Saturday, 21 August 2021

ॐ नमस्ते गणपतये | त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि | त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ---

 

ॐ नमस्ते गणपतये | त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि | त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ...
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आज भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन, पंच-प्राण (प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान) रूपी गणों के, ओंकार रूप (ॐ) में अधिपति, भगवान श्रीगणेश को रिद्धि-सिद्धि सहित नमन!! सभी श्रद्धालुओं को भी नमन!! भगवान श्रीगणेश, ओंकार रूप में हमारे चैतन्य में नित्य विराजमान रहें| आप चिन्मय, आनंदमय, सच्चिदानंद, प्रत्यक्ष ब्रह्म हो| ॐ ॐ ॐ !!
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भारत की संस्कृति में गणेश-चतुर्थी का अत्यधिक महत्व है| भारत में अंग्रेजी शिक्षा प्रचलित होने से पूर्व बालक/बालिकाओं की शिक्षा का आरंभ गणेश-चतुर्थी के दिन से ही होता था| मुझे भी अतीत की कुछ स्मृतियाँ हैं| गणेश चतुर्थी के दिन हमें धुले हुए साफ़ वस्त्र पहिना कर पाठशाला भेजा जाता था| गले में दो डंके भी लटका कर ले जाते थे| विद्यालयों में लड्डू बाँटे जाते थे| अब वो अतीत की स्मृतियाँ हैं| आधुनिक अंग्रेजी अध्यापकों व विद्यार्थियों को गणेश चतुर्थी का कोई ज्ञान नहीं है|
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भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सम्पूर्ण भारत में गणेश चतुर्थी के पर्व ने बड़ा महत्वपूर्ण योगदान दिया है| एक समय था जब अंग्रेजों ने पूरे भारत में धारा-१४४ लागू कर रखी थी| पाँच से अधिक व्यक्ति एक स्थान पर एकत्र नहीं हो सकते थे| अंग्रेज पुलिस गश्त लगाती रहती और जहाँ कहीं भी पाँच से अधिक व्यक्ति एक साथ एकत्र दिखाई देते उन पर बिना चेतावनी के लाठी-चार्ज कर देती| पूरा भारत आतंकित था| ऐसे समय में पं. बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र में गणपति-उत्सव का आरंभ किया| सिर्फ धार्मिक आयोजनों के लिए ही एकत्र होने की छूट थी| गणपति पूजा के नाम पर लोग एकत्र होते और धार्मिकता के साथ-साथ उनमें राष्ट्रवादी विचार भी भर दिये जाते| तत्पश्चात महाराष्ट्र के साथ-साथ पूरे भारत में गणपति उत्सव का चलन हो गया|
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गणपति अथर्वशीर्ष :---
ॐ नमस्ते गणपतये ॥ त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि ॥ त्वमेव केवलं कर्तासि ॥ त्वमेव केवलं धर्तासि ॥ त्वमेव केवलं हर्तासि ॥ त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि ॥ त्वं साक्षादात्मासि नित्यम् ॥१॥
ऋतम् वच्मि ॥ सत्यं वच्मि ॥ २॥
अव त्वं माम्‌ ॥ अव वक्तारम् ॥ अव श्रोतारम् ॥ अव दातारम् ॥ अव धातारम् ॥ अवानूचानमव शिष्यम् ॥ अव पश्चात्तात्‌ ॥ अव पुरस्तात् ॥ अवोत्तरात्तात् ॥ अव दक्षिणात्तात् ॥ अव चोर्ध्वात्तात् ॥ अवाधरात्तात् ॥ सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात् ॥३॥
त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः ॥ त्वमानंदमयस्त्वं ब्रह्ममयः ॥ त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽसि। त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ॥४॥
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते ॥ सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति ॥ सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति ॥ सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति ॥
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः ॥ त्वं चत्वारि वाक्पदानि ॥५॥
