Monday, 24 January 2022

हमारी मौन प्रार्थना निश्चित रूप से कब सुनी जाती है? ---

 (प्रश्न) : हमारी मौन प्रार्थना निश्चित रूप से कब सुनी जाती है?

(उत्तर) : संध्या काल में। (संध्याकाल क्या है? इसे समझाने का प्रयास कर रहा हूँ)
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एक बड़े रहस्य की बात है। हमारे भाव ही हमारी मौन प्रार्थनाएँ हैं। साधनाकाल में कुछ क्षण ऐसे भी आते हैं जब हमारी प्रार्थनाएँ निश्चित रूप से दैवीय शक्तियों तक पहुँचती हैं, और वे हमारा कल्याण करती हैं। हमारा आचरण सही है तो स्वयं भगवती हमारा कल्याण करती हैं। बात चल रही थी 'संध्या काल' की। वैसे तो सूर्योदय से पूर्व के २४ मिनट, और सूर्यास्त के बाद के २४ मिनट 'संध्या काल' होते हैं। लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से हमारे हर श्वास-प्रश्वास और प्रश्वास-श्वास के मध्य के वे संधिक्षण जब बिना किसी प्रयास के स्वतः ही सांस नहीं चल रही है, संध्याकाल हैं। उन क्षणों में हम अहंकार से मुक्त होते हैं, और हमारे भाव यानि मौन प्रार्थनाएँ निश्चित रूप से परमात्मा तक पहुँचती हैं। हमारे जीवन का उद्देश्य 'भगवत्-प्राप्ति है, अतः हमें उन क्षणों में भगवान में स्थित होना चाहिए।
वैसे तो हर समय हमें भगवान में स्थित होना चाहिए। जो सांसें हम ले रहे हैं या छोड़ रहे हैं, वे भगवान स्वयं ही ले और छोड़ रहे हैं। हमारी हर सांस परमात्मा की अभिव्यक्ति है। लेकिन जिन संधि क्षणों में हमारी सांसें स्वभाविक रूप से थमी हुई हैं, हम भगवान के साथ एक हैं। उन संधि क्षणों में की गई उपासना सर्वश्रेष्ठ संध्या है।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१८ जनवरी २०२२

सारी साधनाएँ एक बहाना मात्र है, वैसे ही जैसे किसी बच्चे के हाथ में खिलौना ---

 सारी साधनाएँ एक बहाना मात्र है, वैसे ही जैसे किसी बच्चे के हाथ में खिलौना ---

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सारी आध्यात्मिक सिद्धियाँ और ज्ञान, यहाँ तक की हमारा कल्याण भी हरिःकृपा पर निर्भर है, न कि किसी साधना पर। सारी साधनाएँ तो एक बहाना मात्र ही हैं, वैसे ही जैसे किसी बच्चे के हाथ में कोई खिलौना पकड़ा देते हैं। आवश्यक नहीं है कि शरणागति से भी कल्याण हो जाये। भगवान सिर्फ हमारा प्रेम और सत्यनिष्ठा देखते हैं।

जीवन का हर पल परमात्मा को निरंतर समर्पित है। कभी मृत्यु होगी तो वह इस देह की ही होगी, मैं तो शाश्वत आत्मा हूँ, जो परमात्मा के साथ एक है। मेरा अस्तित्व ही परमात्मा की अभिव्यक्ति है। अब तक के सभी जन्मों के सारे गुण-दोष, संचित व प्रारब्ध कर्मफल, और सर्वस्व परमात्मा को समर्पित है। मेरा एकमात्र संबंध परमात्मा से है। परमात्मा के अतिरिक्त मेरा अन्य किसी से किसी भी तरह का कोई संबंध अब नहीं रहा है। मेरा कोई पृथक अस्तित्व भी नहीं है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ जनवरी २०२२

दूसरों के सिर काट कर, या पंजों के बल चलकर, कोई बड़ा नहीं बन सकता ---

 दूसरों के सिर काट कर, या पंजों के बल चलकर, कोई बड़ा नहीं बन सकता। भौतिक, मानसिक, बौद्धिक, चारित्रिक और आध्यात्मिक -- हर दृष्टी से हमें स्वयं को बलशाली बनना होगा। पर्वत-शिखर से यदि तालाब में जल आता है तो दोष पर्वत-शिखर का नहीं है। हमें स्वयं को पर्वत शिखर बनना होगा।

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हमारे परम आदर्श धनुर्धारी भगवान श्रीराम हैं, जिन्होंने आतताइयों का संहार करने के लिए अस्त्र धारण कर रखे हैं। निज जीवन में भगवान को व्यक्त करें, अपने स्वधर्म का पालन करें, और अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दें। हमारी हर कमी दूर हो जाएगी।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
१८ जनवरी २०२२

अब कोई कामना नहीं है, एकमात्र अभीप्सा है परमात्मा को पाने की यानि आत्म-साक्षात्कार की ---

