Sunday, 28 May 2017

साधक कौन ?.....

साधक कौन ?.....
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किसी भी आध्यात्मिक साधना में किसी भी साधक को सिर्फ एक चौथाई यानि २५% भाग ही साधना का करना पड़ता है|
करुणावश उतना ही २५% भाग सद् गुरु महाराज अपने शिष्य के लिए स्वयं करते हैं,
बाकी का ५०% भाग कृपा कर के भगवान स्वयं करते हैं|
पर साधक का जो २५% भाग है, उसका शत प्रतिशत तो साधक को स्वयं ही पूरी निष्ठा से करना पड़ता है|
पारस पत्थर तो लोहे को सोना बनाता हैं, पर सद् गुरु महाराज तो शिष्य को अपने जैसा ही बना लेते हैं|
अतः पूर्ण रूप से समर्पित होकर पूरी निष्ठा से गुरु प्रदत्त साधना करनी चाहिए|
दीक्षा लेकर भी जो गुरु को दिए वचन को न निभाए वह निश्चित रूप से पाप का भागी है|


ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

सप्त व्याह्रतियों के साथ ब्रह्मगायत्री मन्त्र और प्राणायाम की साधना ---


सप्त व्याह्रतियों के साथ ब्रह्मगायत्री मन्त्र और प्राणायाम की साधना ----------
(गायत्री साधना की यौगिक व तांत्रिक विधि)
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(संशोधित व पुनर्प्रस्तुत लेख)

