Saturday, 15 April 2017

क्या परमात्मा है ? हमें परमात्मा की आवश्यकता क्यों है ?......

(१५ अप्रेल २०१३).
क्या परमात्मा है ? हमें जीवन में परमात्मा की आवश्यकता क्यों है ?......
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कुछ शाश्वत जिज्ञासाएँ और प्रश्न हैं उनमें से सबसे बड़ी जिज्ञासा रही है कि क्या परमात्मा है और हमें उसकी आवश्यकता क्यों है? विश्व में ईसाईयत और इस्लाम ने अपनी अपनी ईश्वर की अवधारणाएँ विकसित कीं और बहुत ही निर्मम और हिंसक तरीके से अपनी मान्यताओं को विश्व में स्थापित किया| पर ये दोनों विचारधाराएँ आपस में सदा युद्धरत रहीं| इनका मत था कि सभी इनकी मान्यताओं को या तो मानें अन्यथा मरने के लिए तैयार रहें| इस्लाम, ईसाई और यहूदी .... इन तीनों मतों का जन्म मध्यपूर्व में हुआ और तीनों इब्राहिमी (Abrahamic religion) मत हैं पर तीनों में कोई समानता नहीं है| इतिहास में ये आपस में सदा युद्धरत रहे हैं| इनमें कभी यह चिंतन नहीं किया गया कि परमात्मा की आवश्यकता क्यों है|
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रूस में नास्तिक साम्यवादी विचारधारा विकसित हुई जो बलात् सब पर थोपी गयी, जहाँ ईश्वर को मानने का अर्थ था अपनी मृत्यु को निमंत्रित करना| यह भी बहुत अधिक हिंसक व्यवस्था थी| अब वह व्यवस्था अपनी स्वाभाविक मौत मर चुकी है, सिर्फ भारत में ही इसके कुछ अनुयायी बचे हैं| विश्व में सिर्फ उत्तरी कोरिया ही एक ऐसा देश है जहाँ ईश्वर को मानने की सजा मौत है| वहाँ का निरंकुश शासक ही स्वघोषित सब कुछ है|
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भारत में जो नास्तिक मत प्रचलित हुए उनके पास एक अति गहन दर्शन था| उन्होंने ईश्वर की आवश्यकता को कभी स्वीकार नहीं किया| इन नास्तिक मतों में प्रमुख हैं ... बौद्ध और जैन मत| इन मतों का विश्व में खूब प्रचार हुआ| ये कभी हिंसक नहीं रहे| बौद्ध मत में 'निर्वाण', और जैन मत में 'वीतरागता' लक्ष्य रही|
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अपना प्रश्न यह है कि हमें ईश्वर की आवश्यकता क्यों है? आवश्यकता है भी या नहीं? मनुष्य संसार में सुख, शांति और समृद्धि ढूँढता है, पर उसे सदा निराशा मिलती है| अंततः हार कर वह विचार करता है कि उसके जीवन का उद्देश्य क्या है, यह सृष्टि क्यों है, सृष्टिकर्ता कौन है आदि आदि| यहीं से ईश्वर को जानने की जिज्ञासा का जन्म होता है| इन जिज्ञासाओं के समाधान के लिए ही व्यक्ति ईश्वर की आवश्यकता को अनुभूत करता है|
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ईश्वर की आवश्यकता हमें इसलिए है कि हम ईश्वर में से आये हैं और जब तक अपने मूल में बापस नहीं लौट जाते तब तक संतुष्ट नहीं हो सकते, तब तक हमें कोई सुख शांति और सुरक्षा नहीं मिल सकती| यह सृष्टि बनी ही ऐसे है| इसका नियम भी यही है| कोई चाहे या न चाहे प्रत्येक जीव को बापस अपने मूल में लौटना ही पड़ता है| जो इसे समझते हैं वे बिना कष्ट पाए चले जाते है और जो नहीं समझते उन्हें कष्ट पाकर लौटना ही पड़ता है| प्रत्येक जीव को शिव बनना ही पड़ता है यही सृष्टि का नियम है| जिस परम चेतना से हमारा प्रादुर्भाव हुआ है उस चेतना में अपने अहंभाव को नष्ट कर हमें विलीन होना ही पड़ेगा| ईश्वर "सच्चिदानन्द" है जिसे उपलब्ध होने के लिए ही हमारा अस्तित्व हुआ है यही ईश्वर की सबसे बड़ी आवश्यकता है| प्रत्येक जीव का शिव बनना उसकी नियति है|