त्वं गुणत्रयातीतः। त्वं अवस्थात्रयातीतः। त्वं देहत्रयातीतः। त्वं कालत्रयातीतः। त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम् ॥ त्वं शक्तित्रयात्मकः। त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम् ॥ त्वं ब्रहमा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं इन्द्रस्त्वं अग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं‌ चंद्रमास्त्वं ब्रह्मभूर्भुवः स्वरोम् ॥६॥
गणादिन् पूर्वमुच्चार्य वर्णादिस्तदनन्तरम्। अनुस्वारः परतरः। अर्धेन्दुलसितम्। तारेण ऋद्धम्। एतत्तव मनुस्वरूपम्। गकारः पूर्वरूपम्। अकारो मध्यमरूपम्। अनुस्वारश्चान्त्यरूपम्। बिन्दुरुत्तररूपम्। नादः संधानम् ॥ संहिता सन्धिः। सैषा गणेशविद्या। गणक ऋषिः। निचृद्‌गायत्रीछंदः गणपतिर्देवता। ॐ गं गणपतये नमः ॥७॥
एकदन्ताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥ ८ ॥
एकदन्तं चतुर्हस्तम् पाशमं कुशधारिणम् ॥ रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम्। रक्तम् लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम् ॥
रक्तगन्धानुलिप्तांगं रक्तपुष्पैः सुपूजितम्। भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्। आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम् ॥ एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः ॥९॥
नमो व्रातपतये नमो गणपतये नमः प्रमथपतये नमस्तेऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय विघ्ननाशिने शिवसुताय वरदमूर्तये नमः ॥ १० ॥
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॥ फलश्रुति ॥ (सिर्फ हिंदी अनुवाद) :----
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इस अथर्वशीर्ष का जो पाठ करता है, वह ब्रह्मीभूत होता है, वह किसी प्रकार के विघ्नों से बाधित नहीं होता, वह सर्वतोभावेन सुखी होता है, वह पंच महापापों से मुक्त हो जाता है। सायंकाल इसका अध्ययन करनेवाला दिन में किये हुए पापों का नाश करता है, प्रातःकाल पाठ करनेवाला रात्रि में किये हुए पापों का नाश करता है। सायं और प्रातःकाल पाठ करने वाला निष्पाप हो जाता है। (सदा) सर्वत्र पाठ करनेवाले सभी विघ्नों से मुक्त हो जाता है एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थों को प्राप्त करता है। यह अथर्वशीर्ष इसको नहीं देना चाहिये, जो शिष्य न हो। जो मोहवश अशिष्य को उपदेश देगा, वह महापापी होगा। इसकी १००० आवृत्ति करने से उपासक जो कामना करेगा, इसके द्वारा उसे सिद्ध कर लेगा। ॥ ११॥
जो इस मन्त्र के द्वारा श्रीगणपति का अभिषेक करता है, वह वाग्मी हो जाता है। जो चतुर्थी तिथि में उपवास कर जप करता है, वह विद्यावान् हो जाता है। यह अथर्वण-वाक्य है। जो ब्रह्मादि आवरण को जानता है, वह कभी भयभीत नहीं होता। ॥ १२॥
जो दुर्वांकुरों द्वारा यजन करता है, वह कुबेर के समान हो जाता है। जो लाजा के द्वारा यजन करता है, वह यशस्वी होता है, वह मेधावान होता है। जो सहस्त्र मोदकों के द्वारा यजन करता है, वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है। जो घृताक्त समिधा के द्वारा हवन करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है। ॥ १३॥
जो आठ ब्राह्मणों को इस उपनिषद् का सम्यक ग्रहण करा देता है, वह सूर्य के समान तेज-सम्पन्न होता है। सूर्यग्रहण के समय महानदी में अथवा प्रतिमा के निकट इस उपनिषद् का जप करके साधक सिद्धमन्त्र हो जाता है। सम्पूर्ण महाविघ्नों से मुक्त हो जाता है। महापापों से मुक्त हो जाता है। महादोषों से मुक्त हो जाता है। वह सर्वविद् हो जाता है। जो इस प्रकार जानता है-वह सर्वविद् हो जाता है। ॥ १४॥
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(आज गुरु-प्रदत्त विधि से यथासंभव अधिक से अधिक उपासना करें)
कृपा शंकर
२२ अगस्त २०२०
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पुनश्च: --- राजस्थान में बच्चों का एक गीत होता था ... "चथुड़ा चौथ भादुड़ों, कर दे माई लाडुड़ो" (पूरा गीत अब याद नहीं है), जिसे गाते-गाते सब बच्चे मिलकर किसी भी संबंधी या परिचित के घर चले जाते| जिस के भी घर जाते, वह बहुत प्रसन्न होता, और सब बच्चों को बड़े प्रेम से लड्डू खिलाकर और दक्षिणा देकर ही भेजता|

