जैसे लोगों के साथ हम रहते हैं वैसे ही बन जाते हैं| अच्छा साथ न मिले तो एकान्त में ईश्वर के साथ रहना अधिक अच्छा है|
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कौन क्या सोचता है यह उसकी समस्या है| एक साधे सब सधै, सब साधे सब खोय| वाद-विवाद में समय नष्ट न करो| कुसंग का सर्वदा त्याग करो और जो भी समय मिलता है उसमें प्रभु की उपासना करो|
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ध्यान में हमें जितनी अधिक शांति अनुभूत होती है उतने ही हम परमात्मा के समीप हैं|
हम लोग दिन-रात परमात्मा के बारे में तरह तरह के सिद्धांतों पर चर्चा करते हैं| वह निरर्थक है| परमात्मा तो हमारे समक्ष ही है| उसी को खाओ, उसी को पीओ, उसी में डूब जाओ, उसी का आनंद लो, और उसी में स्वयं को लीन कर दो| हमारे समक्ष कोई मिठाई रखी हो या कोई फल रखा हो, तो बुद्धिमानी उसको खाने में है, न कि उसकी विवेचना करने में| उसी तरह परमात्मा का भक्षण करो, उसका पान करो, उससे साँस लो और उसी में रहो|
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कौन क्या सोचता है यह उसकी समस्या है| एक साधे सब सधै, सब साधे सब खोय| वाद-विवाद में समय नष्ट न करो| कुसंग का सर्वदा त्याग करो और जो भी समय मिलता है उसमें प्रभु की उपासना करो|
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ध्यान में हमें जितनी अधिक शांति अनुभूत होती है उतने ही हम परमात्मा के समीप हैं|
हम लोग दिन-रात परमात्मा के बारे में तरह तरह के सिद्धांतों पर चर्चा करते हैं| वह निरर्थक है| परमात्मा तो हमारे समक्ष ही है| उसी को खाओ, उसी को पीओ, उसी में डूब जाओ, उसी का आनंद लो, और उसी में स्वयं को लीन कर दो| हमारे समक्ष कोई मिठाई रखी हो या कोई फल रखा हो, तो बुद्धिमानी उसको खाने में है, न कि उसकी विवेचना करने में| उसी तरह परमात्मा का भक्षण करो, उसका पान करो, उससे साँस लो और उसी में रहो|
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मेरा लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति है, अन्य कुछ भी नहीं| यह शरीर रहे या न रहे, इस से भी कोई मतलब नहीं है| बस अंत समय में परमात्मा की चेतना में सचेतन देह-त्याग हो|
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कुछ पाने की इच्छा नहीं है जब पूर्ण रूप से परमात्मा को समर्पित ही होना है| सिर्फ ऐसे ही लोगों का साथ चाहिए जिनके ह्रदय में परमात्मा को पाने की एक गहन अभीप्सा है|
आगे का मार्गदर्शन मुझे गुरुकृपा से प्राप्त है| ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ जनवरी २018