Monday, 3 January 2022

असहमति में उठा मेरा हाथ ---

असहमति में उठा मेरा हाथ ---
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असहमत होने का अधिकार मुझे भारत के संविधान ने दिया है, और सुप्रीम कोर्ट ने भी इसका समर्थन किया है। किसी को गोली मारने का मैं समर्थन नहीं करता, लेकिन ब्रह्मचर्य के परयोग करने वाले महातमा को राष्ट्रपिता कहने को मैं बाध्य नहीं किया जा सकता। भारत के राष्ट्रपिता तो स्वयं भगवान विष्णु हैं जिन्होंने बार बार अवतृत होकर अपनी लीलाओं द्वारा धर्म की रक्षा की है। भारत का नाम भारत ही पड़ा है प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र भरत के नाम पर। प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव को या उनके पुत्र भरत को भी राष्ट्रपिता घोषित किया जा सकता है।
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१४ अगस्त १९४७ को महातमा की नीतियों ने पाकिस्तान को जन्म दिया। पाकिस्तान का क़ायदे-आज़म जिन्ना था और और पिता था महातमा मोहनदास गांधी। गोली मारना गलत था, लेकिन गोडसे ने न्यायालय में जो बयान दिया था वह अकाट्य तर्कों के साथ था, इसलिए उन बयानों को छापने पर लगभग चालीस वर्षों तक प्रतिबंध लगा दिया गया था। उसके बयान में दिये तर्कों का खंडन करने की सामर्थ्य किसी में भी नहीं है। अनुत्तरित प्रश्न तो ये भी हैं कि --
(१) गोली लगने के बाद भी जीवित गांधी को किसी अस्पताल में ले जाकर इलाज़ क्यों नहीं करवाया गया?
(२) किसी डॉक्टर को भी इलाज करने के लिए मौके पर क्यों नहीं बुलाया गया?
(३) उन्हें बिना इलाज़ के ही मरने के लिए क्यों छोड़ दिया गया?
(४) मरने के बाद उनकी लाश का पोस्टमार्टम क्यों नहीं करवाया गया?
(५) गोली चलाने के लिए गोडसे के पास पिस्तोल कहाँ से आई? उस समय के क़ानूनों के अनुसार तो यह संभव ही नहीं था कि बिना लाइसेन्स के कोई किसी भी तरह का हथियार रख सके।
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गाँधी का वध गलत था, पर उसकी प्रतिक्रिया में महाराष्ट्र में पुणे के आसपास के हजारों निर्दोष ब्राह्मणों की कांग्रेसियों द्वारा की गई सामूहिक हत्या क्या अहिंसा थी? गांधी वध के बाद पुणे में लगभग ६ हजार, और पूरे महाराष्ट्र में लगभग १३ हजार निर्दोष ब्राह्मणों की सामूहिक हत्या कर दी गई थी, क्योंकि गोडसे एक महाराष्ट्रीय ब्राह्मण था। उस हत्याकांड की कभी न तो कोई जांच की गई, और न किसी हत्यारे को कोई दंड मिला। क्या उन निर्दोष ब्राह्मणों का कोई मानवाधिकार नहीं था? क्या ब्राह्मण मनुष्य नहीं होते? घरों में सो रहे ब्राह्मणों को पकड़ पकड़ कर उन पर पेट्रोल डालकर आग लगा दी गई, उनके घरों को लूट कर जला दिया गया, और उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। क्या यही कॉंग्रेसी संस्कृति थी?
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भारत में हिंदुओं की आस्था पर प्रहार करने, हिन्दू देवी-देवताओं को गाली देने, और वेद, पुराण, महाभारत, रामायण आदि की निंदा करने की छूट "अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता" के नाम पर सब को है, जो गलत है। महातमा गाँधी का वध निंदनीय और बहुत गलत था। गाँधी कुछ दिन और जीवित रहते तो उनके पाखंड का पता सब को चल जाता, और वे जीते जी ही मर जाते।
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यदि मेरी भावनाओं और विचारों से किसी को कोई ठेस पहुंची है तो मैं क्षमा-याचना करता हूँ। लगता है देश पर शासन करने का अधिकार उन्हीं को है जो कोट के भीतर तो क्रॉस पहिनते हैं, और कोट के ऊपर जनेऊ। जो स्वयं को दत्तात्रेयगोत्री जनेऊधारी कश्मीरी ब्राह्मण कहते हैं, छुट्टी मनाने बार बार इटली भाग जाते हैं, मनोरंजन के लिए बार-बार भाग कर बैंकोक चले जाते हैं, लगता है वे ही इस देश के असली शासक हैं। ये संघी लोग पता नहीं कहाँ से आ गए? यह राष्ट्र और यह देश महातमा जी चेलों का ही है, जिन से पहिले कोई राष्ट्र नहीं था। उन्होने ही इसे राष्ट्र बनाया अतः वे ही राष्ट्रपिता हैं।
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लेकिन मेरा हाथ असहमति में ही उठा रहेगा। सभी को नमन॥ मेरी भूल-चूक माफ करें।
ॐ तत्सत् !!
३१ दिसंबर २०२१
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पुनश्च: --- भारत के विभाजन के समय लगभग २५-३० लाख से अधिक हिंदुओं की हत्या हुई, करोड़ों लोग विस्थापित हुए, लाखों बच्चे अनाथ हुए, लाखों महिलाओं के साथ बलात्कार करके उन्हें बेचा गया, और पता नहीं अथाह कितनी संपत्ति का विनाश हुआ। यह विश्व के इतिहास का सबसे बड़ा हत्याकांड था। क्या इसकी जांच नहीं होनी चाहिए थी? इसके क्या कारण थे? क्या उन कारणों को दूर किया गया? इसके लिए कौन जिम्मेदार थे? क्या कभी उन पर कोई अभियोग चला?
ईश्वर का न्याय अवश्य होगा। दोषियों को इसका दंड भी मिलेगा। भगवान स्वयं उन्हें दंडित करेंगे।
 
