Wednesday, 22 September 2021

शैतान कौन है? ---

 

शैतान कौन है? --- इब्राहिमी मज़हबों (यहूदीयत, ईसाईयत व इस्लाम) में एक शैतान नाम का प्राणी है जो मनुष्य को भटका कर परमात्मा से विमुख कर देता है। दुनिया की सारी बुराइयों के लिए वह जिम्मेदार है।
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सनातन धर्म के अनुसार हमारा तमोगुण ही शैतान है। तमोगुण में भी सबसे बुरा हमारा लोभ है। हमारा लोभ ही हमारी सब बुराइयों का कारण है। यह लोभ ही शैतान का बाप है। भारत में इस समय पर्दे के पीछे से शैतान ही राज्य कर रहा है। वह शैतान ही घूसख़ोरी, छल-कपट, चोरी, राग-द्वेष, अहंकार और हिंसा के रूप में आता है। लोभ ही सबसे बड़ी हिंसा है। लोभ पर विजय ही अहिंसा है -- जो हमारा "परम धर्म" है। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१५ सितंबर २०२१

बड़े भाई साहब की वार्षिक पुण्य तिथि पर श्रद्धांजलि ---

 

बड़े भाई साहब की वार्षिक पुण्य तिथि पर श्रद्धांजलि ---
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गत वर्ष १४ सितंबर 2020 को इस क्षेत्र में प्रसिद्ध नेत्र शल्य चिकित्सक, रा.स्व.से.संघ के सीकर विभाग संघ चालक, सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता, और समाज में अति लोकप्रिय, मेरे बड़े भाई साहब डॉ. दया शंकर बावलिया जी सायं लगभग ८ बजे जयपुर के E.H.C.C. हॉस्पिटल में जहाँ उनका उपचार चल रहा था, अपनी नश्वर देह को त्याग कर एक अज्ञात अनंत यात्रा पर चले गए थे। भगवान अर्यमा की कृपा से निश्चित रूप से उन्हें सद्गति प्राप्त हुई है। नित्य फोन पर वे मुझसे अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रम पर चर्चा करते थे। समसामयिक घटनाक्रमों पर उनकी पकड़ बहुत गहरी थी। बहुत बड़े-बड़े लोगों से उनका संपर्क और मिलना-जुलना था। उपनिषदों और भगवद्गीता पर उनका अध्ययन बहुत अधिक गहरा था।
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वे एक विख्यात नेत्र चिकित्सक तो थे ही, एक सामाजिक कार्यकर्ता भी थे। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वे बचपन से ही स्वयंसेवक थे। देवलोक गमन के समय वे संघ के सीकर विभाग (झुंझुनूं, सीकर व चूरू जिलों) के विभाग संघ चालक थे। जिला नागरिक मंच, व अन्य अनेक सामाजिक संस्थाओं के मुख्य संरक्षक थे। जिले का ब्राह्मण समाज तो आज भी उनके बिना अपने आप को अनाथ सा अनुभूत कर रहा है, क्योंकि उनके मुख्य संरक्षक नहीं रहे।
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आज के दिन १५ सितंबर २०२० को उनकी देह का अंतिम संस्कार झुंझुनूं के बिबाणी धाम श्मशान गृह में कोविड-१९ के कारण सरकारी नियमानुसार कर दिया गया था। भाई साहब को अश्रुपूरित सादर विनम्र श्रद्धांजलि !! ॐ ॐ ॐ !!
१५ सितंबर २०२१

इस संसार के लौकिक जीवन में मैं अनाथ हो गया हूँ --- (१५ सितंबर २०२०)

 