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ईश्वर पर और उसकी आवश्यकता पर जितना चिंतन भारत में हुआ है उतना अन्यत्र कहीं भी नहीं हुआ है| खूब गहन चिंतन मनन करने, और साधना द्वारा साक्षात्कार करने के उपरांत ईश्वर के अस्तित्व और उसकी आवश्यकता को सनातन परम्परा में स्वीकार किया गया है|
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं .....
"ये, तु, अक्षरम्, अनिर्देश्यम्, अव्यक्तम्, पर्युपासते | सर्वत्रागम्, अचिन्त्यम्, च, कूटस्थम्, अचलम्, ध्रुवम्" ||१२:३||
"सन्नियम्य, इन्द्रियग्रामम्, सर्वत्रा, समबुद्धयः | ते, प्राप्नुवन्ति, माम्, एव, सर्वभूतहिते, रताः" ||१२:४||
अर्थात् जो अक्षर की, अनिर्देश्य की, अव्यक्त की, सर्वव्यापक की, अचिंत्य की, कूटस्थ की, अचल ध्रुव की खोज करते हैं , सभी जगह समबुद्धि रखनेवाले, सभी भूतों के हित में लगे वे लोग मेरे पास ही आते हैं|
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हमारे जीवन में एक पीड़ादायक अभाव हर समय सदा ही रहता है| वह अभाव सिर्फ ईश्वर की भक्ति से ही दूर होता है| जब साम्यवाद अपने चरम शिखर पर था उस समय १९६७, १९६८ में मैं दो वर्ष रूस में रहा| रूसी भाषा का अच्छा ज्ञान था| मेरी आयु १९-२० वर्ष की थी पर हर समय कुछ नया जानने और सीखने की प्रबल जिज्ञासा रहती थी| वहाँ ईश्वर का नाम लेने, धार्मिक कर्मकांड, किसी भी तरह के धार्मिक साहित्य और गतिविधि पर पूर्ण प्रतिबन्ध था| नास्तिकता ही राजधर्म थी| वहाँ की व्यवस्था की सोच यह थी कि व्यक्ति की न्यूनतम आवश्यकता (जैसे रोटी, कपड़ा और मकान) पूरी हो जाए और व्यक्ति समर्पित होकर पूर्ण रूप से राज्य व्यवस्था के लिए कार्य करे| सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था वहाँ एकदम समाप्त हो गयी थी| उस घोर नास्तिक व्यवस्था में लोगो की वेदना और तड़प को मैंने प्रत्यक्ष देखा और अनुभूत किया है| लोग अपने आतंरिक अभाव की पूर्ती शराब और सेक्स से ही करने का प्रयास करते थे| किसी भी उत्सव पर या सप्ताहांत में जिधर देखो उधर चारों ओर नशे में चूर युवक युवतियों की भीड़ बिना किसी वर्जना के दिखाई देती थी| उन्ही दिनों तीन महीने लातविया की राजधानी रीगा में भी रहने का अवसर मिला| वहाँ के लोगों की तड़प तो रूसियों से भी अधिक थी| अब तो यह सोचकर काँप उठता हूँ कि बिना ईश्वर के कैसा अर्थहीन जीवन होता है| १९८० में २० दिन के लिए उत्तरी कोरिया जाने का अवसर मिला था| वहाँ के सभी अधिकारियों को रूसी भाषा आती थी अतः संवाद में मुझे कोई कठिनाई नहीं हुई| वहां की घोर नास्तिक व्यवस्था में मनुष्य सरकार की हाँ में हाँ मिलाने वाली मशीन के अलावा और कुछ भी नहीं था| ऐसी नास्तिक व्यवस्था की कल्पना करते हुए भी डर लगता है| १९७६ में रोमानिया गया था कुछ दिनों के लिए| वहां भी सभी नास्तिक साम्यवादी देशों जैसा ही बुरा हाल था| क्या स्त्री क्या पुरुष सब की एक ही सोच थी कि खूब सिगरेट, शराब और सेक्स का सेवन करो और राज्य की व्यवस्था के अनुकूल रहो| १९८८ के अंत में जब साम्यवाद का पतन हुआ तब मैं संयोगवश युक्रेन के ओडेसा नगर में था| उस समय वहाँ के कुछ दृश्य भूल नहीं सकता जब अनेक युवक युवतियां राज्य की नास्तिक व्यवस्था को पूर्ण चुनौती देते हुए सार्वजनिक पार्कों में कीर्तन करते थे| पुलिस उन्हें जेल में डालती तो वहां भी वे कीर्तन करने लगते| वहाँ की नास्तिक सरकार उन लोगों से डरने लगी थी| वहाँ मैनें यह प्रत्यक्ष देखा कि जीवन में ईश्वर की क्यों आवश्यकता है| जीवन में बहुत नास्तिक लोगों को देखा है उनका जीवन सदा असंतुष्ट और दुःखी ही रहता है| इससे अधिक और लिखना मेरी बौद्धिक क्षमता से परे है| सभी को धन्यवाद!
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ अप्रेल २०१३

