Monday, 9 August 2021

पूर्व जन्मों के आचार्यों की कृपा ---

 

पूर्व जन्मों के आचार्यों की कृपा ---
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मुझ अकिंचन पर पूर्व जन्मों के आचार्यों की बड़ी कृपा रही है। कई गोपनीय बातें हैं, जो निषेधात्मक कारणों से बताई नहीं जा सकतीं, लेकिन यह सत्य है कि सूक्ष्म जगत की कुछ महान आत्माओं ने सदा मेरा मार्गदर्शन किया है, और अब इसी समय भी कर रही हैं। समय समय पर उन्होनें मेरी रक्षा भी की है। भगवान की कृपा से थोड़ा-बहुत सत्संग जो आप सब महात्माओं के साथ हो जाता है, वह पूर्व जन्मों के आचार्य चरणों की ही कृपा है।
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जब तक मनुष्य स्वयं को यह शरीर, और संसार को अपना मानता है, तब तक वह एक भक्त और योगी नहीं हो सकता। भोगी मनुष्य भगवत्प्रेम का अधिकारी नहीं होता, वह सिर्फ सेवक हो सकता है। जिन का आचरण पवित्र है, उन्हीं के चरण पूज्य हैं। एक बहुत बड़ा रहस्य है --
यदि हम परमात्मा को निरंतर अपनी स्मृति में रखते हैं, और वे हमारे साथ हैं, तो भूलवश कोई पाप भी हमारे से हो जाये, तो वह प्रकृति द्वारा क्षमा कर दिया जाता है। भगवान के अनुग्रह में बड़ा सामर्थ्य है। हमारी हिमालय से भी बड़ी बड़ी भूलें उनके कृपा-सिंधु में एक साधारण छोटे कंकर-पत्थर से अधिक नहीं है। वे वहाँ भी शोभा दे रही हैं।
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खूब स्मरण करो, खूब प्राणायाम करो, खूब स्वाध्याय, सत्संग और ध्यान करो, -- इन सब का लक्ष्य हमें समर्पण के योग्य बनाना है। अपरिछिन्न ब्रह्म से एकाकार होना ही हमारा सत्य सनातन धर्म है, जो हमें स्वतंत्र और मुक्त कर सकता है।
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सभी संत आचार्य महात्माओं के चरण कमलों में मेरा कोटि कोटि नमन !!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
९ अगस्त २०२१

निष्काम कर्म क्या है? ---

 

निष्काम कर्म क्या है? ---
भगवान से प्रेम और समर्पण भाव से निरंतर उनका स्मरण ही "निष्काम कर्म" है। प्रेम में कोई कामना नहीं होती। कूटस्थ में हम भगवान के साथ एक हैं। हमारी चेतना हर समय आज्ञा चक्र से ऊपर ही रहे। सहस्त्रार चक्र में ध्यान - गुरु-चरणों का ध्यान है। जब भी समय मिले, गुरु-चरणों का ध्यान करो और वहाँ से निःसृत हो रही प्रणव की ध्वनि को सुनते रहो। अपनी ज्योतिर्मय चेतना का विस्तार करते करते उसे सारे ब्रह्मांड की अनंतता में फैला दो। वह विराट अनंतता ही हम हैं, यह भौतिक देह नहीं। उस विराट अनंतता का ध्यान ही अपरिछिन्न ब्रह्म का ध्यान है।
हमारी हरेक गतिविधि के कर्ता और भोक्ता स्वयं भगवान हों। वे निरंतर हमारे जीवन के केंद्र बिन्दु हों। भगवान की भक्ति (परम प्रेम) ही सार है, अन्य सब निःसार है।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
१० अगस्त २०२१

यह दुनिया परमात्मा की है, हमारी नहीं; उसकी मर्जी, वह इसे चाहे जैसे चलाये ---

 