इस संसार के लौकिक जीवन में मैं अनाथ हो गया हूँ...
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कल १४ सितंबर २०२० को सायं लगभग ८ बजे मेरे बड़े भाई साहब डॉ. दयाशंकर जी इस नश्वर देह को त्याग कर अपनी अज्ञात अनंत यात्रा पर चले गए| जगन्माता उन्हें निश्चित रूप से सद्गति प्रदान करेगी| मेरी और उनकी राम-लक्ष्मण की सी जोड़ी थी| जितना प्रेम मुझे उनसे था उतना इस नश्वर जीवन में अन्य किसी से भी नहीं था| नित्य फोन पर वे मुझसे अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रम पर चर्चा करते थे| समसामयिक घटनाक्रमों पर उनकी पकड़ बहुत गहरी थी| बहुत बड़े-बड़े लोगों से उनका संपर्क और मिलना-जुलना था| उपनिषदों और भगवद्गीता पर उनका अध्ययन बहुत अधिक गहरा था|
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वे एक विख्यात नेत्र चिकित्सक तो थे ही, एक सामाजिक कार्यकर्ता भी थे| राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वे बचपन से ही स्वयंसेवक थे| वर्तमान में वे संघ के सीकर विभाग (झुंझुनूं, सीकर व चूरू जिलों) के विभाग संघ चालक थे| जिला नागरिक मंच, व अन्य अनेक सामाजिक संस्थाओं के मुख्य संरक्षक थे| जिले का ब्राह्मण समाज तो आज अपने आप को अनाथ सा अनुभूत कर रहा है, क्योंकि उनके मुख्य संरक्षक नहीं रहे| झुंझुनूं, सीकर, व चुरू जिलों के स्वयं सेवक भी अपने विभाग संघ चालक के चले जाने से दुखी हैं|
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इस समय मैं अधिक लिखने की मनःस्थिति में नहीं हूँ| भाई साहब को श्रद्धांजलि| ॐ ॐ ॐ !!
१५ सितंबर २०२०

सिद्ध गुरु की कृपा के बिना कोई अनुभूति नहीं होती ---

 

आज का दिन बहुत शुभ है, प्रातःकाल उठते समय से ही परमात्मा की उपस्थिति की बड़ी दिव्य अनुभूतियाँ हो रही हैं। ये अनुभूतियाँ किसी अन्य को कराने की सामर्थ्य मुझ में नहीं हैं। यदि होती तो संपूर्ण सृष्टि को ही परमात्मा का आभास करा देता।
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मेरा यह संकल्प भी साकार हो रहा है। सम्पूर्ण सृष्टि ही परमात्मा की उपासना कर रही है। मैं साँस लेता हूँ तो सारी सृष्टि साँस लेती है, मैं साँस छोड़ता हूँ तो सारी सृष्टि साँस छोड़ रही है। मैं चैतन्य हूँ तो सारी सृष्टि भी चैतन्य है। मैं सारी सृष्टि के साथ एक हूँ, यह नश्वर देह नहीं। इस परम ज्योतिर्मय सृष्टि में कहीं भी अंधकार नहीं है। बहुत ही तीब्र गति से यह सृष्टि 'विष्णु नाभि' की परिक्रमा कर रही है। इस की गति से एक स्पंदन हो रहा है जिस की आवृति से उत्पन्न ध्वनि बहुत मधुर है। उस ध्वनि और प्रकाश में परमात्मा स्वयं को व्यक्त कर रहे हैं। मेरा कोई पृथक अस्तित्व नहीं है, मैं उन के साथ एक हूँ।
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भगवान वासुदेव ही समान रूप से सर्वत्र व्याप्त हैं। वे ही परमशिव हैं। साकार रूप में पद्मासनस्थ शांभवी मुद्रा में वे स्वयं ही स्वयं का ध्यान कर रहे हैं। सारी सृष्टि उनके मन का एक संकल्प मात्र है। उनके सिवाय कोई अन्य नहीं है। पृथकता का आभास एक दुःस्वप्न था। वह दुःस्वप्न फिर नहीं आए। सभी जीवात्माएँ, समस्त जड़ और चेतन उनमें जागृत हों।
ॐ ॐ ॐ !!
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ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ नमः शिवाय !!
कृपा शंकर
१५ सितंबर २०२१
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पुनश्च: --- सिद्ध गुरु की कृपा के बिना कोई अनुभूति नहीं होती। गुरु सिद्ध पुरुष हो, श्रौत्रीय व ब्रहमनिष्ठ हो। जय गुरु !!

Tuesday, 14 September 2021

राधाष्टमी और दधीचि-जयंती पर श्रद्धालुओं का अभिनंदन !! ---

 राधाष्टमी और दधीचि-जयंती पर श्रद्धालुओं का अभिनंदन !!

