Sunday, 21 May 2017

मनुष्य जीवन की एकमात्र समस्या और एकमात्र समाधान :--

May 22. 2013.

मनुष्य जीवन की एकमात्र समस्या और एकमात्र समाधान :--
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यह सृष्टि परमात्मा की रचना है जिसे चलाने में वह सक्षम है| उसे हमारे सुझावों की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हम स्वयं भी उसी की रचना हैं|
हरेक कार्य विधिवत रूप से कुछ नियमों के अंतर्गत होता है, जिन्हें न जानना ही हमारी अज्ञानता है|
किसी नियम का उल्लंघन करने पर दंड तो हमें भुगतना ही पड़ता है| हमारा यह तर्क स्वीकार्य नहीं हो सकता कि हमें नियमों का ज्ञान नहीं था|
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कहीं न कहीं किसी आध्यात्मिक नियम का उल्लंघन करने से कष्ट और पीड़ा का सामना करना ही पड़ता है| यहीं से सभी तथाकथित समस्याएँ उत्पन्न होती हैं|
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वास्तव में ये समस्याएँ हमारी नहीं बल्कि सृष्टिकर्ता परमात्मा की हैं| वही तो सब कुछ कर रहा है| जब हम कुछ करेंगे ही नहीं तो हम कैसे उत्तरदायी हो सकते हैं ? हम ने तो कहा नहीं था कि हमें पृथक जीवन दो| जिसने यह जीवन दिया है और जो सब कुछ कर रहा है वही अपने कर्मफलों का भोगी है, हम नहीं| हम अहंकारवश स्वयं को कर्ता बना देते हैं बस यहीं से सब दु:ख, कष्ट और पीडाएं आरम्भ होती हैं|
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मनुष्य के सब दु:खों, कष्टों और पीडाओं का एकमात्र कारण है ----- परमात्मा से पृथकता|
अन्य कोई कारण नहीं है|
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इसी तरह मनुष्य की एकमात्र समस्या है ---- परमात्मा को उपलब्ध/समर्पित होना| अन्य कोई समस्या नहीं है| हम परमात्मा को कैसे उपलब्ध हों यही तो सनातन धर्म सिखाता है|
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हमें धर्म-निरपेक्ष से धर्म-सापेक्ष बनना होगा|
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अपना ध्यान निरंतर कूटस्थ पर रखो और परमात्मा के उपकरण बन जाओ| वह जब इस अनंत अन्धकार से घिरे घोर भवसागर में हमारा ध्रुव तारा ही नहीं बल्कि कर्णधार भी बन जाएगा तब हम भटकेंगे नहीं| प्रकृति की प्रत्येक शक्ति हमारे अनुकूल बन जायेगी| बस उसे और सिर्फ उसे अपनी जीवन नौका का कर्णधार बना लो|
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ॐ तत्सत्| इति| ॐ ॐ ॐ ||

कृपा शंकर
May 22, 2013.

क्या जीवन में परमात्मा की कोई आवश्यकता है? .....


May 22, 2015

क्या जीवन में परमात्मा की कोई आवश्यकता है? .....
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अधिकांश लोग कहते हैं की हमारे पास परमात्मा पर ध्यान के लिए, साधना के लिए, भजन के लिए समय नहीं है| कुछ लाभ होता है या घर में उससे चार पैसे आते हैं तो कुछ सोचें भी अन्यथा क्यों समय नष्ट करें| यह तो निठल्ले लोगों का काम है|
दूसरे कुछ लोग कहते हैं कि जब तक हाथ पैर चलते हैं तब तक खूब पैसे कमाओ, अपना और अपने परिवार व बच्चों का जीवन सुखी करो| जब खाट पकड़ लेंगे तब भगवान को याद करेंगे|
तीसरी तरह के लोग होते हैं कि अभी हमारा समय नहीं आया है| जब समय आयेगा तब देखेंगे|
चौथी प्रकार के लोग हैं जो कहते हैं कि अभी जिंदगी में कुछ मजा, मौज-मस्ती की ही नहीं है| मौज मस्ती से दिल भरने के बाद सोचेंगे|
पांचवीं तरह के लोग हैं जो कहते हैं कि जैसा हम विश्वास करते या सोचते हैं, वह ही सही है, बाकि सब गलत| हमारी बात ना मानो तो तुम जीने लायक ही नहीं हो|
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उपरोक्त सभी को सादर नमन|
दुनिया अपने हिसाब से अपने नियमों से चल रही है, और चलती रहेगी| कौन क्या सोचता है और क्या कहता है क्या इसका कोई प्रभाव पड़ता है?
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जीवन में एक ही पाठ निरंतर पढ़ाया जा रहा है, वह पाठ शाश्वत है| जो नहीं सीखते हैं, वे प्रकृति द्वारा सीखने को बाध्य कर दिए जाते हैं|
भगवान हो या ना हो, विश्वास करो या मत करो कोई अंतर नहीं पड़ता|
किसी से प्रभावित हुए बिना अपना कार्य करते रहो| प्रकृति सब कुछ सिखा देगी|

ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||

May 22, 2015

"श्री" शब्द का महत्व .....

May 22, 2015.

भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के नाम के साथ हम "श्री" शब्द का प्रयोग करते हैं| बिना "श्री" के तो लगता है मैं ईश निंदा ही कर रहा हूँ| सिर्फ अभिवादन करने के लिए हम "राम राम" या "जय राम जी की" कहते हैं| पर उनकी स्तुति के लिए सदा "श्रीराम" ही कहते हैं| श्रीकृष्ण को तो मैं श्री विहीन सोच ही नहीं सकता|
जयश्रीराम ! जयश्रीकृष्ण !
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भारत में श्री, श्रीमान और श्रीमती शब्दों का सामाजिक शिष्टाचार में बड़ा महत्व है। आमतौर श्री, श्रीमान शब्द पुरुषों के साथ लगाया जाता है और श्रीमती महिलाओं के साथ। इसमें पेच यह है कि श्री और श्रीमान जैसे विशेषण तो वयस्क किन्तु अविवाहित पुरुषों के साथ भी प्रयोग कर लिए जाते हैं, किंतु श्रीमती शब्द सिर्फ विवाहिता स्त्रियों के साथ ही इस्तेमाल करने की परम्परा है। अविवाहिता के साथ सुश्री शब्द लगाने का प्रचलन है। यहां परम्परा शब्द का इस्तेमाल हमने इसलिए किया है क्योंकि श्रीमती शब्द में कहीं से भी यह संकेत नहीं है कि विवाहिता ही श्रीमती है। संस्कृत के “श्री” शब्द की विराटता में सबकुछ समाया हुआ है मगर पुरुषवादी समाज ने श्रीमती का न सिर्फ आविष्कार किया बल्कि विवाहिता स्त्रियों पर लाद कर उन्हें “श्रीहीन”कर दिया। संस्कृत के “श्री” शब्द का अर्थ होता है लक्ष्मी, समृद्धि, सम्पत्ति, धन, ऐश्वर्य आदि। सत्ता, राज्य, सम्मान, गौरव, महिमा, सद्गुण, श्रेष्ठता, बुद्धि आदि भाव भी इसमें समाहित हैं। धर्म, अर्थ, काम भी इसमें शामिल हैं। वनस्पति जगत, जीव जगत इसमें वास करते हैं। अर्थात समूचा परिवेश श्रीमय है। भगवान विष्णु को श्रीमान या श्रीमत् की सज्ञा भी दी जाती है। गौरतलब है कि “श्री” स्त्रीवाची शब्द है। उपरोक्त जितने भी गुणों की महिमा “श्री” में है, उससे जाहिर है कि सारा संसार “श्री” में ही आश्रय लेता है। अर्थात समस्त संसार को आश्रय प्रदान करनेवाली “श्री” के साथ रहने के कारण भगवान विष्णु को श्रीमान कहा गया है। इसलिए वे श्रीपति हुए। इसीलिए श्रीमत् हुए। भावार्थ यही है कि भगवान विष्णु तो कण-कण में व्याप्त हैं, वही राम भी हैं, वही तो कृष्ण भी हैं।
प्रश्न तो यह है कि जब “श्री” के होने से भगवान विष्णु श्रीमान या श्रीमत हुए तो फिर श्रीमती की क्या ज़रूरत है? “श्री” से बने श्रीमत् का अर्थ हुआ ऐश्वर्यवान, धनवान, प्रतिष्ठित, सुंदर, विष्णु, कुबेर, शिव आदि। यह सब इनके पास पत्नी के होने से है। पुरुषवादी समाज ने श्रीमत् का स्त्रीवाची भी बना डाला और श्रीमान प्रथम स्थान पर विराजमान हो गए और श्रीमती पिछड़ गईं। समाज यह भूल गया कि “श्री” की वजह से ही विष्णु श्रीमत हुए। संस्कृत में एक प्रत्यय है वत् जिसमें स्वामित्व का भाव है। इसमें अक्सर अनुस्वार लगाय जाता ...क्या किसी वयस्क के नाम के साथ श्रीमान, श्री, श्रीमंत या श्रीयुत लगाने से यह साफ हो जाता है कि उसकी वैवाहिक स्थिति क्या है... है जैसे बलवंत। इसी तरह श्रीमत् भी श्रीमंत हो जाता है। हिन्दी में यह वंत स्वामित्व के भाव में वान बनकर सामने आता है जैसे बलवान, शीलवान आदि। स्पष्ट है कि विष्णु श्रीवान हैं इसलिए श्रीमान हैं।  