Friday, 14 April 2017

यह सृष्टि परमात्मा का एक विचार मात्र है .....

हमने परमात्मा के बारे में तरह तरह की विचित्र कल्पनाएँ कर रखी हैं|
परमात्मा कोई हाथ में डंडा लेकर किसी बड़े सिंहासन पर बैठा अकौकिक पुरुष नहीं है जो अपनी संतानों को दंड और पुरुष्कार दे रहा है| परमात्मा बुद्धि की समझ से परे अचिन्त्य है| उसकी अनुभूतियाँ उसकी कृपा से ही हो सकती हैं|
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यह सृष्टि परमात्मा का एक विचार मात्र है| हम भी परमात्मा के अंश हैं अतः हमारे चारों ओर की सृष्टि हमारे विचारों का ही घनीभूत रूप है| हमारे विचार और सोच ही हमारे कर्म हैं| जैसा हम सोचते हैं वैसा ही हमारे चारों ओर घटित होने लगता है| वैसी ही परिस्थितियों का निर्माण हो जाता है|
उस परम तत्व से एकाकार होकर उसके संकल्प से जुड़कर ही हम कुछ सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं| उस परम तत्व से जुड़ना ही सबसे बड़ी सेवा है जो कोई किसी के लिए कर सकता है|
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परमात्मा तो एक अगम अचिन्त्य परम चेतना है| हम उससे पृथक नहीं हैं| वह ही यह लीला खेल रहा है| कुछ लोग यह सोचते हैं कि परमात्मा ही सब कुछ करेगा और वह ही हमारा उद्धार करेगा| पर ऐसा नहीं है| हमारी उन्नत आध्यात्मिक चेतना ही हमारी रक्षा करेगी| यह एक ऐसा विषय है जिस पर चर्चा मात्र से कोई लाभ नहीं है| .
परमात्मा की ओर चलने के लिए जो मार्ग है वह है ..... सत्संग, परमप्रेम, शरणागति और समर्पण का|
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सत्संग, भक्ति और नियमित साधना करने से मार्गदर्शन मिलता है, पर यह सब हम को स्वयं करना पड़ता है, वैसे ही जैसे प्यास लगने पर पानी स्वयं को ही पीना पड़ता है| दूसरे के पानी पीने से स्वयं की प्यास नहीं बुझती| कोई दूसरा हमें मुक्त करने नहीं आएगा| अपनी मुक्ति का मार्ग स्वयं को ही ढूंढना पड़ेगा|
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न तो कोई शैतान, जिन्न, भूत-प्रेत और न ही कोई दुरात्मा हमको प्रभावित कर सकता है जब तक हम स्वयं ही नहीं चाहें| सारे दु:ख और कष्ट आते ही हैं व्यक्ति को यह याद दिलाने के लिए कि वह गलत दिशा में जा रहा है| अपनी परिस्थितियों के लिए हम स्वयं ही उत्तरदायी हैं, और स्वयं के प्रयास से ही मुक्त हो सकते हैं|
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ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||
कृपाशंकर

जल का संकट .....