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Birthday of Mahatma Gandhi should be observed on 2nd September. As Mohandas Gandhi, he was born on 2nd October, 1861. But as 'Mahatma', he was born on 2nd September, 1938 by order of Secretary to Government, GA Department, Government of CP & Berar.
अब उजागर हुए एक ब्रिटिश दस्तावेज के अनुसार मोहनदास करमचंद गांधी को "महात्मा" की उपाधि ब्रिटिश सरकार द्वारा २ सितंबर १९३८ को दी गई थी। ब्रिटिश सरकार के आदेशानुसार २ सितंबर १९३८ से "गांधी" को "महात्मा गांधी" कहना अनिवार्य था। यह झूठ है कि महात्मा की उपाधि उन्हें नेताजी सुभाषचंद्र बोस, या रवीन्द्रनाथ टैगोर ने दी थी। द्वितीय विश्वयुद्ध में अंग्रेजों की सेवा का वचन देने के कारण श्री मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा कहलवाया गया। यह तथ्य जानने के बाद उन्हें "महात्मा गांधी" कहना अंग्रेजों की गुलामी है।

"अपराजित नमस्तेऽस्तु नमस्ते रामपूजित | प्रस्थानं च करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ||"

"अपराजित नमस्तेऽस्तु नमस्ते रामपूजित | प्रस्थानं च करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ||"
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ब्रह्माण्ड पुराण में दिए हुए एकमुखी हनुमत् कवचम् में ध्यान का यह आठवाँ मन्त्र है| किसी दुर्घटना या चोर डाकुओं के भय, भूत-प्रेत बाधा अथवा शत्रुओं से किसी प्रकार के अनिष्ट की, अथवा रणभूमि में शत्रु के भीषण प्रहार की आशंका रहती है| ऐसी स्थिति आने के पूर्व ही हमें हनुमान जी का ध्यान करते हुए उपरोक्त मन्त्र का प्रस्थान करते समय या उससे पूर्व कम से कम ११ बार जप कर लेना चाहिए| सब संकट कट जायेंगे और हम सकुशल घर लौट आयेंगे| उच्चारण सही और शुद्ध होना चाहिए|
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श्रीएकमुखी हनुमत्कवचम् :---
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किसी विद्वान सिद्ध संत के मार्गदर्शन में ही इसे सिद्ध करें| पूरा श्रीएकमुखी हनुमत्कवचम् इस प्रकार है :---
अथ श्री एकमुखी हनुमत्कवचं प्रारभ्यते ।
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥
श्रीरामदूतं शिरसा नमामि ॥
श्रीहनुमते नमः
एकदा सुखमासीनं शङ्करं लोकशङ्करम् ।
पप्रच्छ गिरिजाकान्तं कर्पूरधवलं शिवम् ॥
पार्वत्युवाच
भगवन्देवदेवेश लोकनाथ जगद्गुरो ।
शोकाकुलानां लोकानां केन रक्षा भवेद्ध्रुवम् ॥