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श्री तो स्वयंभू है। “श्री” का जन्म संस्कृत की श्रि धातु से हुआ है जिसमें धारण करना और शरण लेना जैसे भाव हैं। जाहिर है समूची सृष्टि के मूल में स्त्री शक्ति ही है जो सबकुछ धारण करती है। इसीलिए उसे “श्री” कहा गया अर्थात जिसमें सब आश्रय पाए, ... किसी भी स्त्री को श्री नहीं कहा जा सकता। अब ऐसी “श्री” के सहचर श्रीमान कहलाएं तो समझ में आता है मगर जिस “श्री” की वजह से वे श्रीमान हैं, वह स्वयं श्रीमती बन जाए, यह बात समझ नहीं आती। तुर्रा यह की बाद में पुरुष ने “श्री” विशेषण पर भी अधिकार जमा लिया। अक्लमंद सफाई देते हैं कि यह तो श्रीमान का संक्षिप्त रूप है। तब श्रीमती का संक्षिप्त रूप भी “श्री” ही हुआ। ऐसे में स्त्रियों को भी अपने नाम के साथ “श्री” लगाना शुरु करना चाहिए, क्योंकि वे ही इसकी अधिकारिणी हैं क्योंकि श्री ही स्त्री है और इसलिए उसे लक्ष्मी कहा जाता है। पत्नी या भार्या के रूप में तो वह गृहलक्ष्मी बाद में बनती है, पहले कन्यारूप में भी वह लक्ष्मी ही है। संस्कृत व्याकरण के मुताबिक 'श्री' शब्द के तीन अर्थ होते हैं: शोभा, लक्ष्मी और कांति। तीनों ही प्रसंग और संदर्भ के मुताबिक अलग-अलग अर्थों में इस्तेमाल होते हैं। श्री शब्द का सबसे पहले ऋग्वेद में उल्लेख मिलता है। तमाम किताबों में लिखा गया है कि 'श्री' शक्ति है। जिस व्यक्ति में विकास करने की और खोज की शक्ति होती है, वह श्री युक्त माना जाता है। ईश्वर, महापुरुषों, वैज्ञानिकों, तत्ववेत्ताओं, धन्नासेठों, शब्द शिल्पियों और ऋषि-मुनियों के नाम के आगे 'श्री' शब्द का अमूमन इस्तेमाल करने की परंपरा रही है। राम को जब श्रीराम कहा जाता है, तब राम शब्द में ईश्वरत्व का बोध होता है। इसी तरह श्रीकृष्ण, श्रीलक्ष्मी और श्रीविष्णु तथा श्रीअरविंद के नाम में 'श्री' शब्द उनके व्यक्तित्व, कार्य, महानता और अलौकिकता को प्रकट करता है। मौजूदा वक्त में अपने बड़ों के नाम के आगे 'श्री' लगाना एक सामान्य शिष्टाचार है। लेकिन 'श्री' शब्द इतना संकीर्ण नहीं है कि प्रत्येक नाम के आगे उसे लगाया जाए। असल में तो 'श्री' पूरे ब्रह्मांड की प्राण-शक्ति है। ईश्वर ने सृष्टि रचना इसलिए की, क्योंकि ईश्वर श्री से ओतप्रोत है। परमात्मा को वेद में अनंत श्री वाला कहा गया है। मनुष्य अनंत-धर्मा नहीं है, इसलिए वह असंख्य श्री वाला तो नहीं हो सकता है, लेकिन पुरुषार्थ से ऐश्वर्य हासिल करके वह श्रीमान बन सकता है। सच तो यह है कि जो पुरुषार्थ नहीं करता, वह श्रीमान कहलाने का अधिकारी नहीं है।
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"श्री" सम्पूर्ण ब्रह्मांड की प्राणशक्ति हैं| परमात्मा अनन्तश्री हैं| भगवान श्रीकृष्ण ने परमात्मा की उच्चतम अभिव्यक्ति की इसलिए वे श्री कृष्ण हैं| "श्री" के बिना भगवान साकार रूप ले ही नहीं सकते|
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ॐ ॐ ॐ

सबके लिए एक ही मार्ग नहीं हो सकता .....

