Friday, 2 February 2018

जैसे लोगों के साथ हम रहते हैं वैसे ही बन जाते हैं .....

जैसे लोगों के साथ हम रहते हैं वैसे ही बन जाते हैं| अच्छा साथ न मिले तो एकान्त में ईश्वर के साथ रहना अधिक अच्छा है|
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कौन क्या सोचता है यह उसकी समस्या है| एक साधे सब सधै, सब साधे सब खोय| वाद-विवाद में समय नष्ट न करो| कुसंग का सर्वदा त्याग करो और जो भी समय मिलता है उसमें प्रभु की उपासना करो|
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ध्यान में हमें जितनी अधिक शांति अनुभूत होती है उतने ही हम परमात्मा के समीप हैं|

हम लोग दिन-रात परमात्मा के बारे में तरह तरह के सिद्धांतों पर चर्चा करते हैं| वह निरर्थक है| परमात्मा तो हमारे समक्ष ही है| उसी को खाओ, उसी को पीओ, उसी में डूब जाओ, उसी का आनंद लो, और उसी में स्वयं को लीन कर दो| हमारे समक्ष कोई मिठाई रखी हो या कोई फल रखा हो, तो बुद्धिमानी उसको खाने में है, न कि उसकी विवेचना करने में| उसी तरह परमात्मा का भक्षण करो, उसका पान करो, उससे साँस लो और उसी में रहो|

हम भगवान को क्यों भजें ? .....

हम भगवान को क्यों भजें ? भगवान को हम इसलिए भजें क्योंकि यह उनका ही आदेश है| भगवान कहते हैं ....
"किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा|
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ||९:३३||
स्वामी रामसुखदास जी ने इसका अनुवाद ऐसे किया है ....
जो पवित्र आचरण वाले ब्राह्मण और ऋषि स्वरूप क्षत्रिय भगवान के भक्त हों, वे परमगतिको प्राप्त हो जायँ, इसमें तो कहना ही क्या है, इसलिये इस अनित्य और सुखरहित शरीरको प्राप्त करके तू मेरा भजन कर|
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स्वामी चिन्मयानंद जी ने इसकी यों व्याख्या की है .....
यदि पूर्व श्लोक में वर्णित गुणहीन और साधनहीन लोग भी भक्ति के द्वारा ईश्वर को प्राप्त हो सकते हैं? तो फिर साधन सम्पन्न व्यक्तियों के लिए परमार्थ की प्राप्ति कितनी सरल होगी? यह कहने की आवश्यकता नहीं है। ये साधनसम्पन्न लोग हैं ब्राह्मण अर्थात् शुद्धान्तकरण का व्यक्ति? तथा राजा माने उदार हृदय और दूर दृष्टि का बुद्धिमान व्यक्ति। जिस राजा ने बुद्धिमत्तापूर्वक अपनी राजसत्ता एवं धनवैभव का उपयोग किया हो? वह आत्मानुसंधान के द्वारा वास्तविक शान्ति का अनुभव प्राप्त करता है। ऐसे राजा को ही राजर्षि कहते हैं।सब प्रकार के सम्भावित बुद्धि और हृदय के लोगों का वर्णन करके? और आत्मज्ञान के लिए सबको उपयुक्त साधना का विधान करने के पश्चात्? अब? भगवान् इस प्रकरण का उपसंहार करते हुए कहते हैं? इस अनित्य और सुखरहित लोक को प्राप्त करके अब तुम मेरा भजन करो। अर्जुन के निमित्त दिया गया उपदेश हम सबके लिए ही है क्योंकि यदि श्रीकृष्ण आत्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं? तो अर्जुन उस मनुष्य का प्रतिनिधि है? जो जीवन संघर्षों की चुनौतियों का सामना करने में अपने आप को असमर्थ पाता है।असंख्य विषय? इन्द्रियाँ और मन के भाव इनसे युक्त जगत् में ही हमें जीवन जीना होता है। ये तीनों ही सदा बदलते रहते हैं। स्वाभाविक ही? इन्द्रियों के द्वारा विषयोपभोग का सुख अनित्य ही होगा। और दो सुखों के बीच का अन्तराल केवल दुखपूर्ण ही होगा।आशावाद का जो विधेयात्मक और शक्तिप्रद ज्ञान गीता सिखाती है? उसी स्वर में? भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ कहते हैं कि यह जगत् केवल दुख का गर्त या निराशा की खाई या एक सुखरहित क्षेत्र है।भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं कि इस अनित्य और सुखरहित लोक को प्राप्त होकर अब उसको नित्य और आनन्दस्वरूप आत्मा की पूजा में प्रवृत्त होना चाहिए। इस साधना में अर्जुन को प्रोत्साहित करने के लिए भगवान् ने यह कहा है कि गुणहीन लोगों के विपरीत जिस व्यक्ति में ब्राह्मण और राजर्षि के गुण होते हैं? उसके लिए सफलता सरल और निश्चित होती है। इसलिए भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करो।
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
२५ जनवरी २०१८