सङ्ग्रामे सङ्कटे घोरे भूतप्रेतादिके भये ।
दुःखदावाग्निसन्तप्तचेतसां दुःखभागिनाम् ॥
ईश्वर उवाच
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया ।
विभीषणाय रामेण प्रेम्णा दत्तं च यत्पुरा ॥
कवचं कपिनाथस्य वायुपुत्रस्य धीमतः ।
गुह्यं ते सम्प्रवक्ष्यामि विशेषाच्छृणु सुन्दरि ॥
ॐ अस्य श्रीहनुमत् कवचस्त्रोत्रमन्त्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषिः ।
अनुष्टुप्छन्दः । श्रीमहावीरो हनुमान् देवता। मारुतात्मज इति बीजम् ॥
ॐ अञ्जनीसूनुरिति शक्तिः । ॐ ह्रैं ह्रां ह्रौं इति कवचम् ।
स्वाहा इति कीलकम् । लक्ष्मणप्राणदाता इति बीजम् ।
मम सकलकार्यसिद्ध्यर्थे जपे वीनियोगः ॥
अथ न्यासः
ॐ ह्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः । ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ॐ ह्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ अञ्जनीसूनवे हृदयाय नमः । ॐ रुद्रमूर्तये शिरसे स्वाहा ।
ॐ वायुसुतात्मने शिखायै वषट् । ॐ वज्रदेहाय कवचाय हुम् ।
ॐ रामदूताय नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ ब्रह्मास्त्रनिवारणाय अस्त्राय फट् ।
ॐ रामदूताय विद्महे कपिराजाय धीमही ।
तन्नो हनुमान् प्रचोदयात् ॐ हुं फट् स्वाहा ॥ इति दिग्बन्धः ॥
अथ ध्यानम् ॥
ॐ ध्यायेद्बालदिवाकरधृतिनिभं देवारिदर्पापहं
देवेन्द्रप्रमुखप्रशस्तयशसं देदीप्यमानं रुचा ।
सुग्रीवादिसमस्तवानरयुतं सुव्यक्ततत्त्वप्रियं
संरक्तारुणलोचनं पवनजं पीताम्बरालङ्कृतम् ॥ १॥
उद्यन्मार्तण्डकोटिप्रकटरुचियुतं चारुवीरासनस्थं
मौञ्जीयज्ञोपवीतारुणरुचिरशिखाशोभितं कुण्डलाङ्गम् ।
भक्तानामिष्टदं तं प्रणतमुनिजनं वेदनादप्रमोदं
ध्यायेद्देवं विधेयं प्लवगकुलपतिं गोष्पदीभूतवार्धिम् ॥ २॥
वज्राङ्गं पिङ्गकेशाढ्यं स्वर्णकुण्डलमण्डितम् ।
नियुद्धकर्मकुशलं पारावारपराक्रमम् ॥ ३॥
वामहस्ते महावृक्षं दशास्यकरखण्डनम् ।
उद्यद्दक्षिणदोर्दण्डं हनुमन्तं विचिन्तयेत् ॥ ४॥
स्फटिकाभं स्वर्णकान्ति द्विभुजं च कृताञ्जलिम् ।
कुण्डलद्वयसंशोभिमुखाम्भोजं हरिं भजेत् ॥ ५॥
उद्यदादित्यसङ्काशमुदारभुजविक्रमम् ।
कन्दर्पकोटिलावण्यं सर्वविद्याविशारदम् ॥ ६॥
श्रीरामहृदयानन्दं भक्तकल्पमहीरूहम् ।
अभयं वरदं दोर्भ्यां कलये मारूतात्मजम् ॥ ७॥
अपराजित नमस्तेऽस्तु नमस्ते रामपूजित ।
प्रस्थानं च करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ॥ ८॥
यो वारांनिधिमल्पपल्वलमिवोल्लङ्घ्य प्रतापान्वितो
वैदेहीघनशोकतापहरणो वैकुण्ठतत्त्वप्रियः ।
