Saturday, 15 January 2022

वे मरे नहीं, अमर हुए. वे हारे नहीं, वीरगति को प्राप्त हुए ---

 वे मरे नहीं, अमर हुए. वे हारे नहीं, वीरगति को प्राप्त हुए. उन्होंने भारत की अस्मिता (सनातन धर्म और संस्कृति) की रक्षा के लिए युद्ध किया था. भारत की भूमि पर महाभारत के पश्चात लड़ा गया यह सबसे बड़ा धर्मयुद्ध था.

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१४ जनवरी १७६१ को हुए पानीपत के तीसरे युद्ध में हुतात्मा एक लाख तीस हजार से भी अधिक अमर हिन्दू योद्धाओं को श्रद्धांजलि और नमन !!
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सदाशिव राव भाऊ एक महान वीर हिन्दू योद्धा था, जिसके नेतृत्व में यह युद्ध लड़ा गया था| उसकी सेना धर्मरक्षा हेतु, दुर्दांत लुटेरे अहमदशाह अब्दाली से लड़ने के लिए हजारों मील दूर महाराष्ट्र से पैदल चल कर आई थी, जिसके साथ में भारी तोपखाना भी था| उस के सैनिकों ने उस दिन भूखे, प्यासे, सर्दी में ठिठुरते हुए युद्ध किया था, क्योंकि उन्हें पर्याप्त समय ही नहीं मिला था| फिर भी वे वीरता से लड़े और अमर हुए| महाराष्ट्र का शायद ही कोई ऐसा घर होगा जिसका कोई न कोई सदस्य वीरगति को प्राप्त नहीं हुआ था|
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भारत के शत्रु वामपंथी इतिहासकारों ने भारत का गलत इतिहास लिखा है| इस युद्ध के बाद अहमदशाह अब्दाली भाग गया था और उसका फिर कभी साहस ही नहीं हुआ, भारत की ओर आँख उठाकर देखने का| अहमदशाह अब्दाली ने पंजाब में भयंकर नर-संहार और विनाश किया, फिर मथुरा के और आसपास के सारे हिन्दू मंदिर तोड़कर ध्वस्त कर दिये थे| उसने चालीस हज़ार से अधिक तीर्थयात्रियों व धर्मनिष्ठ नागरिकों का सामूहिक नरसंहार कर उनके नरमुंडों से मथुरा के पास एक मीनार खड़ी कर दी थी| उसी की सजा उसे देने के लिए सदाशिवराव भाऊ महाराष्ट्र से आया था| उस युद्ध के पश्चात पश्चिम में खैबर घाटी से होकर फिर किसी आक्रमणकारी का भारत में आने का साहस नहीं हुआ|
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सिर्फ दस वर्षों में ही मराठे हिन्दुओं ने अपनी खोयी हुई शक्ति को पुनः प्राप्त किया और उन सब विश्वासघातियों को निपटा दिया जिनके कारण पानीपत में उनकी हार हुई थी| महादजी शिंदे ने पूरे रुहेलखण्ड को बर्बाद कर दिया जिनकी गद्दारी से पानीपत में हार हुई थी| बाजीराव ने दिल्ली पर अपना अधिकार कर पूरी मुग़ल सत्ता समाप्त कर दी। साहू जी द्वारा अभयदान देने से ही मुगलों को जीवित छोड़ दिया गया। पंजाब में मराठा सेना की सहायता से ही सिखों का राज्य स्थापित हुआ। अंग्रेजों ने भारत की सत्ता मराठों से प्राप्त की थी, न कि मुगलों से। इस तरह के और भी अनेक युद्ध लड़े गए, जिन्हें छिपाया गया है| वीर-प्रसूता भारत माता की जय|
इस लेख को लिखने का उद्देश्य --- किसी पूर्वजन्म की स्मृति को व्यक्त करना है| ध्यान में वह पूरा युद्ध याद आ जाता है| लगता है किसी पूर्व जन्म में उस महायुद्ध में मेरी भी कोई भूमिका थी| कृपा शंकर
१५ जनवरी २०२१

Thursday, 13 January 2022

कर्तृत्व व धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप, सुख-दुःख और प्रकाश-अंधकार से भी परे हमारा वास्तविक अस्तित्व है ---

 कर्तृत्व व धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप, सुख-दुःख और प्रकाश-अंधकार से भी परे हमारा वास्तविक अस्तित्व है ---