आसुरी जगत का प्रभाव हम पर कैसे होता है? ---

 

आसुरी जगत का प्रभाव हम पर कैसे होता है? ---
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सूक्ष्म जगत की आसुरी और पैशाचिक शक्तियाँ निरंतर अपने शिकार ढूँढ़ती रहती हैं। जिसके भी चित्त में वासनाएँ होती हैं, उस व्यक्ति पर अपना अधिकार करके वे उसे अपना उपकरण बना लेती हैं, और उस से सारे गलत काम करवाती हैं। जितना हमारा गलत और वासनात्मक चिंतन होता है, उतना ही हम उन आसुरी शक्तियों को स्वयं पर अधिकार करने के लिए निमंत्रित करते हैं। भौतिक जगत पूर्ण रूप से सूक्ष्म जगत के अंतर्गत है। सूक्ष्म जगत की अच्छी या बुरी शक्तियाँ ही यहाँ अपना कार्य कर रही हैं। कई बार मनुष्य कोई जघन्य अपराध जैसे ह्त्या, बलात्कार या अन्य कोई दुष्कर्म कर बैठता है; फिर सोचता है कि उसके होते हुए भी यह सब कैसे हुआ, मैं तो ऐसा कर ही नहीं सकता था। पर उसे यह नहीं पता होता कि वह किन्हीं आसुरी शक्तियों का शिकार हो गया था जिन्होंने उस पर अधिकार कर के यह दुष्कर्म करवाया।
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ईश्वर के मार्ग में ही नहीं, अन्य सभी क्षेत्रों में भी हमारी सभी बुराइयों की जड़ हमारे स्वयं का लोभ और अहंकार हैं। लोभ और अहंकार के कारण ही - काम, क्रोध, राग-द्वेष, प्रमाद, व दीर्घसूत्रता आदि जन्म लेते हैं। हमारा लोभ और अहंकार ही सूक्ष्म जगत की आसुरी शक्तियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। प्रेतबाधा एक वास्तविकता है। जिनका मन कमजोर होता है, उन्हें यह प्रेतबाधा अधिक होती है, लेकिन वास्तविक कारण अवचेतन मन में छिपा लोभ और अहंकार ही है।
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अगर हम संसार में कोई अच्छा कार्य करना चाहते हैं तो उसका एक ही उपाय है कि परमात्मा को निरंतर स्वयं के भीतर प्रवाहित होने दें, उसके उपकरण बन जाएँ। परमात्मा का साथ ही शाश्वत है, अन्य सब नश्वर हैं। परमात्मा को निरंतर अपने चित्त में, अपने अस्तित्व में प्रवाहित होने दें, सब बातों का सार यही है। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२१ अगस्त २०२१
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पुनश्च :--
लोभ और अहंकार ही सबसे बड़ी हिंसा हैं। इनसे मुक्ति ही अहिंसा है, जो हमारा परमधर्म है।
पैशाचिक जगत भी हम पर हावी है। प्राणियों को तड़पा-तड़पा कर मारने से पिशाचों को तृप्ति मिलती है। ये पिशाच ही इतना खून-खराबा और हिंसा करवाते हैं। ये अपार यौन सुख व धन का लोभ देकर अपने शिकारों को अपने वश में रखते हैं। मनुष्य इन का सामना नहीं कर सकता। इनसे मुक्त होने के लिए उसे दैवीय सहायता लेनी ही पड़ती है।
पिशाचों के शिकार हुये मनुष्य नर-पिशाच बन जाते हैं, इसका एक उदाहरण - तालिबानी हिंसा है। इससे अधिक नहीं लिखना चाहता, क्योंकि मेरी बात कोई सुनेगा भी नहीं, पसंद भी नहीं करेगा, और मेरे अनेक शत्रु हो जाएँगे। इतना ही बहुत है। धन्यवाद॥