 (निम्न प्रस्तुति व्यक्तिगत सत्संगों से प्राप्त ज्ञान, साधना के निजी अनुभवों और कुछ कुछ स्वाध्याय पर आधारित है)
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भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं को 'गायत्री छन्दसामहम्' अर्थात छंदों में गायत्री कहा है|
गायत्री मन्त्र को ही सावित्री मन्त्र भी कहते है| महाभारत में गायत्री मंत्र की महिमा कई स्थानों पर गाई गयी है।
भीष्म पितामह युद्ध के समय जब शरशय्या पर पड़े होते हैं तो उस समय अन्तिम उपदेश के रूप में युधिष्ठिर आदि को गायत्री उपासना की प्रेरणा देते हैं। भीष्म पितामह का यह उपदेश महाभारत के अनुशासन पर्व के अध्याय 150 में दिया गया है .........
''जो व्यक्ति गायत्री का जप करते हैं उनको धन, पुत्र, गृह सभी भौतिक वस्तुएँ प्राप्त होती हैं| उनको राजा, दुष्ट, राक्षस, अग्नि, जल, वायु और सर्प किसी से भय नहीं लगता| जो लोग इस उत्तम मन्त्र गायत्री का जप करते हैं, वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों वर्ण एवं चारों आश्रमों में सफल रहते हैं| जिस स्थान पर गायत्री का पाठ किया जाता है, उस स्थान में अग्नि काष्ठों को हानि नहीं पहुँचाती है, बच्चों की आकस्मिक मृत्यु नहीं होती, न ही वहाँ अपङ्ग रहते हैं|
जो लोग गायत्री का जप करते हैं उन्हें किसी प्रकार का कष्ट एवं क्लेश नहीं होता है तथा वे जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करते हैं| गौवों के बीच गायत्री का पाठ करने से गौवों का दूध अधिक पौष्टिक होता है| घर हो अथवा बाहर, चलते फिरते सदा ही गायत्री का जप किया करें| गायत्री से बढ़कर कोई जप नहीं है|"
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गायत्री का दूसरा नाम सावित्री सविता की शक्ति ब्रह्मशक्ति होने के कारण ही रखा गया है|
इस मन्त्र का देवता सविता (सूर्य) है| वेद मंत्रों की अधिष्ठात्री देवी वही है| इसी से उसे सावित्री कहते हैं|
यो देवः सवितास्माकं धियो धर्मादिगोचरः| प्रेरयेत् तस्य यद् भर्गः तं वरेण्यमुषास्महे||
‘जो सविता देव हमारी बुद्धि को धर्म में प्रेरित करता है उसके श्रेष्ठ भर्ग (तेज) की हम उपासना करते हैं।
सर्व लोकप्रसवनात् सविता स तु कीर्त्यते। यतस्तद् देवता देवी सावित्रीत्युच्यते ततः।।-अमरकोश
‘‘वे सूर्य भगवान समस्त जगत को जन्म देते हैं इसलिए ‘सविता’ कहे जाते हैं। गायत्री मन्त्र के देवता ‘सविता’ हैं इसलिए उसकी दैवी-शक्ति को ‘सावित्री’ कहते हैं|’’
ब्रह्म तेज और सविता एक ही हैं| गायत्री को तेजस्विनी कहा गया है| सविता तेज का प्रतीक है| अस्तु सविता का तेज और गायत्री के भर्ग को एक ही समझा जाना चाहिए|
गायत्री मन्त्र के देवता सविता हैं और साधक उनकी भर्गः ज्योति का ध्यान करते हैं जो आज्ञा चक्र से ऊपर सहस्त्रार में या उससे भी ऊपर दिखाई देती है|
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वेसे तो वेद की महिमा अनन्त है, किंतु महर्षि विश्वामित्र जी के द्वारा दृष्ट ऋग्वेद के तृतीय मण्डल के 62वें सूक्त का दसवाँ मन्त्र 'ब्रह्म गायत्री-मन्त्र' के नाम से विख्यात है, जो इस प्रकार है ----
"तत्सवितुर्वरेण्यं| भर्गो देवस्य धीमहि| धियो यो न: प्रचोदयात||"
उपरोक्त मन्त्र का अर्थ तो सभी को ज्ञात है अतः उस पर चर्चा नहीं करेंगे|
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गायत्री की महिमा अनंत है|
गायत्र्येव परो विष्णुर्गायत्र्येव पर: शिव:। गायत्र्येव परो ब्रह्म गायत्र्येव त्रयी तत:॥ —स्कन्द पुराण काशीखण्ड ४/९/५८, वृहत्सन्ध्या भाष्य
