Friday, 8 October 2021

आज के जमाने में हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष कौन हैं? ---

 

आज के जमाने में हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष कौन हैं?---
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हर अनुचित तरीके से अपार धन (हिरण्य) एकत्र करने, उसी में लोटपोट रहने, व उसी का निरंतर चिंतन करने वाले लोभी और अहंकारी व्यक्ति ही आज के जमाने के हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष हैं| इनका नाश स्वयं भगवान करते हैं|
"जाको प्रभु दारुण दुख देही, ताकी मति पहले हर लेही|"
"जाको विधि पूरन सुख देहीं, ताकी मति निर्मल कर देहि|"
दूसरों का अधिकार छीन कर उनके भाग को हड़पने वाले, जीवन में लालची और लोभी, जिनका एकमात्र लक्ष्य ही रुपये-पैसे बनाना हो, ऐसे लोग भगवान की बड़ी-बड़ी बातें करेंगे लेकिन अपने एक रुपये के लाभ के लिए दूसरों का लाखों का नुकसान कर देंगे, ये आज के युग के हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष हैं| ऐसे लोगों से विष की तरह दूर रहें|
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हिरण्यकशिपु का शाब्दिक अर्थ होता है ... स्वर्ण का बिस्तर| जो हर समय सिर्फ धन एकत्र करने व उसी में रहने की कामना करता है वह हिरण्यकशिपु है|
अक्ष का अर्थ है ... पहियों की धुरी, यानि वह डंडा जिसके दोनों सिरों पर गाड़ी आदि के पहिए लगे रहते हैं| प्रचलित भाषा में इसे कमानी भी कहते हैं| जिनसे जुआ/चौसर खेलते हैं, उन काठ या हड्डी के छह पहलों वाले लम्बे टुकड़े जिनके पहलों पर बिन्दियाँ बनी होती हैं, उनको भी अक्ष कहते हैं|
पृथ्वी के दोनों ध्रुवों के बीच लेटी हुई सीधी कल्पित रेखाओं (latitude) को भी अक्ष कहते हैं|
हमारी चेतना में जब धन ही धन रहता है, तब हम हिरण्याक्ष बन जाते हैं|
कश्यप ऋषि और उनकी पत्नी दिति के दो पुत्र हुए थे ... हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष| दोनों को मारने के लिये भगवान को अवतार लेना पड़ा था|
इन राक्षसों को नष्ट करने के लिए हमें भी अपने चैतन्य हृदय में भगवान को अवतृत करना होगा|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
९ अक्टूबर २०२०

जो परमात्मा प्रकाश में हैं, वे ही अंधकार में हैं ---

भगवान ही एकमात्र सत्य हैं। जो परमात्मा प्रकाश में हैं, वे ही अंधकार में हैं। सुख-दुःख, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म -- सब उन्हीं के मन की कल्पना है। प्रकाश का अभाव ही अंधकार है, और अंधकार का अभाव ही प्रकाश। इस प्रकाश और अंधकार के खेल से ही यह सृष्टि चल रही है। प्रकाश का महत्व - अंधकार से है। अंधकार में ही तारे चमकते हैं। मनुष्य विवश है, परिस्थितियों का दास है। सब कुछ प्रकृति के वश में है; मनुष्य का लोभ और अहंकार ही बंधन है। लोभ और अहंकार से मुक्त व्यक्ति ही स्वतंत्र, धार्मिक और जीवनमुक्त है।

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पुनश्च: -- भगवान के अलावा, कोई किसी के काम नहीं आता। दुःख-सुख में सिर्फ भगवान ही काम आते हैं। वे ही प्रकाश हैं, और वे ही अंधकार हैं।
स्वयं में व्यक्त देवत्व की अभिव्यक्ति ही काम आती है, किसी अन्य की नहीं।
२६ सितंबर २०२१

योगिराज श्री श्री श्याचरण लाहिड़ी महाशय की पुण्यतिथि ---

 

