Tuesday, 25 September 2018

जिनकी भाषा अभद्र है, उन राजनेताओं से मुझे कोई मतलब नहीं है .....

जिनकी भाषा अभद्र है, उन राजनेताओं से मुझे कोई मतलब नहीं है .....
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कुछ राजनेता मूर्खतापूर्ण और असभ्य भाषा का प्रयोग कर रहे हैं मैं कभी भूल कर भी उन का समर्थन नहीं कर सकता, विशेषकर एक ऐसे घटिया राजनेता और उसके अंधभक्तों का जो अपना गला फाड़ फाड़ कर बिना किसी प्रमाण के देश के प्रधानमंत्री को चोर बता रहे हैं|
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मुझे सन १९६२ में हुए चीनी आक्रमण के समय का घटनाक्रम पूरी तरह याद है| उस समय मेरी आयु चौदह वर्ष की थी| वह युद्ध हम पूरी तरह तत्कालीन प्रधानमंत्री की मूर्खता के कारण हारे थे| उन्होंने अपने निज जीवन में ऐसा कोई भी कार्य नहीं किया जिसे हम आदर्श कह सकें| उनके समय देश का पहला रक्षा घोटाला हुआ था| उसके बाद उनके वंशज शासकों ने महा भयंकर घोटाले ही घोटाले किये| क्या इस घटिया राजनेता ने अपने पूर्वजों को कभी चोर कहा है?
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राफेल का पूरा विवाद यही है कि एक विमान के लिए २००७ में जो मूल्य निर्धारित हुआ था वह २०१७ में तीन गुणा कैसे हो गया? मेरा सीधा सा प्रश्न है कि सांसदों को इस समय उस समय से आठ गुणा अधिक वेतन क्यों मिल रहा है? सांसदों को भी भी वही वेतन मिलना चाहिए जो २००७ में मिल रहा था| कम से कम इस राजनेता के अंधभक्तों को तो ग्यारह वर्ष पुराना वेतन ही लेना चाहिए था|
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एक भवन के सामने मोहल्ले के सारे चोर एकत्र होकर नारे लगा रहे थे कि चौकीदार चोर है चोर है, ताकि वह चौकीदार भाग जाए औए वे खुल कर चोरी कर सकें| इस बात का राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं है|

सभी को साभार सादर धन्यवाद !
२५ सितम्बर २०१८
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श्री अरुण उपाध्याय जी द्वारा टिप्पणी .....

अन्य देशों में भी अपने देश का विरोध करने वाले हुए हैं, पर भारत से बहुत कम। दूसरे देशों में उनको दण्डित किया जाता है। यहां वे पूजनीय और आदर्श बन जाते हैं। एक और बड़ा अन्तर यह है कि अन्य स्थानों में सरकार विरोधी लोग ही विदेशी मदद लेते हैं, वह भी बहुत कम समय के लिए, उनके भक्त कभी नहीं होते।
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भारत जैसा कभी और कहीं नहीं हुआ कि शासक ही देश का सबसे बड़ा शत्रु हो और विश्व शान्ति और अहिंसा के नाम पर अपने ही देश की आधी भूमि दूसरे देश को सौंप दे तथा करोड़ देशवासियों की हत्या करवा दे। शासन पाने के लिये पाकिस्तान अलग किया गया, कश्मीर भी पाकिस्तान को देने की कोशिश हुयी और आज तक भारत से अलग ही है तथा संविधान की ३७० धारा का समर्थन कांग्रेस द्वारा हो रहा है। उसके बाद तिब्बत चीन को बिना लड़े सौंप दिया तथा उसकी अनुमति ब्रिटेन से लेने की कोशिश की। ब्रिटेन ने अपने विवेक का उपयोग करने के लिये कहा तो तुरत तिब्बत चीन को सौंप दिया। पाकिस्तान+ कश्मीर +तिब्बत का क्षेत्रफल वर्तमान भारत के बराबर है।
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हिन्दू मुस्लिम के आधार पर विभाजन हुआ, अतः पाकिस्तान मुस्लिम देश बना, पर भारत भी अल्पसंख्यक सुविधा के नाम पर व्यवहार में मुस्लिम देश ही रहा। यदि भारत हिन्दू देश नहीं था,तो पाकिस्तान के हिन्दू जान बचाने के लियॆ भारत क्यों आये, ईरान-अफगानिस्तान भी जा सकते थे। तिब्बत यदि भारत का अंग नहीं था, तो तिब्बती शरणार्थी और दलाई लामा जान बचाने के लिये भारत क्यों आये।
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द्वितीय विश्वयुद्ध में परमाणु बम मिला कर १०० लाख लोग मरे थे। उसमें भारत के २७ लाख सैनिक थे। अर्थात् शेष विश्व के मात्र ७३ लाख मरे। भारत में इसके अतिरिक्त विभाजन में तथा तिब्बत में ३०-३० लाख लोग अहिंसा के नाम पर मरे जबकि उस समय भारत के पास आधुनिक हथियार वाली सबसे बड़ी स्थल सेना थी। अर्थात् भारत मे सत्य-अहिंसा से ८७ लाख, बाकी विश्व में युद्ध और अणु बम से ७३ लाख मरे।