सबके लिए एक ही मार्ग नहीं हो सकता .....
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सारे मार्ग और सिद्धांत हमारे लिए हैं, हम उनके लिए नहीं| हम सिर्फ और सिर्फ परमात्मा के लिए हैं| सब सिद्धांतों और मार्गों से ऊपर उठना ही पड़ेगा| परमात्मा हमारे कूटस्थ में सर्वदा विराजमान हैं| हमें कूटस्थ का अनुशरण करने और कूटस्थ चैतन्य में ही स्थिर रहने का निरंतर प्रयास करना चाहिए जहाँ भगवान की निरंतर अनुभूति होती है|
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यदि कोई मुझ से पूछे कि ध्रुवतारा कहाँ है तो मैं अपनी अंगुली से दिखाऊँगा कि ध्रुव तारा वहाँ है| एक बार ध्रुवतारे को देखने के पश्चात न तो मेरी अंगुली का कोई महत्व है और न ही मुझ बताने वाले का|
किसी मार्गदर्शिका को देखते हुए मैं अपने गंतव्य पर जाता हूँ| जब एक बार गंतव्य दिखाई दे जाता है तो मार्गदर्शिका की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि गंतव्य मेरे सामने है|
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वैसे ही एक बार परमात्मा की एक झलक मिल जाए तो इधर उधर देखना ही भटकाव है| पागल की तरह उनके पीछे पड़ जाओ| हमारे लक्ष्य परमात्मा हमारे समक्ष सर्वदा हैं| उन्हें छोड़कर इधर उधर कहीं भी नहीं देखना चाहिए|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

साक्षी भाव .....