उन के प्रेम में एक बार मग्न होकर तो देखो, जीवन में आनंद ही आनंद होगा ---

 

सारी शाश्वत जिज्ञासाओं का समाधान, सभी प्रश्नों के उत्तर, पूर्ण संतुष्टि, पूर्ण आनंद और सभी समस्याओं का निवारण - सिर्फ और सिर्फ परमात्मा में है। अपनी चेतना को सदा भ्रूमध्य में रखो, और निरंतर परमात्मा का स्मरण करो। अपने हृदय का सम्पूर्ण प्रेम उन्हें दीजिये। पूरा मार्गदर्शन स्वयं परमात्मा करेंगे। हमारी एकमात्र समस्या ईश्वर की प्राप्ति है, अन्य कोई समस्या नहीं है। गीता में भगवान कहते हैं --
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
अर्थात् - अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ॥
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बहुत अधिक लोगों की भीड़ से अधिक अच्छा तो दो-तीन लोगों का साथ है जो परमात्मा की चेतना में सदा रहते हों। दो लाख लोगों की भीड़ में बड़ी कठिनता से कोई एक व्यक्ति होता है जिसका साध्य परमात्मा हो। अधिकांश लोगों के लिए परमात्मा एक साधन मात्र है, साध्य तो संसार है। कोई अच्छा साथ न मिले तो परमात्मा के साथ अकेले रहना ही अधिक अच्छा है। जहाँ कोई अन्य नहीं है, वही तो "अनन्य योग" है। हमारी भक्ति कहीं व्यभिचारणी न हो।
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महाभारत के अनुशासन पर्व में भगवान श्रीकृष्ण, महाराज युधिष्ठिर को तंडि ऋषि कृत "शिवसहस्त्रनाम" का उपदेश देते हैं, जो भगवान श्रीकृष्ण को उपमन्यु ऋषि से प्राप्त हुआ था। उसका १६६वां श्लोक है --
"एतद् देवेषु दुष्प्रापं मनुष्येषु न लभ्यते। निर्विघ्ना निश्चला रुद्रे भक्तिर्व्यभिचारिणी॥"
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महाभारत के भीष्म पर्व में कुरुक्षेत्र की रण-भूमि में भगवान श्रीकृष्ण, अपने प्रिय शिष्य अर्जुन को जो भगवद्गीता का उपदेश देते हैं, उसके १३वें अध्याय का ११वां श्लोक है --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी। विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥"
इसे भगवान ने अनन्ययोग कहा है, जिसके लिए अव्यभिचारिणी भक्ति, एकान्तवास के स्वभाव, और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि का होना बताया है।
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नदी का विलय जब महासागर में हो जाता है, तब नदी का कोई नाम-रूप नहीं रहता, सिर्फ महासागर ही महासागर रहता है। हमारी आयु अनंत है। हम यह देह नहीं, एक शाश्वत आत्मा, और परमात्मा का अंश हैं। यह सृष्टि परमात्मा की अभिव्यक्ति और उनकी लीला है। परमात्मा से परमप्रेम हो जाने पर वे स्वयं ही हमारा ध्यान करते हैं, और अपना बोध कराते हैं। उन के प्रेम में एक बार मग्न होकर तो देखो। जीवन में आनंद ही आनंद होगा
ॐ तत्सत् !!
२१ अगस्त २०२०