 इस जीवन में मेरी सदा से ही यह इच्छा रही थी कि मुझे ऐसे ही लोगों का साथ मिले जो जीवन में हर दृष्टिकोण से सफल भी हों, और जिनमें भगवान की भक्ति भी कूट कूट कर भरी हो। जहाँ ऐसे लोग रहते हों, उन्हीं स्थानों पर रहने की इच्छा भी थी। लेकिन मेरी ये मनोकामनायें कभी पूर्ण नहीं हुईं। इतने अच्छे मेरे प्रारब्ध कर्म नहीं थे।

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अब कोई कामना नहीं है। एकमात्र अभीप्सा रमात्माहै प को पाने की, यानि आत्म-साक्षात्कार की। अभी कुछ लिखने की इच्छा नहीं है। अब ऐसा वातावरण मुझ स्वयं को ही निर्माण करना पड़ेगा, जो मेरे अनुकूल हो। किसी से मिलने की, या कहीं जाने की अब कोई कामना नहीं है।
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सर्वप्रथम भगवान की प्राप्ति तो इसी जीवन में अभी इसी क्षण करनी है। भगवान भी अब स्वयं को रोक नहीं सकेंगे। मैं जहाँ भी और जैसे भी हूँ, भगवान को वहाँ आना ही पड़ेगा। मैं न तो कोई नमन कर रहा हूँ और न कोई प्रार्थना कर रहा हूँ। ईश्वर को पाना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। ईश्वर अब और छिप नहीं सकते, उन्हें प्रकट होना ही पड़ेगा। संचित कर्मों की और कर्मफलों की कोई परवाह नहीं है, वे कटते रहेंगे। लेकिन भगवान मुझे इसी क्षण चाहियें। और प्रतीक्षा नहीं कर सकता।
कृपा शंकर
१९ जनवरी २०२२

सनातन धर्मावलम्बियों को चाहिए कि वे ---

 सनातन धर्मावलम्बियों को चाहिए कि वे ---

(१) भौतिक, मानसिक, बौद्धिक, चारित्रिक और आध्यात्मिक -- हर दृष्टी से स्वयं बलशाली बनें, और आत्मरक्षा करने में समर्थ हों। अपने स्वधर्म को समझें, और उसका निज जीवन में सपरिवार पालन करें। अपनी संतानों को अच्छे से अच्छे संस्कार और शिक्षा दें। उन्हें भी हर तरह से उच्च-चरित्रवान, सशक्त और आत्मविश्वासी बनायें। उनमें इतना साहस हो कि वे निर्भय होकर अपनी बात कह सकें और अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकें। अपनी संतानों को सत्य-सनातन-धर्म की शिक्षा दिलवायें, और उन्हें इतना सक्षम व समर्थवान बनायें कि वे सत्य-सनातन-धर्म की शिक्षा दूसरों को भी दे सकें। समय पर उनका उपनयन संस्कार करवाएँ, उनमें भगवान की भक्ति जागृत कर, उन्हें आसन, प्राणायाम, ध्यान आदि सिखलाएँ।
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(२) सरकारों पर दबाव डालकर, संविधान से हिन्दू विरोधी प्रावधानों को हटवायें। हिन्दू मंदिरों को सरकारी लूट से बचायें, और यह सुनिश्चित करें कि वे धर्म-शिक्षा और धर्म-प्रसार के केंद्र बनें। सरकारों पर दबाव डालकर "समान नागरिक संहिता", "समान विधान" और "समान कानून" लागू करवायें। हम धर्म-निरपेक्ष नहीं, धर्म-सापेक्ष, धर्मावलम्बी और सत्यनिष्ठ बनें। गुरुकुल शिक्षा-पद्धति पुनर्जीवित की जाये, जहाँ उच्चतम आधुनिक वैज्ञानिक और व्यावसायिक शिक्षा की भी व्यवस्था हो।
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(३) अनुसंधान और शोध द्वारा सच्चा इतिहास लिखा जाए। उसमें कोई झूठ-कपट न हो। उन सब कारणों को दूर किया जाये जिनके कारण हम विदेशी आक्रमणकारियों से पराजित हुए। हमारा गौरवशाली इतिहास सामने लाया जाये, हमारे धर्म-ग्रन्थों की और हमारी ऐतिहासिक विरासत की रक्षा हो।
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(४) हम आत्म-सम्मान से जीयें। एक-दूसरे की सहायता करें, और सुनिश्चित करें कि किसी भी तरह का अभाव हिन्दू समाज में न हो, व कोई भी हिन्दू अभावग्रस्त न हो। गर्व से कहो हम हिन्दू हैं। हमारी हर कमी दूर होगी। हम विश्वगुरु और पूरे विश्व के लिए एक आदर्श होंगे।
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१९ जनवरी २०२२