अक्षाद्यर्चितराक्षसेश्वरमहादर्पापहारी रणे ।
सोऽयं वानरपुङ्गवोऽवतु सदा युष्मान्समीरात्मजः ॥ ९॥
वज्राङ्गं पिङ्गकेशं कनकमयलसत्कुण्डलाक्रान्तगण्डं
नाना विद्याधिनाथं करतलविधृतं पूर्णकुम्भं दृढं च
भक्ताभीष्टाधिकारं विदधति च सदा सर्वदा सुप्रसन्नं
त्रैलोक्यत्राणकारं सकलभुवनगं रामदूतं नमामि ॥ १०॥
उद्यल्लाङ्गूलकेशप्रलयजलधरं भीममूर्तिं कपीन्द्रं
वन्दे रामाङ्घ्रिपद्मभ्रमरपरिवृतं तत्त्वसारं प्रसन्नम् ।
वज्राङ्गं वज्ररूपं कनकमयलसत्कुण्डलाक्रान्तगण्डं
दम्भोलिस्तम्भसारप्रहरणविकटं भूतरक्षोऽधिनाथम् ॥ ११॥
वामे करे वैरिभयं वहन्तं शैलं च दक्षे निजकण्ठलग्नम् ।
दधानमासाद्य सुवर्णवर्णं भजेज्ज्वलत्कुण्डलरामदूतम् ॥ १२॥
पद्मरागमणिकुण्डलत्विषा पाटलीकृतकपोलमण्डलम् ।
दिव्यगेहकदलीवनान्तरे भावयामि पवमाननन्दनम् ॥ १३॥
ईश्वर उवाच
इति वदति विशेषाद्राघवो राक्षसेन्द्रम्
प्रमुदितवरचित्तो रावणस्यानुजो ह्
रघुवरवरदूतं पूजयामास भूयः
स्तुतिभिरकृतार्थः स्वं परं मन्यमानः ॥ १४॥
वन्दे विद्युद्वलयसुभगस्वर्णयज्ञोपवीतं
कर्णद्वन्द्वे कनकरुचिरे कुण्डले धारयन्तम् ।
उच्चैर्हृष्यद्द्युमणिकिरणश्रेणिसम्भाविताङ्गं
सत्कौपीनं कपिवरवृतं कामरूपं कपीन्द्रम् ॥ १५॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं सततं स्मरामि ॥ १६॥
ॐ नमो भगवते हृदयाय नमः ।
ॐ आञ्जनेयाय शिरसे स्वाहा ।
ॐ रुद्रमूर्तये शिखायै वषट् ।
ॐ रामदूताय कवचाय हुम् ।
ॐ हनुमते नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ अग्निगर्भाय अस्त्राय फट् ।
ॐ नमो भगवते अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ आञ्जनेयाय तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ रुद्रमूर्तये मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ वायुसूनवे अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ हनुमते कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ अग्निगर्भाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
अथ मन्त्र उच्यते
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः ।
ॐ ह्रीं ह्रौं ॐ नमो भगवते महाबलपराक्रमाय भूतप्रेतपिशाच
शाकिनी डाकिनी यक्षिणी पूतनामारी महामारी
भैरव-यक्ष-वेताल-राक्षस-ग्रहराक्षसादिकं
क्षणेन हन हन भञ्जय भञ्जय
मारय मारय शिक्षय शिक्षय महामाहेश्वर रुद्रावतार हुं फट् स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते हनुमदाख्याय रुद्राय सर्वदुष्टजनमुखस्तम्भनं