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एक अवस्था ऐसी भी आती है जब व्यक्ति, भगवान की परम कृपा से कर्तृत्व व धर्म और अधर्म से भी परे चले जाता है| भगवान से उसकी कोई पृथकता नहीं रहती| वह ही सबसे बड़ा और आदर्श ध्येय है|
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सृष्टि में यह माया -- आवरण व विक्षेप के रूप में, सदा से ही अपना काम करती आई है, और सदा करती ही रहेगी| यह बाहरी अंधकार भी बना ही रहेगा, क्योंकि अंधकार के बिना सृष्टि नहीं चल सकती| यह सृष्टि -- अंधकार और प्रकाश का ही मिला-जुला खेल, निर्माण है| बिना अंधकार के प्रकाश नहीं है, और प्रकाश के बिना अंधकार नहीं है| यह खेल ही पाप-पुण्य, अधर्म-धर्म और दुःख-सुख है| भगवान इन सब से परे भी है और इन सब में भी है|
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हमारा लक्ष्य परमात्मा के उस प्रकाश में स्थित होना है जहाँ कोई अंधकार नहीं है| श्रुति भगवती ही प्रमाण है, जो बताती है कि परमात्मा की ज्योति ही सारी सृष्टि को आलोकित कर रही है; परमात्मा को कोई प्रकाशित नहीं कर सकता| वहाँ कोई अंधकार नहीं है| कठ व मुंडक श्रुति कहती हैं --
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥"
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गीता में भगवान कहते हैं ...
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः| यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम||१५:६||"
अर्थात् उसे न सूर्य प्रकाशित कर सकता है और न चन्द्रमा और न अग्नि| जिसे प्राप्त कर मनुष्य पुन: (संसार को) नहीं लौटते हैं, वह मेरा परम धाम है||
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"यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्| यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्||१५:१२||
अर्थात् जो तेज सूर्य में स्थित होकर सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में है और अग्नि में है, उस तेज को तुम मेरा ही जानो||
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"सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च|
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्||१५:१५||"
अर्थात् मैं ही समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ| मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (उनका अभाव) होता है| समस्त वेदों के द्वारा मैं ही वेद्य (जानने योग्य) वस्तु हूँ तथा वेदान्त का और वेदों का ज्ञाता भी मैं ही हूँ||
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उन भगवान में स्थिर होना ही हमारा परम लक्ष्य हो, उससे कम कुछ भी नहीं|
सारा ज्ञान उपनिषदों में है| सारे उपनिषदों का सार श्रीमद्भगवद्गीता में है| हम कूटस्थ में भगवान का ध्यान करते हुए, उनमें स्थित होकर ही अपना जीवन व्यतीत करने में प्रयासरत रहें| वे ही परमशिव हैं, वे ही विष्णु, वे ही नारायण, वे ही वासुदेव, श्रीकृष्ण, और वे ही श्रीराम हैं| सारे ज्ञान का आदि और अंत वे ही हैं|
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"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च |
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ||
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व |
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ||"
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ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ नमः शिवाय !! 🌹🙏🕉🕉🕉🙏🌹
कृपा शंकर
१३ जनवरी २०२१

लोहड़ी के त्योहार की शुभ कामनायें ---

कल मकर संक्रांति, और आज लोहड़ी है. लोहड़ी के त्योहार की शुभ कामनायें और एक महान वीर दुल्ला भट्टी (दूलिया भाटी) को भी नमन जिसकी स्मृति में लोहड़ी का त्योहार मनाया जाता है ---

