Saturday, 1 January 2022

हमारी भक्ति अनन्य-अव्यभिचारिणी और अनपायनी हो ---

 हमारी भक्ति अनन्य-अव्यभिचारिणी और अनपायनी हो ---

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मैंने एक बार लिखा था कि हमारे भगवान बड़े ईर्ष्यालु प्रेमी हैं, वे हमारा शत-प्रतिशत प्यार माँगते हैं| जरा सी भी कमी हो तो विमुख हो जाते हैं| और प्यार भी वे ऐसा माँगते हैं जिसमें निरंतर वृद्धि होती रहे| जैसे एक छोटे बच्चे को मनाते हैं, वैसे ही उन्हें भी मनाना पड़ता है| अब एक ऐसे विषय पर लिखने को मुझे बैठा दिया है जिस की पात्रता मुझ में बिलकुल भी नहीं है| फिर भी अपनी सीमित और अति-अति-अति-अल्प बुद्धि से कुछ न कुछ तो लिखूँगा ही, इज्ज़त का सवाल है| अपयश, यश और सारी महिमा उन्हीं की है|
"दीनदयाल सुनी जबतें, तब तें हिय में कुछ ऐसी बसी है|
तेरो कहाय के जाऊँ कहाँ मैं, तेरे हित की पट खैंचि कसी है||
तेरोइ एक भरोसो मलूक को, तेरे समान न दूजो जसी है|
ए हो मुरारि पुकारि कहौं अब मेरी हँसी नहीं तेरी हँसी है||"
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इस लेख में जो गीता के श्लोक दिये हैं, उन का स्वाध्याय तो पाठक को स्वयं ही करना होगा| भगवान ने मुझे समझने की योग्यता तो दी है पर समझाने की नहीं| समझ भी भगवान की कृपा से ही आती है| उतना ही लिख पाऊँगा जितना लिखने की प्रेरणा मिल रही है|
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सबसे पहिले गीता की बात करते हैं, फिर मानस की करेंगे| गीता में भगवान कहते हैं .....
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी|
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि||१३:११||"
अनन्य का अर्थ है .... जहाँ अन्य कोई नहीं है, जहाँ हमारे में और प्रत्यगात्मा में कोई भेद नहीं है| भगवान कहते हैं .....
"ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च|
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च||१४:२७||
अर्थात् मैं अमृत, अव्यय, ब्रह्म, शाश्वत धर्म, और ऐकान्तिक अर्थात् पारमार्थिक सुख की प्रतिष्ठा हूँ||
इसी भाव में स्थित होकर उनका ध्यान करना चाहिए| हम यह नश्वर देह नहीं, शाश्वत आत्मा हैं| उनमें समर्पित होने पर पृथक आत्मा का बोध भी नहीं रहता, वे ही वे रह जाते हैं और कर्ता भाव विलुप्त हो कर उपास्य, उपासना और उपासक वे स्वयं ही हो जाते हैं| ध्यान करते करते उपास्य के गुण उपासक में भी आ ही जाते हैं|
भक्ति में व्यभिचार वह है जहाँ भगवान के अलावा अन्य किसी से भी प्यार हो जाता है| भगवान हमारा शत-प्रतिशत प्यार माँगते हैं| हम जरा से भी इधर-उधर हो जाएँ तो वे चले जाते हैं| इसे समझना थोड़ा कठिन है| हम हर विषय में, हर वस्तु में भगवान की ही भावना करें, और उसे भगवान की तरह ही प्यार करें| सारा जगत ब्रह्ममय हो| ब्रह्म से पृथक कुछ भी न हो| यह अव्यभिचारिणी भक्ति है|
भगवान कहते हैं.....
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते|
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः||७:१९||"
इस स्थिति को हम ब्राह्मी स्थिति भी कह सकते हैं, जिसके बारे में भगवान कहते हैं .....
"विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः|
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति||२:७१||"
"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति|
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति||२:७२||"
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अब बात करेंगे "अनपायनी" भक्ति की| भक्ति अनपायनी हो, इसका अर्थ है कि उसमें "अपाय" न हो| अपाय का अर्थ .... कम होते होते नाश होना भी होता है, और श्वास भी होता है| हमारी भक्ति में निरंतर वृद्धि हो, कभी भी कोई कमी न हो| भगवान् के चरणों में हमारी भक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाये, कभी घटे नहीं|
"बार बार बर मागउं हरषि देहु श्रीरंग| पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग||"
प्रेम ऐसा होना चाहिए जो हर क्षण बढ़े, उसमें भी कोई कमी न आने पाये| यह अनपायिनी भक्ति है| यह भक्ति हर सांस के साथ बढ़ती है| यह परमप्रेम है जिसे ही भक्ति-सूत्रों में देवर्षि नारद ने "भक्ति" कहा है| भक्ति में हमें ..... धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष .... की भी कामना नहीं होनी चाहिए| हमें भगवान का सिर्फ और सिर्फ प्रेम चाहिए, अन्य कुछ भी नहीं| उनके प्रेम के अलावा कुछ भी कामना होने पर पतन प्रारम्भ हो जाता है|
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम|
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम||
अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरवान|
जनम–जनम रति रामपद यह वरदान न आन||
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यह अनन्य-अव्यभिचारिणी-अनपायनी भक्ति .... अनंत चैतन्य का द्वार है| वह भक्ति जागृत होती है परमप्रेम और गुरुकृपा सेे| भगवान के प्रति परमप्रेम जागृत होते ही मेरुदंड उन्नत हो जाता है, दृष्टिपथ स्वतः ही भ्रूमध्य पथगामी हो जाता है, व चेतना उत्तरा-सुषुम्ना (आज्ञाचक्र व सहस्त्रार के मध्य) में स्थिर हो जाती है| मेरुदंड में सुषुम्ना जागृत हो जाती है और वहाँ संचारित हो रहा प्राण-प्रवाह अनुभूत होने लगता है| कूटस्थ में ज्योतिर्मय ब्रह्म और अनाहत नाद भी अनुभूत होने लगते हैं|
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गुरु रूप में हे भगवान वासुदेव, आप की कृपा सदैव बनी रहे| मुझ अकिंचन के लाखों दोष व नगण्य गुण ..... सब आप को समर्पित हैं| आप से मेरी कहीं पर भी कोई पृथकता नहीं है| मेरा सर्वस्व आपका है, और मेरे सर्वस्व आप ही हैं| कभी कोई पृथकता का बोध न हो| आप ही मेरे योग-क्षेम हो| आपका यह वाक्य मुझे बहुत अधिक शक्ति देता है जिसमें आपने अनन्य भाव से उपासना करने को कहा है .....
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते|
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्||९:२२||"
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अनन्यभाव से युक्त होकर आपकी मैं आत्मरूप से निरन्तर निष्काम उपासना कर सकूँ| इतनी शक्ति अवश्य देना| मेरा सर्वस्व आपको समर्पित है|
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ जनवरी २०२०

