Tuesday, 12 October 2021

अपने भीतर के अंधकार को दूर करो, तभी बाहर का अंधकार दूर होगा ---

 

हम सब धीरे-धीरे अंधकार से प्रकाश की ओर जा रहे हैं| दिन-प्रतिदिन असत्य का अंधकार थोड़ा-थोड़ा दूर हो रहा है| विगत दो हजार वर्षों का समय अंधकार और असत्य का था| अब उस में शनैः शनैः बाहर निकल रहे हैं| अब भी चारों ओर, बहुत अधिक असत्य, झूठ-कपट, और अन्याय है, जिन का प्रतिरोध करने की सामर्थ्य हमारे में नहीं है|
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भगवान से प्रार्थना की तो यही उत्तर मिला कि सर्वप्रथम अपने भीतर के अंधकार को दूर करो, तभी बाहर का अंधकार दूर होगा| सर्वव्यापी ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करो, नाद-श्रवण करो, और परमात्मा को पूर्ण समर्पण करो|
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हमारे कूटस्थ-चैतन्य में परमात्मा नित्य हैं| उन्हें ढूँढने कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं है| कूटस्थ-चैतन्य ही हमारा हृदय है जहाँ परमात्मा नित्य निरंतर बिराजमान हैं| कमी है तो हमारे उत्साह और प्रयास में ही है, अन्यत्र कहीं कोई कमी नहीं है| अपनी कमी स्वयं को ही दूर करनी होगी|
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१३ अक्टूबर २०२०

Monday, 11 October 2021

सिर्फ परमात्मा (ब्रह्म) ही सत्य है ---

 सिर्फ परमात्मा (ब्रह्म) ही सत्य है .....

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सिर्फ परमात्मा ही सत्य हैं| यह आभासीय जगत उनका एक लीला-विलास है| हम एक शाश्वत-आत्मा, परमात्मा का अंश ही नहीं, उनके साथ एक हैं| हमारा कोई पृथक अस्तित्व नहीं है| हमारे चैतन्य में सिर्फ परमात्मा ही रहें|
गीता में भगवान कहते हैं .....
"समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः| ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्||९:२९||"
अर्थात् मैं समस्त भूतों में सम हूँ; न कोई मुझे अप्रिय है और न प्रिय; परन्तु जो मुझे भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें और मैं भी उनमें हूँ||
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"ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः| मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति||१५:७||"
अर्थात् इस जीव लोक में मेरा ही एक सनातन अंश जीव बना है| वह प्रकृति में स्थित हुआ (देहत्याग के समय) पाँचो इन्द्रियों तथा मन को अपनी ओर खींच लेता है अर्थात् उन्हें एकत्रित कर लेता है||
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गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं ...
"ईश्वर अंश जीव अविनाशी चेतन विमल सहज सुख राशी |
सो माया वश भयो गोसाईं बंध्यो जीव मरकट के नाहीं ||"
अर्थात् जैसे बन्दर मुट्ठी बाँध के संकड़े मुँह वाले बर्तन में खुद ही फँसता है, वैसे ही जीव भी स्वयं की मान्यताओं से फँस जाता है|
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हमारा एकमात्र अस्तित्व परमात्मा है, हमारा एकमात्र संबंध परमात्मा से है, और हम परमात्मा से पृथक नहीं हैं| हमारा मत-मतांतर, हमारा सिद्धान्त, हमारा धर्म, हमारा सर्वस्व परमात्मा ही है| उस से पृथक कुछ भी नहीं है| जैसे समुद्र में जल की एक बूंद होती है, वैसे हम भी इस महासागर के अंश और स्वयं यह महासागर हैं|
ॐ तत्सत् || ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१२ अक्तूबर २०२०