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एक मध्यकालीन महान राजपूत हुतात्मा धर्मरक्षक महावीर दुल्ला भट्टी (मृत्यु: १५९९) की स्मृति में पंजाब, हरियाणा व हिमाचल प्रदेश में मनाए जाने वाला लोहड़ी का त्योहार आज १३ जनवरी को है| पंजाब में जो वीर योद्धा दुल्ला भट्टी के नाम से प्रसिद्ध था, राजपूताने में वह दूलिया भाटी के नाम से विख्यात था| साठ वर्ष पूर्व तक राजस्थान में नौटंकी के लोक कलाकार दूलिया का नाटक दिखाते थे| दूलिया के नाटकों की कुछ-कुछ स्मृति मुझे भी है| पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में मकर संक्रान्ति की पूर्वसंध्या पर इस त्यौहार का उल्लास रहता है| रात्रि में खुले स्थान में परिवार और आस-पड़ोस के लोग मिलकर आग के किनारे घेरा बना कर बैठते हैं और रेवड़ी, मूंगफली आदि खाते हैं| गीत भी गाये जाते हैं और महिलाएं नृत्य भी करती हैं|
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मुगल बादशाहों के काल में विशेषकर अकबर बादशाह के काल में हिन्दू कन्याओं का अपहरण बहुत अधिक होने लगा था| विवाहों के अवसर पर जब सभी सगे-संबंधी एकत्र होते थे, मुगल सैनिक हमला कर के सभी पुरूषों को मार देते और महिलाओं का अपहरण कर के ले जाते| हिन्दू बहुत अधिक आतंकित थे| तभी से हिंदुओं में बाल-विवाह और रात्री-विवाह की प्रथा पड़ी| तभी से छोटे बच्चों का विवाह रात के अंधेरे में चुपचाप कर दिया जाने लगा|
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दुल्ला भट्टी एक राजपूत थे जिन्हें बलात् मुसलमान बना दिया गया था| पर हिंदुओं की गरीबी और दुःख-दर्द उन से सहन नहीं हुआ और वे विद्रोही बन बैठे| दुल्ला भट्टी बादशाह अकबर के शासनकाल के दौरान पंजाब में रहते थे| उन्होंने एक छापामार विद्रोहियों की सेना बनाकर मुगल अमीरों और जमीदारों से धन लूटकर गरीबो में बाँटने के अलावा, जबरन रूप से बेचीं जा रही हजारों हिंदू लड़कियों को मुक्त करवाया| साथ ही उन्होंने हिंदू परम्पराओं के अनुसार उन सभी हिन्दू लड़कियों का विवाह हिंदू लड़कों से करवाने की व्यवस्था की, और उन्हें दहेज भी प्रदान किया| इस कारण वह पंजाब के हिंदुओं में एक लोक-नायक बन गए| धीरे-धीरे दुला भट्टी के प्रशंसकों और चाहने वालों की संख्या बढऩे लगी| सताये हुए निर्धन हिन्दू अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उसके पास जाते और अपना दुखड़ा रोते| उनके दुखों को सुनकर दुला भट्टी उठ खड़ा होता और जैसे भी संभव होता उनकी समस्याओं का समाधान करता|
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एक धर्मांतरित मुसलमान होकर भी हिंदुओं की सेवा करने के कारण दुला भट्टी से अकबर बादशाह बहुत अधिक नाराज हुआ| उस ने दुला भट्टी को एक डाकू घोषित कर दिया और देखते ही उसकी हत्या का आदेश भी जारी कर दिया| अकबर बादशाह के सिपाही कभी भी दुला भट्टी को जीवित नहीं पकड़ सके क्योंकि उसका भी सूचनातंत्र बहुत ही गहरा और व्यापक था| वह मुगलों को लूटता और उस धन से निर्धन हिंदुओं की पुत्रियों का विवाह बड़े धूमधाम से करता| कहीं-कहीं वह यदि व्यक्तिगत रूप से किसी विवाह समारोह में उपस्थित ना हो पाता था तो वहाँ अपनी ओर से धन भेजकर सारी व्यवस्था अपने लोगों के माध्यम से करा देता| दुला भट्टी के लोग पंजाब, जम्मू कश्मीर आज के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, हरियाणा, राजस्थान और पाकिस्तान के भी बहुत बड़े भूभाग पर सक्रिय हो गये थे| इतने बड़े भूभाग में अकबर ने कई बार भट्टी को मारने का अभियान चलाया, परंतु उसे कभी सफलता नहीं मिली|
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एक बार एक निर्धन ब्राह्मण अपनी पुत्री के विवाह में सहायता प्राप्त करने हेतु दुला भट्टी के पास गया| उस गरीब ब्राह्मण की दरिद्रता को देखकर दुला भट्टी बहुत अधिक दु:खी हुआ| उस गरीब कन्या के कोई भाई नहीं था इस लिए दुला भट्टी ने उसे अपनी धर्मबहिन बना लिया और स्वयं उपस्थित रहकर विवाह करवाने का वचन भी दे दिया| यह समाचार अपने गुप्तचरों से अकबर को मिल गया| उसने उस गाँव के आसपास अपने गुप्तचर इस आदेश के साथ नियुक्त कर दिये कि देखते ही बिना किसी चेतावनी के दुला भट्टी की हत्या कर दी जाये|
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विवाह कार्यक्रम में दुला भट्टी दहेज का सारा सामान लेकर स्वयं उपस्थित हुआ| विवाह के बाद जब डोली विदा हो रही थी तब अकबर के छद्म सैनिकों को पता चल गया और उन्होने उस पर बिना किसी चेतावनी के आक्रमण कर दिया| उसे संभलने का अवसर भी नहीं मिला और वह महान धर्मरक्षक महावीर मारा गया| जिस दिन उस की हत्या हुई वह दिन मकर संक्रांति से पहले वाला दिन था|
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दुला भट्टी के रोम-रोम में अपने देशवासियों के प्रति प्रेम भरा था, वह उनकी व्यथाओं से व्यथित था और उनका उद्घार चाहता था| अपने इसी आदर्श के लिये अपनी समकालीन मुगल सत्ता के सबसे बड़े बादशाह अकबर से टक्कर ली| वह जब तक जीवित रहा तब तक अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष करता रहा| वह परम राष्ट्रभक्त था| दुला भट्टी की स्मृति में पंजाब, जम्मू कश्मीर, दिल्ली, हरियाणा राजस्थान और पाकिस्तान में (अकबर का साम्राज्य की लगभग इतने ही क्षेत्र पर था) लोहिड़ी का पर्व हर्षोल्लास के साथ मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व मनाया जाता है| वह महावीर दुल्ला भट्टी अमर है और अमर रहेगा| भारत माता की जय| 🌹🙏🌹
कृपा शंकर
१३ जनवरी २०२१