कुरु कुरु ह्रां ह्रीं ह्रूं ठंठंठं फट् स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते अञ्जनीगर्भसम्भूताय रामलक्ष्मणानन्दकराय
कपिसैन्यप्रकाशनाय पर्वतोत्पाटनाय सुग्रीवसाधकाय
रणोच्चाटनाय कुमारब्रह्मचारिणे गम्भीरशब्दोदयाय
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं सर्वदुष्टनिवारणाय स्वाहा ।
ॐ नमो हनुमते सर्वग्रहानुभूतभविष्यद्वर्तमानान् दूरस्थान्
समीपस्थान् सर्वकालदुष्टदुर्बुद्धीनुच्चाटयोच्चाटय परबलानि
क्षोभय क्षोभय
मम सर्वकार्यं साधय साधय हनुमते
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं फट् देहि ।
ॐ शिवं सिद्धं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं स्वाहा ।
ॐ नमो हनुमते परकृतान् तन्त्रमन्त्र-पराहङ्कारभूतप्रेतपिशाच
परदृष्टिसर्वविघ्नदुर्जनचेटकविधान् सर्वग्रहान् निवारय निवारय
वध वध पच पच दल दल किल किल
सर्वकुयन्त्राणि दुष्टवाचं फट् स्वाहा ।
ॐ नमो हनुमते पाहि पाहि एहि एहि एहि
सर्वग्रहभूतानां शाकिनीडाकिनीनां विषं दुष्टानां सर्वविषयान्
आकर्षय आकर्षय मर्दय मर्दय भेदय भेदय
मृत्युमुत्पाटयोत्पाटय शोषय शोषय ज्वल ज्वल प्रज्ज्वल प्रज्ज्वल
भूतमण्डलं प्रेतमण्डलं पिशाचमण्डलं निरासय निरासय
भूतज्वर प्रेतज्वर चातुर्थिकज्वर विषमज्वर माहेश्वरज्वरान्
छिन्धि छिन्धि भिन्धि भिन्धि
अक्षिशूल-वक्षःशूल-शरोभ्यन्तरशूल-गुल्मशूल-पित्तशूल-
ब्रह्मराक्षसकुल-परकुल-नागकुल-विषं नाशय नाशय
निर्विषं कुरु कुरु फट् स्वाहा ।
ॐ ह्रीं सर्वदुष्टग्रहान् निवारय फट् स्वाहा ॥
ॐ नमो हनुमते पवनपुत्राय वैश्वानरमुखाय
हन हन पापदृष्टिं षण्ढदृष्टिं हन हन
हनुमदाज्ञया स्फुर स्फुर फट् स्वाहा ॥
श्रीराम उवाच
हनुमान् पूर्वतः पातु दक्षिणे पवनात्मजः ।
प्रतीच्यां पातु रक्षोघ्न उत्तरस्यामब्धिपारगः ॥ १॥
उदीच्यामूर्ध्वगः पातु केसरीप्रियनन्दनः ।
अधश्च विष्णुभक्तस्तु पातु मध्ये च पावनिः ॥ २॥
अवान्तरदिशः पातु सीताशोकविनाशनः ।
लङ्काविदाहकः पातु सर्वापद्भ्यो निरन्तरम् ॥ ३॥
सुग्रीवसचिवः पातु मस्तकं वायुनन्दनः ।
भालं पातु महावीरो भ्रुवोर्मध्ये निरन्तरम् ॥ ४॥
नेत्रे छायाऽपहारी च पातु नः प्लवगेश्वरः ।
कपोलकर्णमूले तु पातु श्रीरामकिङ्करः ॥ ५॥
नासाग्रे अञ्जनीसूनुर्वक्त्रं पातु हरीश्वरः ।
वाचं रुद्रप्रियः पातु जिह्वां पिङ्गललोचनः ॥ ६॥
पातु दन्तान् फाल्गुनेष्टश्चिबुकं दैत्यप्राणहृत् ।
var ओष्ठं रामप्रियः पातु चिबुकं दैत्यकोटिहृत्
पातु कण्ठं च दैत्यारिः स्कन्धौ पातु सुरार्चितः ॥ ७॥
भुजौ पातु महातेजाः करौ तु चरणायुधः ।