 यज्ञ क्या है? और उसे कैसे करे? ---

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यज्ञ एक धार्मिक कृत्य है, पर जैसा मुझे समझ में आया है, उसके अनुसार ... जो भी कार्य समष्टि के कल्याण और परोपकार के लिए किया जाता है, वह "यज्ञ" है| समष्टि के लिए सर्वश्रेष्ठ कार्य जो कोई कर सकता है वह है ..... परमात्मा से अहैतुकी परमप्रेम, और समर्पण| यहाँ हम अपने मानित्व/अहं की आहुति परमात्मा को देते हैं| जब अहं समाप्त हो जाता है तब केवल परमात्मा ही बचते हैं| यही समष्टि की सबसे बड़ी सेवा और सबसे बड़ा यज्ञ है|
गीता में भगवान कहते हैं ...
"ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्| ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना||४:२४||"
अर्थात् अर्पण (अर्थात् अर्पण करने का साधन श्रुवा) ब्रह्म है, और हवि (शाकल्य अथवा हवन करने योग्य द्रव्य) भी ब्रह्म है, ब्रह्मरूप अग्नि में ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा जो हवन किया गया है, वह भी ब्रह्म ही है| इस प्रकार ब्रह्मरूप कर्म में समाधिस्थ पुरुष का गन्तव्य भी ब्रह्म ही है||
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने यज्ञों में स्वयं को "जपयज्ञ" बताया है ....
"महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्| यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः||१०:२५||"
अर्थात् मैं महर्षियों में भृगु और वाणी (शब्दों) में एकाक्षर ओंकार हूँ| मैं यज्ञों में जपयज्ञ और स्थावरों (अचलों) में हिमालय हूँ||"
अग्नि पुराण के अनुसार ..... "जकारो जन्म विच्छेदः पकारः पाप नाशकः| तस्याज्जप इति प्रोक्तो जन्म पाप विनाशकः||"
इसका अर्थ है .... ‘ज’ अर्थात् जन्म मरण से छुटकारा, ‘प’ अर्थात् पापों का नाश ..... इन दोनों प्रयोजनों को पूरा कराने वाली साधना को ‘जप’ कहते हैं|
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जहां तक मुझे समझ में आया है, ओंकार का निरतर मानसिक श्रवण और मानसिक जप ही वह यज्ञ है, जिसे भगवान श्रीकृष्ण बता रहे है| जिसे भगवान श्रीकृष्ण बता रहे हैं, वह ही निजी स्तर पर किया हुआ श्रेष्ठतम यज्ञ है
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इस जीवन में माता पिता की सेवा और सम्मान प्रथम यज्ञ है| उसके बिना अन्य यज्ञ सफल नहीं होते| वे लोग भाग्यशाली हैं जिन्हें माता पिता की सेवा का अवसर मिलता है| माता पिता का तिरस्कार करने वाले से उसके पितृगण प्रसन्न नहीं होते| उसके घर में कोई सुख शांति नहीं होती और उसके सारे यज्ञ-कर्म विफल होते हैं|
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इस ग्रह पृथ्वी के देवता 'अग्नि' हैं| अग्नि का अर्थ ऊर्जा भी होता है| भूगर्भ में जो अग्नि रूपी ऊर्जा है उस के कारण, और सूर्य से प्राप्त ऊर्जा के कारण ही इस पृथ्वी गृह पर जीवन है| भूगर्भस्थ अग्नि के कारण ही हमें सब प्रकार के रत्न, धातुएँ और वनस्पति प्राप्त होती हैं| ऋग्वेद का प्रथम मंत्र कहता है .....
"ॐ अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् | होतारं रत्नधातमम् ||"
यहाँ अग्नि का अर्थ ऊर्जा भी है| पुरोहित का अर्थ होता है जो इस पुर का हित देखता है| लौकिक रूप से इस पृथ्वी लोक पर परमात्मा का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक "अग्नि" है, उसी की ऊर्जा हमें जीवित रखती है| उस "अग्नि" में हम समष्टि के कल्याण के लिए कुछ विशिष्ट मन्त्रों के साथ आहुतियाँ देते हैं वह भी यज्ञ का एक रूप है| अग्नि देवता इस पृथ्वी के सबसे बड़े पुरोहित हैं|
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आजकल जिसे क्रियायोग कहते हैं उसमें विशिष्ट विधि द्वारा प्राण में अपान, और अपान में प्राण कि आहुतियाँ देते हैं| यह क्रियायोग भी एक यज्ञ है|
"अपाने जुह्वति प्राण प्राणेऽपानं तथाऽपरे| प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः||४:२९||"
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परोपकार के लिए हम जो भी कार्य करते हैं वह भी यज्ञ की श्रेणी में आता है| भगवान की भक्ति भी एक यज्ञ है| परमात्मा की चर्चा "ज्ञान यज्ञ" है|
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हिरण्यगर्भ सूक्त के "कस्मै देवाय हविषा विधेम?" अर्थात हम किस देवता की प्रार्थना करें और किस देवता के लिए हवन करें, यजन करें, प्रार्थना करें? कौन सा देव है,जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा कर सके, हमको शांति प्रदान कर सके, हमें ऊँचा उठाने में सहायता दे सके? किस देवता को प्रणाम करें? ऐसा देव कौन है? मेरी समझ से ये वे देव हैं जिन्होनें मुझ में ही नहीं, पूरी सृष्टि में स्वयं को व्यक्त कर रखा है| उन्हीं परब्रह्म का ओंकार रूप में ध्यान ही सबसे बड़ा यज्ञ है|
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परमात्मा को पाने की प्रचंड अग्नि प्रज्ज्वलित कर, शिवभाव में स्थित होकर, प्रणव की चेतना से युक्त हो, हर साँस में सोsहं-हंसः भाव से उस प्रचंड अग्नि में अपने अस्तित्व की आहुतियाँ देकर प्रभु की सर्वव्यापकता और अनंतता में विलीन हो जाना सबसे बड़ा यज्ञ है| अपने सम्पूर्ण अस्तित्व का प्रभु में पूर्ण समर्पण कर उनके साथ एकाकार हो जाना ही यज्ञ कि परिणिति है| ||इति||
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(इस लेख में लिखे विचार मेरे निजी विचार हैं| किसी के विचार मुझसे नहीं मिलते तो बिना बुरा माने अपने स्वयं के निजी विचार प्रस्तुत करें)
ॐ तत्सत् !! शिवोहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर बावलिया
झुंझुनूं (राजस्थान)
१२ अक्टूबर २०२०