मेरी श्रद्धा और विश्वास .....

मेरी श्रद्धा और विश्वास .....
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मैं अपने मन को नियंत्रित नहीं कर पा रहा हूँ, पर कोई चिंता मुझे नहीं है| मुझे पूर्ण श्रद्धा और विश्वास है कि मेरे इष्टदेव प्रेम की डोरी से बाँधकर इसे एक न एक दिन अपने आप ही अपने आधीन कर ही लेंगे| वे ही मेरी हर परिस्थिति में रक्षा कर रहे हैं और सदा ही करेंगे| मैं निश्चिन्त हूँ क्योंकि खोने को मेरे पास कुछ भी नहीं है, सब कुछ तो उन्हीं का है| एकमात्र बाधा यह जीवभाव है जिसका भी वे हरि एक न एक दिन हरण कर ही लेंगे| यह उनका स्वभाव है| यह जीवभाव नहीं रहेगा तो कोई राग-द्वेष और अहंकार भी नहीं रहेगा| उन हरि का चिंतन ही मेरा स्वभाव है| ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ सितम्बर २०१८

हम भगवान को दान में क्या दे सकते हैं ? .....

हम भगवान को दान में क्या दे सकते हैं ? .....
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(जो मैं इस लेख में लिखने जा रहा हूँ यह सब संत-महात्माओं के सत्संग से प्राप्त ज्ञान है)
इस देह के साथ हमारा सम्बन्ध सिर्फ कर्मफलों का है, इसमें विगत जन्मों के कर्मफल भी आते हैं| इस जन्म में किये हुए सकाम कर्मफलों को भोगने के लिए फिर से देह धारण करनी होगी| इसमें हमारी इच्छा नहीं चलती, सब कुछ प्रकृति के नियमों के अनुसार होता है| हमें कर्म करने का अधिकार है पर उनके फलों को भोगने में हम स्वतंत्र नहीं हैं| उनका फल भुगतने के लिए प्रकृति हमें बाध्य कर देती है| हमारे सारे सगे-सम्बन्धी, माता-पिता, संतानें, शत्रु-मित्र ..... सब पूर्व जन्मों के कर्मफलों के आधार पर ही मिलते हैं| अतः जिस भी परिस्थिति में हम हैं वह अपने ही कर्मों का भोग है, अतः कोई पश्चात्ताप न करके इस दुश्चक्र से निकलने का प्रयास करते रहना चाहिए|
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इस निरंतर हो रहे जन्म-मरण के दुश्चक्र से मुक्ति के लिए सर्वप्रथम तो हमें परमात्मा को स्थायी रूप से अपने हृदय में बैठाना होगा, और परमप्रेम से उनको समर्पित होना होगा| फिर सतत् दीर्घकाल की साधना द्वारा कर्ताभाव और देहबोध से मुक्त होना होगा|
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इसके लिए चिंता की कोई बात नहीं है, क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण का अभय वचन है .....
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे||१८:६५||"
अर्थात् तूँ मुझ में ही मन और चित्त लगा, मेरा ही भक्त यानि मेरा ही भजन पूजन करने वाला हो, तथा मुझे ही नमस्कार कर| इस प्रकार करता हुआ तूँ मुझ वासुदेव में अपने साधन और प्रयोजन को समर्पित कर के मुझे ही प्राप्त होगा| मैं तुझ से सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तूँ मेरा प्रिय है|
भगवान का इतना बड़ा आश्वासन है अतः भय किस बात का? हमें उन की शरण में तुरंत चले जाना चाहिए| महाभारत में अनेक स्थानों पर भगवान श्रीकृष्ण ने ऐसी ही बातें सत्य की शपथ खाकर कही हैं|
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अब प्रश्न उठता है कि हम भगवान को दान में क्या दे सकते हैं? बात बड़ी अजीब सी है, जिस भगवान ने सब कुछ दिया है उन को हम दान में क्या दे सकते हैं? हाँ, एक चीज ऐसी अवश्य है जिसका दान भगवान भी हमारे से स्वीकार कर लेते हैं| यदि भगवान हमारा दिया हुआ दान स्वीकार कर लेते हैं तो उससे बड़ा पूण्य कोई दूसरा नहीं है| वह दान है ..... हमारी अपनी "जीवात्मरूपता" का यानी "जीवात्मभाव" का| इस जीवात्मरूपता के अतरिक्त हमारे पास अन्य कुछ है भी नहीं|
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भगवान का आदेश है .....
"यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्| यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्||९:२७||"
अर्थात् हे कौन्तेय तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो|
भगवान ने इस से पूर्व यह भी कहा है ....
"ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्| ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना||४:२४||"
अर्थात् अर्पण (अर्थात् अर्पण करने का साधन श्रुवा) ब्रह्म है, और हवि (शाकल्य अथवा हवन करने योग्य द्रव्य) भी ब्रह्म है, ब्रह्मरूप अग्नि में ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा जो हवन किया गया है वह भी ब्रह्म ही है| इस प्रकार ब्रह्मरूप कर्म में समाधिस्थ पुरुष का गन्तव्य भी ब्रह्म ही है||
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हमारा हर कर्म ब्रह्मकर्म हो, हमारी चेतना ब्रह्ममय हो, हम जीवात्मभाव से मुक्त हों, यह भगवान को दिया हुआ दान है| हमारा अपना है ही क्या? हमारे हृदय में भगवान ही धड़क रहे हैं, हमारी सांसे भी वे ही ले रहे हैं, हमारी आँखों से भी वे ही देख रहे हैं, और हमारे पैरों से भी वे ही चल रहे हैं| यह पृथकता यानी जीवात्मभाव का बोध एक मायावी भ्रम और धोखा है|
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हे मनमोहन भगवान वासुदेव, हमारा मन तुम्हारे ही श्रीचरणों में ही समर्पित हो, तुम्हें छोड़कर यह मन अन्यत्र कहीं भी नहीं भागे| आप ही गुरु हो और आप ही मेरे परमशिव और मेरी परमगति हो| ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ सितम्बर २०१८

Friday, 21 September 2018

सत्संग सार .....

सत्संग सार .....
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भगवान की यह परम कृपा रही है कि संसार की इस अथाह भीड़ में से उन्होंने मुझे भी छाँट कर स्वयं के श्रीचरणों की सेवा में लगा दिया है| उनके श्री चरण ही मेरे आराध्य हैं, वे ही मेरी गति हैं और वे ही मेरे सर्वस्व हैं| मेरी कोई भी कामना नहीं है| अनेक लेख मुझ अकिंचन के माध्यम से लिखे जा चुके हैं, उनकी संख्या बढाने से अब कोई लाभ नहीं है| सब का सार यही है कि हमारे हृदय में कोई भी कामना नहीं होनी चाहिए| हमारा पूर्ण प्रेम और अभीप्सा सिर्फ परमात्मा के प्रति ही हो, कोई किसी भी तरह की कामना न रहे| कामनाएँ ही पाप का मूल हैं| स्वर्ग की कामना भी एक धोखा है जो अंततः नर्कगामी ही है|
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सूक्ष्म जगत के अनेक महात्माओं ने मुझे आशीर्वाद दिया है जिनको भौतिक रूप में मैनें कभी भी नहीं देखा| इस भौतिक विश्व में भी मुझे संत चरणों से प्यार है जो निरंतर आशीर्वाद देते रहते हैं| भगवान से मेरी एक ही प्रार्थना है कि किसी भी कामना का जन्म न हो और उन्हीं के श्रीचरणों में अंतःकरण लगा रहे|
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हम सब नित्यमुक्त हैं अतः किसी भी तरह की कोई मुक्ति हमें नहीं चाहिए| हमारा पूरा अंतःकरण यानि मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार भगवान को समर्पित हो| भगवान के सर्वश्रेष्ठ साकार रूप आप सब को भी मेरा दण्डवत् प्रणाम स्वीकार हो| ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ सितम्बर २०१८
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पुनश्चः :-- एक आध्यात्मिक शक्ति भारतवर्ष का पुनरोत्थान कर रही है| भारतवर्ष फिर से अपने द्वीगुणित परम वैभव को प्राप्त होगा| असत्य और अन्धकार की शक्तियाँ पराभूत होंगी, ज्ञान का आलोक सर्वत्र व्याप्त होगा| भारतवर्ष में दस भी ऐसे महात्मा हैं जो परमात्मा को प्राप्त हैं, तो भारतवर्ष कभी नष्ट नहीं हो सकता|

