Sunday, 15 August 2021

विहंगावलोकन ---

 

विहंगावलोकन---
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"ॐ ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं, द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्|
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि||"
"मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्| यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥"
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सिंहावलोकन या विहंगावलोकन कुछ भी कहिए, जब अतीत पर दृष्टि डालता हूँ तो एक प्रश्न उठता है कि क्या यह जीवन भी यों ही व्यर्थ चला गया है? कई जन्मों पूर्व एक संकल्प किया था, जिसके पश्चात कई जन्म निकल गए, पर वह संकल्प इस जन्म में भी पूर्ण नहीं हुआ| दोष स्वयं का ही है, किसी अन्य का नहीं; पूर्व जन्मों में कोई अच्छे कर्म नहीं किए थे, इसलिए यह जन्म लेना पड़ा, और यह भी व्यर्थ ही चला गया| कुछ भी सकारात्मक कार्य करने का साहस नहीं जुटा पाया| जब तक वह संकल्प पूर्ण नहीं होगा, फिर इसी धरा पर जन्म लेना पड़ेगा| अब तो भगवान स्वयं ही करुणावश मुझे माध्यम बना कर वह संकल्प पूर्ण करेंगे, जो मेरे वश की बात नहीं है|
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आत्मा नित्य मुक्त है, किसी भी तरह का मोक्ष या मुक्ति मुझे नहीं चाहिए| मुक्त तो पहले से ही हूँ, ये सारे बंधन अनेक जन्मों में स्वयं के द्वारा ही स्वयं पर थोपे हुए हैं, जिन से मुक्त होना अब स्वयं के वश की बात नहीं है| अब तो भगवान स्वयं ही करुणावश यह सारा कार्य करेंगे| मोक्ष की कामना एक बंधन से दूसरे बंधन में जाने की कामना है, जैसे लोहे की बेड़ियों के स्थान पर सोने-चाँदी की बेड़ियाँ पहिनना| स्वर्ग से अधिक घटिया स्थान इस सृष्टि में कोई अन्य नहीं है, वहाँ ईश्वर नहीं है, सिर्फ इंद्रिय भोग ही भोग हैं| पुण्य समाप्त होने पर धक्का मारकर बापस पृथ्वी पर फेंक दिया जाता है| वैसे ही जैसे आप किसी पहाड़ी पर किसी पाँच सितारा होटल में जायें, जब तक पैसा है, होटल वाले आपका स्वागत करेंगे, पैसा समाप्त होते ही बिना सामान के धक्का मार कर बाहर फेंक देंगे, जहाँ आप को कोई भिखारी भी नहीं पूछेगा|
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एक ही बात अच्छी हुई है कि पूर्व जन्म में जो मेरे गुरु थे, उनकी सत्ता सूक्ष्म जगत में है, जहाँ से वे सूक्ष्म देह में अब भी मेरा मार्गदर्शन और रक्षा कर रहे हैं| इस जन्म में भी वे ही गुरु और मार्गदर्शक व संरक्षक हैं| पूरी शाश्वतता में वे ही गुरु व मार्गदर्शक रहेंगे| उन्होने कभी मेरा साथ नहीं छोड़ा, क्योंकि वे मेरे सबसे बड़े हितैषी हैं| अब पूर्व जन्म की सभी स्मृतियों को भी भुला देना चाहता हूँ| किसी भी तरह की कोई कामना अब नहीं रही है|
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इस जन्म में मेरे जो आध्यात्मिक रूप से हितैषी मित्र थे, वे सब मेरे से नाराज चल रहे हैं क्योंकि मैं उनकी अपेक्षाओं और मापदण्डों पर कभी खरा नहीं उतर पाया| वे मुझे क्षमा करें| जो प्रारब्ध में लिखा होता है, वही होता है|
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हिमालय जितनी बड़ी-बड़ी अपनी सभी कमियों को और स्वयं को गुरु महाराज के चरण-कमलों में समर्पित कर रहा हूँ| वे परमात्मा के साथ एक हैं, उनमें और परमात्मा में कोई भेद नहीं है| अब से कभी किसी कामना का जन्म ही न हो|
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"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च |
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ||
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व |
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ||"
कृपा शंकर
१५ अगस्त २०२०

Thursday, 12 August 2021

ईश्वर की अनुभूति ईश्वर की कृपा से ही होती है? ---

 