साक्षी भाव .....
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परमात्मा ही समस्याओं के रूप में आते हैं और वे ही समाधान हैं|
किसी भी व्यक्ति के सामने उतनी ही समस्याएँ आती हैं जिनका भार वह वहन कर सके, उससे अधिक नहीं|
विकट से विकट संकट का समाधान है ..... "सदा साक्षी भाव"|
स्वयं साक्षी बनकर परमात्मा को कर्ता बनाओ| अपना जीवन उसे सौंप दो|
उसे जीवन का केंद्र बिंदु ही नहीं समस्त जीवन का आश्रय बनाओ|
सब समस्याएं तिरोहित होने लगेंगी|
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पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन, जप-तप सभी बाहरी उपक्रम हैं, लेकिन 'साक्षी भाव' दुनिया की सबसे सटीक और कारगर विधि है जो पदार्थ, भाव और विचार से व्यक्ति का तादात्म्य समाप्त कर देती है| साक्षी भाव अध्‍यात्म का राजपथ तो है ही साथ ही यह जीवन के सुख-दुःख में भी काम आता है|
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साक्षीभाव ही आध्यात्म का प्रवेशद्वार है|
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साक्षी भाव की एक और कड़ी है .... गृहस्थ सन्यासी की तरह रहना| श्री श्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय गृहस्थ थे, सामान्य धोती कुर्ता पहनते थे व नौकरी करते थे| एक बार वे एक बहुत बड़े आध्यात्मिक पुरूष त्रेलंग स्वामी से मिलने गए| स्वामी जी अपने सैंकड़ों शिष्यों के साथ बैठे थे| उनको आता देखकर स्वामी जी उठ खड़े हुए, गले लगाया और सम्मान पूर्वक बैठाया| शिष्यों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि इस गृहस्थ के प्रति इतना सम्मान क्यों? स्वामी जी ने बताया कि जिसको पाने के लिए मुझे वर्षो तक कठिन साधना करनी पड़ी, रोटी और लंगोटी तक का भी त्याग करना पड़ा, ये महाशय गृहस्थ रहते हुए भी उसी परम पद पर प्रतिष्ठित हैं मुझमें व इनमें कोई भेद नहीं है|
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साक्षी भाव का अभ्यास अजपा-जप और प्रणव के ध्यान द्वारा करें| ध्यान साधना को जीवन का अंग बनायें|
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साक्षी भाव का मूल है ...... कर्मों में निर्लिप्तता ......
हम हर पल कुछ न कुछ कर्म करते है और एक किया गया कर्म दूसरे कर्म का कारण होता है| दूसरा कर्म तीसरे का कारण है और इस प्रकार ये कार्य कारण की अनन्त श्रंखला चलती ही रहती है, और इस श्रंखला के कारण मनुष्य बार बार जन्म लेता है| अब प्रश्न ये है कि इस से बाहर निकले का उपाय क्या है?
क्यों कि कर्म तो हम चाहे या न चाहे वो तो हमसे होते ही रहेंगे, कर्महीन होना असंभव है|
इस का उत्तर सिर्फ गीता में ही है और कही भी नही है| गीता में भगबान श्री कृष्ण कहते है कि .....
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् |
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ||
कर्म के फल का त्याग करने की भावना से युक्त होकर, योगी परम
शान्ति पाता है। लेकिन जो ऐसे युक्त नहीं है, इच्छा पूर्ति के लिये
कर्म के फल से जुड़े होने के कारण वो बन्ध जाता है|
भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट रूप से कह रहे है की कर्म करो, फल की इच्छा मत करो| जिसने ऐसा न किया वह निश्चित ही अच्छा या बुरा जैसा भी कर्म किया है उस का दायीत्व स्वयं लेकर उस का फल भोगने को तैयार है| सारे दुःख का कारण अपेक्षा है| साक्षी भाव का मूल है कर्मो में निर्लिप्तता|
जब हम कोई कर्म करे तो अपने ही साक्षी हो कर ये देखे कि .... ये कौन है जो यह कर रहा है| जब हम स्वाद ले, क्रोध या काम में, अन्य विविध कर्मो में कर्म करने वाला अर्थात वह स्वयं क्या अनुभव कर रहा है साक्षी हो कर| ये अनुभव करते वक्त आप अपने को (द्रष्टा ) अपने अस्तित्व से अलग रक्खे|
मेरी ये बात शायद कुछ लोगो को समझ में न आये पर मनन कीजिये आप स्वयं समझ जायेंगे। ये ठीक उसी प्रकार है जैसे आप कोई अपनी ही फिल्म देख रहे हो और वो भी लाइव.... इसका विचार शुन्यता से गहरा नाता है| इस के चमत्कारिक प्रभाव और उपयोगिता की चर्चा अंतहीन है।