हमारी समस्याएँ और उन का समाधान ---

 हमारी समस्याएँ और उन का समाधान ---

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स्वयं इस व्यक्ति की, राष्ट्र की, और विश्व की, सभी समस्याओं को मैं बहुत अच्छी तरह समझता हूँ| उनका समाधान क्या है? इसे भी अच्छी तरह जानता हूँ|
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आध्यात्मिक दृष्टि से इस सृष्टि की और हमारी सबसे बड़ी समस्या जो हर समस्याओं की मूल है, वह है --- हमारी परमात्मा से पृथकता|
उसका समाधान भी एक ही है| और वह है --- परमात्मा को समर्पण और आत्म-साक्षात्कार|
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इस दिशा में क्या करना चाहिए इसका उत्तर भी श्रीमद्भगवद्गीता, रामचरितमानस, और श्रीमद्भागवत् जैसे ग्रन्थों में बहुत अच्छी तरह दिया है| आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत किसी ब्रह्मनिष्ठ आचार्य महात्मा के सान्निध्य में रहकर उनसे मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिये|
जहाँ चाह वहाँ राह, जब जागो तभी सबेरा| ॐ तत्सत् !!
१ जनवरी २०२१

Thursday, 30 December 2021

"आत्म-ज्ञान" ही "मोक्ष" है ---

 "आत्म-ज्ञान" ही "मोक्ष" है ---

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भारत की सनातन हिन्दू परंपरा में मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ बताए गए हैं --- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष| पुरुषार्थ से तात्पर्य मनुष्य जीवन के लक्ष्य या उद्देश्य से है| इन्हें पुरुषार्थचतुष्टय भी कहते हैं| इनमें भी मोक्ष को परम पुरुषार्थ माना गया है| मोक्ष क्या है? यह प्रश्न मैंने अनेक मनीषियों से पूछा है, पर किसी के भी उत्तर से मुझे कभी संतुष्टि नहीं मिली| यथार्थ में संतुष्टि तो तभी मिलती है जब उत्तर स्वयं आत्मा से आता है| मैं तो यही मान बैठा था कि मोह का क्षय ही मोक्ष है| लेकिन मैं गलत था| जब तक पृथकता का बोध यानि द्वैत है, तब तक मोह का क्षय संभव नहीं है|
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१२ दिसंबर २०२० को दोपहर में मैं ध्यानमग्न था कि अचानक ही एक विचार बिजली की तरह अंतर्चेतना में कौंध गया, जिसने अंतर्चेतना में प्रकाश ही प्रकाश भर दिया| मुझे किसी ने मेरे अंतर में कहा कि ---
"जब दृष्टि, दृश्य और दृष्टा एक हो जाते हैं, कहीं कोई भेद नहीं रहता, --- वह एक विज्ञानमय सिद्धावस्था है| यह सिद्धावस्था ही मोक्ष है|"
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उसी समय गीता के दूसरे अध्याय का ७२वाँ श्लोक याद आया ---
"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति| स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति||२:७२||"
अर्थात् -- हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है| इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता| अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है||
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गीता में बताई हुई यह ब्राह्मी स्थिति ही मोक्ष है| यह ब्राह्मी यानी ब्रह्म में होने वाली स्थिति है| सब कर्मों का सन्यास कर के केवल ब्रह्मरूप से स्थित हो कर मनुष्य फिर कभी मोहित नहीं होता, यानि मोह को प्राप्त नहीं होता| अंतकाल में ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर मनुष्य ब्रह्म में लीन हो जाता है| यही मोक्ष है|
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इस ब्राह्मी स्थिति को ही योगिराज श्रीश्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय ने क्रिया की परावस्था कहा है| क्रियायोग साधकों के लिए क्रिया की परावस्था में स्थायी स्थिति ही मोक्ष है| इस मोक्षरूपी परम पुरुषार्थ में अभीप्सा न होने पर कोई भी मनुष्य न तो भक्ति कर सकता है, और न ही अन्य साधनों में प्रवृति कर सकता है|
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शुक्ल यजुर्वेद की काण्व शाखा के बृहदारण्यक उपनिषद के स्वाध्याय से यह विषय बहुत अच्छी तरह से समझ में आ सकता है| वहाँ ऋषि याज्ञवल्क्य के ब्रह्मज्ञान पर उपदेश ही उपदेश हैं जिनका स्वाध्याय जीवन में कम से कम एक बार तो करना ही चाहिए| याज्ञवल्क्य जी मैत्रेयी से कहते हैं ---
"आत्मा वा अरे द्रष्टव्य: श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य: |"
अर्थात् --- अरे यह आत्मा ही देखने (जानने) योग्य है, सुनने योग्य है, मनन करने योग्य है तथा निदिध्यासन (ध्यान) करने योग्य है||
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अथर्ववेद के माण्डूक्य उपनिषद में कहा गया है --- "अयमात्मा ब्रह्म" --- यानि "यह आत्मा ब्रह्म है"| ध्यान साधना के लिए यह महावाक्य है| यह आत्मज्ञान ही "मोक्ष" है|
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"ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्ण मुदच्यते| पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्ण मेवा वशिष्यते|"
ॐ शांति: शांति: शांतिः ||
ॐ सहनाववतु सहनौभुनक्तु सहवीर्यंकरवावहै तेजस्वि नावधीतमस्तु माविद्विषावहै||
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः||
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हम सब इस परम पुरुषार्थ "मोक्ष" को प्राप्त हों| इसी शुभ कामना के साथ आप सब महात्माओं को सप्रेम सादर प्रणाम !! 🙏🕉🙏
कृपा शंकर बावलिया
झुंझुनूं (राजस्थान)
१३ दिसंबर २०२०