योगिराज श्री श्री श्याचरण लाहिड़ी महाशय (३० सितंबर १८२८ -- २६ सितम्बर १८९५) की आज १२६वीं पुण्यतिथि है। इस जीवन में जिन जिन महापुरुषों से मुझे प्रेरणा मिली है, उनमें वे अग्रणी हैं।
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समय समय पर उन्होंने अपने अनेक शिष्यों के समक्ष प्रकट होकर उन्हें साकार दर्शन दिए हैं। विस्तृत वर्णन उनकी जीवनियों में उपलब्ध है। देहत्याग के पूर्व उन्होंने कई घंटों तक गीता के श्लोकों की व्याख्या की, और अचानक कहा कि "मैं अब घर जा रहा हूँ।" यह कह कर वे अपने आसन से उठ खड़े हुए, तीन बार परिक्रमा की और उत्तराभिमुख हो कर पद्मासन में बैठ गए और ध्यानस्थ होकर अपनी नश्वर देह को सचेतन रूप से त्याग दिया। पावन गंगा के तट पर मणिकर्णिका घाट पर गृहस्थोचित विधि से उनका दाह संस्कार किया गया। वे मनुष्य देह में साक्षात शिव थे। ऐसे महान गृहस्थ योगी को नमन !!
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हे मृत्यु, तेरी विजय कहाँ है? हे मृत्यु, तेरा दंश कहाँ है? जीवन और मृत्यु दोनों ही प्रकाश और अन्धकार के खेल हैं। कभी प्रकाश हावी हो जाता है, और कभी अन्धकार, लेकिन विजय सदा प्रकाश की ही होती है, यद्यपि अन्धकार के बिना प्रकाश का कोई महत्त्व नहीं है। सृष्टि द्वंद्वात्मक यानि दो विपरीत गुणों से बनी है। जीवन और मृत्यु भी दो विपरीत गुण हैं, पर मृत्यु एक मिथ्या भ्रम मात्र है, और जीवन है वास्तविकता। जीवात्मा कभी मरती नहीं है, सिर्फ अपना चोला बदलती है, अतः विजय सदा जीवन की ही है, मृत्यु की नहीं।
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भगवान श्रीकृष्ण का वचन है ---
"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृहणाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥"
जिस प्रकार मनुष्य फटे हुए जीर्ण वस्त्र उतार कर नए वस्त्र धारण कर लेता है, वैसे ही यह देही जीवात्मा पुराने शरीर को छोड़कर दूसरा शरीर धारण कर लेती है।
(गीता में आस्था रखने वालों को समाधियों, मक़बरों और कब्रों की पूजा नहीं करनी चाहिए क्योंकि दिवंगत आत्मा तो तुरंत दूसरा शरीर धारण कर लेती है| महापुरुष तो परमात्मा के साथ सर्वव्यापी हैं)
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जीवात्मा सदा शाश्वत है| भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं ---
"नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारूतः॥"
जीवात्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, पानी गीला नहीं कर सकता और वायु सुखा नहीं सकती।"
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भगवान श्रीकृष्ण ने ही कहा है ....
"न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे"॥"
जीवात्मा अनादि व अनन्त है। यह न कभी पैदा होता है और न मरता है। यह कभी होकर नहीं रहता और फिर कभी नहीं होगा, ऐसा भी नहीं है। यह (अज) अजन्मा अर्थात् अनादि, नित्य और शाश्वत सनातन है।
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शरीर के मरने वा मारे जाने पर भी जीवात्मा मरती नहीं है।
When the perishable has been clothed with the imperishable, and the mortal with immortality, then the saying that is written will come true: “Death has been swallowed up in victory.” “Where, O death, is your victory? Where, O death, is your sting?
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ॐ नमः शिवाय ! ॐ शिव ! ॐ गुरु !! जय गुरु !!
कृपा शंकर
२६ सितम्बर २०२१

यहाँ कोई लघु मार्ग नहीं है ---

जब भूख लगती है तब भोजन स्वयं को करना पड़ता है, किसी दूसरे के भोजन करने से स्वयं का पेट नहीं भरता। वैसे ही ईश्वर-प्राप्ति के लिए साधना स्वयं को करनी पड़ती है, किसी दूसरे की साधना से स्वयं का कल्याण नहीं हो सकता। मनुष्य लघु मार्ग (Short cut) ढूँढता है, लेकिन यहाँ कोई लघु मार्ग नहीं है।

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शास्त्रों में पूरा मार्ग-दर्शन है। यह संसार - साधना यानि क्रिया का स्थल है, चिंता का नहीं। भगवान के नियम शाश्वत और अपरिवर्तनीय हैं। दुराचार क्या है? यह स्वयं का हृदय बता देता है। दुराचार यानि पाप के दो फल होते हैं -- अविवेक और दुःखों की वृद्धि। इसके लिए किसी अन्य को दोष देना व्यर्थ है। एक ही अविनाशी परम तत्त्व का सर्वत्र दर्शन मोक्षदायक ज्ञान है|
ॐ तत्सत् !!
२७ सितंबर २०२१

मनुष्य जीवन का सार भगवान की भक्ति में है ---

 