हमारी जीवन चेतना, स्थायी रूप से प्रकृति से परे परमशिव में स्थित हो, हम सब परमशिव बनें ---

 हमारी जीवन चेतना, स्थायी रूप से प्रकृति से परे परमशिव में स्थित हो, हम सब परमशिव बनें ---

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आध्यात्मिक दृष्टि से ध्यान में हर साँस के साथ हमारा उत्तरायण और दक्षिणायण चलता रहता है| हमारी सूक्ष्म देह में मूलाधारचक्र -- दक्षिण दिशा; और सहस्त्रारचक्र -- उत्तर दिशा है| कूटस्थ ज्योतिर्मय ब्रह्म -- सूक्ष्मजगत के सवितादेव भगवान भुवन-भास्कर हैं|
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गुरु महाराज की परम कृपा से गहरे ध्यान में, जब हर श्वास के साथ घनीभूत प्राणऊर्जा (कुंडलिनी), सुषुम्ना नाड़ी की ब्राह्मीउपनाड़ी में एक विशेष ध्वनि और विधि से सभी चक्रों को भेदती हुई ऊपर उठकर कूटस्थ तक जाती है, यह मेरा उत्तरायण है|
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वहाँ से वही कुंडलिनी जब एक दूसरी ध्वनि और विधि के साथ सब चक्रों को भेदती हुई नीचे बापस मूलााधार पर लौटती है, तब मेरा दक्षिणायण है|
यह क्रिया हर श्वास-प्र्श्वास के साथ चलती रहती है|
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कभी कभी यह ब्रह्मरंध्र को भी भेदकर अनंतता के साथ मिल जाती है| जिस दिन यह अनंतता से भी परे परमशिव को स्थायी रूप से समर्पित हो जाएगी, उस दिन उसी समय मेरा जीवन धन्य और कृतार्थ हो जाएगा| यह भगवान श्रीहरिः और गुरु महाराज की परम कृपा होगी|
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हमारा जीवन सार्थक हो| हम सब का कल्याण हो| 🌹🙏🕉🙏🌹
कूटस्थ ज्योतिर्मय ब्रह्म को नमन ! ॐ श्रीगुरुभ्यो नमः !!
कृपा शंकर
१३ जनवरी २०२१

Wednesday, 12 January 2022

मुझे निरंतर अपने साथ ही रखो, मुझे अपने साथ एक करो ---

 हे प्रभु, मुझे अपना उद्धार, मुक्ति या मोक्ष आदि कुछ भी नहीं चाहिए; मुझे निरंतर अपने साथ ही रखो, मुझे अपने साथ एक करो ---

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उद्धार होने से क्या पता आपका साथ छूट जाये| मुझे मेरा उद्धार नहीं, आपका सदा साथ ही चाहिए| तरह-तरह के संकल्पों-विकल्पों से मुक्ति दो, ये विक्षेप उत्पन्न करते हैं| आपके उपदेशों का पालन करने की सामर्थ्य मुझ में नहीं है| आपने कह तो बहुत कुछ दिया पर उसका पालन करने में मैं असमर्थ हूँ| जो करना है वह आप ही करो| मेरा काम अपनी सब बुराइयों के साथ आपको समर्पित होना है| बुराइयाँ नहीं छूटतीं| आपने अपने चरणों में आश्रय दिया है, वही पर्याप्त है| और कुछ नहीं चाहिए| आपके उपदेश भी नहीं चाहिए| मुझे अपने साथ एक करो| बस और कुछ नहीं|
ॐ तत्सत् !!
१२ जनवरी २०२१

Sunday, 9 January 2022

भगवान की प्राप्ति से अधिक सरल अन्य कुछ भी नहीं है ---

 भगवान की प्राप्ति से अधिक सरल अन्य कुछ भी नहीं है| भगवान कहीं दूर नहीं, हमारे हृदय में ही बैठे हुए हैं ---

"ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति| भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया||"
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वे किसे मिलते हैं?---
"निर्मल मन जन सो मोहि पावा | मोहि कपट छल छिद्र न भावा ||"
उन्हें पाने के लिए अपने अन्तःकरण का स्वभाव स्वच्छ और शुद्ध करना होगा| फिर वे तो मिले हुए ही हैं| हमारे और भगवान के मध्य में कोई दूरी नहीं है| जहाँ कपट और छल हैं, वे वहाँ नहीं आ सकते| छल-कपट से मुक्त होते ही भगवान तो मिले हुए ही हैं।
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मैं उन सब सज्जनों, साधु-संतों को भी हार्दिक धन्यवाद देता हूँ, जिन्होनें मुझे अपने साथ सत्संग का अवसर दिया| जब से भगवान हृदयस्थ हो गए हैं, किसी बाहरी सत्संग की आवश्यकता नहीं रही है| सारे भेद समाप्त हो रहे हैं|
सभी को धन्यवाद और नमन!!

अखंड आध्यात्मिक साधना कैसे हो? ---

अखंड आध्यात्मिक साधना कैसे हो? ---
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अखंड आध्यात्मिक साधना (Unbroken Spiritual Meditation) सरल से भी सरल, और संभव से भी अधिक संभव है| इसमें कुछ भी जटिलता नहीं है| एक ही शर्त है कि हृदय में भगवान के प्रति परमप्रेम (Integral and absolute love for the Divine) और सत्यनिष्ठा (sincerity) हो| बस, और कुछ भी नहीं चाहिए| जिन में परमप्रेम और सत्यनिष्ठा नहीं है, उन्हें यह लेख पढ़ने की आवश्यकता नहीं है|
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इसमें आरंभ रात्रि के ध्यान से करना होगा| रात्रि को सोने से पूर्व परमात्मा का गहनतम ध्यान कर के निश्चिंत होकर सोयें, वैसे ही जैसे एक बालक अपनी माँ की गोद में सोता है| सिर के नीचे तकिया नहीं, जगन्माता का वरद हस्त हो| दूसरे दिन का प्रारम्भ परमात्मा के गहनतम ध्यान से करें| पूरे दिन अपना कार्य यथावत् सामान्य ढंग से करें| बस यही भाव रखें कि जो भी काम आप कर रहे हैं, वह काम आप नहीं, बल्कि आपके माध्यम से भगवान स्वयं कर रहे हैं| भगवान को कर्ता बनाओ, स्वयं कर्ता मत बनो| बार बार यही भाव रखें कि आपके हरेक कार्य को भगवान ही करते हैं, आप तो निमित्त मात्र हैं| भगवान ही आपके पैरों से चल रहे हैं, आँखों से देख रहे हैं, हाथों से काम कर रहे हैं, हृदय में धडक रहे हैं| आपके हर काम को भगवान ही कर रहे हैं|
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इस का लाभ यह होगा कि मृत्यु के समय भगवान ही आपको याद करेंगे| आपको उन्हें याद करने की चिंता नहीं करनी होगी| रात्रि में जब आप शयन कर रहे होंगे तब जगन्माता स्वयं जाग कर आप की रक्षा कर रही होगी|
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भगवान श्रीकृष्ण स्वयं भी हमें निमित्त मात्र बनने का आदेश देते हैं ---
"जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् |
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ||११:३३||"
अर्थात् इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो; शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो| ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं| हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त ही बनो||
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भगवान ने अर्जुन को "सव्यसाचि" इसलिए कहा क्योंकि अर्जुन को दोनों हाथों से बाण चलाने का अभ्यास था| कूटस्थ हृदय में बिराजमान मेरे गुरु महाराज मुझे इसी समय यह उपदेश दे रहे हैं कि जब हमारी साँसें दोनों नासिकाओं से चल रही हों, उस समय हम भी सव्यसाचि हैं| जिस समय सांसें दोनों नासिकाओं से चल रही हों, वह साधना की सिद्धी का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त है| उस समय कूटस्थ सूर्य-मण्डल में परमपुरुष भगवान श्रीहरिः का ध्यान करते हुये, सुषुम्ना के सब चक्रों में प्रवाहित हो रहे प्राण-प्रवाह के प्रति भी सजग रहो| (आगे की बातें व्यक्तिगत और गोपनीय हैं).
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सब को मेरा हार्दिक नमन !! सब का कल्याण हो !! 🌹🙏🕉🕉🕉🙏🌹
कृपा शंकर
१० जनवरी २०२१