ईश्वर की अनुभूति ईश्वर की कृपा से ही कैसे होती है?---
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इस विषय पर मैंने लिखना तो आरंभ कर दिया है पर पता नहीं इस लेख का समापन कर पाऊँगा या नहीं| हो सकता है बीच में ही बंद कर इसे मिटाना भी पड़े, क्योंकि विषय बहुत अधिक कठिन है जिसे सरलतम भाषा में और कम से कम शब्दों में व्यक्त करना तो और भी अधिक कठिन है| यह एक परिचयात्मक लेख है जिसे सरलतम भाषा में कम से कम शब्दों में लिखने का प्रयास कर रहा हूँ| ईश्वर की कृपा हुई तो यह लेख पूरा हो जाएगा, अन्यथा नहीं| कहीं कोई त्रुटि रह जाये तो मेरी भूल-चूक माफ करें|
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जब हम इस पृथ्वी की भूमध्य रेखा पर से या उस से नीचे दक्षिण गोलार्ध में खड़े होकर ध्रुव तारे को देखने का प्रयास करते हैं तो वह बिल्कूल भी दिखाई नहीं देगा, चाहे पहाड़ पर ही चढ़ कर कितनी भी शक्तिशाली दूरबीनों से देखने का प्रयास कर लें| जैसे जैसे हम भूमध्य रेखा से उत्तर की ओर बढ़ते है तब धीरे-धीरे ध्रुव तारा धुंधला सा दिखाई देने लगता है, जब कि भूगोल शास्त्र के अनुसार के अनुसार यह पृथ्वी से दिखाई देने वाले तारों में से ४५वाँ सबसे अधिक चमकदार तारा है| आज जो ध्रुव तारा हमें दिखाई दे रहा है वह वहाँ ४३४ वर्ष पूर्व था| ध्रुवतारे का प्रकाश जब वहाँ से चला था, तब से पृथ्वी तक पहुँचने में उसे ४३४ वर्ष लगे| इसकी चमक हमारे सूर्य से २२०० गुणा अधिक है, और हमारे सूर्य से यह ३० गुना अधिक बड़ा भी है| जैसे जैसे हम उत्तर की ओर बढ़ते हैं वैसे वैसे ही उसकी चमक भी बढ्ने लगती है| फिर भी ४५ डिग्री उत्तरी अक्षांस रेखा तक वह धुंधला ही दिखाई देखा| ४५ डिग्री उत्तरी अक्षांस रेखा से उत्तर में वह एक चमकीले तारे के रूप में दिखाई देगा| ध्रुव क्षेत्र तक पहुँचने से पूर्व भूतल से कुछ ऊपर की ऊँचाई पर हमें वायुमंडल में आकर्षक रंगीन प्रकाश की छटायें दिखाई देने लगती हैं, जिन्हें "ध्रुवीय प्रकाश" या "मेरु ज्योति" (Aurora Borealis) कहते हैं| ध्रुवीय प्रकाश हरे-पीले पर्दे की आकृति में दिखाई देने वाली प्रकाश की एक पट्टी की तरह दिखाई देता है जो कभी-कभी गहरे लाल रंग के दहकते हुए अंगारे के रूप में भी दिखाई देने लगता है| कभी-कभी तीव्र ध्रुवीय प्रकाश के साथ-साथ वायुमंडल में गड़गड़ाहट भी सुनाई देती है, जो ११ वर्षों में एक बार तो बहुत अधिक हो जाती है| ध्रुव क्षेत्र से पहले एक क्षेत्र ऐसा भी आता है जहाँ मध्य रात्रि में सूर्य कुछ समय के लिए दिखाई देता है (यह मैंने अपनी स्वयं की आँखों से देखा है), बाकी हर समय धुंध रहती है| ध्रुव क्षेत्र में धुंध रहती है, पर सब कुछ दिखाई देता है|
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अब तक मैंने जो कुछ भी लिखा है, उसे एक आध्यात्मिक रूप देता हूँ| हमारी प्राण-ऊर्जा बहिर्मुखी होती है जो निरंतर बाहर की ओर निःसृत होती रहती है| अपने आचरण और विचारों को पवित्र कर (जो पूर्ण आवश्यक है) जब हम भगवान के प्रति भक्ति के साथ-साथ, अजपा-जप करते हुए भ्रूमध्य पर ध्यान करते हैं, और अपनी चेतना का विस्तार करते हैं, तब वह बहिर्मुखी प्राण-ऊर्जा अंतर्मुखी होने लगती है, और धीरे धीरे मूलाधार चक्र में प्रकट होकर ऊर्ध्वमुखी हो, ऊपर की ओर उठने लगती है| यह कुंडलिनी जागरण है| ऊर्ध्वमुखी घनीभूत प्राण-ऊर्जा ही कुंडलिनी शक्ति है| हमारी देह का मणिपुर चक्र, देह की भूमध्य रेखा है| जब तक हमारी चेतना इसके नीचे है, हमें परमात्मा का प्रकाश नहीं दिखाई दे सकता| जैसे-जैसे हम ऊपर उठते हैं, कूटस्थ में एक धुंधली ज्योति के दर्शन होने लगते हैं| गुरुकृपा से जब वह घनीभूत ऊर्जा अनाहत चक्र तक पहुँचती है तब भक्ति का उदय होता है| विशुद्धि चक्र को पार करने पर विस्तार की अनुभूतियाँ होने लगती हैं, और उस ब्रह्म-ज्योति के दर्शन स्पष्ट रूप से होने लगते हैं| तब लगता है कि हम यह देह नहीं, परमात्मा की अनंतता हैं| जब वह ऊर्जा आज्ञाचक्र का भेदन करती है तब ज्योतिर्मय ब्रह्म के स्पष्ट दर्शन होने लगते हैं और अनाहत नाद भी स्पष्ट रूप से स्वतः ही सुनाई देने लगता है, और हम उनके साथ एक होने लगते हैं| वास्तविक रूप से आध्यात्मिक यात्रा भी यहीं से आरंभ होती है| इससे आगे सहस्त्रार में ज्ञान-क्षेत्र, श्रीबिन्दु और पराक्षेत्र हैं, ज्येष्ठा, वामा और रौद्री ग्रंथियां हैं, ब्रह्मरंध्र और उससे बाहर की अनंतता से भी परे परमशिव हैं| योग-साधना का लक्ष्य कुंडलिनी महाशक्ति का परमशिव में विलय है|
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यह एक परिचयात्मक लेख है जिसका उद्देश्य एक जिज्ञासा उत्पन्न करना है| असली ज्ञान तो किसी ब्रह्मनिष्ठ सिद्ध सदगुरु के सान्निध्य में साधना करने पर भगवान की कृपा से ही होता है|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
१२ अगस्त २०२०