Friday, 20 August 2021

आप सब में अपने प्रभु को नमन !! मैं दो-तीन बातें स्पष्ट करना चाहता हूँ --

 

आप सब में अपने प्रभु को नमन !! मैं दो-तीन बातें स्पष्ट करना चाहता हूँ --
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(१) मैं फेसबुक पर जो कुछ भी लिखता हूँ, वह कोई घोषणा नहीं, बल्कि मेरे प्रेम और भावनाओं की अभिव्यक्ति है। यह मेरा सत्संग है।
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(२) मेरा उद्देश्य किसी को सुधारना या स्वयं सुधरना नहीं है। किसी के विचार मुझे अच्छे नहीं लगते तो मैं उन्हें नहीं पढ़ता या नहीं सुनता। किसी के अच्छे लगते हैं तो पढ़ता व सुनता हूँ।
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(३) मुझे भगवान की कृपा से फेसबुक पर ही अनेक बहुत ही अच्छे और शानदार लोग मिले हैं, जो अन्यत्र नहीं मिल सकते थे। कई प्रख्यात विद्वानों और महात्माओं से परिचय हुआ। ऐसे भक्त महात्मा और ज्ञानी भी मिले हैं जिनके पास बैठने मात्र से ही भक्ति जागृत हो जाती है। ऐसे महात्मा भी मिले हैं जिनके पास बैठने मात्र से ही निज चैतन्य में वेदान्त जागृत हो जाता है।
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यह सब मैं भगवान की कृपा मानता हूँ। मेरा प्रेम ही है जो मुझे इस मंच पर रखे हुये है, अन्यथा मैं निःस्पृह हूँ। अच्छे-बुरे जो भी अनुभव मुझे हो रहे हैं, वे मेरे कर्मों के फल हैं, जिनसे मेरे कर्म ही कट रहे हैं। आप सब से हो रहा संवाद भी मेरे संस्कारों के कारण है, और कुछ नहीं।
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आप सब में अपने प्रभु को नमन !! ॐ तत्सत् !!
२० अगस्त २०२१

भगवान से परमप्रेम (भक्ति) जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है ---

भगवान से परमप्रेम (भक्ति) जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। जब भी भगवान की याद आये वह क्षण सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त है। जिस समय दोनों नासिकाओं से साँस चल रही हो, वह ध्यान करने का सर्वश्रेष्ठ समय है। भगवान से अधिक सुलभ कोई अन्य नहीं है। हम अपने स्वार्थ के लिए उन्हें याद करते हैं तो वे नहीं आते, अन्यथा तो वे निरंतर समक्ष हैं। जब चारों ओर घोर अन्धकार हो, जीवन की विपरीततम परिस्थितियाँ हों, कहीं कोई आशा की कोई किरण दिखाई न दे, तब सदगुरु रूप में भगवान ही हैं जो हमारा साथ नहीं छोड़ते। हम ही उन्हें भुला सकते हैं पर वे हमें नहीं भुलाते। उनसे मित्रता बनाकर रखें। वे इस जन्म से पूर्व भी हमारे साथ थे, और इस जन्म के पश्चात भी सभी जन्मों में हमारे साथ शाश्वत रूप से रहेंगे। अपनी सारी पीड़ाएँ, सारे दु:ख, सारे कष्ट उन्हें सौंप दो। वे ही हैं जो हमारे माध्यम से दुखी हैं। वे ही कष्ट बन कर आये हैं, और वे ही समाधान बन कर आयेंगे। उन्हें मत भूलो, वे भी हमें नहीं भूलेंगे। निरंतर उनका स्मरण करो। जब भूल जाओ, तब याद आते ही फिर उन्हें स्मरण करना आरम्भ कर दो। हमारे सुख दुःख सभी में वे हमारे ही साथ रहेंगे.
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अपने ह्रदय का समस्त प्रेम उन्हें बिना किसी शर्त के दो। यह उन्हीं का प्रेम था, जो हमें माँ बाप, भाई-बहिनों, सगे-सम्बन्धियों और मित्रों व परिचितों-अपरिचितों के माध्यम से मिला। उन्हीं के प्रेम से हमें वह शक्ति मिली है, जिससे हम वर्तमान में चैतन्य हैं। वे ही हमारे हृदय में धड़क रहे हैं, फेफड़ों से सांस ले रहे हैं, आँखों से देख रहे हैं, पैरों से चल रहें हैं, और अन्तःकरण की समस्त क्रियाओं को सम्पन्न कर रहे हैं। उन्होंने स्वयं को छिपा रखा है पर हर समय हमारे साथ हैं। मैं उनके प्रति पूर्णतः समर्पित हूँ। ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ अगस्त २०२१