इस सृष्टि में सभी की अपनी अपनी समस्यायें हैं, अपनी अपनी पीड़ा है| जिस समय ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ, पृथ्वी का उत्तरी गोलार्ध युद्ध के मुहाने पर खड़ा है, पश्चिमी एशिया का एक शानदार देश गृहयुद्ध झेल रहा है और नष्ट हो रहा है| कई देश नष्ट हो चुके हैं| भारत की भी अति गंभीर समस्यायें हैं, और हर नागरिक की भी| मेरी भी पीड़ायें हैं... एक-दो नहीं बहुत सारीं| गहराई से सोचता हूँ तो चार प्रश्न दिमाग में आते हैं...
(१) कौन कष्ट पा रहा है? (२) क्या कष्ट पा रहा है? (३) क्या मैं सचमुच दुःखी हूँ? (४) इन दुःखों और कष्टों के मध्य मेरा क्या कर्तव्य है?
इन के उत्तर भी लिख रहा हूँ|
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(१) कौन कष्ट पा रहा है? ... जिसने यह सृष्टि रची है, वह परमात्मा स्वयं ही जीवों के रूप में कष्ट पा रहा है, और स्वयं को ही कष्ट दे रहा है| आनंद भी वही है और कष्ट भी वही है|
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(२) क्या कष्ट पा रहा है? ... हमारा अहंकार और पृथकता का बोध ही कष्ट पा रहा है| यह सदा कष्ट ही पायेगा| सृष्टि की रचना ही इस आधार हुई है कि अहंकार और सुख कभी साथ-साथ नहीं रह सकते|
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(३) क्या मैं सचमुच ही दुःखी हूँ? ... जिसने मुझे बनाया, वह परमात्मा ही दुखी है, मैं नहीं| उसका कष्ट और पीड़ा ही मुझ में व्यक्त हो रही हैं|
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(४) इन दुःखों और कष्टों के मध्य मेरा क्या कर्तव्य है? ... इसका उत्तर गीता में भगवान श्रीकृष्ण देते हैं .....
"उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्‌ | आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः||६:५||"
अर्थात हम अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करें, और अपने को अधोगति में न डाले| क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है||"
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यह दुनिया परमात्मा की है, हमारी नहीं| उसकी मर्जी, वह इसे चाहे जैसे चलाये| पर उसकी अभिव्यक्ति उसके विश्व में निरंतर हो| इस संसार में कष्ट ही कष्ट हैं, कोई आनंद नहीं| आनंद सिर्फ परमात्मा में है| भूतकाल चाहे जितना भी दुःखद हो, उसे तो हम बदल नहीं सकते, भविष्य हमारे लिए एक स्वप्न मात्र है| हमारा अधिकार सिर्फ वर्तमान पर है| जैसा भविष्य हम चाहते हैं, वैसे ही वर्तमान का निर्माण करें| यह परिवर्तन स्वयं से हो, वर्तमान हमारे आदर्शों का हो| दुनियादारी की सब पुरानी बातों को भूल कर अपना हृदय, पूर्ण प्रेम पूर्वक परमात्मा को ही दे देने में सार्थकता और समझदारी है|
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मैं तो एक फूल हूँ, मुरझा गया तो मलाल क्यों ?
तुम तो महक हो, हवाओं में जिसे समाना है ||
कृपा शंकर
१० अगस्त २०२०

🌹🌹🌹श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की शुभ कामनायें🌹🌹🌹 🙏भगवान श्रीकृष्ण हमारे चैतन्य में प्रखरता से व्यक्त हों🙏 ---

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की शुभ कामनायें. भगवान श्रीकृष्ण हमारे चैतन्य में प्रखरता से व्यक्त हों