भगवान किसे प्राप्त होते हैं ? ...

भगवान किसे प्राप्त होते हैं ? ... (यह संत-महात्माओं के सत्संग से प्राप्त ज्ञान का सार है)
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भगवान उसी साधक को प्राप्त होते हैं जिसे भगवान स्वयं स्वीकार कर लेते हैं| भगवान उसी को स्वीकार करते हैं जो सिर्फ भगवान को ही स्वीकार करता है यानि भगवान को ही प्राप्त करना चाहता है, कुछ अन्य नहीं|
महत्व उनको पाने की घनिभूत अभीप्सा का है, अन्य किसी चीज का नहीं| आध्यात्मिक साधनाएँ यदि उनको पाने की अभीप्सा बढ़ाती हैं तभी सार्थक हैं, अन्यथा निरर्थक हैं|
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गीता में भगवान कहते हैं .....
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्| मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः||४:११||
अर्थात् जो भक्त जिस प्रकार से जिस प्रयोजन से जिस फलप्राप्ति की इच्छा से मुझे भजते हैं उनको मैं उसी प्रकार से भजता हूँ, अर्थात् उनकी कामना के अनुसार ही फल देकर मैं उनपर अनुग्रह करता हूँ|
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असली भक्त को तो मोक्ष की इच्छा भी नहीं हो सकती, वह प्रभु को ही पाना चाहता है, अतः प्रभु भी उसे ही पाना चाहते हैं| एक ही साधक को एक साथ "मुमुक्षुत्व" और "फलार्थित्व" नहीं हो सकते| जो फलार्थी हैं उन्हें फल मिलता है, और जो मुमुक्षु हैं उन्हें मोक्ष मिलता है| इस प्रकार जो जिस तरह से भगवान को भजते हैं उनको भगवान भी उसी तरह से भजते हैं| भगवान में कोई राग-द्वेष नहीं होता, जो उनको जैसा चाहते हैैं, वैसा ही अनुग्रह वे भक्त पर करते हैं| भगवान वरण करने से प्राप्त होते हैं, किसी अन्य साधन से नहीं|
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जैसे एक स्त्री और एक पुरुष सिर्फ एक दूसरे को ही पति-पत्नी के रूप में स्वीकार करते हैं, तभी वे एक-दूसरे के होते हैं, वैसे ही जो सिर्फ भगवान को ही वरता है, भगवान भी उसे ही वरते हैं| सिर्फ कामना करने मात्र से ही भगवान किसी को नहीं मिलते|
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गीता में ही भगवान कहते हैं .....
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्‌ | व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ||२:४४||
अर्थात् जो मनुष्य इन्द्रियों के भोग तथा भौतिक ऎश्वर्य के प्रति आसक्त होने से ऎसी वस्तुओं से मोहग्रस्त हो जाते है, उन मनुष्यों में भगवान के प्रति दृढ़ संकल्पित बुद्धि नहीं होती है||
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भगवान आगे और भी कहते हैं .....
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन | निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्‌ ||२:४५||
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते| तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्||९:२२||
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज| अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः||१८:६६||
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सबका सार यही है कि कोई भी किसी भी तरह की कामना नहीं होनी चाहिए, सिर्फ परमात्मा को उपलब्ध होने की ही गहनतम अभीप्सा हो, तभी भगवान प्राप्त होते हैं|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० सितम्बर २०१८