वर्त्तमान में तीन ऐसे संकट हैं जिन से मुक्ति पाने में वर्त्तमान सभ्यता को बहुत अधिक प्रयास करना होगा .........
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(१) विश्व में सबसे बड़ा संकट यानि खतरा इस समय है "इस्लामी आतंकवाद" का| समय रहते इस समस्या का निदान नहीं किया गया तो यह आतंकवाद पूरे विश्व को नष्ट कर देगा|

(२) दूसरा सबसे बड़ा संकट है कचरे के निस्तारण का| इतना अधिक कचरा इकट्ठा हो रहा है जिस से पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित हो रहा है| भौतिक कचरे के साथ साथ वैचारिक कचरा भी इकट्ठा हो रहा है|

(३) तीसरा सबसे बड़ा संकट जो आ रहा है वह है पीने योग्य जल की कमी का| इस लेख में उसी की चर्चा की गयी है|
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जल का संकट .....
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पूरा भारत पानी के अभाव से जूझ रहा है| हर दिन हालत बिगड़ रहे हैं| पानी की उपयोगिता और खर्च दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है| यह निकट भविष्य की सबसे बड़ी समस्या बनकर उभर रही है|
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मेरा एक सुझाव है कि सरकारी कार्यालयों, मंत्रियों, अधिकारियों व कर्मचारियों के निवासों, और व्यक्तिगत निवासों पर लॉन लगाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाये| इससे पानी की बर्बादी रुक जायेगी|
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जिन लोगों ने अपने घरों में लॉन यानि दूब के बगीचे लगा रखे हैं, उन्हें दूब के स्थान पर सब्जियाँ उगानी चाहियें|
सब्जी का उपयोग स्वयं कीजिये और औरों को भी दीजिये| समाज का भला होगा|
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कृपया इस सन्देश को यथासंभव खूब फैलाएं | धन्यवाद|

मेरा यह वर्तमान जन्म ही सर्वश्रेष्ठ है .....

मेरा यह वर्तमान जन्म ही सर्वश्रेष्ठ है .....
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एकांत में हमें अपने विचारों पर, और अन्यों के साथ अपनी वाणी पर सजगता पूर्वक नियंत्रण रखना चाहिए|
अधोगामी विचार .... पतन का कारण होते हैं|
अनियंत्रित शब्द .... स्वयं की आलोचना, निंदा व अपमान का कारण बन सकते हैं|
एकांत में परमात्मा के किसी पवित्र मन्त्र का निरंतर जाप हमारी रक्षा करता है|
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जहाँ तक मैं समझता हूँ, परमात्मा हाथ में डंडा लेकर किसी बड़े सिंहासन पर बैठा कोई अलोकिक पुरुष नहीं है जो अपनी संतानों को दंड और पुरष्कार दे रहा है|
जैसी अपनी सोच होती है वैसी ही परिस्थितियों का निर्माण हो जाता है| हमारे विचार और सोच ही हमारे कर्म हैं|
परमात्मा तो एक अगम अचिन्त्य परम चेतना है जो हम से पृथक नहीं है| वह चेतना ही यह लीला खेल रही है|
कुछ लोग यह सोचते हैं कि परमात्मा ही सब कुछ करेगा और वही हमारा उद्धार करेगा| पर ऐसा नहीं है| हमारी उन्नत आध्यात्मिक चेतना ही हमारी रक्षा करेगी|
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मनुष्य देह में हमारा जन्म अपने प्रारब्ध कर्मों को भोगने के लिए ही होता है|
जब तक संचित कर्म अवशिष्ट हैं तब तक बारंबार पुनर्जन्म होता ही रहेगा|
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इस निरंतर पुनरागमन से मुक्ति के लिए अहंभाव को समर्पित करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है|
यह मनुष्य देह, इस देह की ही कामनापूर्ति के लिए नहीं मिली है|
यह एक साधन है जिसका उपयोग परमात्मा की प्राप्ति के लिए ही करना चाहिए|
जब तक हम स्वयं नहीं चाहें, तब तक न तो कोई शैतान और न ही कोई दुरात्मा हमें प्रभावित कर सकता है|
ये सब बातें हम लोग करते हैं दूसरों पर दोषारोपण करने और अपने दायित्व से परे भागने के लिए|
अपनी परिस्थितियों के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं और हम स्वयं अपने स्वयं के प्रयास से ही स्वयं को मुक्त कर सकते हैं| .
हे प्रभु, नष्ट ही करना है तो यह अहंकार नष्ट करो| "मुझे", "मैं" और "मेरा" इस बोध से मुक्त करो|
मेरा यह वर्तमान जन्म ही सर्वश्रेष्ठ है| अगले जन्म की प्रतीक्षा मुझे नहीं करनी चाहिए|
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सर्वव्यापक चेतना परमात्मा का तो सभी के प्रति समभाव है|
वह चेतना तो सभी को समान दृष्टि से देखती है, उसका किसी से द्वेष नहीं, किसी से प्रेम नहीं|
हमारे विचार और संकल्प ही हमारे कर्म हैं जो सुख-दूःख के हेतु बनते हैं।
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जब तक हम स्वयं नहीं चाहें, तब तक न तो कोई शैतान और न ही कोई दुरात्मा हमें प्रभावित कर सकता है|
ये सब बातें हम लोग करते हैं दूसरों पर दोषारोपण करने और अपने दायित्व से परे भागने के लिए|
अपनी परिस्थितियों के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं और हम स्वयं अपने स्वयं के प्रयास से ही स्वयं को मुक्त कर सकते हैं|
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नियमित ध्यान और भक्ति से मार्गदर्शन मिलता है पर यह स्वयं को करना पड़ता है| कोई दूसरा हमें मुक्त करने नहीं आएगा| अपनी मुक्ति का मार्ग स्वयं को ही ढूँढना पड़ेगा|

ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
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अगर हमें वास्तव में परमात्मा से प्रेम हैै तो ......

April 12, 2016

अगर हमें वास्तव में परमात्मा से प्रेम हैै तो ......
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दिन का आरम्भ भगवान के ध्यान से करें| दिन में हर समय भगवान को अपनी चेतना में रखें| यदि भूल जाएँ तो याद आते ही पुनश्चः उन्हें अपनी चेतना में जीवन का केंद्रबिंदु बनाएँ| उनके उपकरण मात्र बनें| समर्पण का निरंतर प्रयास हो|
रात्रि को सोने से पहिले यथासंभव गहनतम ध्यान करके ही सोयें| रात्रि का ध्यान सबसे अधिक महत्वपूर्ण है|
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जो द्विज हैं यानि जिन्होंने यज्ञोपवीत धारण कर रखा है उन्हें नित्य संध्या (संधि क्षणों में की गई साधना) और ब्रह्मगायत्री का यथासंभव अधिकाधिक जप करना चाहिए| मानसिक रूप से तो किसी भी परिस्थिति में कर ही सकते हैं| हर कार्य का आरम्भ ब्रह्मगायत्री के मानसिक जप से ही करें| कुछ आचार्यों के अनुसार जिन द्विजों ने यज्ञोपवीत धारण कर रखा है उनकी धर्म-पत्नियों को भी ब्रह्मगायत्री का जप करना चाहिए| संध्या तो सब का कर्तव्य है| सामान्यतः रात्री और दिवस का सन्धिक्षण, मध्याह्न, दिवस और रात्री का सन्धिक्षण और मध्यरात्रि का समय संध्याकाल होता है| इन संधिक्षणों में की गयी साधना को संध्या कहते हैं| अपनी गुरु परम्परानुसार सभी को संध्या करनी चाहिए| संध्या का फल कभी क्षीण नहीं होता|
योगियों के लिए हर श्वास प्रश्वास और हर क्षण सन्धिक्षण है| अतः वे अपने कूटस्थ में निरंतर प्रणव का ध्यान करते हैं|
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जैसा हम सोचते हैं वैसे ही हम बन जाते हैं| निरंतर भगवान का ध्यान करेंगे तो स्वतः ही उपास्य के सारे सद्गुण हमारे में खिंचे चले आयेंगे और हमारी सारी विकृतियाँ स्वतः ही दूर हो जायेंगी|
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भगवान के प्रति अहैतुकी परम प्रेम हमारा स्वाभाविक धर्म है| उनके प्रति समर्पित होकर जीवन का हर कार्य करना और शरणागति द्वारा पूर्ण समर्पण हमारा परम धर्म है| हम धर्म की रक्षा करेंगे तो धर्म भी हमारी रक्षा करेगा| बिना धर्म का पालन किये हम निराश्रय और असहाय हैं|
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण का वचन है .....
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते | स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ||२:४०||
अर्थात इस महाभय से हमारी रक्षा थोड़ा बहुत धर्म का पालन ही करेगा|
जब भगवान श्रीकृष्ण का आदेश है तो उसकी पालना हमें करनी ही होगी|
अन्य सारे उपाय अति जटिल और कठिन है अतः सबसे सरल मार्ग के रूप में स्वाभाविक रूप से धर्म का पालन हमें करना ही चाहिए, तभी धर्म ही हमारी रक्षा करेगा| धर्म का पालन ही धर्म की रक्षा है और धर्म की रक्षा ही हमारी स्वयं की रक्षा है|