ब्रह्म गायत्रीति- ब्रह्म वै गायत्री। —शतपथ ब्राह्मण ८/५/३/७ -ऐतरेय ब्रा० अ० १७ खं० ५
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योग साधना में गायत्री मन्त्र का जाप ----
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गुरु प्रदत्त विधि से सूक्ष्म शरीरस्थ सुषुम्ना नाड़ी में होता है| गुरु कृपा से ही सुषुम्ना नाड़ी का द्वार खुलता है जो मूलाधार से आज्ञा चक्र तक है|
उससे भी आगे परा सुषुम्ना है जो आज्ञाचक्र से भ्रूमध्य तक होकर वहाँ से सहस्त्रार में जाती है| और उत्तरा सुषुम्ना है जो आज्ञाचक्र से सीधे सहस्त्रार में जाती है| उत्तरा सुषुम्ना में प्रवेश तो गुरु की अति विशेष कृपा से ही हो पाता है|
वहाँ जो कूटस्थ ज्योति दिखाई देती है वही सविता देव की भर्गः ज्योति है जिसका ध्यान किया जाता है और जिसकी आराधना होती है| इसका क्रम इस प्रकार मेरुदंड व मस्तिष्क के सूक्ष्म चक्रों पर मानसिक जाप करते हुए है ---
ॐ भू: ------ मूलाधार चक्र,
ॐ भुवः ---- स्वाधिष्ठान चक्र,
ॐ स्वः ----- मणिपुर चक्र,
ॐ महः ---- अनाहत चक्र,
ॐ जनः -- -- विशुद्धि चक्र,
ॐ तपः ------ आज्ञा चक्र,
ॐ सत्यम् --- सहस्त्रार ||
फिर आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य में या सहस्त्रार के ऊपर एक विराट ज्योति दिखाई देती है जिस पर ध्यान किया जाता है| जब चित्त में थोड़ी स्थिरता आती है तब फिर प्रार्थना और जप किया जाता है ----
ॐ "तत्सवितुर्वरेण्यं, भर्गोदेवस्य धीमहि, धियो योन: प्रचोदयात् |"
यह त्रिपदा गायत्री है| इसमें चौबीस अक्षर हैं|
यह एक जप है| जप से पूर्व संकल्प करना पड़ता है कि आप कितने जप करेंगे| जितनों का संकल्प लिया है उतने तो करने ही पड़ेंगे|
फिर जप के पश्चात् उस ज्योति का ध्यान करते रहो और ॐ के साथ साथ ईश्वर की सर्वव्यापकता में मानसिक अजपा-जप करते रहो| ईश्वर की सर्वव्यापकता आप स्वयं ही हैं|
(पूरी विधि किसी शक्तिपात संपन्न सद्गुरु से सीखनी चाहिए)
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समापन --
ॐ "आपो ज्योति" मानसिक रूप से बोलते हुए दायें हाथ की तीन अँगुलियों से बाईँ आँख का स्पर्श करें,
"रसोsमृतं" से दायीं आँख का,
और "ब्रह्मभूर्भुवःस्वरोम्" से भ्रूमध्य का स्पर्श करें|
फिर लम्बे समय तक अपने आसन पर बैठे और सर्वस्व के कल्याण की कामना करो| प्रभु को अपना सम्पूर्ण परम प्रेम अर्पित करो और आप स्वयं ही वह परम प्रेम बन जाओ|
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मुझे एक संत ने बताया था कि ऋग्वेद में एक मंत्र है जिस में "गायत्री" शब्द आता है और उस मन्त्र के दर्शन बिश्वामित्र से बहुत पूर्व शव्याश्व्य ऋषि को हुए थे|
प्रचलित गायत्री मन्त्र के दृष्टा विश्वामित्र ऋषि थे| इस के चौबीस अक्षर हैं और तीन पद हैं| अतः यह त्रिपदा चौबीस अक्षरी गायत्री मन्त्र कहलाता है| बाद में अन्य महान ऋषियों ने गायत्री मंत्र से पहले "भू", भुवः, और "स्वः" ये तीन व्याह्रतियाँ भी जोड़ दीं| अतः पूरा मन्त्र अपने प्रचलित वर्त्तमान स्वरुप में आ गया|
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यह सप्त व्याह्रातियुक्त गायत्री साधना की विधि बहुत अधिक शक्तिशाली है और समाधी के लिए बहुत प्रभावी है|
इस साधना में यम नियमों का पालन, व भक्ति अनिवार्य है, अन्यथा कोई लाभ नहीं होगा|
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आप सब में हृदयस्थ प्रभु को नमन |
ॐ तत्सत्| ॐ नमः शिवाय| ॐ ॐ ॐ ||