स्वयं के साथ ही एक सत्संग और मनोरंजन .....


मैं जो कुछ भी भगवान के बारे में सोचता हूँ और लिखता हूँ, वह मेरा स्वयं के साथ ही एक सत्संग और मनोरंजन है| जीवन में इस मन ने बहुत अधिक भटकाया है| अब यह पूरी तरह भगवान में लग गया है, और निरंतर लगा रहे इसी उद्देश्य से लिखना होता रहता है| मैं किसी अन्य के लिए नहीं, स्वयं के लिए ही लिखता हूँ| किसी को अच्छा लगे तो ठीक है, नहीं लगे तो भी ठीक है| किसी को अच्छा नहीं लगे तो उनके पास मुझे Unfriend और Block करने का विकल्प है| सभी को सप्रेम सादर नमन! 
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  1. जिन्हें परमात्मा से प्यार नहीं है ऐसे लोगों से मुझे भी कोई लेना देना नहीं है| उन से मैं किसी भी तरह का कोई संपर्क नहीं रखना चाहता| आजकल के ध्यान साधक, ध्यान साधना का इसलिए अभ्यास करते हैं कि इस से उन्हें तनाव से मुक्ति, अच्छा स्वास्थ्य और शांति मिलेगी| मेरा ऐसे साधकों से भी कोई लेना देना नहीं है, और न ही उन्हें सिखाने वाले योग गुरुओं से|
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    मेरा लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति है, अन्य कुछ भी नहीं| यह शरीर रहे या न रहे, इस से भी कोई मतलब नहीं है| बस अंत समय में परमात्मा की चेतना में सचेतन देह-त्याग हो|
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    कुछ पाने की इच्छा नहीं है जब पूर्ण रूप से परमात्मा को समर्पित ही होना है| सिर्फ ऐसे ही लोगों का साथ चाहिए जिनके ह्रदय में परमात्मा को पाने की एक गहन अभीप्सा है|

    आगे का मार्गदर्शन मुझे गुरुकृपा से प्राप्त है| ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
    कृपा शंकर
    २४ जनवरी २018

भगवान सबके ह्रदय में हैं, ढूँढने से वहीं मिलते हैं .....

भगवान सबके ह्रदय में हैं, ढूँढने से वहीं मिलते हैं .....
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भगवान सभी प्राणियों के हृदय में बिराजमान हैं, अपनी माया से इस देह रूपी यन्त्र पर आरूढ़ हो कर सभी प्राणियों को (उनके स्वभावके अनुसार) भ्रमण कराते रहते हैं| निज हृदय को छोड़कर हम भगवान को बाहर ढूँढ़ते हैं, पर अंततः उन्हें निज हृदय में ही पाते हैं| 
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जो इस हृदय में धड़क रहे हैं, जो इन फेफड़ों से साँस ले रहे हैं, जो इन आँखों से देख रहे हैं, जो इन पैरों से चल रहे हैं, जो इस मन से सोच रहे हैं, वे और कोई नहीं, मेरे प्रियतम ही हैं, वही यह मैं हूँ |
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भगवान कहते हैं ....
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति|
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया |१८:६१||
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ !!
२४ जनवरी २०१८

भगवान हैं, यहीं हैं, अभी हैं, और सदा ही रहेंगे .....

