Sunday, 26 February 2017

मेरा परिचय .....

संशोधित व पुनर्प्रस्तुत. (26 फरवरी, 2012 को प्रस्तुत किया हुआ लेख)
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मेरा परिचय .....
I am the polestar of my shipwrecked thoughts .....
मैं ध्रुव तारा हूँ मेरे ही विखंडित विचारों का,
मैं पथ-प्रदर्शक हूँ स्वयं के भूले हुए मार्ग का.
मैं अनंत, मेरे विचार अनंत,
मेरी चेतना अनंत और मेरा अस्तित्व अनंत.
मेरा केंद्र है सर्वत्र,
परिधि कहीं भी नहीं.
मेरे उस केंद्र में ही मैं स्वयं को खोजता हूँ,
बस यही मेरा परिचय है.
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शिवोहम् शिवोहम् अहम् ब्रह्मास्मि .

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आत्मज्ञान, ज्ञान, अज्ञान, मोह, मोक्ष, सत्य, आत्मा, परमात्मा, माया, जीव, ब्रह्म, साधक, साधना, योग और वियोग आदि अनेक ------- अत्यधिक भारी भरकम शब्दों से मैं आज स्वयं को मुक्त कर रहा हूँ|
मैं इनका भार और नहीं ढो सकता|
ये सब अहं, प्राण, मन और बुद्धि की सीमाएँ हैं| इनसे परे भी कुछ ना कुछ अवश्य है| मेरी अभीप्सा अनंत है| वह अनन्त परम चैतन्य जो मैं स्वयं हूँ | ॐ ॐ ॐ ||

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या ........

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या ........
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'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मेव नापरः' ........ भगवत्पाद जगद्गुरू शंकराचार्य का यह कथन उनका अपना अनुभव है| उन्होंने समाधी की उच्चतम अवस्था में इस सत्य को अनुभूत किया| जिसने इसे अनुभूत किया उसके लिए तो यह सत्य है, और जो सिर्फ बुद्धि से या पूर्वाग्रह से कह रहा है उसके लिए असत्य है|
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आज के भौतिक विज्ञानी कह रहे हैं कि पदार्थ का कोई अस्तित्व नहीं है, यह घनीभुत उर्जा ही है जो अपनी आवृतियों द्वारा पदार्थ के रूप में व्यक्त हो रही है| किस अणु में कितने इलेक्ट्रोन हैं वे तय करते हैं कि पदार्थ का बाह्य रूप क्या हो| अंततः ऊर्जा भी एक विचार मात्र है ---- सृष्टिकर्ता के मन का एक विचार या संकल्प|
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यह बात वैज्ञानिक दृष्टी से तो सत्य है पर जो इसे नहीं समझता उसके लिए असत्य| आज के वैज्ञानिक तो सत्य अपनी प्रयोगशालाओं में सिद्ध कर रहे हैं उसी सत्य को भारतीय ऋषियों ने समाधी की अवस्था में समझा| इस सत्य को आचार्य शंकर ने चेतना के जिस स्तर को उपलब्ध होकर कहा उसे हम चेतना के उस स्तर पर जाकर ही समझ सकते हैं| बुद्धि द्वारा किसी निर्णय पर नहीं पहुँच सकते| धन्यवाद|
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ॐ नमः शिवाय| ॐ ॐ ॐ ||

साधकों के लिए रात्रि को सोने से पहिले का समय सर्वश्रेष्ठ होता है ......

साधकों के लिए रात्रि को सोने से पहिले का समय सर्वश्रेष्ठ होता है .......
इसके लिए तैयारी करनी पडती है .....