कृपा शंकर
२६ मई २०१५

अनुसरण किसका करें ? ....

अनुसरण किसका करें ? ....
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महाभारत में एक यक्षप्रश्न के उत्तर में महाराज युधिष्ठिर कहते है ......
"तर्को प्रतिष्ठः श्रुतया विभिन्ना नैको मुनिर्यस्य मतं प्रमाणम् |
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम् महाजनो येन गतः स पन्थाः ||"
अर्थात् .... तर्कों से कुछ भी प्रतिष्ठित किया जा सकता है, श्रुति के अलग अलग अर्थ कहे जा सकते हैं, कोई एक ऐसा मुनि नहीं जिनका वचन प्रमाण माना जा सके| धर्म का तत्त्व तो मानो निविड़ गुफाओं में छिपा है (गूढ है), इस लिए महापुरुष जिस मार्ग से गये हों, वही मार्ग जाने योग्य है |
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अब प्रश्न यह उठता है कि ऐसे कौन से महापुरुष हैं जिनका अनुसरण किया जाए|
हर व्यक्ति अपनी अपनी चेतना के अनुसार पृथक पृथक उत्तर देगा|
मेरी जहाँ तक समझ है, तीन ही ऐसे महापुरुष हैं जिनका मैं अनुसरण कर सकता हूँ, यानि जिनको मैं पूर्णतः समर्पित हो सकता हूँ|
वे हैं ..... भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण और श्री हनुमान जी |
ये ही मेरे परम आदर्श हैं, और इनके जीवन का प्रत्येक अंश मेरे लिए परम आदर्श है| इनका स्थान अन्य कोई नहीं ले सकता|
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महाभारत में आता है कि सरोवर में जल लेने गये महाराज युधिष्ठिर को उस सरोवर में रहनेवाले यक्ष ने चार प्रश्न किये, और कहा कि उन चार प्रश्नों के उत्तर देने पर ही वह सरोवर का जल ले सकते हैं, अन्यथा नहीं| यक्ष के प्रश्नों के उत्तर न देने पर अन्य चारों पांडव मूर्छित हो चुके थे|
यक्ष ने पूछा ......
का वार्ता, किमाश्चर्यं, कः पन्था, कश्च मोदते ?
इति मे चतुरः प्रश्नान् पूरयित्वा जलं पिब ....
अर्थात् ...
(1) कौतुक करने जैसी क्या बात है ?
(2) आश्चर्य क्या है ?
(3) कौन सा मार्ग है ?
(4) कौन आनंदित रहता है ?
मेरे इन चार प्रश्नों के उत्तर देने के पश्चात् ही पानी पी सकते हो|
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महाराज युधिष्ठिर ने उत्तर दिया .....
 

(1) मासर्तुवर्षा परिवर्तनेन सूर्याग्निना रात्रि दिवेन्धनेन |
अस्मिन् महामोहमये कराले भूतानि कालः पचतीति वार्ता ||
अर्थात् ....
इस कराल मोह में, महिने, वर्ष इत्यादि के परिवर्तन से, सूर्यरुप अग्नि के इंधन से काल रात-दिन प्राणियों को पकाता है; यह कौतुक करने की बात है |
 

(2) अहन्यहनि भूतानि गच्छन्ति यममन्दिरम् |
शेषा जीवितुमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम् ||
अर्थात् ....
प्रतिदिन कितने हि प्राणी यम मंदिर जाते हैं (मर जाते हैं), यह देखने के पश्चात भी शेष मनुष्य सदा जीवित रहना चाहते हैं| यह सबसे बड़ा आश्चर्य है|
 

(3) "तर्को प्रतिष्ठः श्रुतया विभिन्ना नैको मुनिर्यस्य मतं प्रमाणम्
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम् महाजनो येन गतः स पन्थाः |"
अर्थात् ....
तर्कों से कुछ भी प्रतिष्ठित किया जा सकता है, श्रुति के अलग अलग अर्थ कहे जा सकते हैं, कोई एक ऐसा मुनि नहीं केवल जिनका वचन प्रमाण माना जा सके; धर्म का तत्त्व तो मानो निविड़ गुफाओं में छिपा है (गूढ है), इस लिए महापुरुष जिस मार्ग से गये हों, वही मार्ग जाने योग्य है |
 

(4) दिवसस्याष्टमे भागे शाकं पचति गेहिनी |
अनृणी चाप्रवासी च स वारिचर मोदते ||
अर्थात् .......
हे जलचर ! दिन के आठवें भाग में (सुबह-शाम रसोई के वक्त) जिसकी गृहिणी खाना पकाती हो, जिसके सर पे कोई ऋण न हो, जिसे (अति) प्रवास न करना पड़ता हो, वह मनुष्य (घर) सदा आनंदित होता है ।
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ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२८ मई २०१६

क्या करें और क्या न करें ? ......