"संसार में हों कष्ट कम तो नर्क को दिखलाइये।
पर हे दयानिधि, दासता का दृश्य मत दिखलाइये॥"
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विषय-वासनाओं की दासता - दरिद्रता को जन्म देती है। यह दरिद्रता सबसे बड़ा अभिशाप, महादुःखदायी और सब पापों की जननी है। सब तरह की दरिद्रता दुःखदायी है, चाहे वह - भौतिक, मानसिक, बौद्धिक या आध्यात्मिक - किसी भी स्तर की हो।
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स्वर्ग की बातें भी बड़ी फालतू और घटिया हैं। स्वर्ग यानि जन्नत जाने की कामना से अधिक घटिया और फालतू दूसरी कोई बात है ही नहीं। जैसे गुण मनुष्य में होते हैं, वैसी ही कल्पना मनुष्य स्वर्ग-नर्क की कर लेता है। कमी सिर्फ इतनी ही है कि मरने के बाद कोई बापस आकर बताता नहीं है कि उसकी क्या गति हुई है। लेकिन मरने से पूर्व स्वयं का हृदय ही यह सत्य बता देता है कि उसकी क्या गति होने वाली है।
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मनुष्य जीवन का सार भगवान की भक्ति में है। भक्ति साकार हो या निराकार, कोई फर्क नहीं पड़ता, कहीं से आरम्भ तो हो। गहन अभीप्सा और परमप्रेम के साथ भगवान का निरंतर प्रेमपूर्वक स्मरण, और सद-आचरण ही भक्ति है।
ॐ तत्सत् !!
२७ सितंबर २०२१

आये थे हरिः भजन को, ओटन लगे कपास ---

 

"आये थे हरिः भजन को, ओटन लगे कपास !!"
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युवावस्था में जब परमात्मा की एक झलक मिली थी, उसी क्षण मुझे विरक्त हो जाना चाहिए था। लेकिन कभी दृढ़ साहस नहीं जुटा पाया। हृदय में प्रज्वलित अभीप्सा की प्रचंड अग्नि अभी तक तृप्त और संतुष्ट नहीं हुई है। बड़ी असह्य पीड़ा हो रही है।
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मुझे किसी भी तरह की मुक्ति और मोक्ष नहीं चाहिए। जीवन-मुक्त अवस्था में बार बार पुनर्जन्म हो, और तब तक हो, जब तक जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं हो जाये। हर बार जन्म से ही पूर्ण वैराग्य, ज्ञान और भक्ति हो। मेरे आदर्श स्वयं भगवान पुरुषोत्तम हैं, वे निश्चित रूप से मुझे अपने साथ एक कर, स्वयम् को मुझ में व्यक्त करेंगे।
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"नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्‌ तपसो वाप्यलिङ्गात्‌।
एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वांस्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ॥"
(मुण्डकोपनिषद् ३-२-४)
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२७ सितंबर २०२१

जिसकी जैसी श्रद्धा होती है, वह वैसा ही हो जाता है ---

 

जिसकी जैसी श्रद्धा होती है, वह वैसा ही हो जाता है ---
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श्रद्धा तीन प्रकार की होती है -- सात्विक, राजसिक और तामसिक। जैसे संस्कार हमें अपने माँ-बाप, परिवार और समाज द्वारा मिलते हैं, वैसे ही हम बन जाते हैं। हम अपने ऊपर डाले हुये संस्कारों के उत्पाद हैं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं ---
"सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥१७:३॥"
अर्थात् -- हे भारत सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके सत्त्व (स्वभाव, संस्कार) के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जिस श्रद्धा वाला है वह स्वयं भी वही है अर्थात् जैसी जिसकी श्रद्धा वैसा ही उसका स्वरूप होता है॥"
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शुक्ल यजुर्वेद में कहा है --
"व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्‌।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते॥"
अर्थात्‌ मनुष्य को उन्नत जीवन की योग्यता व्रत से प्राप्त होती है, जिसे दीक्षा कहते हैं। दीक्षा से दक्षिणा यानी जो कुछ किया जा रहा है, उसमें सफलता मिलती है। इससे श्रद्धा जागती है और श्रद्धा से सत्य की यानी जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति होती है, जो उसका अंतिम निष्कर्ष है।
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आचरण की शुद्धता को किसी भी कठिन परिस्थिति में न छोड़ना, और निष्ठापूर्वक उसका पालन करना "व्रत" कहलाता है। वस्तुतः विशेष संकल्प के साथ लक्ष्य सिद्धि के लिए किए जाने वाले कार्य का नाम "व्रत" है। व्रत का अर्थ - भूखा मरना नहीं है। एक संस्कार को बार बार दृढ़ करना और उस संस्कार से भिन्न कोई विषय आए उसे हटाना एक व्रत है।
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जिस परमात्मा का हमने वरण कर लिया है उसके अतिरिक्त हृदय में अन्य कोई भी भाव न हो, स्वयं के पृथक अस्तित्व का भी, तभी हम श्रद्धावान हैं। बार बार निरंतर इसका अभ्यास करना पड़ता है। जो हमारे हृदय में भाव हैं वह ही हमारी श्रद्धा है, और जो हमारी श्रद्धा है, वह ही हम हैं।
सभी निजात्माओं को नमन !! हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२९ सितंबर २०२१