Tuesday, 7 December 2021

भोजन विधि ---

 भोजन विधि ---

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हम जो कुछ भी खाते या पीते हैं, वह आहार हम नहीं खाते-पीते, बल्कि भगवान को अर्पित करते हैं, जिसे भगवान स्वयं वेश्वानर (जठराग्नि) के रूप में हमारे माध्यम से ग्रहण करते हैं; और उस से पूरी सृष्टि का भरण-पोषण होता है| अतः वही आहार ग्रहण करें जो भगवान को प्रिय है| उतना ही भोजन अपनी थाली में लें, जितना हम पूरी तरह खा सकें; जूठा छोड़ना -- भगवान का अपमान है| भोजन एक सोमयज्ञ है जिसमें हम भगवान को सोम की आहूति देते हैं| भगवान कहते हैं --
"अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः |
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ||१५:१४||"
प्राण और अपान वायु के संयोग से जठराग्नि बनती है, जिस के रूप में वैश्वानर भगवान स्वयं हमारी देह में भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य अन्न रूपी सोम को पचाते हैं| इस से सम्पूर्ण सृष्टि के प्राणियों का भरण-पोषण होता है|
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गीता में बताए हुए निम्न मंत्र का पाठ कर के ही भोजन करना चाहिए ---
" ॐ ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् |
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ||४:२४||"
अर्थात् अर्पण (अर्पण करने का साधन श्रुवा) ब्रह्म है, और हवि (शाकल्य अथवा हवन करने योग्य द्रव्य) भी ब्रह्म है; ब्रह्मरूप अग्नि में ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा जो हवन किया गया है, वह भी ब्रह्म ही है| इस प्रकार ब्रह्मरूप कर्म में समाधिस्थ पुरुष का गन्तव्य भी ब्रह्म ही है||
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जो परमात्मा के मातृ रूप भगवती अन्नपूर्णा के भक्त हैं, वे अन्नपूर्णा स्तोत्र के निम्न भाग का पाठ कर अन्नपूर्णा से माँगे हुए भिक्षान्न के रूप में भोजन करते हैं ---
"अन्नपूर्णे सदा पूर्णे शंकरप्राणवल्लभे |
ज्ञान वैराग्य-सिद्ध्‌यर्थं भिक्षां देहिं च पार्वति ||"
"भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी माताऽन्नपूर्णेश्वरी ||"
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जो मैंने संत-महात्माओं के प्रवचनों में सुना है, उसके अनुसार पञ्च-प्राणों को मानसिक रूप से आहुति देकर --- "ॐ प्राणाय स्वाहा | ॐ अपानाय स्वाहा | ॐ व्यानाय स्वाहा | ॐ उदानाय स्वाहा | ॐ समानाय स्वाहा |" --- प्रथम पाँच ग्रास उपरोक्त मंत्रों के साथ करने चाहियें| कम से कम प्रथम ग्रास तो -- "ॐ प्राणाय स्वाहा" -- मंत्र के साथ लेना ही चाहिए|
भोजन से पूर्व "˙ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा" मंत्र बोलकर जल से आचमन करना चाहिए, और भोजन के उपरांत "ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा" मंत्र से भी आचमन करना चाहिए|
भोजन बनाने वाले को चाहिए कि जब भोजन बन जाये तब भोजन के बहुत ही छोटे-छोटे तीन ग्रास लेकर तीन बार निम्न मंत्रों के साथ अग्नि को जिमाये --- "ॐ भूपतये स्वाहा", "ॐ भुवनपतये स्वाहा", "ॐ भूतानां पतये स्वाहा"|
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अनेक विद्वान ब्राह्मण, कृष्ण यजुर्वेद के निम्न शांति मंत्र का पाठ कर के ही भोजन करते हैं -
"ॐ सह नाववतु | सह नौ भुनक्तु | सह वीर्यं करवावहै | तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै || ॐ शांति शांति शांति ||"
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सार की बात :--- भोजन शांतिपूर्वक, मौन होकर, सिर्फ भगवान का चिंतन करते हुए, पूर्ण प्रेम पूर्वक, इस भाव से ही करना चाहिये कि यह भोजन भगवान स्वयं ही ग्रहण कर रहे हैं|
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इस लेख का समापन वैदिक शांतिमंत्र से ही करता हूँ ---
"ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।। ॐ शांति, शांति, शांति ||"
कृपा शंकर
८ दिसंबर २०२०
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पुनश्च: --- भगवान को क्या प्रिय है? भगवान कहते हैं ---
"पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति| तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः||९:२६||"
अर्थात् जो भक्त मुझे पत्र, पुष्प, फल, और जल आदि कुछ भी वस्तु भक्तिपूर्वक देता है, उस प्रयतात्मा -- शुद्धबुद्धि भक्त के द्वारा भक्तिपूर्वक अर्पण किये हुए वे पत्र पुष्पादि मैं (स्वयं) खाता हूँ अर्थात् ग्रहण करता हूँ||
भक्तों को केवल अपुनरावृत्तिरूप अनन्त फल मिलता है, और वे अपनी आराधना भी भी सुखपूर्वक कर सकते हैं|