नखान्नखायुधः पातु कुक्षिं पातु कपीश्वरः ॥ ८॥
वक्षो मुद्रापहारी च पातु पार्श्वे भुजायुधः ।
लङ्काविभञ्जनः पातु पृष्ठदेशे निरन्तरम् ॥ ९॥
नाभिञ्च रामदूतस्तु कटिं पात्वनिलात्मजः ।
गुह्मं पातु महाप्राज्ञः सृक्किणी च शिवप्रियः ॥ १०॥
ऊरू च जानुनी पातु लङ्काप्रासादभञ्जनः ।
जङ्घे पातु महाबाहुर्गुल्फौ पातु महाबलः ॥ ११॥
अचलोद्धारकः पातु पादौ भास्करसन्निभः ।
पादान्ते सर्वसत्वाढ्यः पातु पादाङ्गुलीस्तथा ॥ १२॥
सर्वाङ्गानि महावीरः पातु रोमाणि चात्मवान् ।
हनुमत्कवचं यस्तु पठेद्विद्वान् विचाक्षणः ॥ १३॥
स एव पुरूषश्रेष्ठो भक्तिं मुक्तिं च विन्दति ।
त्रिकालमेककालं वा पठेन्मासत्रयं सदा ॥ १४॥
सर्वान् रिपून् क्षणे जित्वा स पुमान् श्रियमाप्नुयात् ।
मध्यरात्रे जले स्थित्वा सप्तवारं पठेद्यदि ॥ १५॥
क्षयाऽपस्मारकुष्ठादितापत्रयनिवारणम् ।
आर्किवारेऽश्वत्थमूले स्थित्वा पठतिः यः पुमान् ॥ १६॥
अचलां श्रियमाप्नोति सङ्ग्रामे विजयी भवेत् ॥ १७॥
यः करे धारयेन्नित्यं स पुमान् श्रियमाप्नुयात् ।
विवाहे दिव्यकाले च द्यूते राजकुले रणे ॥ १८॥
भूतप्रेतमहादुर्गे रणे सागरसम्प्लवे ।
दशवारं पठेद्रात्रौ मिताहारी जितेन्द्रियः ॥ १९॥
विजयं लभते लोके मानवेषु नराधिपः ।
सिंहव्याघ्रभये चाग्नौ शरशस्त्रास्त्रयातने ॥ २०॥
शृङ्खलाबन्धने चैव काराग्रहनियन्त्रणे ।
कायस्तम्भे वह्निदाहे गात्ररोगे च दारूणे ॥ २१॥
शोके महारणे चैव ब्रह्मग्रहविनाशने ।
सर्वदा तु पठेन्नित्यं जयमाप्नोत्यसंशयम् ॥ २२॥
भूर्जे वा वसने रक्ते क्षौमे वा तालपत्रके ।
त्रिगन्धेनाथवा मस्या लिखित्वा धारयेन्नरः ॥ २३॥
पञ्चसप्तत्रिलौहैर्वा गोपितं कवचं शुभम् ।
गले कट्यां बाहुमूले वा कण्ठे शिरसि धारितम् ॥ २४॥
सर्वान् कामानवाप्नोति सत्यं श्रीरामभाषितम् ॥ २५॥
उल्लङ्घ्य सिन्धोः सलिलं सलीलं यः शोकवह्निं जनकात्मजायाः ।
आदाय तेनैव ददाह लङ्कां नमामि तं प्राञ्जलिराञ्जनेयम् ॥ २६॥
ॐ हनुमानञ्जनीसूनुर्वायुपुत्रो महाबलः ।
श्रीरामेष्टः फाल्गुनसखः पिङ्गाक्षोऽमितविक्रमः ॥ २७॥
उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशनः ।
लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा ॥ २८॥
द्वादशैतानि नामानि कपीन्द्रस्य महात्मनः ।
स्वापकाले प्रबोधे च यात्राकाले च यः पठेत् ॥ २९॥
तस्य सर्वभयं नास्ति रणे च विजयी भवेत् ।
धनधान्यं भवेत्तस्य दुःखं नैव कदाचन ॥ ३०॥
ॐ ब्रह्माण्डपुराणान्तर्गते नारद अगस्त्य संवादे ।
श्रीरामचन्द्रकथितपञ्चमुखे एकमुखी हनुमत् कवचम् ॥