यह संसार एक युद्धभूमि है, हमारा जीवन किसी युद्ध से कम नहीं है ---

 

यह संसार एक युद्धभूमि है, हमारा जीवन किसी युद्ध से कम नहीं है ---
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यह संसार एक युद्धभूमि है, और हमारा जीवन किसी भी युद्ध से कम नहीं है। हम तो निमित्तमात्र है। भगवान स्वयं ही कर्ता और भोक्ता है। जहाँ हम स्वयं को कर्ता व भोक्ता मान लेते हैं, वहीं इसके परिणाम हमारे कर्मफलों में जुड़ जाते हैं। इस युद्ध में निःस्पृह समभाव और सत्यनिष्ठा से परमात्मा की चेतना में रत रहते हुए युद्ध करना हमारा स्वधर्म है। सुख-दुःख, लाभ-हानि, और जय-पराजय में कोई राग-द्वेष न हो तो कोई पाप नहीं लगेगा। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं ---
"सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥२:३८॥"
अर्थात् - "सुख-दु:ख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान करके युद्ध के लिये तैयार हो जाओ; इस प्रकार तुमको पाप नहीं होगा॥"
शरीर को अपना रूप समझना एक बहुत बड़ा पाप है। जैसा हम सोचते हैं, वैसा ही हो जाता है। यह सृष्टि हमारे ही विचारों का घनीभूत रूप है। जिन के विचार एक समान हों उन्हें "सुहृत्" कहते हैं। परमार्थ और मुमुक्षा के लिए साधना करने वालों के लिए सबसे बड़ी बाधा इस भौतिक देह की चेतना है।
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आज्ञाचक्र से ऊपर इस विराट अनंत आकाश में भगवान वासुदेव या परमशिव की एक छवि बनाकर रखो, जिसमें सारी सृष्टि समाहित है, और जो सारी सृष्टि में व्याप्त है। उससे परे व उससे अन्य कुछ भी नहीं है। उसी का ध्यान करते हुए, अपने पृथक अस्तित्व के बोध को उसी में समर्पित कर दो। उसी की चेतना में प्राणायाम, हंसः योग, नाद श्रवण, क्रियायोग, जपयोग, प्रत्यभिज्ञा ध्यान, आदि जिसकी भी प्रेरणा भगवान से मिले, वह साधना करो, लेकिन कर्ता भगवान को ही बनाओ। भगवान एक प्रवाह हैं, जिन्हें स्वयं के माध्यम से प्रवाहित होने दें। वे एक रस हैं, जिनका स्वाद चखें।
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एक बात याद रखें कि यह शरीर एक धोखेबाज मित्र है, उसकी देखभाल के लिए उसे उतना ही दें जितना उसके लिए आवश्यक है। इस लोकयात्रा के लिए मिला हुआ, वह एक वाहन मात्र है, जिसकी maintenance भी आवश्यक है।
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जो हम करना चाहते हैं, वह कर नहीं पाते। जो हम जानना चाहते हैं, वह जान नहीं पाते। यही हमारी पीड़ा है। कुछ करने, जानने व पाने की अतृप्त इच्छाओं को परमात्मा को सौंप दें। कुछ भी इच्छा या कामना को न रखें। परमात्मा में समर्पण ही वास्तविक स्वतन्त्रता है। परमात्मा में भक्ति द्वारा समर्पण से ही वैराग्य और ज्ञान की प्राप्ति होती है, और उसी से हमें मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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परमात्मा से पृथकता ही अज्ञान है, और यह अज्ञान ही सबसे बड़ा बंधन है। अब अतिम प्रश्न है कि आरंभ कहाँ से करे। यह भी भगवान पर छोड़ दें कि वे आरंभ कहाँ से करायें। मन-पसंद का भाव हमारा बहुत बड़ा शत्रु है।
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इस संसार में करने योग्य दो ही काम हैं --
(१) पूर्ण हृदय व पूर्ण प्रेम से परमात्मा का निरंतर ध्यान, जो हमारा स्वधर्म है।
(२) उसके पश्चात अपने स्वभावानुसार राष्ट्रधर्म और सामाजिक दायित्वों का पूर्ण निष्ठा से निर्वहन।
बाकि अन्य सब समय का दुरुपयोग है। शेष कुशल।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमः शिवाय ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ अगस्त २०२१
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पुनश्च: ---
(१) "सीता राम सीता राम, सीताराम कहिये, जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिये। मुख में हो राम नाम, राम सेवा हाथ में, तू अकेला नाहिं प्यारे, राम तेरे साथ में। विधि का विधान जान, हानि लाभ सहिये, जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिये॥"
(२) "सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ॥"