Monday, 9 August 2021

पूर्व जन्मों के आचार्यों की कृपा ---

 

पूर्व जन्मों के आचार्यों की कृपा ---
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मुझ अकिंचन पर पूर्व जन्मों के आचार्यों की बड़ी कृपा रही है। कई गोपनीय बातें हैं, जो निषेधात्मक कारणों से बताई नहीं जा सकतीं, लेकिन यह सत्य है कि सूक्ष्म जगत की कुछ महान आत्माओं ने सदा मेरा मार्गदर्शन किया है, और अब इसी समय भी कर रही हैं। समय समय पर उन्होनें मेरी रक्षा भी की है। भगवान की कृपा से थोड़ा-बहुत सत्संग जो आप सब महात्माओं के साथ हो जाता है, वह पूर्व जन्मों के आचार्य चरणों की ही कृपा है।
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जब तक मनुष्य स्वयं को यह शरीर, और संसार को अपना मानता है, तब तक वह एक भक्त और योगी नहीं हो सकता। भोगी मनुष्य भगवत्प्रेम का अधिकारी नहीं होता, वह सिर्फ सेवक हो सकता है। जिन का आचरण पवित्र है, उन्हीं के चरण पूज्य हैं। एक बहुत बड़ा रहस्य है --
यदि हम परमात्मा को निरंतर अपनी स्मृति में रखते हैं, और वे हमारे साथ हैं, तो भूलवश कोई पाप भी हमारे से हो जाये, तो वह प्रकृति द्वारा क्षमा कर दिया जाता है। भगवान के अनुग्रह में बड़ा सामर्थ्य है। हमारी हिमालय से भी बड़ी बड़ी भूलें उनके कृपा-सिंधु में एक साधारण छोटे कंकर-पत्थर से अधिक नहीं है। वे वहाँ भी शोभा दे रही हैं।
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खूब स्मरण करो, खूब प्राणायाम करो, खूब स्वाध्याय, सत्संग और ध्यान करो, -- इन सब का लक्ष्य हमें समर्पण के योग्य बनाना है। अपरिछिन्न ब्रह्म से एकाकार होना ही हमारा सत्य सनातन धर्म है, जो हमें स्वतंत्र और मुक्त कर सकता है।
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सभी संत आचार्य महात्माओं के चरण कमलों में मेरा कोटि कोटि नमन !!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
९ अगस्त २०२१