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"गोपाल सहस्रनाम" के अनुसार एक ही शक्ति के दो रूप है राधा और माधव (श्रीकृष्ण) -- अर्थात् श्रीराधा ही श्रीकृष्ण हैं, और कृष्ण ही राधा हैं --
"तस्माज्ज्योतिरभूद्द्वेधा राधामाधवरूपकम्‌।"
वैष्णव निंबार्क संप्रदाय और चैतन्य महाप्रभु के अनुयायियों में श्रीराधा जी की आराधना मुख्य होती है।
महर्षि दधीचि एक वैदिक ऋषि थे। इन्हीं की हड्डियों से बने वज्र से इंद्र ने वृत्रासुर का संहार किया था।
 
१४ सितंबर २०२१ 

अपनी बुद्धि रूपी कन्या का विवाह ---

 

अपनी बुद्धि रूपी कन्या का विवाह परमात्मा से कर के निश्चिंत हो रहा हूँ। उनसे अच्छा वर और कोई नहीं मिलेगा। दहेज में अपना मन, अहंकार व चित्त भी दे रहा हूँ।
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इस बुद्धि रूपी कन्या ने अनंतकाल तक तप, आराधना और प्रतीक्षा की है। उन
सर्वलोकेश्वरेश्वर अनाथाश्रय दयाधाम ने इस किंकरी पर द्रवित होकर यह संबंध स्वीकार कर लिया है। अपने आराध्य की आराधना से यह कन्या तो धन्य हुई ही है, साथ साथ मैं और आप सब भी धन्य हो गए हैं। ॐ तत्सत् !!
१३ सितंबर २०२१

कूटस्थ सूर्यमण्डल में भगवान पुरुषोत्तम पर निरंतर सदा ध्यान रहे ---


कूटस्थ सूर्यमण्डल में भगवान पुरुषोत्तम पर निरंतर सदा ध्यान रहे ---
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संसार में कहीं भी सुख-शांति-सुरक्षा नहीं है, क्योंकि हमारी इस सृष्टि का निर्माण द्वैत से हुआ है, जिसमें सदा द्वन्द्व रहता है। सुख-शांति-सुरक्षा अद्वैत में है, द्वैत में नहीं। भगवान ने स्वयं को "खं" यानि आकाश-तत्व के रूप में व्यक्त किया है, जहाँ कोई द्वैत नहीं होता। इसलिए जो भगवान के सपीप है, वह "सुखी" है, और जो उन से दूर है वह "दुःखी" है।
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गीता का सर्वप्रथम उपदेश इस जीवन में जिन विद्वान आचार्य से मैंने ग्रहण किया, उन्होने मुझे सब से पहिले क्षर-अक्षर योग का उपदेश दिया था --
"द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१५:१६॥"
अर्थात् इस लोक में क्षर (नश्वर) और अक्षर (अनश्वर) ये दो पुरुष हैं। समस्त भूत क्षर हैं और कूटस्थ अक्षर कहलाता है॥
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यह "कूटस्थ" शब्द मुझे बहुत प्यारा लगा और मैं इसी के अनुसंधान में लग गया और लगा रहा जब तक कूटस्थ-चैतन्य की प्रत्यक्ष अनुभूति नहीं हुई। निषेधात्मक कारणों से अपनी अनुभूतियों को तो नहीं लिख सकता, लेकिन यह तो लिख ही सकता हूँ कि आध्यात्म में अब कोई रहस्य - रहस्य नहीं रहा है। कूटस्थ पुरुषोत्तम स्वयं भगवान वासुदेव हैं, वे ही परमशिव हैं। वे ही हमारे वास्तविक अमूर्त स्वरूप हैं।
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"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥"
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥"
"यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥"
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥"
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ सितंबर २०२१
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कूटस्थ सूर्यमण्डल में पुरुषोत्तम का ध्यान और क्रिया-योग साधना -- यही इस अकिंचन का जीवन है। यज्ञ में यजमान की तरह मैं तो एक निमित्त मात्र हूँ। कर्ता और भोक्ता तो भगवान स्वयं हैं। रात्रि को सोने से पूर्व और ब्राह्ममुहूर्त में उठते ही भगवान का ध्यान, और हर समय उनका अनुस्मरण अनिवार्य है।
भगवान कहते है --
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥"
अर्थात् - सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो॥
Abandoning all duties, take refuge in Me alone: I will liberate thee from all sins; grieve not.
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ॐ तत्सत् ॥ गुरु ॐ !! जय गुरु !!
१८ सितंबर २०२१