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"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने, प्रणत क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:||"
"वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् | देवकीपरमानन्दं कृष्णं वंदे जगद्गुरुम् ||"
"वंशी विभूषित करा नवनीर दाभात्, पीताम्बरा दरुण बिंब फला धरोष्ठात्|
पूर्णेन्दु सुन्दर मुखादर बिंदु नेत्रात्, कृष्णात परम किमपि तत्व अहं न जानि||"
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मेरा सुझाव है कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन, कम से कम बात करें, कम से कम लोगों से मिलें, टीवी आदि न देखें, व अधिकाधिक मानसिक नामजप पूर्ण भक्तिभाव से करें| मध्याह्न में पर्याप्त विश्राम करें, और सायंकाल सात बजे दुबारा स्नान कर, थोड़ी देर बहुत ही हल्का ऊर्जादायी व्यायाम और प्राणायाम कर के रात्रि को आठ घंटे के लिए भगवान के ध्यान में बैठ जाएँ| भूमि पर नहीं बैठ सकते तो कुर्सी पर बैठ कर करें| कमर सीधी रहे, दृष्टि भ्रूमध्य में, और चेतना कूटस्थ में| थक जाएँ तो कुछ देर महामुद्रा आदि व प्राणायाम करें| इससे थकावट दूर हो जाएगी| फिर बापस ध्यान में बैठ जाएँ|
प्रस्तावित समय :---
सायं ८ बजे से मध्यरात्रि १२ बजे तक,
फिर मध्यरात्रि १२.३० से प्रातः ५ बजे तक|
सशक्त व स्वस्थ हों तभी ध्यान करें, अन्यथा नहीं| ध्यान का समापन समष्टि के कल्याण की प्रार्थना के साथ करें| भगवान की कृपा आप सभी पर बनी रहे|
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"कस्तूरी तिलकं ललाट पटले वक्ष: स्थले कौस्तुभं।
नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणु: करे कंकणं॥
सर्वांगे हरि चन्दनं सुललितं कंठे च मुक्तावली।
गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपाल चूडामणि:॥"
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||"
कृपा शंकर
१० अगस्त २०२०

Saturday, 7 August 2021

सदा समभाव में स्थित रहने का अभ्यास करें ---

परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, इसलिये सदा समभाव में स्थित रहने का अभ्यास करें। इन्द्रिय सुख और वासनाएँ मीठा विष हैं। कर्तापन का अभिमान पाप है। मैंने इतने दान-पुण्य किये, मैनें इतने परोपकार के कार्य किये, मैनें इतनी साधना की, इतने जप-तप किए, मैं इतना बड़ा भक्त हूँ, मैं इतना बड़ा साधक हूँ, मेरे जैसा धर्मात्मा कोई नहीं है -- ऐसे भाव पापकर्म हैं, क्योंकि इन से अहंकार बढता है। जिस से अहंकार की निवृति हो -- वही पुण्य है।

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श्रीमद्भगवद्गीता में जिस समत्व की बात कही गयी है, वह ही ज्ञान है। जिस ने समत्व को प्राप्त किया है, वह ही ज्ञानी है, और वह ही स्थितप्रज्ञ है। जो सुख-दुःख, हानि-लाभ, यश-अपयश, मान-अपमान आदि में समभाव रखता है, और राग-द्वेष व अहंकार से परे है, वह ही ज्ञानी कहलाने का अधिकारी है। बहुत सारी जानकारी प्राप्त करना, अनुभव और सीख -- ज्ञान नहीं है। जिसने ग्रन्थों को रट रखा है और बहुत कुछ अनुभव से या पुस्तकों से सीखा है वह भी ज्ञानी नहीं है। ज्ञानी वही है जो समत्व में स्थित है। ॐ तत्सत्॥
कृपा शंकर
८ अगस्त २०२१