निष्काम कर्म क्या है? ---

 

निष्काम कर्म क्या है? ---
भगवान से प्रेम और समर्पण भाव से निरंतर उनका स्मरण ही "निष्काम कर्म" है। प्रेम में कोई कामना नहीं होती। कूटस्थ में हम भगवान के साथ एक हैं। हमारी चेतना हर समय आज्ञा चक्र से ऊपर ही रहे। सहस्त्रार चक्र में ध्यान - गुरु-चरणों का ध्यान है। जब भी समय मिले, गुरु-चरणों का ध्यान करो और वहाँ से निःसृत हो रही प्रणव की ध्वनि को सुनते रहो। अपनी ज्योतिर्मय चेतना का विस्तार करते करते उसे सारे ब्रह्मांड की अनंतता में फैला दो। वह विराट अनंतता ही हम हैं, यह भौतिक देह नहीं। उस विराट अनंतता का ध्यान ही अपरिछिन्न ब्रह्म का ध्यान है।
हमारी हरेक गतिविधि के कर्ता और भोक्ता स्वयं भगवान हों। वे निरंतर हमारे जीवन के केंद्र बिन्दु हों। भगवान की भक्ति (परम प्रेम) ही सार है, अन्य सब निःसार है।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
१० अगस्त २०२१

यह दुनिया परमात्मा की है, हमारी नहीं; उसकी मर्जी, वह इसे चाहे जैसे चलाये ---

 

इस सृष्टि में सभी की अपनी अपनी समस्यायें हैं, अपनी अपनी पीड़ा है| जिस समय ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ, पृथ्वी का उत्तरी गोलार्ध युद्ध के मुहाने पर खड़ा है, पश्चिमी एशिया का एक शानदार देश गृहयुद्ध झेल रहा है और नष्ट हो रहा है| कई देश नष्ट हो चुके हैं| भारत की भी अति गंभीर समस्यायें हैं, और हर नागरिक की भी| मेरी भी पीड़ायें हैं... एक-दो नहीं बहुत सारीं| गहराई से सोचता हूँ तो चार प्रश्न दिमाग में आते हैं...
(१) कौन कष्ट पा रहा है? (२) क्या कष्ट पा रहा है? (३) क्या मैं सचमुच दुःखी हूँ? (४) इन दुःखों और कष्टों के मध्य मेरा क्या कर्तव्य है?
इन के उत्तर भी लिख रहा हूँ|
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(१) कौन कष्ट पा रहा है? ... जिसने यह सृष्टि रची है, वह परमात्मा स्वयं ही जीवों के रूप में कष्ट पा रहा है, और स्वयं को ही कष्ट दे रहा है| आनंद भी वही है और कष्ट भी वही है|
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(२) क्या कष्ट पा रहा है? ... हमारा अहंकार और पृथकता का बोध ही कष्ट पा रहा है| यह सदा कष्ट ही पायेगा| सृष्टि की रचना ही इस आधार हुई है कि अहंकार और सुख कभी साथ-साथ नहीं रह सकते|
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(३) क्या मैं सचमुच ही दुःखी हूँ? ... जिसने मुझे बनाया, वह परमात्मा ही दुखी है, मैं नहीं| उसका कष्ट और पीड़ा ही मुझ में व्यक्त हो रही हैं|
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(४) इन दुःखों और कष्टों के मध्य मेरा क्या कर्तव्य है? ... इसका उत्तर गीता में भगवान श्रीकृष्ण देते हैं .....
"उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्‌ | आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः||६:५||"
अर्थात हम अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करें, और अपने को अधोगति में न डाले| क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है||"
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यह दुनिया परमात्मा की है, हमारी नहीं| उसकी मर्जी, वह इसे चाहे जैसे चलाये| पर उसकी अभिव्यक्ति उसके विश्व में निरंतर हो| इस संसार में कष्ट ही कष्ट हैं, कोई आनंद नहीं| आनंद सिर्फ परमात्मा में है| भूतकाल चाहे जितना भी दुःखद हो, उसे तो हम बदल नहीं सकते, भविष्य हमारे लिए एक स्वप्न मात्र है| हमारा अधिकार सिर्फ वर्तमान पर है| जैसा भविष्य हम चाहते हैं, वैसे ही वर्तमान का निर्माण करें| यह परिवर्तन स्वयं से हो, वर्तमान हमारे आदर्शों का हो| दुनियादारी की सब पुरानी बातों को भूल कर अपना हृदय, पूर्ण प्रेम पूर्वक परमात्मा को ही दे देने में सार्थकता और समझदारी है|
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मैं तो एक फूल हूँ, मुरझा गया तो मलाल क्यों ?
तुम तो महक हो, हवाओं में जिसे समाना है ||
कृपा शंकर
१० अगस्त २०२०

