्ञानियों से मेरा खूब सत्संग हुआ है। विदेशों में कई बड़े-बड़े यूरोपीय व अमेरिकी पादरियों से मेरी खूब मगजमारी भी हुई है। काली कंबल पर कोई दूसरा रंग नहीं चढ़ सकता। अतः किसी की भी मुझे तथाकथित रूप से सुधारने की कौशिस कभी सफल नहीं हो सकती। किसी को कोई शिकायत है तो मुझसे स्पष्ट कहे।
कृपा शंकर
१४ जनवरी २०२२