वेदांत दर्शन, साधन चतुष्टय और संत आशीर्वाद :--

वेदांत दर्शन, साधन चतुष्टय और संत आशीर्वाद :--
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यह बात मैं पूरे दावे के साथ अपने अनुभव से कह रहा हूँ कि वेदान्त दर्शन को सिर्फ स्वाध्याय से तब तक कोई भी ठीक से नहीं समझ सकता जब तक किसी श्रौत्रीय ब्रह्मनिष्ठ सिद्ध महात्मा का आशीर्वाद प्राप्त न हो| तपस्वी महात्माओं के आशीर्वाद से प्राप्त अनुभूतियों से वेदान्त स्वतः भी समझ में आ सकता है| अतः एक मुमुक्षु को संतों का सदा सत्संग करना चाहिए|
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वैसे वेदान्त में प्रवेश के लिए साधन चतुष्टय यानी चार योग्यताओं की आवश्यकता पड़ती है|
वे हैं .....
(१) नित्यानित्य विवेक.
(२) वैराग्य.
(३) षड्गुण/षट सम्पत्ति... (शम, दम, श्रद्धा, समाधान, उपरति, और तितिक्षा).
(४) मुमुक्षुत्व.
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रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं .....
"बिनु सत्संग विवेक न होई| राम कृपा बिनु सुलभ न सोई||"
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भगवान से प्रेम करेंगे तो भगवान की कृपा होगी और भगवान की कृपा होगी तो सत्संग लाभ भी होगा| सत्संग लाभ होगा तो विवेक जागृत होगा, और विवेक जागृत होगा तो वैराग्य भी होगा| वैराग्य और अभ्यास से छओं सदगुण भी आयेंगे और मुमुक्षुत्व भी जागृत होगा| फिर साधक जितेन्द्रिय हो जाता है और भोगों की आसक्ति नष्ट हो जाती है|
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इस दिशा में पहला कदम है .... परमप्रेम जो सिर्फ परमात्मा से ही हो सकता है| अपने पूर्ण ह्रदय से अपना पूर्ण प्रेम परमात्मा को दें, फिर सारे द्वार अपने आप ही खुल जायेंगे, सारे दीप अपने आप ही जल उठेंगे, और सारा अन्धकार भी अपने आप ही नष्ट हो जाएगा||

ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० सितम्बर २०१८

सफ़ेद गुलाब और गौरैया .....

सफ़ेद गुलाब और गौरैया .....
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एक बगीचे में कई गुलाब के फूल खिले थे| सब के रंग लाल, पीले, गुलाबी और अन्य थे, पर सिर्फ एक ही सफ़ेद रंग का गुलाब था| उस सफ़ेद गुलाब में एक हीन भावना आ गयी और वह भगवान से प्रार्थना करता कि मुझे भी लाल रंग का बना दो|
एक दिन एक गौरैया उड़ती हुई उस बगीचे में आई, उसने उस सफ़ेद गुलाब को देखा और उससे प्यार करने लगी| पूरे दिन दोनों ने बातचीत की और गौरैया ने अगले दिन फिर आने की बात कही| सफ़ेद गुलाब ने अपनी शर्त रखी कि वह लाल रंग का होने पर ही मित्रता करेगा|
गौरैया पूरी रात विचार करती रही कि अपने मित्र सफ़ेद गुलाब को लाल कैसे बनाए| दुसरे दिन जब सूर्योदय हुआ तब सफ़ेद गुलाब जागा और अपनी पंखुड़ियाँ फैला दीं| घोर आश्चर्य ! उसकी सब पंखुड़ियाँ लाल थीं| वह प्रसन्नता से नाच उठा| उसने नीचे देखा तो बड़ा दुखद दृश्य था| नीचे मरी हुई गौरैया अपने स्वयं के रक्त में ही भीगी हुई पडी थी, उसकी छाती में कई कटे हुए के चिह्न थे|
सफ़ेद गुलाब को समझ में आया कि क्या हुआ| रात को गौरैया आई थी, उसने मित्रता निभाने के लिए फूल के साथ लगे काँटों से अपना सीना छलनी किया और बंद सफ़ेद गुलाब को अपने रक्त से भिगो दिया|
कई लोगों ने हमारे जीवन में प्रसन्नता लाने के लिए त्याग किया है| हमें उन सब का उपकार मानना चाहिए| हम उन्हें अपना सर्वश्रेष्ठ प्यार दें| पर पहला प्यार परम प्रिय परमात्मा को दें जिन्होनें हमें अपना प्रियतम स्वरुप दिया है|