🌹🌹🌹श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की शुभ कामनायें🌹🌹🌹 🙏भगवान श्रीकृष्ण हमारे चैतन्य में प्रखरता से व्यक्त हों🙏 ---

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की शुभ कामनायें. भगवान श्रीकृष्ण हमारे चैतन्य में प्रखरता से व्यक्त हों

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"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने, प्रणत क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:||"
"वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् | देवकीपरमानन्दं कृष्णं वंदे जगद्गुरुम् ||"
"वंशी विभूषित करा नवनीर दाभात्, पीताम्बरा दरुण बिंब फला धरोष्ठात्|
पूर्णेन्दु सुन्दर मुखादर बिंदु नेत्रात्, कृष्णात परम किमपि तत्व अहं न जानि||"
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मेरा सुझाव है कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन, कम से कम बात करें, कम से कम लोगों से मिलें, टीवी आदि न देखें, व अधिकाधिक मानसिक नामजप पूर्ण भक्तिभाव से करें| मध्याह्न में पर्याप्त विश्राम करें, और सायंकाल सात बजे दुबारा स्नान कर, थोड़ी देर बहुत ही हल्का ऊर्जादायी व्यायाम और प्राणायाम कर के रात्रि को आठ घंटे के लिए भगवान के ध्यान में बैठ जाएँ| भूमि पर नहीं बैठ सकते तो कुर्सी पर बैठ कर करें| कमर सीधी रहे, दृष्टि भ्रूमध्य में, और चेतना कूटस्थ में| थक जाएँ तो कुछ देर महामुद्रा आदि व प्राणायाम करें| इससे थकावट दूर हो जाएगी| फिर बापस ध्यान में बैठ जाएँ|
प्रस्तावित समय :---
सायं ८ बजे से मध्यरात्रि १२ बजे तक,
फिर मध्यरात्रि १२.३० से प्रातः ५ बजे तक|
सशक्त व स्वस्थ हों तभी ध्यान करें, अन्यथा नहीं| ध्यान का समापन समष्टि के कल्याण की प्रार्थना के साथ करें| भगवान की कृपा आप सभी पर बनी रहे|
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"कस्तूरी तिलकं ललाट पटले वक्ष: स्थले कौस्तुभं।
नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणु: करे कंकणं॥
सर्वांगे हरि चन्दनं सुललितं कंठे च मुक्तावली।
गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपाल चूडामणि:॥"
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||"
कृपा शंकर
१० अगस्त २०२०

Saturday, 7 August 2021

सदा समभाव में स्थित रहने का अभ्यास करें ---

परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, इसलिये सदा समभाव में स्थित रहने का अभ्यास करें। इन्द्रिय सुख और वासनाएँ मीठा विष हैं। कर्तापन का अभिमान पाप है। मैंने इतने दान-पुण्य किये, मैनें इतने परोपकार के कार्य किये, मैनें इतनी साधना की, इतने जप-तप किए, मैं इतना बड़ा भक्त हूँ, मैं इतना बड़ा साधक हूँ, मेरे जैसा धर्मात्मा कोई नहीं है -- ऐसे भाव पापकर्म हैं, क्योंकि इन से अहंकार बढता है। जिस से अहंकार की निवृति हो -- वही पुण्य है।

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श्रीमद्भगवद्गीता में जिस समत्व की बात कही गयी है, वह ही ज्ञान है। जिस ने समत्व को प्राप्त किया है, वह ही ज्ञानी है, और वह ही स्थितप्रज्ञ है। जो सुख-दुःख, हानि-लाभ, यश-अपयश, मान-अपमान आदि में समभाव रखता है, और राग-द्वेष व अहंकार से परे है, वह ही ज्ञानी कहलाने का अधिकारी है। बहुत सारी जानकारी प्राप्त करना, अनुभव और सीख -- ज्ञान नहीं है। जिसने ग्रन्थों को रट रखा है और बहुत कुछ अनुभव से या पुस्तकों से सीखा है वह भी ज्ञानी नहीं है। ज्ञानी वही है जो समत्व में स्थित है। ॐ तत्सत्॥
कृपा शंकर
८ अगस्त २०२१