हमारे जीवन का एकमात्र उद्देश्य ईश्वर की प्राप्ति है ---

हमारे जीवन का एकमात्र उद्देश्य ईश्वर की प्राप्ति है। जैसी हमारी पात्रता है, उसी के अनुसार भगवान हमारा मार्गदर्शन करते हैं। भगवत्-प्राप्ति ही हमारा स्वधर्म है, और यही सनातन धर्म का सार है। हम कर्म करने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन कर्ताभाव ही हमें कर्मफलों को भोगने को बाध्य करता है। जब तक कर्ताभाव है तब तक यह जन्म-मृत्यु का चक्र चलता रहेगा। इसे कोई नहीं रोक सकता। इस चक्र से मुक्त होने के लिए जीवन में भक्ति, वैराग्य और ज्ञान का होना परम आवश्यक है। हम निमित्त मात्र होकर कार्य करें। भगवान को ही कर्ता बनाएँ। गीता में भगवान कहते हैं ---
"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥११:३३॥"
अर्थात् - "इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो; शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो। ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त ही बनो॥"
बायें हाथ से भी बाण चलाने का अभ्यास होनेके कारण अर्जुन "सव्यसाची" कहलाता है।
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हमारी सबसे बड़ी समस्या है कि हमें भक्ति, वैराग्य और ज्ञान कैसे प्राप्त हों? ये ही हमें असत्य के अंधकार से बचा सकते हैं। हम भगवान को निरंतर अपनी स्मृति में रखें। फिर भगवान को आना ही पड़ेगा। जैसे कोई माता-पिता अपनी संतान के बिना नहीं रह सकते, वैसे ही भगवान भी हमारे बिना नहीं रह सकते। लेकिन वे तभी आयेंगे जब हम उन्हें अपने हृदय का पूर्ण प्यार देंगे।
भगवान कहते हैं ---
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
अर्थात् - "इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥"
(यहाँ 'युद्ध करो' से अभिप्राय है, हर कार्य करो। यह जीवन भी एक युद्धभूमि है जहाँ भगवान स्वयं ही कर्ता हैं, हम तो निमित्त मात्र हैं)
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भगवान को पाने की एक तीब्र अभीप्सा हृदय में निरंतर हो। अभीप्सा का अर्थ है - एक अतृप्त प्यास और तड़प। हमारी साँसें चल रही हैं, यह भगवान की हमारे ऊपर सबसे बड़ी कृपा, और उनकी उपस्थिती का प्रमाण है। भगवान समान भाव से सर्वत्र व्याप्त हैं। उनकी माया के आवरण और विक्षेप ने हमें उन से दूर कर रखा है। यह सारी सृष्टि, सारा ब्रह्मांड, सारा विश्व ही विष्णु का रूप है --
"ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः।
भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥" (विष्णु सहस्त्र्नाम प्रथम मंत्र)
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ईशावास्योपनिषद का प्रथम मंत्र कहता है ---
"ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥"
उपरोक्त मंत्र का अर्थ बहुत व्यापक है। इसका सार यही है कि इस सारे जगत में ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है। यह उन्हीं के आवास के लिए है। त्यागपूर्वक यानि यह मेरा नहीं है, के भाव से जीवनयापन करें। किसी भी दूसरे की धन-सम्पत्ति पर ललचाई दृष्टि न डालें।
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जैसी हमारी पात्रता है उसके अनुसार भगवान हमारा मार्गदर्शन करते हैं। यह मैं मेरे निजी अनुभव द्वारा कह रहा हूँ। जैसा और जो भी उनसे प्रेरणा मिलती है, वही मेरे माध्यम से लिखा जाता है। मैं अपनी मर्जी से कुछ भी नहीं लिखता। मेरे हर विचार के पीछे परमात्मा हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० जनवरी २०२२

हमें भगवान की आवश्यकता अभी इसी समय तुरंत है ---

हमें भगवान की आवश्यकता अभी इसी समय तुरंत है। उनके बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकते। उनके सिवाय और कुछ चाहिए भी नहीं।
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यह भौतिक-शरीर तो एक आधार है। वास्तविक साधना सूक्ष्म-शरीर में होती है। जब मुझे कारण-शरीर और उससे परे के अनुभव होने लगे थे तब कुछ भ्रम की सी स्थिति उत्पन्न हो गई थी , जो गुरुकृपा से अब नहीं है। थोड़ा बहुत तो अहंकार रहता ही है, क्योंकि यह सृष्टि अहंकार से ही चल रही है। जिस दिन अहंकार नहीं रहेगा उस दिन यह भौतिक शरीर ही नहीं, सूक्ष्म और कारण शरीर व उनकी तन्मात्राएं भी नष्ट हो जायेंगी; और आत्मा का परमात्मा में विलय हो जाएगा।
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गुरुकृपा से इस विषय पर कोई शंका अवशिष्ट नहीं है, लेकिन इसकी सार्वजनिक चर्चा का निषेध है। गुरुकृपा से अनुभूतिजन्य ज्ञान खूब हुआ है, इसलिए उनको सदा नमन करता हूँ। उनके स्मरणमात्र से वेदान्त की अनुभूतियाँ होने लगती हैं।
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जिनके हृदय में नारायण यानि भगवान विष्णु का निवास है, वे ही श्रीमान हैं, क्योंकि नारायण ने अपने हृदय में श्री को रखा हुआ है। जिनके हृदय में नारायण का निवास है, श्री का अनुग्रह यानि कृपा उन्हीं पर होती है। अतः अपने हृदय मंदिर में नारायण को सदा बिराजित रखें। इसी मंगलमय शुभ कामना के साथ आप सब के हृदय में नारायण को नमन !!
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२० जनवरी २०२२