(1) सायंकालीन आहार शीघ्र लें |
(2) पूर्व या उत्तर की और मुंह करके बिस्तर पर ही कम्बल के आसन पर बैठकर सद्गुरु, परमात्मा और सब संतों को प्रणाम करें|
(3) सद्गुरु प्रदत्त या इष्ट देव के मन्त्र का तब तक जाप करें जब तक आपका ह्रदय प्रेम से नहीं भर उठे| इतना जाप करें कि आप प्रेममय हो जाएँ| जीवन में एकमात्र महत्व उस प्रेम का ही है जो परमात्मा के प्रति आपके अंतर में है|
(4) मूलाधार से आज्ञाचक्र तक (कुछ दिनों बाद सहस्त्रार तक) और बापस क्रमशः हरेक चक्र पर ओम का मानसिक जाप खूब देर तक करें जब तक आप को संतुष्टि न मिले| समापन आज्ञाचक्र पर ही करें|
(5) अपनी सब चिंताएं और समस्याएँ जगन्माता को सौंपकर निश्चिन्त होकर वैसे ही सो जाएँ जैसे एक बालक माँ की गोद में सोता है| ध्यान रहे आप बिस्तर पर नहीं, माँ की गोद में सो रहे हैं| पूरी रात सोते जागते कैसे भी हो, जगन्माता की प्रेममय चेतना में ही रहें| संसार में जगन्माता को छोड़कर अन्य कोई भी आपका नहीं है| उनका साथ शाश्वत है जो जन्म से पूर्व, मृत्यु के बाद और निरंतर अनवरत आपके साथ है|
(6) प्रातःकाल उठते ही आज्ञाचक्र पर सद्गुरु को प्रणाम कर (गुरु पादुका स्तोत्र में दिये) वाग्भव बीजमंत्र का जाप करें| अनाहत चक्र पर जगन्माता या इष्टदेव का मोहिनी बीजमंत्र या गुरु प्रदत्त मन्त्र के साथ ध्यान करे| साथ साथ आज्ञाचक्र यानि कूटस्थ पर गुरु की चेतना भी बनी रहे|
(7) शौचादि से निवृत होकर कुछ देर व्यायाम करें जैसे टहलना, दौड़ना, सूर्यनमस्कार व महामुद्रा आदि| फिर प्राणायाम जैसे अनुलोम-विलोम आदि कर अपने साधना कक्ष में पूर्व या उत्तर की और मुंह कर कम्बल के आसन पर बैठ जाओ| मेरुदंड सदा उन्नत रहे इसका ध्यान रहे| ध्यान खेचरी मुद्रा में ही करें| यदि खेचरी मुद्रा नहीं भी कर सकते हो तो प्रयासपूर्वक जीभ को ऊपर की ओर मोड़कर तालू से सटाकर रखें| धीरे धीरे अभ्यास हो जयेगा और खेचरी भी होने लगेगी| सद्गुरु, इष्टदेव और सब संतों को प्रणाम कर प्रार्थना करें और क्रमशः सब चक्रों पर खूब देर तक ओम का जाप करें| समापन आज्ञाचक्र पर कर वहां खूब देर तक ओम का ध्यान करें| अजपाजाप का अभ्यास करें और गुरु प्रदत्त साधना करें| ध्यान के बाद योनीमुद्रा का अभ्यास करें| चक्रों पर ध्यान के लिए और वैसे भी साधना के लिए भागवत मन्त्र सर्वश्रेष्ठ है| ध्यान के बाद तुरंत आसन ना छोड़ें, कुछ देर बैठे रहें फिर सद्गुरु को प्रणाम करते हुए सर्वस्व के कल्याण की प्रार्थना के साथ समापन करें|
(8) पूरे दिन भगवान का स्मरण रखें| यदि भूल जाएँ तो याद आते ही फिर स्मरण शुरू कर दें| मेरुदंड यानि कमर सदा सीधी रखें| याद आते ही कमर सीधी कर लें| दोपहर को यदि समय मिले तो फिर कुछ देर चक्रों में ओम का जाप कर लें| भागवत मन्त्र का यथासंभव खूब जाप करें|
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धीरे धीरे आप की चेतना भगवान से युक्त हो जायेगी| भगवान से उनके प्रेम के अतिरिक्त और कुछ भी न मांगे| उन्हें पता है कि आपको क्या चाहिए| भगवान के पास सब कुछ है पर आपका प्रेम नहीं है जिसके लिए वे भी तरसते हैं| आप भगवान से इतना कुछ माँगते हो, भगवान ने ही आपको सब कुछ दिया है तो क्या आप अपना पूर्ण प्रेम भगवान को नहीं दे सकते?
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ॐ नमः शिवाय| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय| ॐ ॐ ॐ ||

जीवन एक अनसुलझा रहस्य ..