संसार रूपी पाठशाला ---

 

संसार रूपी पाठशाला ---
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यह संसार एक पाठशाला है जहाँ सब एक पाठ पढ़ने के लिए आते हैं। वह पाठ निरंतर पढ़ाया जा रहा है। जो उसे नहीं सीखते वे दुःख और कष्टों द्वारा उसे सीखने के लिए बाध्य कर दिए जाते हैं। संसार में दुःख और कष्ट आते हैं, उनका एक ही उद्देश्य है -- मनुष्य को सन्मार्ग पर चलने को बाध्य करना। या तो अभी या फिर तीन-चार जन्मों के पश्चात। तब तक कई जन्म व्यर्थ चले जाते हैं।
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हर निष्ठावान व्यक्ति के समक्ष दो मार्गों में से अनिवार्य रूप से एक मार्ग चुनने का विकल्प अवश्य आता है, जहाँ तटस्थ नहीं रह सकते। एक तो ऊर्ध्वगामी मार्ग है, जो सीधा परमात्मा की ओर जाता है, दूसरा अधोगामी मार्ग है जो सांसारिक भोग विलास की ओर जाता है। अति तीव्र आकर्षण वाला यह अधोगामी मार्ग विष मिले हुए शहद की तरह है जो स्वाद में तो बहुत मीठा है पर अंततः कष्टमय और दुःखदायी है। इस अधोगामी आकर्षण को ही इब्राहिमी मज़हबों (यहूदीयत, ईसाईयत और इस्लाम) ने "शैतान" का नाम दिया है। "शैतान" कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि वासनाओं के प्रति वह अधोगामी आकर्षण ही है जिसे हम माया भी कह सकते हैं। इस माया की ओर आकर्षित होने वाले को तीन-चार कष्टमय जन्म व्यतीत हो जाने के पश्चात ही होश आता है, और उसे वह विकल्प फिर मिलता है।
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वह मार्गदर्शन सभी को मिलता है। कोई यदि यह कहे कि उसे कभी भी कोई मार्गदर्शन नहीं मिला है तो वह असत्य बोल रहा है।
सभी का कल्याण हो। ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३० दिसंबर २०२१

योगारूढ़ कौन है? --- .

 

योगारूढ़ कौन है? ---
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मेरी अनुभवजन्य निजी मान्यता है कि पूर्ण भगवत्-प्रेम के साथ जिसकी चेतना निरंतर आज्ञाचक्र से ऊपर सहस्त्रार में रहती है, ऐसा व्यक्ति ही योगारूढ़ हो सकता है। वह व्यक्ति प्रणम्य है, उसे प्रणाम करना चाहिए। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं --
"यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥६:४॥"
अर्थात् -- " जिस समय न इन्द्रियों के भोगों में तथा न कर्मों में ही आसक्त होता है, उस समय वह सम्पूर्ण संकल्पों का त्यागी मनुष्य योगारूढ़ कहा जाता है।"
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संकल्पों का त्याग सिर्फ इच्छा शक्ति से नहीं हो सकता। अजपा-जप का अभ्यास, और उनके द्वारा गीता में बताई हुई साधनाएं करते रहो। भगवान श्रीकृष्ण सब गुरुओं के गुरु हैं। उन से बड़ा गुरु कोई अन्य नहीं है। हर सांस पर उनका स्मरण करो। उन्हें निरंतर अपने हृदय में रखो। जिस दिन उन की कृपा होगी, सारा ज्ञान अपने आप ही प्राप्त हो जाएगा, और सारी साधनाएं भी अपने आप ही होने लगेंगी, और सिद्ध भी हो जायेंगी। आवश्यकता सिर्फ परमप्रेम और अभीप्सा की है।
ॐ तत्सत् !!
३० दिसंबर २०२१

मैं मुक्त हूँ ---

 

भगवान ने तो बहुत पहिले ही मेरी पदोन्नति कर दी थी, पर मैं स्वयं ही झूठे बहाने बनाकर मोह-माया के बंधनों में बंधा रहा। अब समय आ गया है, स्वयं को इन सब बंधनों से मुक्त करने का। कब तक दूसरों के पीछे-पीछे भागता रहूँगा? कब तक एक साधक और साधकत्व के भावों से ही बंधा रहूँगा? इनसे तो बहुत पहिले ही मुझे ऊपर उठ जाना चाहिए था?
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भगवान ने मुझे जहाँ भी और जैसे भी रखा है, वहीं पर मैं इसी क्षण से मुक्त हूँ। कोई बंधन, मुझ पर नहीं है। मैं सब बंधनों से परे हूँ। यह शरीर एक वाहन है, मेरे प्रारब्ध में जब तक इस पर लोकयात्रा करना लिखा है, तब तक करूँगा। उसके पश्चात का भी मुझे पता है, लेकिन अपना रहस्य किसी को क्यूँ दूँ? वह रहस्य, रहस्य ही रहना चाहिए। इसी क्षण से मेरा वर्तमान भी सबके लिए एक रहस्य ही रहेगा। मेरे लिए कोई पराया है ही नहीं। मैं सबके साथ एक हूँ।
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ॐ नमस्तुभ्यं नमो मह्यं तुभ्यं मह्यं नमोनमः। अहं त्वं त्वमहं सर्वं जगदेतच्चराचरम्॥
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२९ दिसंबर २०२१