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जीवन में आनन्द के आगे सारी कामनाएँ ठहर जाती हैं| इसके बाद कुछ रहता ही नहीं है चाहने को| नन्द का अर्थ है ... समृद्धि| आनन्द का अर्थ है चहुंमुखी, पूर्ण समृद्धि| समृद्धि का अर्थ है ...... सम्+रिद्धि| रिद्धि का अर्थ है, जो निरन्तर सम्यक् रूप से बढता जाए| यह है लौकिक आनन्द| एक और आनन्द है .... पारलौकिक| इसके पर्याय हैं कृष्ण| जहाँ से सम्पूर्ण सृष्टि का विस्तार शुरू होता है| जहाँ जाकर सृष्टि का विस्तार ठहर जाता है| कृष्ण कहते हैं कि मैं अव्यय पुरूष हूं| उस अव्यय पुरूष की प्रथम कला ही आनन्द है| सम्पूर्ण सृष्टि इसी अव्यय पुरूष से आगे बढती है| अत: यह सिद्धान्त बन गया है कि आनन्द के बिना सृष्टि नहीं हो सकती| आनन्द के मूल में रहता है साक्षी भाव| जब व्यक्ति को ज्ञान के सहारे विज्ञानधारा समझ में आ जाती है, तब आनन्द की ओर गति होती है| साक्षी भाव प्रकट होता है| साक्षी होने का अर्थ है ..... अनासक्तभाव| न कोई आसक्ति, न कोई विरक्ति| न कुछ अच्छा है, न ही कुछ बुरा है। जो है, बस है|
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वर्षों पहिले एक कहानी पढी थी, संभवतः यह कहानी ओशो के किसी लेख में थी| बहुत सुन्दर कहानी है ....
एक बार एक नदी के किनारे दो सन्यासी अपनी पूजा पाठ में लगे हुए थे| उन सन्यासी में से एक ने गृहस्थ जीवन के बाद सन्यास ग्रहण किया था जबकि दूसरा बाल्य अवस्था से ही सन्यासी था| उन्होंने देखा की एक स्त्री नदी में स्नान कर रही हैं और नदी का स्तर लगातार बढ़ रहा हैं| उनमें से एक सन्यासी बोला अगर यह स्त्री डूबने लगेगी तो हम इसे बचा भी नहीं पाएंगे क्योंकि स्त्री का स्पर्श भी हमारे लिए वर्जित हैं| अचानक बचाओ बचाओ की आवाज आई तब वह सन्यासी जिसने गृहस्थ जीवन के बाद सन्यास ग्रहण किया था, उठ कर गया और उस स्त्री को निकाल कर किनारे ले आया और फिर अपनी पूजा पाठ में लग गया| इस पर दूसरा सन्यासी बोला यह तुमने अच्छा नहीं किया, स्त्री का स्पर्श भी हमारे लिए अपराध है, तुमने सन्यासी धर्म का उल्लंघन किया है, तुम्हें इसका दंड मिलना चाहिए| तब दुसरे सन्यासी ने संयत स्वर में पूछा कि तुम किस स्त्री की बात कर रहे हो? उसने क्रोधित हो कर कहा जिस स्त्री को तुमने अभी अभी पानी से निकाला है| इस पर पहले वाले ने उत्तर दिया कि उस घटना को तो बहुत समय बीत गया है लेकिन तुम्हारे दिमाग से वह स्त्री अभी तक नही निकली है| मै तो उस घटना को भूल ही गया था| यह कह कर वह फिर अपनी पूजा पाठ में लग गया|
साक्षीभाव तो यही है|
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हम सिर्फ साक्षी हैं, यह साक्षीभाव ही हमारा स्वभाव है| न हम कर्ता हैं और न विचारक| यह हमारा स्वरुप है| साक्षीभाव से ही "भूमा" तत्व की अनुभूति होती है| साक्षीभाव ही निष्काम कर्म है और साक्षीभाव ही संन्यास भी है|
संन्यास का अर्थ संसार को छोड़ देना नहीं है| संन्यास का अर्थ है : असार, व्यर्थ जो हम पकड़े हुए हैं, उसका छूट जाना| छोड़ना नहीं, छूट जाना| भेद स्पष्ट है|
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साक्षीभाव से वैराग्य जागृत होता है| हमारे देश में सन्यास तथा वैराग्य को लेकर भारी भ्रम प्रचलित है| विषयों में अनासक्ति का अर्थ यह माना जाता है कि मनुष्य कोई कर्म ही नहीं करे| संसार के अन्य जीवों से कटकर कहीं वन में जाकर रहने को ही सन्यास माना जाता है| कर्म और सन्यास की जो व्याख्या गीता में की गयी है उसे समझने में हम असमर्थ रहे हैं| कर्म करना और उसके फल में आकांक्षा न होना ही सन्यास है| श्रीमद्भागवत गीता में यह स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य अपनी देह के रहते बिना कर्म किये रह ही नहीं सकता| वह तत्वज्ञान को जानने के बाद भी विषयों से पृथक नहीं होता बल्कि उसमें आसक्ति का त्याग कर देता है|
योग दर्शन के अनुसार ....
दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम |
दिखने व सुनने वाले विषयों से सर्वथा तृष्णारहित चित्त की अवस्था ही वैराग्य है|
तत्परं पुरुषरव्यातेर्गुणवतृष्ण्यम् |
ज्ञान से प्रकृति के गुणों में तृष्णा का सर्वथा अभाव हो जाना ही परम वैराग्य है|
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साँसों के आवागमन को देखना, विचारों के आने-जाने को देखना, सुख और दुःख के भाव को देखना और इस देखने वाले को भी देखना ...... यह ऐसी प्रक्रिया है जैसे समुद्र की उथल-पुथल अचानक रुकने लगे और फिर धीरे-धीरे कंकर, पत्थर और कचरा नीचे तल में जाने लगे| जैसे-जैसे साक्षी भाव गहराता है मानो जल पूर्णत: साफ और स्वच्छ होने लगता है|
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जीवन सफल चुनौतियों से ही होता है| विकट से विकट चुनौती का समाधान बड़ा सरल है|
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ॐ ॐ ॐ ||