Sunday, 10 October 2021

हमें ध्यान-साधना किस बिन्दु से करनी चाहिए ? ---

 

हमें ध्यान-साधना किस बिन्दु से करनी चाहिए ?
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हमें अपने गुरु की आज्ञा से, उनके द्वारा बताई हुई विधि से ही ध्यान-साधना करनी चाहिए| इस से साधना में कोई त्रुटि रह जाये तो गुरु महाराज उसका शोधन कर देते हैं| धीरे-धीरे कर्ताभाव समाप्त हो जाता है, और गुरु ही कर्ता हो जाते हैं| हमें स्वयं को, साधना के फल को, और अपने सारे अस्तित्व को उनके श्रीचरणों में अर्पित कर देना चाहिए| अपने लिए बचाकर कुछ भी नहीं रखना चाहिए| गुरु-तत्व की अनुभूति होने के पश्चात सारे संशय दूर हो जाते हैं|
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ध्यान कूटस्थ में ही होता है| कूटस्थ शब्द को परिभाषित तो किया जा सकता है, पर इस की वास्तविक अनुभूति और ज्ञान ..... गुरु-कृपा से ही होता है| अतः शब्दों पर नहीं, अपनी अनुभूतियों पर ही मेरी आस्था है| मेरे अनुभूतियाँ किसी और के काम नहीं आ सकतीं, अतः उन के बारे में लिखना निरर्थक है| पिछले जन्म में जिस अवस्था तक साधना हुई थी, इस जन्म में उसका प्रारम्भ वहीं से हुआ| इस जन्म में जहाँ तक पहुँचूँगा, अगले जन्म में वहीं से इस यात्रा का पुनश्च प्रारम्भ होगा|
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अपने अनुभव से एक बात सदा से कहता आया हूँ, और फिर कह रहा हूँ कि हमें अपनी चेतना को प्रयासपूर्वक आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य ... उत्तरा-सुषुम्ना में रखना चाहिए और शिव, या विष्णु या उनके किसी अवतार का निरंतर ध्यान वहीं करना चाहिए| गुरु प्रदत्त बीज-मंत्र का जप भी निरंतर होते रहना चाहिए| आगे की साधना ...... भगवान स्वयं करेंगे, और सारी अनुभूतियाँ और उपलब्धियाँ भी उन्हीं की होंगी, हमारी नहीं| वास्तव में हम तो हैं ही नहीं, जो भी हैं, वे ही है|
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० अक्टूबर २०२०