यमराज का सदा स्वागत है ---

 यमराज जी का सदा स्वागत है; जब भी उन को फुर्सत हो, बड़े आराम से अपनी सुविधानुसार कभी भी आ जायें। हर समय उनके साथ चलने को तैयार हैं ---

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जब कान के पास के बाल सफ़ेद हो जाएँ तब सचेत हो जाना चाहिए क्योंकि कानों के पास के बालों का सफ़ेद होना यमराज का एक सन्देश है कि मैं कभी भी आ सकता हूँ। महाराजा दशरथ ने एक बार दर्पण में अपना मुख देखा तो कानों के पास सफ़ेद बाल दिखाई दिए। उन्होंने तुरंत ही राम के राज्याभिषेक की तैयारी आरम्भ कर दी।
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कहते हैं कि यमराज जब किसी के प्राण हरने आते हैं तो उनके भैंसे के गले में बंधी घंटी की ध्वनि मरने वाले को सुनाई देने लगती है। उसकी ध्वनि इतनी कर्णकटु होती है कि वह घबरा जाता है और विगत का पूरा जीवन उसको सिनेमा की तरह दिखाई देने लगता है। उसी चेतना में यमराज उसके गले में फंदा डालकर उस को देहचेतना से मुक्त कर देते हैं। फिर उसे बहुत अधिक कष्ट झेलने पड़ते हैं।
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यमराज के भैंसे के गले में बंधी घंटी की ध्वनी सुने इससे पहिले ही ओंकार की ध्वनी को या राम नाम की ध्वनी को निरंतर सुनने का अभ्यास आरम्भ कर देना चाहिए। आप किसी बड़े मंदिर में जाते हैं तो वहाँ एक बड़ा घंटा लटका रहता है जिसे जोर से बजाने पर उसकी ध्वनी का स्पंदन बहुत देर तक सुनाई देता है| कल्पना करो कि ऐसे ही किसी घंटे से ओंकार की या रामनाम की ध्वनि निरंतर आ रही है। उस ध्वनी को सुनने और उस पर ध्यान करने का नित्य नियमित अभ्यास करो। यह ध्वनि ही हमें मुक्ति दिला सकती है। अन्यथा एक बार यमराज के भैंसे के गले की घंटी सुन गयी तो फिर अंत समय में अन्य कुछ भी सुनाई नहीं देगा।
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जिन का कभी जन्म ही नहीं हुआ, अभी से उन मृत्युंजयी भगवान शिव का ध्यान स्वयं शिवमय होकर करना आरम्भ कर दो। यमराज फिर हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। "चन्द्रशेखर माश्रये मम किं करिष्यति वै यमः?" कितनी शीतलता और दिव्यता है भगवान शिव में!! वे भगवान चन्द्रशेखर शिव सदा हमारे में व्यक्त हों। ॐ नमः शिवाय॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
६ दिसंबर २०२१