जीवन एक अनसुलझा रहस्य .......
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जीवन में हम अनेक ऐसे स्वप्न देखते हैं, जो उस समय वास्तविक लगते है| पर समय बीतने पर वे सब बातें स्वप्नवत हो जाती हैं| जीवन में पता नहीं कितने और किस किस तरह के लोगों से मिला, कहाँ कहाँ गया, कहाँ कहाँ रहा, कितने आश्चर्य देखे, कितने विचार आये, कितने संकल्प किये, कितना अभिमान किया, कितनी पीड़ाएँ भोगीं, कितनी खुशियाँ मनाईं, कितनी उपलब्धियाँ मनाईं .......... वे सब अब स्वप्न सी लगती हैं|
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जीवन का रहस्य अभी तक अनसुलझा है| यह यात्रा यों ही चलती रहेगी| वाहन (देह) बदल जाते हैं पर यात्री (प्राणी) वो ही रहता है| सारी खुशियाँ, सारे दुःख, सारी उपलब्धियाँ ... सब स्वप्न हैं| कितनी भी लम्बी यात्रा कर लो पर अंततः यही पाते हैं कि ..... वो ही घोड़ा है और वो ही मैदान है|
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आप सब दिव्यात्माओं को नमन !
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

भगवान को भूलना ब्रह्महत्या का पाप और आत्मतत्व को भूलना आत्महत्या है ...

भगवान को भूलना ब्रह्महत्या का पाप और आत्मतत्व को भूलना आत्महत्या है ...
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ब्रह्महत्या को सबसे बड़ा पाप माना गया है| मेरी अल्प और सीमित बुद्धि से ब्रह्महत्या के दो अर्थ हैं ..... एक तो अपने स्वयं में अन्तस्थ परमात्मा को विस्मृत कर देना, और दूसरा है किसी ब्रह्मनिष्ठ महात्मा की ह्त्या कर देना| श्रुति भगवती कहती है कि अपने आत्मस्वरूप को विस्मृत कर देना उसका हनन यानि ह्त्या है| सांसारिक उपलब्धियों को हम अपनी महत्वाकांक्षा, लक्ष्य और दायित्व बना लेते हैं| पारिवारिक, सामाजिक व सामुदायिक सेवा कार्य भी हमें करने चाहियें क्योंकि इनसे पुण्य मिलता है, पर इनसे आत्म-साक्षात्कार नहीं होता|
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हमारे कूटस्थ ह्रदय में सच्चिदानन्द ब्रह्म यानि स्वयं परमात्मा बैठे हुए हैं| हम संसार की हर वस्तु की ओर ध्यान देते हैं पर परमात्मा की ओर नहीं| हम कहते हैं कि हमारा यह कर्तव्य बाकी है और वह कर्तव्य बाकी है पर सबसे बड़े कर्तव्य को भूल जाते हैं कि हमें ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना है| बच्चों की शिक्षा, बच्चों को काम पर लगाना, व्यापार की सँभाल करना आदि आदि में ही जीवन व्यतीत हो जाता है| जो लोग कहते हैं कि हमारा समय अभी तक नहीं आया है, उनका समय कभी आयेगा भी नहीं|
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भगवान को भूलना ब्रह्म-ह्त्या का पाप है| आजकल गुरु बनने और गुरु बनाने का भी खूब प्रचलन हो रहा है| गुरु पद पर हर कोई आसीन नहीं हो सकता| एक ब्रह्मनिष्ठ, श्रौत्रीय और परमात्मा को उपलब्ध हुआ महात्मा ही गुरु हो सकता है जिसे अपने गुरु द्वारा अधिकार मिला हुआ हो| सार कि बात यह कि भगवान को भूलना ब्रह्महत्या है, और भगवान को भूलने वाले ब्रह्महत्या के दोषी हैं जो सबसे बड़ा पाप है|
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मनुष्य योनी में जीव का जन्म होता ही है पूर्ण समर्पण का पाठ सीखने के लिए| अन्य सब बातें इसी का विस्तार हैं| यह एक ही पाठ प्रकृति द्वारा निरंतर सिखाया जा रहा है| कोई इसे देरी से सीखता है, कोई शीघ्र| जो नहीं सीखता है वह इसे सीखने को बाध्य कर दिया जाता है| लोकयात्रा के लिए हमें जो देह रूपी वाहन दिया गया है वह नश्वर और अति अल्प क्षमता से संपन्न है| बुद्धि भी अति अल्प और सिमित है, जो कुबुद्धि ही है| चित्त नित-नूतन वासनाओं से भरा है| अहंकार महाभ्रमजाल में उलझाए हुए है| मन अति चंचल और लालची है| ये सब मिलकर इस मायाजाल में फँसाए हुए है जिसे तोड़ने का पूर्ण समर्पण के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग ही नहीं है| हमें आता जाता कुछ नहीं है पर सब कुछ जानने का झूठा भ्रम पाल रखा है|
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इस लेख के अंत में कुछ विचार प्रस्तुत करता हूँ .......
माता पिता परमात्मा के अवतार हैं, उनका पूर्ण सम्मान करें|
प्रातः और सायं विधिवत साधना करनी चाहिए| निरंतर प्रभु का स्मरण रहे|
गीता के कम से कम पाँच श्लोकों का नित्य पाठ करना चाह्हिए|
कुसंग का सर्वदा त्याग|
कर्ताभाव से मुक्ति|
किसी भी प्रकार के नशे का त्याग|
सात्विक भोजन|
एकाग्रता से अनन्य भक्ति|
वैराग्य और एकांत का अभ्यास|
भगवान का अनन्य भक्त ही ब्राह्मण है| हर श्रद्धालु क्षत्रिय है|
सिर्फ नाम या वस्त्र बदलने से कोई विरक्त नहीं होता|
वैराग्य प्रभु कि कृपा से ही प्राप्त होता है|
गुरुलाभ भी भगवान की कृपा से ही प्राप्त होता है|
संन्यास मन की अवस्था है|
तामसिक साधनाओं से बचें|
साधना के फल का भगवान को अर्पण|
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आप सब को नमन ! ॐ नमः शिवाय| ॐ ॐ ॐ ||