Friday, 8 October 2021

आज के जमाने में हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष कौन हैं? ---

 

आज के जमाने में हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष कौन हैं?---
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हर अनुचित तरीके से अपार धन (हिरण्य) एकत्र करने, उसी में लोटपोट रहने, व उसी का निरंतर चिंतन करने वाले लोभी और अहंकारी व्यक्ति ही आज के जमाने के हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष हैं| इनका नाश स्वयं भगवान करते हैं|
"जाको प्रभु दारुण दुख देही, ताकी मति पहले हर लेही|"
"जाको विधि पूरन सुख देहीं, ताकी मति निर्मल कर देहि|"
दूसरों का अधिकार छीन कर उनके भाग को हड़पने वाले, जीवन में लालची और लोभी, जिनका एकमात्र लक्ष्य ही रुपये-पैसे बनाना हो, ऐसे लोग भगवान की बड़ी-बड़ी बातें करेंगे लेकिन अपने एक रुपये के लाभ के लिए दूसरों का लाखों का नुकसान कर देंगे, ये आज के युग के हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष हैं| ऐसे लोगों से विष की तरह दूर रहें|
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हिरण्यकशिपु का शाब्दिक अर्थ होता है ... स्वर्ण का बिस्तर| जो हर समय सिर्फ धन एकत्र करने व उसी में रहने की कामना करता है वह हिरण्यकशिपु है|
अक्ष का अर्थ है ... पहियों की धुरी, यानि वह डंडा जिसके दोनों सिरों पर गाड़ी आदि के पहिए लगे रहते हैं| प्रचलित भाषा में इसे कमानी भी कहते हैं| जिनसे जुआ/चौसर खेलते हैं, उन काठ या हड्डी के छह पहलों वाले लम्बे टुकड़े जिनके पहलों पर बिन्दियाँ बनी होती हैं, उनको भी अक्ष कहते हैं|
पृथ्वी के दोनों ध्रुवों के बीच लेटी हुई सीधी कल्पित रेखाओं (latitude) को भी अक्ष कहते हैं|
हमारी चेतना में जब धन ही धन रहता है, तब हम हिरण्याक्ष बन जाते हैं|
कश्यप ऋषि और उनकी पत्नी दिति के दो पुत्र हुए थे ... हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष| दोनों को मारने के लिये भगवान को अवतार लेना पड़ा था|
इन राक्षसों को नष्ट करने के लिए हमें भी अपने चैतन्य हृदय में भगवान को अवतृत करना होगा|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
९ अक्टूबर २०२०

जो परमात्मा प्रकाश में हैं, वे ही अंधकार में हैं ---

भगवान ही एकमात्र सत्य हैं। जो परमात्मा प्रकाश में हैं, वे ही अंधकार में हैं। सुख-दुःख, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म -- सब उन्हीं के मन की कल्पना है। प्रकाश का अभाव ही अंधकार है, और अंधकार का अभाव ही प्रकाश। इस प्रकाश और अंधकार के खेल से ही यह सृष्टि चल रही है। प्रकाश का महत्व - अंधकार से है। अंधकार में ही तारे चमकते हैं। मनुष्य विवश है, परिस्थितियों का दास है। सब कुछ प्रकृति के वश में है; मनुष्य का लोभ और अहंकार ही बंधन है। लोभ और अहंकार से मुक्त व्यक्ति ही स्वतंत्र, धार्मिक और जीवनमुक्त है।

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पुनश्च: -- भगवान के अलावा, कोई किसी के काम नहीं आता। दुःख-सुख में सिर्फ भगवान ही काम आते हैं। वे ही प्रकाश हैं, और वे ही अंधकार हैं।
स्वयं में व्यक्त देवत्व की अभिव्यक्ति ही काम आती है, किसी अन्य की नहीं।
२६ सितंबर २०२१