मेरा अभ्युदय और निःश्रेयस ही सारी सृष्टि का अभ्युदय और निःश्रेयस है ---

 मेरा अभ्युदय और निःश्रेयस ही सारी सृष्टि का अभ्युदय और निःश्रेयस है ---

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धर्म और राष्ट्र के उत्थान हेतु प्रत्येक सच्चे भारतीय को परमात्मा पर ध्यान के द्वारा अपनी दीनता और हीनता का परित्याग कर अपने निज देवत्व को जागृत करना होगा। हम अपनी क्षुद्रात्मा पर परिछिन्न माया के आवरण को साधना द्वारा हटा कर संकल्प करें कि ध्यान-साधना में अनुभूत ज्योतिर्मय नाद-ब्रह्म रूपी सर्वव्यापी कूटस्थ सूर्य मैं ही हूँ, जिसका पूर्ण प्रकाश, ज्योतियों की ज्योति - ज्योतिषांज्योति है। मेरे ही संकल्प से सम्पूर्ण संसार का विस्तार हुआ है। जब मैं सांस लेता हूँ तो सारा ब्रह्मांड साँस लेता है, जब मैं साँस छोड़ता हूँ, तब सम्पूर्ण ब्रह्मांड साँस छोड़ता है। मेरा अभ्युदय और निःश्रेयस ही सारी सृष्टि का अभ्युदय और निःश्रेयस है। परमात्मा की अनंतता और उससे परे जो कुछ भी है, वह मैं ही हूँ, यह नश्वर देह नहीं। मेरे से परे कुछ भी नहीं है। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
७ दिसंबर २०२१

Monday, 6 December 2021

मेरा एकमात्र संबंध परमात्मा से है, अन्य सब लोकाचार मात्र है ---

 मेरा एकमात्र संबंध परमात्मा से है, अन्य सब लोकाचार मात्र है ---

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भगवान की भक्ति ही इस जीवन की एकमात्र उपलब्धि है। सारे पारिवारिक व सामाजिक सम्बन्धों में, और बड़ी बड़ी ज्ञान की बातों में अब कोई रस नहीं आता। इन तिलों में अब कोई तेल नहीं है। इस लौकिक जीवन में मेरे साथ बहुत ही अधिक छल-कपट, ठगी और विश्वासघात हुआ है। पता नहीं किस जन्म के किए हुए पापों का फल था। मैं तो मानता हूँ कि इस से मेरे कर्म ही कटे हैं, इसलिए कोई पछतावा नहीं है।
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मुझे निमित्त-मात्र बनाकर भगवान वासुदेव हर समय मेरे समक्ष रहते हैं, और एक क्षण के लिए भी ओझल नहीं होते। वे स्वयं ही स्वयं की उपासना करते हैं। ध्यान साधना में पाता हूँ कि मैं तो कहीं हूँ ही नहीं, स्वयं भगवान वासुदेव ही अपने परमशिव रूप का या नारायण रूप का कूटस्थ में ध्यान कर रहे हैं। जब तक वे इस देह में प्राण रूप में हैं, तब तक वे ही इस देह के स्वामी हैं। मेरे लिए इससे बड़ी कोई अन्य उपलब्धि नहीं हो सकती, यह मनुष्य जीवन की बड़ी से बड़ी उपलब्धि है जो मुझे अनायास ही प्राप्त हो गई है।
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भगवान कहते हैं --
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥७:१८॥"
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥"
अर्थात् - (यद्यपि) ये सब उत्कृष्ट हैं, परन्तु ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है ऐसा मेरा मत है, क्योंकि वह स्थिर बुद्धि ज्ञानी अति उत्तम गतिस्वरूप मुझमें अच्छी प्रकार स्थित है॥ बहुत जन्मोंके अन्तमें अर्थात् मनुष्यजन्ममें 'सब कुछ परमात्मा ही है', ऐसा जो ज्ञानवान् मेरे शरण होता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है॥
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निज अस्तित्व का हरेक कण उन्हें समर्पित है। स्वयं के लिए तो बस उनकी कृपा ही पर्याप्त है। और कुछ भी मेरे पास नहीं है। सब कुछ उनका है। अंत में यह कहना चाहता हूँ कि मेरा एकमात्र संबंध परमात्मा से है, अन्य सब लोकाचार मात्र है। किसी पूर्व जन्म का कोई संस्कार रहा होगा, इसी से इस जन्म में ये सब संबंधी, मित्र और परिचित बने। वास्तव में परमात्मा को छोड़कर अन्य किसी से मेरा कुछ भी लेना-देना नहीं है। यह शरीर रहे या न रहे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
५ दिसंबर २०२१