Tuesday, 26 October 2021

मनुष्य का वास्तविक सौंदर्य उसके संस्कारों में है, शरीर में नहीं ---

 मनुष्य का वास्तविक सौंदर्य उसके संस्कारों में है, शरीर में नहीं ---

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किसी भी समाज के लोगों के विचार और भावनाओं को समझ कर उस समाज के बारे में हम सब कुछ जान सकते हैं। मनुष्य का सौंदर्य उसके संस्कारों में है, शरीर में नहीं। किसी भी मनुष्य की चैतन्य आत्मा ही स्थायी रूप से हमें प्रभावित कर सकती है, उसका शारीरिक सौंदर्य नहीं। यदि हम अपने भीतर के सौंदर्य -- "परमात्मा" -- को जान लें तो सब कुछ जान लिया।
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भारत की आत्मा "धर्म" है, अधर्म नहीं। हम सब शाश्वत आत्मा हैं, जिसका सर्वोपरी धर्म है -- परमात्मा को जानना यानि भगवत्-प्राप्ति। यह भगवत्-प्राप्ति ही सत्य-सनातन-धर्म है। यही भारत की अस्मिता और प्राण है। सनातन-धर्म के बिना भारत पूरी तरह नष्ट हो जाएगा।
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भारत का वैचारिक और भावनात्मक पतन बहुत तेजी से हो रहा है। बचने के उपायों पर देश के वे प्रबुद्ध जन विचार करें जिन के हाथों में सत्ता है। भारत के लोग बहुत अधिक भोगी व स्वार्थी हो चुके हैं। हमारी त्याग-तपस्या की भावना निरंतर क्षीण होती जा रही है। हमारी पारिवारिक व्यवस्था लगभग नष्ट हो चुकी है। अपनी रक्षा तो हमें स्वयं को ही करनी होगी।
ॐ तत्सत्
कृपा शंकर
२२ अक्तूबर २०२१

आत्मा में तो अभीप्सा है, लेकिन मन और बुद्धि में नहीं ---

 आत्मा में तो अभीप्सा है, लेकिन मन और बुद्धि में नहीं ---

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परमात्मा से साक्षात्कार हर आत्मा चाहती है, लेकिन मन और बुद्धि विषय-वासनाओं में लिप्त है। इस विषय-वासना को वेदान्त-वासना में परिवर्तित कर के हम आत्माराम कैसे बनें? यह एक बहुत बड़ी ज्वलंत व्यवहारिक समस्या है।
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इसका उत्तर श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बड़े स्पष्ट रूप से दिया है जिसे पढ़कर बुद्धि वाह-वाह तो कर देती है, लेकिन अनुसरण नहीं करती। हर सदविचार से विद्रोह तो मन उसी समय कर देता है। उपनिषदों में सारा ज्ञान भरा पड़ा है, जिसे समझ कर हम उत्साहित तो हो जाते हैं, पर हमारे मन और बुद्धि उस दिशा में हमें बिलकुल भी नहीं बढ़ने देते।
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इसका समाधान क्या है? एकमात्र समाधान है -- हम अपने मन और बुद्धि को परमात्मा में प्रतिष्ठित करें। दूसरे शब्दों में परमात्मा को ही मन और बुद्धि पर शासन करने दें। इसके लिए भगवान से प्रार्थना भी करनी होगी और ऐसी आत्माओं से सत्संग भी करना होगा जो वास्तव में महान हैं। महान वो है जो महत्-तत्व यानि परमात्मा से जुड़ा है। भगवान का निरंतर स्मरण, और शरणागति द्वारा समर्पण का निरंतर प्रयास -- ये ही समाधान हैं, अन्य कुछ भी नहीं।
आप सब में अभिव्यक्त हो रहे परमात्मा को नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२२ अक्तूबर २०२१

परमात्मा के लिए अभीप्सा यानि एक अतृप्त प्यास, तड़प, और प्रचंड अग्नि सदा ह्रदय में प्रज्ज्वलित रहे ---

 परमात्मा के लिए अभीप्सा यानि एक अतृप्त प्यास, तड़प, और प्रचंड अग्नि सदा ह्रदय में प्रज्ज्वलित रहे ---