" यो वै भूमा तत् सुखं नाल्पे सुखमस्ति " .....


" यो वै भूमा तत् सुखं नाल्पे सुखमस्ति " ।

भूमा तत्व में यानि व्यापकता, विराटता में सुख है, अल्पता में सुख नहीं है| जो भूमा है, व्यापक है वह सुख है| कम में सुख नहीं है|
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ब्रह्मविद्या के आचार्य भगवान सनत्कुमार से उनके शिष्य देवर्षि नारद ने पूछा ..
" सुखं भगवो विजिज्ञास इति " |

जिसका उत्तर भगवान् श्री सनत्कुमार जी का प्रसिद्ध वाक्य है .....
" यो वै भूमा तत् सुखं नाल्पे सुखमस्ति " |


( यो वै भूमा तत् सुखम्, नाल्पे सुखमस्ति,भूमैव सुखं-छान्दोग्य उप. (७/२३/१) | )
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ॐ नमो भगवते सनत्कुमाराय | ॐ ॐ ॐ ||

नाथ सम्प्रदाय के १२ उप सम्प्रदायों में "मन्नाथी" सम्प्रदाय के "टाँई" गाँव (जिला झुंझुनूं, राजस्थान) स्थित प्राचीनतम प्रमुख मठ का भ्रमण .....

May 20, 2017.

नाथ सम्प्रदाय के १२ उप सम्प्रदायों में "मन्नाथी" सम्प्रदाय के "टाँई" गाँव (जिला झुंझुनूं, राजस्थान) स्थित प्राचीनतम प्रमुख मठ का भ्रमण .....
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राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र की मरुभूमि में झुंझुनू जिले के बिसाऊ कसबे के पास "टाँई" गाँव में मन्नाथी सम्प्रदाय का प्राचीनतम प्रमुख मठ है| यह मठ बहुत विशाल और जागृत स्थान है| इस सम्प्रदाय में अनेक सिद्ध संत हुए हैं और अभी भी हैं| यहाँ की परम्परा के संतों के झुंझुनू, फतेहपुर (सीकर जिला) और लक्ष्मणगढ़ (सीकर जिला) सहित भारत के अनेक स्थानों पर आश्रम हैं|

आज प्रातः साढ़े तीन बजे सपरिवार हमारे घर से लगभग ३२ किलोमीटर दूर इस आश्रम के लिए कार द्वारा चलकर ठीक चार बजे वहाँ पहुँच गया| बड़ा सुरम्य वातावरण था| वहाँ सूर्योदय से पूर्व ही शनिवार और मंगलवार को दूर दूर से अनेक श्रद्धालू आते हैं, जिनके असाध्य रोग नाथ जी महाराज की कृपा और आशीर्वाद से ठीक हो जाते हैं| ब्रह्ममुहूर्त में वहाँ जाना और भगवान का स्मरण करना अपने आप में एक अच्छा अनुभव था|

प्राचीन काल में स्यालकोट (वर्तमान में पाकिस्तान में) में शंखभाटी नाम के एक राजा थे जिनके पूर्णमल और रिसालु नाम के दो पुत्र थे| ये दोनों भाई श्री गोरक्षनाथ जी के प्रत्यक्ष शिष्य बने और क्रमशः योगी चोरंगी नाथ और योगी मन्नाथ के नाम से प्रसिद्ध हुए| भ्रमण करते करते योगी मन्नाथ जी इस मरुभूमि में आये और यहीं रह कर घोर तपस्या कर के परम अवधूत सिद्ध संत कहलाये| उनकी ही परम्परा में यह मन्नाथी सम्प्रदाय बना और यह स्थान "टाँई" नामक गाँव के रूप में प्रसिद्ध हुआ|

यहीं पर योगी मन्नाथ जी ने अपनी देह त्यागी, जहाँ उनका समाधी मंदिर है| इस आश्रम के अंतर्गत प्राचीन काल से ही २००० बीघा कृषि भूमि है| इसमें उनके शिष्यों की भी समाधियाँ हैं| दीर्घकाल तक यहाँ बहुत अच्छे अच्छे सिद्ध संत रहे हैं, अतः यह स्थान बहुत जागृत है|

मुझे ऐसे स्थानों पर जाना बहुत अच्छा लगता है| मरुभूमि का यह पूरा क्षेत्र वास्तव में हर सम्प्रदाय के साधू संतों के दिव्य स्पंदनों से भरा पडा है|

ॐ ॐ ॐ ||

May 20, 2017.