क्या करें और क्या न करें ? ......
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आज के जीवन की भागदौड़ में, अनेक प्रकार के दबावों और आकर्षणों के मध्य, कोई भी सान्सारिक व्यक्ति विचलित हुए बिना नहीं रह सकता|
क्या करें और क्या न करें ? यह प्रश्न सदा विचलित करता रहता है|
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सर्वश्रेष्ठ समाधान है ..... हम परमात्मा को जीवन का केंद्रबिंदु और कर्ता बनाकर उसे स्वयं में प्रवाहित होने दें| जब तक कर्ताभाव है तब तक शास्त्रोक्त कर्म करें|
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एक गृहस्थ को जीवन में कम से कम इतना तो धन संचय करना चाहिए कि किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े| आज कि दुनिया में वह व्यक्ति भाग्यशाली है जिस पर कोई ऋण यानि उधार न हो, जिसे आजीविका के लिए परदेशों में भटकना ना पड़ता हो, और जिसे घर में प्रेम से बनाया हुआ भोजन मिलता हो|
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जीवन में जो भी सर्वश्रेष्ठ है अपने ह्रदय से पूछकर वो ही कार्य करें|


ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||
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कृपा शंकर
२६ मई २०१६

जितनी हम सोचते हैं, उससे कहीं अधिक शक्ति हमारे विचारों में है .....



जितनी हम सोचते हैं, उससे कहीं अधिक शक्ति हमारे विचारों में है .....
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जैसा हम सोचते हैं वैसा ही प्रभा-मंडल हमारे चारों और बन जाता है और वह प्रभा-मंडल वैसी ही परिस्थितियों को हमारी और आकर्षित करता रहता है| सफलता के विचार सफलता लाते हैं, असफलता के विचार असफलता लाते हैं, और जो हम सोचते हैं वही हम बन जाते हैं| हम यदि सोचते हैं कि हमारा कार्य कठिन है तो वह वास्तव में कठिन हो जाएगा, यदि हम उसे आसान सोचेंगे तो वह सचमुच आसान हो जाएगा| हम अपनी मंजिल को दूर मानेंगे तो मंजिल दूर चली जायेगी, मंजिल को पास मानेंगे तो मंजिल पास ही आ जायेगी|
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ये ही नियम आध्यात्म में लागू होते हैं| यदि हम सोचते हैं कि भगवान मेरे से दूर है तो भगवान वास्तव में दूर हैं, और यदि हम सोचते हैं कि भगवान हमारे ह्रदय में है तो वास्तव में वे हमारे ह्रदय में ही होते हैं|
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सारी आध्यात्मिक साधनाओं का यही रहस्य है| अब और क्या लिखूं ? सार की बात लिख दी है| जो समझने वाले हैं वे समझ जायेंगे और जो नहीं समझ सकते वे कभी नहीं समझेंगे| हम भजन, जप, तप, ध्यान आदि करते हैं, निरंतर परमात्मा का चिंतन करते हैं, उसका प्रयोजन यही है|
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सफलता का रहस्य प्रयास की गहनता और निरंतरता में है| हम भगवान का ध्यान जितना अधिक करेंगे उतनी ही अधिक और भी हमारी इच्छा ध्यान करने की होगी| जितना कम ध्यान करेंगे उतनी ही परमात्मा को पाने की प्यास कम होती चली जाती है|
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आत्मा की प्यास और तड़प यानि अभीप्सा तो परमात्मा के प्रति ही होती है| आत्मा को संतुष्टि परमात्मा से ही मिलती है| मन इन्द्रीय सुखों की पूर्ती हेतु संसार में भटकाता है पर संसार में किसी को कहीं भी संतुष्टि नहीं मिलती है क्योंकि जो आत्म-तत्व है वह तो परमात्मा को ही पाना चाहता है| हम इस बात को समझें या न समझें यह दूसरी बात है, पर यह सत्य है कि हमारा आत्म-तत्व परमात्मा को ही पाना चाहता है, उसकी अभीप्सा परमात्मा के ही प्रति है, वह अन्य कहीं संतुष्ट नहीं हो सकता| इन्द्रिय सुखों के प्रति प्रबल आकर्षण विखंडित व्यक्तित्व को जन्म देता है| यही हमारे असंतोष का कारण है|
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जो हम बनना चाहते हैं वह तो हम पहले से ही हैं| जिसे हम ढूँढ रहे हैं, वह भी हम स्वयं ही हैं| सुख, शान्ति, संतुष्टि, आनंद और पूर्णता हम स्वयं ही हैं| परमात्मा का ह्रदय ही हमारा स्वाभाविक घर है जहाँ हमें पहुँचना है| पर हम तो वहाँ पहले से ही हैं| जो हम प्राप्त करना चाहते हैं, वह हम स्वयं हैं| पूर्ण प्रेम से निरंतर इसी भाव में प्रयासपूर्वक रहो| एक दिन हम स्वयं को अपने गंतव्य पर ही पायेंगे|
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
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कृपा शंकर
२७ मई २०१७