भारत का गौरवशाली इतिहास हमें क्यों नहीं पढ़ाया जाता ? .....

April 12, 2016 

भारत का गौरवशाली इतिहास हमें क्यों नहीं पढ़ाया जाता ?
भारत के महान शासकों के बारे में हमें क्यों नहीं बताया जाता ?
क्या विदेशी लुटेरों का झूठा प्रशस्तिगान ही भारत का इतिहास है ?
यह कैसा षडयंत्र है ?
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भारत का इतिहास गौरवशाली है| भारत ने पराधीनता को कभी भी पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया था| सदा विदेशी लुटेरों का प्रतिकार किया| मराठों का इतिहास, विजयनगर साम्राज्य और अन्य भी अनेक महान क्षेत्रीय शासकों और योद्धाओं का इतिहास अत्यधिक गौरवशाली था जिनके बारे में हमें नहीं पढ़ाया जाता|
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लगता है भारत का इतिहास भारत के शत्रुओं ने लिखा है|
हमें यह पढ़ाया गया है कि अंग्रेजों के आने से पहिले भारत भारत नहीं था, भारत को एक किया तो अंग्रेजों ने ही किया| यह एक बहुत बड़ा झूठ है|
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समुद्रगुप्त के बारे में तो बच्चों को बिलकुल नहीं पढ़ाया जाता जिसका साम्राज्य पूर्व में आसाम और ब्रह्मदेश से लेकर पश्चिम में वर्तमान ईरान के भीतर तक, और उत्तर में सम्पूर्ण हिमालय से लेकर दक्षिण में श्रीलंका तक था|
समुद्र्गुप्त भारत का महान शासक था जिसने अपने जीवन काल मे कभी भी पराजय का स्वाद नही चखा| सारे भारत को उसने अपने पराक्रम से एक सूत्र में बाँध रखा था| पूरी पृथ्वी पर उसका कोई विरोधी नहीं था| उसकी कीर्ति चारों ओर फ़ैली हुई थी|
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वह वैदिक धर्म का अनुयायी था| उसने अनेक तीर्थों का पुनरुद्धार किया, अनेक अश्वमेध यज्ञ किए और ब्राह्मणों दीनों, अनाथों को अपार दान दिया| वह सत्संग का प्रेमी था| माँ सरस्वती और लक्ष्मी की उस पर अपार कृपा थी| ऐसा कोई भी सद्गुण नहीं है जो उसमें न रहा हो| उसकी नीति थी साधुता का उदय हो तथा असाधुता कर नाश हो| उसका हृदय इतना मृदुल था कि प्रणतिमात्र से पिघल जाता था| उसने लाखों गायों का दान किया था| अपनी कुशाग्र बुद्धि और संगीत कला के ज्ञान तथा प्रयोग से उसने ऐसें उत्कृष्ट काव्य का सर्जन किया था कि लोग 'कविराज' कहकर उसका सम्मान करते थे| उसने अपने आधीन सिंहल द्वीप (श्रीलंका) के राजा मेघवर्ण को बोधगया में बौद्धविहार बनाने की अनुमति देकर अपनी महती उदारता का परिचय दिया था|
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अन्य भी अनेक महान शासक, योद्धा और वीर पुरुष भारत में हुए हैं जिनके बारे में हमें नहीं पढ़ाया जाता| कभी ना कभी वह दिन अवश्य आयेगा जब हमें अपने सही इतिहास का ज्ञान होगा हमें अपने राष्ट्र और संस्कृति पर गर्व होगा, तभी भारत अपने परम वैभव को पुनश्चः प्राप्त करेगा|
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साधुता का उदय हो, असाधुता कर नाश हो| भारत माता की जय हो|
ॐ नमःशिवाय | हर हर महादेव | जय श्रीराम | ॐ ॐ ॐ ||