परमात्मा को पूर्ण समर्पण ही सबसे बड़ी साधना है ---

 

दान-पुण्य से उत्तम गति तो प्राप्त होती है, पर जन्म-मरण से छुटकारा नहीं मिलता। परमात्मा को पूर्ण समर्पण ही सबसे बड़ी साधना है। गीता में भगवान कहते हैं --
"तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥६:४६॥"
अर्थात् - "क्योंकि योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, और (केवल शास्त्र के) ज्ञान वालों से भी श्रेष्ठ माना गया है, तथा कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है, इसलिए हे अर्जुन तुम योगी बनो॥"
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पीछे मुड़कर न देखें, दृष्टि सदा सामने ही रहे, व चलते रहें। रुको मत। मन लगे या न लगे, अपना साधन न छोड़ें। दिन में तीन-चार घंटे तो भजन (नामजप, ध्यान प्राणायाम आदि) करना ही है। कोई बहाने न बनाएँ। मन नहीं लगे तो भी बैठे रहो, पर साधन छूटना नहीं चाहिए। बाधाएँ तो बहुत आयेंगी। असुर और देवता भी नहीं चाहते कि किसी साधक की साधना सफल हो। वे भी मार्ग में बाधाएँ उत्पन्न करते रहते हैं। इस मार्ग में सिर्फ सद्गुरु की कृपा ही काम आती है। गुरु चूंकि परमात्मा के साथ एक है, और उनसे बड़ा हितकारी अन्य कोई नहीं है, अतः उन्हीं की कृपा साधक की रक्षा करती है।
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सूक्ष्म प्राणायाम द्वारा पाप नष्ट होते हैं, जिनकी विधि सिद्ध गुरु ही बता सकता है। गुरु सेवा का अर्थ होता है -- "गुरु-प्रदत्त साधना का अनवरत नियमित अभ्यास।" परमात्मा के किस रूप का ध्यान करना है, वह भी गुरु ही बताता है।
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सभी को शुभ कामनाएँ और नमन ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ अगस्त २०२१