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हृदय में परमात्मा की उपस्थिति का निरंतर आभास रहे, यही उपासना है, यही सर्वोपरी साधना है। उपास्य के गुण उपासक में आये बिना नहीं रहते। परमात्मा की प्राप्ति की तड़प में समस्त इच्छाएँ विलीन हों, और अवचेतन मन में छिपी सारी वासनाएँ नष्ट हों। जब भी समय मिले भ्रूमध्य से सहस्त्रार के मध्य में ब्रह्मरंध्र तक पूर्ण भक्ति के साथ ध्यान कीजिये। निष्ठा और साहस के साथ हर बाधा को पार करने में समर्थ हो जाएँगे। परमात्मा से सिर्फ परमात्मा के पूर्ण प्रेम के लिए ही प्रार्थना करें। अन्य प्रार्थनाएँ व्यर्थ और महत्वहीन हैं। परमात्मा की शक्ति सदा हमारे साथ है। उससे जुड़कर ही हमारे सभी शिव-संकल्प पूर्ण हो सकते हैं, अन्यथा नहीं।
ॐ तत्सत् ॥ ॐ ॐ ॐ ॥
कृपा शंकर
२२ अक्तूबर २०२१

उस्मानिया सल्तनत को किसने हराया ? ---

सल्तनत-ए-उस्मानिया (Ottoman Empire) (सन १३५० ई. से सन १९१८ ई.) को प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय हिन्दू सैनिकों ने ही हराया था। अंग्रेजों में इतना साहस नहीं था कि वे तुर्कों या जर्मनों से सीधे युद्ध कर सकें। फिर भी श्रेय ब्रिटेन को ही मिला क्योंकि भारत उस समय ब्रिटेन के आधीन था।

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सीधे युद्ध में तुर्कों और जर्मनों ने अंग्रेजों को सदा ही बहुत बुरी तरह पीटा था। अंग्रेज़ उनसे डरते थे। अंग्रेजों द्वारा युद्ध में चारे की तरह हमेशा भारतीय सैनिकों को ही आगे रखा जाता था। अंग्रेजों की विजय के पीछे सदा भारतीय सैनिकों का बलिदान था। तुर्की और जर्मनी सदा मित्र थे और उन्होने आपस में सदा मित्रता निभाई।
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यूरोप के ईसाईयों और उस्मानिया सल्तनत के मुसलमानों के मध्य तीन बहुत बड़े भयंकर खूनी मज़हबी युद्ध हुए थे, जिनमें सदा यूरोप के ईसाई ही हारे। यूरोप के उन ईसाईयों को अरबों ने नहीं, उत्तरी अफ्रीका के लड़ाकों ने हराया था जो कालांतर में मुसलमान बन गए थे। अरब तो उस समय तुर्कों के गुलाम थे, उनका कोई योगदान नहीं था। उत्तरी अफ्रीका के मुसलमान, इस्लाम के आगमन से पूर्व हिन्दू धर्म को मानते थे।
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उस्मानिया सल्तनत का कोई भी खलीफा कभी हज करने नहीं गया, यद्यपि मक्का-मदीना सहित पूरा अरब उनके आधीन था। एक बार सऊदी अरब के बादशाह ने स्वयं को स्वतंत्र करना चाहा तो तुर्क सेना सऊदी बादशाह और मुख्य इमाम को जंजीरों से बांधकर इस्तांबूल ले गई और इस्तांबूल की हागिया सोफिया शाही मस्जिद के सामने सऊदी बादशाह का सिर कलम कर दिया। वहाँ उपस्थित हजारों की भीड़ ने तालियाँ बजाई और पटाखे छोड़े। मुख्य इमाम का सिर मुख्य बाज़ार में कलम किया गया। यही एक कारण है कि अरबों के दिल में तुर्कों के प्रति एक घृणा का भाव अभी भी है।
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भारत में जिन मुसलमान बादशाहों ने राज्य किया वे सभी मूल रूप से तुर्क ही थे। मुगल लोग उज्बेकिस्तान से आए थे जो उस्मानिया सल्तनत का एक भाग था।
ईसाईयों ने निरंतर संघर्ष जारी रखा और यूरोप में इस्लाम का प्रवेश नहीं होने दिया। उन्होने विश्व के अधिकांश भागों में छल से ईसाईयत को फैलाया।
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हिंदुओं को अपने मंदिरों में प्रवेश की अनुमति सिर्फ हिन्दू श्रद्धालुओं को ही देनी चाहिए। जिनकी श्रद्धा हिन्दू धर्म में नहीं है, उनका प्रवेश हिन्दू मंदिरों में निषिद्ध हो।
२२ अक्तूबर २०२१

मेरा तो एक ही धर्म है, और वह है -- "भगवत्-प्राप्ति", अन्य कुछ भी मेरा धर्म नहीं है ---

 मेरा तो एक ही धर्म है, और वह है -- "भगवत्-प्राप्ति", अन्य कुछ भी मेरा धर्म नहीं है। यही मेरे मन की एकमात्र भावना और प्रार्थना है ---