भगवान हैं, यहीं हैं, अभी हैं, और सदा ही रहेंगे .....
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भगवान का और मेरा साथ शाश्वत है| वे निरंतर मेरे साथ हैं, पल भर के लिए भी कभी मुझ से पृथक नहीं हुए हैं| सारी सृष्टि ही भगवान से अभिन्न है, मैं भी भगवान से अभिन्न हूँ| भगवान ही है जो यह "मैं" बन गए हैं| मैं यह देह नहीं बल्कि एक सर्वव्यापी शाश्वत आत्मा हूँ, भगवान का ही अंश और अमृतपुत्र हूँ| अयमात्मा ब्रह्म| जैसे जल की एक बूँद महासागर में मिल कर स्वयं भी महासागर ही बन जाती है, कहीं कोई भेद नहीं होता, वैसे ही भगवान में समर्पित होकर मैं स्वयं भी उनके साथ एक हूँ, कहीं कोई भेद नहीं है|
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जिसे मैं सदा ढूँढ रहा था, जिसको पाने के लिए मैं सदा व्याकुल था, जिसके लिए मेरे ह्रदय में सदा एक प्रचंड अग्नि जल रही थी, जिस के लिए एक अतृप्त प्यास ने सदा तड़फा रखा था, वह तो मैं स्वयं ही हूँ| उसे देखने के लिए, उसे अनुभूत करने के लिए और उसे जानने या समझने के लिए कुछ तो दूरी होनी चाहिए| पर वह तो निकटतम से भी निकट है, अतः उसका कुछ भी आभास नहीं होता, वह मैं स्वयं ही हूँ|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ जनवरी २०१८

Tuesday, 23 January 2018

सर्वोच्च उपलब्धि .....

सर्वोच्च उपलब्धि .....
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जल की एक बूँद की सर्वोच्च उपलब्धी है ..... महासागर में विलीन हो जाना|
जल की बूँद महासागर में विलीन होकर स्वयं महासागर बन जाती है| इसके लिए क्या वह महासागर की ऋणी है? नहीं, कभी नहीं| उसका उद्गम महासागर से हुआ था और वह अन्ततः उसी में विलीन हो गयी| यही उसका नैसर्गिक धर्म था|
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वैसे ही जीव की सर्वोच्च उपलब्धि है -- परम शिव परमात्मा से मिलन| यही आत्मज्ञान है, और यही आत्मसाक्षात्कार है|
भगवान कहते हैं .....
"मम दरसन फल परम अनूपा | जीव पाव निज सहज सरूपा" ||
भगवान यह भी कहते हैं .....
"सन्मुख होइ जीव मोहि जबही | जनम कोटि अघ नासहिं तबही" ||
हमारा सहज स्वरुप परमात्मा है, हम परमात्मा से आये हैं, परमात्मा में हैं, और परमात्मा में ही उसी तरह बापस चले जायेंगे जिस तरह जल की एक बूँद बापस महासागर में चली जाती है| यह ही हमारा नैसर्गिक धर्म है|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ जनवरी २०१८

भगवान की अनन्य भक्ति क्या है ? .....

भगवान की अनन्य भक्ति क्या है ? .....
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ध्यान साधना और भगवान की अनन्य भक्ति में मैं कोई भेद नहीं पाता| मेरी अनुभूति में ये दोनों एक ही हैं, इन में कोई अंतर नहीं है| ध्यान साधना में हम ध्यान परमात्मा की अनंतता पर करते हैं, जिसमें सब समाहित है और कुछ भी पृथक नहीं है| अनन्य भक्ति भी यही है|
परमात्मा से मैं पृथक नहीं हूँ, इस प्रकार परमात्मा को अपने से एक जानकर जो परम प्रेम किया जाता है, वह ही अनन्य भक्ति है| भगवान से मैं अन्य नहीं हूँ, वे मेरे साथ एक हैं, वे ही वे हैं, अन्य कोई नहीं है, सिर्फ वे ही वे हैं, यह जो 'मैं' हूँ, वह भी वास्तव में स्वयं परमात्मा ही हैं| मैं उन परम पुरुष से अलग नहीं हूँ, इस प्रकार से उनको अपने से एक जान कर जो प्रेम किया जाता है वह ही अनन्य है| परमात्मा को मैं जब अपना स्वरुप मानता हूँ, तब उनसे जो प्रेम होता वह ही परम प्रेम है, और वह ही अनन्य भक्ति है| उस परम प्रेम से ही भगवान मिलते हैं| इस धारणा का गहन चिंतन ही ध्यान है|
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भगवान कहते हैं .....
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया |
यस्यान्तः स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्‌ ||८.२२||
संधि विच्छेद :--
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यः तु अनन्या |
यस्य अन्तः स्थानि भूतानि येन सर्वम् इदं ततम्‌ ||
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ जनवरी २०१८