भारत छोड़ो आंदोलन के बारे में मेरे विचार ---

 भारत छोड़ो आंदोलन ---

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८ अगस्त १९४२ का दिन बहुत प्रसिद्ध है। इस दिन श्री मोहनदास-करमचंद गांधी द्वारा मुंबई के "अगस्त क्रान्ति मैदान" में "भारत छोड़ो आंदोलन" आरंभ किया गया था। उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध (१ सितंबर १९३९ - २ सितंबर १९४५) चल रहा था। यह एक बहुत विराट देशव्यापी आन्दोलन था जिसका लक्ष्य भारत से ब्रितानी साम्राज्य को समाप्त करना था।
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इस आन्दोलन को अंग्रेजों ने बड़ी निर्दयता और निर्ममता से पूरे देश में बहुत बुरी तरह कुचल दिया था, इस लिए यह सफल नहीं हुआ। गाँधी जी को फ़ौरन गिरफ़्तार कर लिया गया था। जयप्रकाश नारायण भूमिगत हो गए थे। फिर श्री लालबहादुर शास्त्री ने इस आन्दोलन का नेतृत्व किया। "करो या मरो" का नारा गांधीजी ने दिया था जिसे लालबहादुर शास्त्री जी ने "मरो नहीं, मारो" बना दिया।
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कुछ राजनीतिक विचारकों के अनुसार इस आंदोलन की विफलता का कारण गलत समय पर गलत राजनीति से प्रेरित होना था। ९ अगस्त १९२५ को पं.रामप्रसाद 'बिस्मिल' के नेतृत्व में दस जुझारू कार्यकर्ताओं ने काकोरी काण्ड किया था जिसकी यादगार ताजा रखने के लिये पूरे देश में प्रतिवर्ष ९ अगस्त को "काकोरी काण्ड स्मृति-दिवस" मनाने की परम्परा भगत सिंह ने आरम्भ कर दी थी जिसमें बहुत बड़ी संख्या में नौजवान एकत्र होते थे। गांधीजी चाहते थे कि जनता उसे भूल जाए। इसलिए उन्होंने इस आन्दोलन का समय आठ और नौ अगस्त को रखा।
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विद्यालयों में तो हमें यही पढ़ाया गया था कि हमें स्वतन्त्रता इसी आन्दोलन के कारण मिली। लेकिन यह झूठ था। बड़े होकर ही हमें पता चला कि स्वतन्त्रता निम्न दो कारणों से मिली --
(१) द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति तक अंग्रेजी सेना की कमर टूट गयी थी और वह भारत पर अपना नियंत्रण रखने में असमर्थ थी। भारतीय सैनिकों ने अँगरेज़ अफसरों के आदेश मानने और उन्हें सलामी देना बंद कर दिया था। नौसेना ने विद्रोह कर दिया था और अँगरेज़ अधिकारियों को मुंबई के कोलाबा में बंदी बना लिया। इससे अँगरेज़ बहुत अधिक डर गए थे, और उन्होंने भारत छोड़ने का निर्णय ले लिया।
(२) नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना की और अपनी स्वतंत्र सेना बनाकर भारत की स्वतन्त्रता के लिए युद्ध आरम्भ कर दिया। वे इतने अधिक लोकप्रिय हो चुके थे कि उन्हें भारत के प्रधानमंत्री बनने से कोई नहीं रोक सकता था। अँगरेज़ भयभीत थे। उन्होंने भारत का अधिक से अधिक नुकसान किया, भारत को अधिक से अधिक लूटा, विभाजन किया और अपने मानसपुत्र को सता हस्तांतरित कर के भारत से चले गए|
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धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो !! भारत सदा विजयी रहे !! हर हर महादेव !!
ॐ तत्सत् !!
८ अगस्त २०२१

आत्मा से अन्य कुछ भी नहीं है ---

 आत्मा से अन्य कुछ भी नहीं है ---

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यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय "ईशावास्योपनिषद्" के मंत्र ६ और ७ कहते हैं ---
"यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥६॥"
(यः तु सर्वाणि भूतानि आत्मनि एव अनुपश्यति च सर्वभूतेषु आत्मानम्। ततः न विजुगुप्सते॥)
"यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७॥"
(यस्मिन् विजानतः आत्मा एव सर्वाणि भूतानि अभूत्। तत्र एकत्वम् अनुपश्यतः कः मोहः कः शोकः॥)
हिन्दी में भावार्थ --
जो सभी भूतों प्राणियों को आत्मा में ही देखता है, और सभी भूतों या सत्ताओं में आत्मा को; वह फिर सर्वत्र एक ही आत्मा के प्रत्यक्ष दर्शन के पश्चात्, किसी से घृणा नहीं करता।
पूर्ण ज्ञान, विज्ञान से सम्पन्न होने के कारण जिस मनुष्य के अन्दर यह परमोच्च चेतना जाग गयी है कि स्वयम्भू आत्मसत्ता ही स्वयं सभी भूत, सभी सत्ताएं या सम्भूतियां बना है, उस मनुष्य में फिर मोह कैसे होगा, शोक कहां से होगा जो सर्वत्र एकता का अनुभव करता है।