भारत में ब्राह्मणों की दुर्दशा ......

भारत में ब्राह्मणों की दुर्दशा  ......
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भारत में इस समय सबसे अधिक दुर्दशा ब्राह्मणों की है| ब्राह्मणों की स्थिति तथाकथित दलितों से भी खराब है| वास्तव में इस समय देश में कोई दलित वर्ग है तो वह ब्राह्मणों का है| आरक्षण व्यवस्था ने ब्राह्मणों की आर्थिक और सामाजिक रूप से कमर तोड़ दी है| अब ब्राह्मणों को यदि जीवित रहना है तो संगठित होना पड़ेगा| आरक्षण के समर्थक सभी दल ऊंची ऊंची बातें ही करते हैं पर सामाजिक समरसता के शत्रु हैं| ब्राह्मणों के साथ साथ राजपूतों जैसी अन्य अनारक्षित सामान्य वर्ग की जातियों का भी यही हांल है| किसी भी तरह का आरक्षण न हो| हर कदम पर आरक्षण का विरोध करें|
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ब्राह्मणों ने कभी किसी पर अत्याचार नहीं किये| ब्राह्मणों के विरुद्ध समस्त झूठा प्रचार अंग्रेजों ने किया| सन १८५८ ई. में अंग्रेजों ने ब्राह्मणों द्वारा चलाये जा रहे सारे गुरुकुलों को आग लगाकर नष्ट कर दिया| उन का धन छीन कर उन्हें निर्वासित कर दिया| उनकी पुस्तकें जला दी गईं| उन का उद्देश्य था ब्राह्मण व्यवस्था को नष्ट करना| आज जितने भी धर्म ग्रन्थ उपलब्ध हैं वे सिर्फ इसीलिए उपलब्ध है कि ब्राम्हणों ने उन्हें रट रट कर सुरक्षित रखा| ब्राह्मण शासक वर्ग नहीं था| दलितोद्धार का आरम्भ ब्राह्मणों ने ही किया| जिन्हें आप दलित कहते हैं वे उच्च कोटि के क्षत्रिय ठाकुर थे| चूंकि उन्होंने इस्लाम कबूल नहीं किया इसलिए मुस्लिम शासकों ने उन्हें मल उठाने को बाध्य किया| उन्होंने अपनी मर्यादा भंग की पर धर्म नहीं छोड़ा इसलिए मुस्लिम शासकों ने उन्हें भंगी कह्ना शुरू किया| कई शताब्दियों तक उन्होंने विदेशी आक्रान्ताओं के विरुद्ध संघर्ष किया| दलितों में भी अनेक जातियां हैं| आरक्षण का लाभ उनकी एक जाति विशेष को ही मिला है| ब्राह्मणों के विरुद्ध सारा प्रचार धर्मनिरपेक्षतावादियों और मार्क्सवादियों का है जो वर्ग-संघर्ष में आस्था रखते हैं| सनातन धर्म में वर्ग संघर्ष का कोई स्थान नहीं है| ब्राह्मणों का जीवन त्याग तपस्या से पूर्ण रहा है| सब से अधिक त्याग और तपस्या किसी जाति ने की है तो वह है ब्राह्मण जाति| जाति प्रथा का विरोध भी किसी ने किया है तो सिर्फ ब्राह्मण जाति ने| दलितोद्धार का वर्त्तमान युग में सबसे बड़ा कार्य किया स्वामी दयानंद सरस्वती और वीर सावरकर जैसे लोगों ने जो स्वयं ब्राह्मण थे|
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वर्ण व्यवस्था को जन्म आधारित किसने व कब किया यह तो निष्पक्ष शोध का विषय है| यहाँ मैं कुछ ऐसे विद्यालयों व् गुरुओं की बात बताना चाहता हूँ जिन्हें मैंने बचपन में अंतिम सांसें लेते हुए देखा है| आज कोई उनकी कल्पना भी नहीं कर सकता| मैंने अपनी आँखों से ऐसे गुरुओं को देखा है जो विद्यादान के बदले में कोई शुल्क नहीं लेते थे| नि:शुल्क विद्यार्थियों को पढ़ाते थे| वर्ष में एक बार गुरूजी चौकी पर बैठते थे और विद्यार्थी एक एक कर के क्षमतानुसार कुछ वस्त्र या अन्न या कुछ राशी उन्हें गुरु-दक्षिणा के रूप में देते जिनसे वे पूरे वर्ष भर काम चलाते|जो विद्यार्थी कुछ भी देने में असमर्थ होता गुरूजी उसके घर वर्ष में सिर्फ एक बार भोजन कर आते| बस इसी स्कूल फीस के बदले गुरूजी वर्ष भर बच्चों को अपना धर्म मान कर पढ़ाते| यह भारत के ब्राह्मणों का धर्म था जो आज की अंग्रेजी स्कूलों की चकाचोंध में खो गया है|

ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२७ मई २०१३

आत्मनिवेदन यानि नरमेध यज्ञ .......


आत्मनिवेदन यानि नरमेध यज्ञ .......
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योगियों के अनुसार कुण्डलिनी जागरण ................ गोमेध यज्ञ है,
मणिपुर चक्र का भेदन ...................................... अश्वमेध यज्ञ है,
अनाहत चक्र का भेदन ...................................... वाजपेय यज्ञ है,
आज्ञा चक्र का भेदन .......................................... सोम यज्ञ है,
और अपने आप को हवि रूप में
परमात्मा रुपी अग्नि में पूर्ण समर्पण ........................ नरमेध यज्ञ है|
यह आत्मनिवेदनात्मक भक्ति रुपी यज्ञ है|
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कोई भी प्राणी पवित्रता और शुद्ध भाव से अपने आपको शाकल्य मानकर और भगवान को अग्नि समझकर उन प्रभु को अपने आप को निरंतर समर्पित करता है, तो यह नरमेध यज्ञ उसे भगवान् की प्राप्ति करा देता है|

हवि डालते समय ओम् या किसी भगवन्नाम या मन्त्र का उच्चारण हम कर सकते हैं| यह सामग्रीनिरपेक्ष सात्विक यज्ञ है जिसे शरणागति या आत्मनिवेदन भक्ति भी कह सकते हैं| इस परम सात्विक नरमेध यज्ञ यानि आत्मनिवेदन रूपी भक्ति यज्ञ का आश्रय हम सब ले सकते हैं|

ॐ आत्मतत्वं समर्पयामी नम: स्वाहा । इदम् नरमेध यज्ञे आत्म कल्याणार्थाय इदम् न मम ।।
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

कृपा शंकर
२७ मई २०१५