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भगवान के प्रेम में खड़ा हूँ तो एक विशाल वृक्ष की तरह खड़ा हूँ, कोई भी झंझावात उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इतनी तो हरिःकृपा मुझ अकिंचन पर बनी रहे। यदि गिरूँगा तो एक बीज की तरह ही गिरूँगा जो पुनश्च उग आता है।
जन्म-मृत्यु, भूख-प्यास, श्रम-कष्ट , भय-तृष्णा -- ये तो इस शरीर के धर्म हैं, मेरे नहीं। मेरा तो एक ही धर्म है, और वह है -- "भगवत्-प्राप्ति"। अन्य कुछ भी मेरा धर्म नहीं है।
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भगवान की पूर्णता -- उनका जगन्माता का स्वरूप है, जिसने इस पूरी सृष्टि को धारण किया हुआ है। वे भी अंततः परमशिव में विलीन हो जाती हैं। वे मुझे अपनी स्मृति में इतना तन्मय रखें कि कभी पराभूत नहीं होना पड़े। मुझ अकिंचन में तो इतनी सामर्थ्य नहीं है कि उनका निरंतर स्मरण कर सकूँ। वे ही मुझे भगवद्-दृष्टि प्रदान करें, सदा अपनी स्मृति में, हर तरह के मोह-माया से मुक्त रखें।
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जो हुआ सो हुआ और होकर चला भी गया। अब इसी क्षण से यह जीवन मङ्गलमय और धन्य हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ अक्तूबर २०२१

सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण कैसे होगा? ---

 काल की गति पर पूर्ण नियंत्रण सिर्फ भगवान का है। इस समय काल की गति ऊर्ध्वमुखी है, अतः इस आरोह-काल में मनुष्य की चेतना का भी निरंतर उत्थान और विस्तार हो रहा है। जिस दिन आत्मा की शाश्वतता और कर्मफलों की प्राप्ति हेतु पुनर्जन्म का सत्य , जन-सामान्य को समझ में आने लगेगा, उसी दिन से सत्य-सनातन-धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा सम्पूर्ण विश्व में होने लगेगी। सत्य-सनातन-धर्म सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त होगा, और असत्य का अंधकार दूर होगा।

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भगवान की सर्वोत्तम और सर्वाधिक अभिव्यक्ति भारतभूमि में हुई है। अतः भारत निश्चित रूप से एक सत्य-सनातन-धर्मनिष्ठ अखंड हिन्दू राष्ट्र बनेगा। भारत में छाया असत्य का अंधकार दूर होगा, और सनातन-धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण होगा। वह दिन देखने के लिए मैं जीवित रहूँ या नहीं, लेकिन उस घटना का साक्षी अवश्य रहूँगा। सनातन धर्म का आधार ही -- आत्मा की शाश्वतता, कर्मफलों की प्राप्ति हेतु पुनर्जन्म, और भगवत्-प्राप्ति है।
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अपनी वर्तमान आयु और अवस्था में अब भगवत्-प्राप्ति को ही अपना एकमात्र धंधा बना लिया है। इस धंधे में केवल भगवान ही सम्मिलित हैं, और कोई भी अन्य नहीं है। सारी साधनाएँ और उपासना इसी धंधे का भाग हैं। सारा नफा-नुकसान भी भगवान का है, अन्य किसी से कुछ भी लेना-देना नहीं है। मैं रहूँ या न रहूँ, इसका भी कोई महत्व नहीं है। मेरी चेतना में एकमात्र अस्तित्व भगवान का ही रहे। इस समय मेरी आयु आधिकारिक रूप से ७५ वर्ष है, अतः यही धंधा मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ है।
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सभी को मंगलमय शुभ कामनाएँ और नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२४ अक्तूबर २०२१

सत्यधर्मनिष्ठ क्षत्रिय ही देश की रक्षा, और सुशासन दे सकते हैं ---

 सत्यधर्मनिष्ठ क्षत्रिय ही देश की रक्षा, और सुशासन दे सकते हैं।

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अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए हिंदुओं को एक ब्रहमतेज के साथ-साथ क्षात्रबल भी जागृत कर अपना सैन्यीकरण करना होगा। क्षत्रियत्व ही वास्तव में देश की रक्षा कर सकता है। हिन्दू जाति शस्त्र धारण करे। सभी हिंदुओं के पास आत्मरक्षा हेतु अस्त्र-शस्त्र हों, और उनका प्रयोग करना भी आता हो। सरकार को बाध्य किया जाये कि वह नियमों में परिवर्तन करे, और हिंदुओं को अस्त्र-शस्त्र रखने और धर्मरक्षा का अधिकार दे। सत्यधर्मनिष्ठ क्षत्रिय ही देश की रक्षा और सुशासन दे सकते हैं।
२५ अक्तूबर २०२१