योगिराज श्री श्री श्याचरण लाहिड़ी महाशय की पुण्यतिथि ---

 

योगिराज श्री श्री श्याचरण लाहिड़ी महाशय (३० सितंबर १८२८ -- २६ सितम्बर १८९५) की आज १२६वीं पुण्यतिथि है। इस जीवन में जिन जिन महापुरुषों से मुझे प्रेरणा मिली है, उनमें वे अग्रणी हैं।
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समय समय पर उन्होंने अपने अनेक शिष्यों के समक्ष प्रकट होकर उन्हें साकार दर्शन दिए हैं। विस्तृत वर्णन उनकी जीवनियों में उपलब्ध है। देहत्याग के पूर्व उन्होंने कई घंटों तक गीता के श्लोकों की व्याख्या की, और अचानक कहा कि "मैं अब घर जा रहा हूँ।" यह कह कर वे अपने आसन से उठ खड़े हुए, तीन बार परिक्रमा की और उत्तराभिमुख हो कर पद्मासन में बैठ गए और ध्यानस्थ होकर अपनी नश्वर देह को सचेतन रूप से त्याग दिया। पावन गंगा के तट पर मणिकर्णिका घाट पर गृहस्थोचित विधि से उनका दाह संस्कार किया गया। वे मनुष्य देह में साक्षात शिव थे। ऐसे महान गृहस्थ योगी को नमन !!
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हे मृत्यु, तेरी विजय कहाँ है? हे मृत्यु, तेरा दंश कहाँ है? जीवन और मृत्यु दोनों ही प्रकाश और अन्धकार के खेल हैं। कभी प्रकाश हावी हो जाता है, और कभी अन्धकार, लेकिन विजय सदा प्रकाश की ही होती है, यद्यपि अन्धकार के बिना प्रकाश का कोई महत्त्व नहीं है। सृष्टि द्वंद्वात्मक यानि दो विपरीत गुणों से बनी है। जीवन और मृत्यु भी दो विपरीत गुण हैं, पर मृत्यु एक मिथ्या भ्रम मात्र है, और जीवन है वास्तविकता। जीवात्मा कभी मरती नहीं है, सिर्फ अपना चोला बदलती है, अतः विजय सदा जीवन की ही है, मृत्यु की नहीं।
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भगवान श्रीकृष्ण का वचन है ---
"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृहणाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥"
जिस प्रकार मनुष्य फटे हुए जीर्ण वस्त्र उतार कर नए वस्त्र धारण कर लेता है, वैसे ही यह देही जीवात्मा पुराने शरीर को छोड़कर दूसरा शरीर धारण कर लेती है।
(गीता में आस्था रखने वालों को समाधियों, मक़बरों और कब्रों की पूजा नहीं करनी चाहिए क्योंकि दिवंगत आत्मा तो तुरंत दूसरा शरीर धारण कर लेती है| महापुरुष तो परमात्मा के साथ सर्वव्यापी हैं)
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जीवात्मा सदा शाश्वत है| भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं ---
"नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारूतः॥"
जीवात्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, पानी गीला नहीं कर सकता और वायु सुखा नहीं सकती।"
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भगवान श्रीकृष्ण ने ही कहा है ....
"न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे"॥"
जीवात्मा अनादि व अनन्त है। यह न कभी पैदा होता है और न मरता है। यह कभी होकर नहीं रहता और फिर कभी नहीं होगा, ऐसा भी नहीं है। यह (अज) अजन्मा अर्थात् अनादि, नित्य और शाश्वत सनातन है।
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शरीर के मरने वा मारे जाने पर भी जीवात्मा मरती नहीं है।
When the perishable has been clothed with the imperishable, and the mortal with immortality, then the saying that is written will come true: “Death has been swallowed up in victory.” “Where, O death, is your victory? Where, O death, is your sting?
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ॐ नमः शिवाय ! ॐ शिव ! ॐ गुरु !! जय गुरु !!
कृपा शंकर
२६ सितम्बर २०२१