भारत पर हो रहा मनोवैज्ञानिक आक्रमण .....

भारत पर एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक आक्रमण हो रहा है| इस का उद्देश्य भारतीयों में अपनी अस्मिता, स्वाभिमान और देशभक्ति की भावना को मिटा देना है ताकि भारत के और टुकड़ेे कर के उसे नष्ट कर दिया जाये|इसके पीछे अमेरिका, चीन, पाकिस्तान जैसे देशों का हाथ तो है ही, साथ साथ अंग्रेजों के उन मानसपुत्रों का भी हाथ है जिनके हाथ में अँगरेज़ भारत की सत्ता सौंप गए थे| इनका साथ दे रहे हैं भारत के असंख्य जयचंद|
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पहले यह आक्रमण धर्मनिरपेक्षतावाद, सर्वधर्मसमभाववाद के विचार थोपने, जातीय आधार पर वर्गसंघर्ष करवाने और हमारे गौरवशाली अतीत को विस्मृत करवाने के रूप में था, अब भारतीयों को असहिष्णु बताकर उनमें आत्महीनता का बोध लाने के रूप में है| भारत एक आध्यात्मिक राष्ट्र तभी बन सकता है जब सभी भारतीयों में अपने भारतीय होने का स्वाभिमान यानि आत्म-गौरव हो|
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हमें अपने सही इतिहास, साहित्य और वैभव का ज्ञान होना अति आवश्यक है| हमें हर दृष्टिकोण से शक्तिशाली और संगठित होना होगा| इसके लिए दैवीय शक्तियों के सहयोग की भी आवश्यकता होगी और जीवन में परमात्मा की भी| भारत हमारे लिए कोई भूमि का टुकडा नहीं, साक्षात माता है| आध्यात्म की और परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति भारत में ही हुई है| भारत एक ऊर्ध्वमुखी विभा-रत मनीषियों का समूह है| सनातन धर्म का ज्ञान सर्वप्रथम भारतीयों को ही हुआ और सनातन धर्म का पुनरोत्थान भी भारत से ही होगा| भारत की अस्मिता सनातन धर्म है और भारत की राजनीति भी सनातन धर्म ही होगी|
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हे जन्म भूमि भारत, हे कर्म भूमि भारत,
हे वन्दनीय भारत, अभिनंदनीय भारत |
जीवन सुमन चढ़ाकर, आराधना करेंगे,
तेरी जनम-जनम भर, हम वंदना करेंगे|
हम अर्चना करेंगे ||१||
महिमा महान तू है, गौरव निधान तू है,
तू प्राण है हमारा, जननी समान तू है |
तेरे लिए जियेंगे, तेरे लिए मरेंगे,
तेरे लिए जनम भर, हम साधना करेंगे |
हम अर्चना करेंगे ||२||
जिसका मुकुट हिमालय, जग जग मगा रहा है,
सागर जिसे रतन की, अंजुली चढा रहा है |
वह देश है हमारा, ललकार कर कहेंगे,
इस देश के बिना हम, जीवित नहीं रहेंगे |
हम अर्चना करेंगे ||३||
भारत माता की जय | वन्दे मातरम् ||
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सभी को शुभ कामनाएँ और सादर नमन |
ॐ नमःशिवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ नमः शिवाय |

कृपा शंकर
११ अप्रेल २०१६