समस्त सृष्टि ही भगवान शिव का नटराज के रूप में नृत्य है .....

समस्त सृष्टि ही भगवान शिव का नटराज के रूप में नृत्य है .....
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निरंतर हो रहे ऊर्जा खण्डों का प्रवाह, परमाणुओं का सृजन और विसर्जन, भगवान नटराज का नृत्य है| मूल रूप से कोई पदार्थ है ही नहीं, सब कुछ ऊर्जा है| उस ऊर्जा के पीछे भी एक विचार है, और उस विचार के पीछे भी एक परम चेतना है| वह परम चेतना और उससे भी परे जो है वह परम शिव है|
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मनुष्य की अति अल्प और सीमित बुद्धि द्वारा परमात्मा अचिन्त्य और अगम्य है| समय समय पर महापुरुषों ने मार्गदर्शन किया है कि परमात्मा के किस रूप का और कैसे ध्यान करना चाहिए|
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ह्रदय में जब परमात्मा के लिए परम प्रेम उत्पन्न होता है तब एक जिज्ञासु साधक को स्वतः ही भगवान से मार्गदर्शन प्राप्त होने लगता है| उसी का हमें अनुशरण करना चाहिए|
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लौकिक रूप से यही कहना उचित है कि अपनी अपनी गुरु-परम्परानुसार ही उपासना करनी चाहिए|
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भगवान् शिव की उपासना सबसे सरल और स्वाभाविक है| हम सब पर भगवान परम शिव की कृपा बनी रहे| शुभ कामनाएँ और नमन !
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ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||

इस सृष्टि में देवासुर संग्राम सदा से चलता आया है .....

इस सृष्टि में देवासुर संग्राम सदा से चलता आया है और निरंतर सदा ही चलता रहेगा| जब तक यह सृष्टि है तब तक हमारे भीतर और बाहर ऐसे ही रहेगा| इस से मुक्त होने के लिए हमें स्वयं की चेतना को ऊपर उठाकर आध्यात्मिक साधना द्वारा इस द्वन्द्व और त्रिगुणात्मक सृष्टि की चेतना से परे जाना होगा| जीव जब तक स्वयं को शिवत्व में स्थापित नहीं कर लेता तब तक इसी द्वंद्व में फँसा रहेगा| अन्य कोई उपाय नहीं है|
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यह सृष्टि हमारे विचारों का ही घनीभूत रूप है| हम सब के विचार मिल कर ही इस सृष्टि के रूप में व्यक्त हो रहे हैं| इसी लिए हमारे शास्त्र कहते हैं कि हमारा हर संकल्प शिव संकल्प होना चाहिए, क्योंकि हर संकल्प पूरा अवश्य होता है| हमारे विचार, कामनाएँ, इच्छाएँ आदि पूर्ण अवश्य होती हैं| ये ही हमारे कर्म हैं जिनका फल अवश्य मिलता है| इनसे मुक्त हुए बिना काम नहीं चलेगा| हमारी हरेक समस्याओं के कारण भी हमारे भीतर है और समाधान भी हमारे भीतर ही है|
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शुभ कामनाएँ| हमारा हर संकल्प शिव संकल्प हो| हम जीव से शिव बनें, हम सब को पूर्णता की प्राप्ति हो|
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ॐ तत्सत् | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||