हनुमान जी का ध्यान ---

 

"मनोजवं मारुततुल्यवेगमं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥"
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रामरक्षास्तोत्र से लिए हुए उपरोक्त मंत्र से ध्यान आरंभ करें। यह हनुमान जी का ध्यान मंत्र है, जो बहुत ही अधिक शक्तिशाली है। इसके ध्यान से बहुत गोपनीय अनुभूतियाँ होंगी, जिन्हें गोपनीय ही रखें। इसकी सफलता हमारी श्रद्धा और विश्वास पर निर्भर है। इस की विधि हनुमान जी की कृपा से समझ में आ जाएगी। इसका भावार्थ है ---
"जिनकी मन के समान गति और वायु के समान वेग है, जो परम जितेन्दिय और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, उन पवनपुत्र वानरों में प्रमुख श्रीरामदूत की मैं शरण लेता हूँ।"
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हे संकटमोचन पवनकुमार ! आप आनंद मंगलों के स्वरूप हैं। आप की जय हो॥
ॐ तत्सत् !!
२८ दिसंबर २०२१

सुखी होना स्वयं में यानि परमात्मा में स्थित होना है ---

 

सुखी होना स्वयं में यानि परमात्मा में स्थित होना है। यह एक मानसिक अवस्था है। सुखी होना वर्तमान में है, भविष्य में नहीं। श्रुति भगवती कहती है --"ॐ खं ब्रह्म।" 'खं' कहते है आकाश तत्व यानि परमात्मा को। जो परमात्मा से जितना समीप है, वह उतना ही सुखी है। जितने हम परमात्मा से दूर हैं, उतने ही दुःखी हैं। जो प्रभु से सब के कल्याण की प्रार्थना करता है, जो सब को सुखी और निरामय देखना चाहता है, सिर्फ वही सुखी है। प्रभु की सभी संतानें यदि सुखी होंगी, तभी हम सुखी हो सकते हैं, अन्यथा नहीं।
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आवरण और विक्षेप के रूप में माया तो अपना काम करेगी ही। हमें भी अपना काम भक्ति, शरणागति, समर्पण, अभ्यास, सत्संग और वैराग्य द्वारा निरंतर करते रहना चाहिए। रात्रि में सोने से पहिले, और प्रातः उठते ही भगवान का स्मरण, जप और ध्यान करें। निरंतर भगवान की स्मृति बनाये रखें। जब भी समय मिले खूब जप और ध्यान करें। जितना साधन हो सके उतना करें, बाकी शरणागत होकर भगवान को समर्पित कर दें। आगे का काम उनका है। भगवान का इतना चिंतन करें कि वे स्वयं हमारी चिंता करने लगें।
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दो साँसों के मध्य का हर क्षण दिव्य है। जब दोनों नासिकाओं से साँस चल रही है, वह सर्वश्रष्ठ समय/मुहूर्त होता है जिसका उपयोग भगवान की भक्ति/ध्यान आदि में करना चाहिए। ध्यान साधना के लिए यह आवश्यक है कि दोनों नासिकाओं से सांस चल रही हो। अन्यथा हम ध्यान नहीं कर सकते।
सभी को शुभ कामनाएँ और सप्रेम नमन ! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२८ दिसंबर २०२१
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पुनश्च: --- आपको इसकी अनुभूति करनी होगी। अपनी सूक्ष्म देह से परे परमात्मा की अनंतता पर ध्यान करे॥ "ख' को भूल जाएँ, और अनंत विस्तार में ॐ शब्द को सुनते हुए, ध्यान करे। "ख" शब्द प्रतीकात्मक मात्र है।