Sunday, 6 November 2016

प्राण तत्व की स्थिरता, मन पर नियंत्रण, निःसंगत्व और शिवत्व ......

प्राण तत्व की स्थिरता, मन पर नियंत्रण, निःसंगत्व और शिवत्व ......
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>>> कल मुझसे किसी मनीषी ने ये प्रश्न पूछे थे जिनका मैं उस समय तो कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाया था, क्योंकि वे प्रश्न ही इतने गहन थे कि एक बार तो मैं स्तब्ध हो गया था| पर अब उनका उत्तर दे सकता हूँ|
वे प्रश्न थे .....
(1) मन क्या है ? मन को कैसे परिभाषित करेंगे ? मन से मुक्त यानि मनरहित कैसे हों ?
(2) निःसंगत्व की उपलब्धी कैसे हो ? क्या हम निःसंग हो सकते हैं ?
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इन का उत्तर इस प्रकार है .....
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(1) मन पर नियंत्रण हम तभी कर सकते हैं जब हम इसके स्त्रोत को समझ सकें| जहाँ से यानि जिस बिंदु से मन का जन्म होता है उसे समझना आवश्यक है|
मैं अपनी अति अल्प और सीमित समझ से इस निर्णय पर पहुंचा हूँ कि .....
>>> मन की उत्पत्ति प्राणों से होती है| "चंचल प्राण ही मन है"| प्राण की चंचलता को स्थिर कर के ही हम मन को वश में कर सकते हैं, और मनरहित हो सकते हैं| प्राण तत्व को स्थिर करना ही योग साधना है| यही चित्त की वृत्तियों का निरोध है| इसी के लिए हम यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा और ध्यान करते हैं| चंचल प्राण से ही चित्त की वृत्तियों और मन का जन्म होता है|
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(2) चंचल प्राण को स्थिर करने पर हम पाते हैं कि ...... एकोsहं द्वितीयोनास्ति| प्राणों की स्थिरता ही शिवत्व में स्थिति है| जब हम सम्पूर्ण समष्टि के साथ एक हो जाते हैं, तब हम पाते हैं कि सिर्फ एक मैं ही हूँ जो जड़-चेतन में सर्वत्र व्याप्त है, मेरे सिवाय अन्य कोई भी नहीं है| यही शिवत्व है और यही निःसंगत्व है|
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ॐ तत्सत् | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||

भगवा वस्त्र ----

भगवा वस्त्र ----
भगवा वस्त्र अग्नि का प्रतीक ही नहीं साक्षात पवित्रतम अग्निवस्त्र है जिसे पहिन कर सन्यासी अपने अहंकार और वासनाओं कि आहुति अग्नि में निरंतर देता है|
भारत के जनमानस में भगवा वस्त्र का सम्मान इतना अधिक है कि वे किसी को भी भगवा वस्त्र में देखकर नतमस्तक हो जाते हैं|
पर दुर्भाग्यवश विदेशी जासूस और विधर्मी मत प्रचारक भी हिन्दुओं को ठगने के लिए भगवा वस्त्र पहिनते आए हैं|
भारत के साधू समाज को चाहिए कि वे हर किसी को भगवा वस्त्र न पहिनने दें| इसके लिए कोई शासकीय व्यवस्था हो जिसके अंतर्गत भगवा वस्त्र पहिनने का अधिकार मात्र उसी को हो जिसने विधिवत रूप से संन्यास दीक्षा ली हो|
हिन्दुओं को बदनाम करने के लिए हिन्दू नाम धारी अधर्मियों ने "भगवा आतंकवाद" नाम के शब्द की भी रचना की|
कोई कुछ भी कहे पर भारत की अस्मिता हिंदुत्व ही है और भारत हिंदुत्व के कारण ही भारत है|
सनातन धर्म ही भारतवर्ष है और भारतवर्ष ही सनातन धर्म है|
ॐ ॐ ॐ ||

Saturday, 5 November 2016

एक महान चमत्कार ......


एक महान चमत्कार ....
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कहते हैं संतों के पैर जहाँ भी पड़ते हैं वहाँ चमत्कार ही चमत्कार होते हैं| वह भूमि भी धन्य हो जाती है जहाँ उनके पैर पड़ते हैं| कुछ ऐसा ही चमत्कार मैं पिछले चार-पाँच दिन से देख रहा हूँ|
मैं जहाँ रहता हूँ, उस मोहल्ले में सारे लोग उच्च शिक्षित और समर्थवान हैं| शत-प्रतिशत महिलाऐं भी उच्च शिक्षित हैं| कहीं भी कोई अनपढ़ महिला नहीं मिलेगी| कोई निर्धन भी नहीं है|
पर लगभग सारे लोग अति भौतिकवादी और आधुनिक विचारों के हैं जहाँ आध्यात्म और भक्ति की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता| मैं प्रभु से प्रार्थना किया करता था कि यहाँ सब में धर्म की चेतना जागृत हो, पर कुछ भी नहीं हो रहा था| अंततः भगवान ने सुन ही ली|
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हमारे सौभाग्य से पाँच दिनों पूर्व एक विरक्त संत हरिशरण जी महाराज मेरे घर के सामने वाली पंक्ति के ही दो घर छोड़कर एक घर में आकर ठहरे और उन्होंने अपने साक्षात मूर्तिमान परम प्रेममय व्यक्तित्व से पूरे मोहल्ले को ही प्रभुप्रेममय बना दिया है| अब स्थिति यह है कि पच्चीस-तीस महिलाएं, दस-बारह पुरुष और अनेक बालक प्रातःकाल पाँच बजे एकत्र होकर संस्कृत में गीता पाठ करते हैं और मोहल्ले में हरिनाम संकीर्तन करते हुए प्रभात फेरी निकालते हैं| यह चेतना इन संत पुरुष के आने के एक दिन पश्चात ही आरम्भ हो गयी| प्रेतभाषा अंग्रेजी को छोडकर ये उच्च शिक्षित महिलाऐं अब आपस में राधे राधे बोलकर ही अभिवादन करती हैं| पता नहीं इनके किस जन्म के संस्कार जागृत हो गए कि सब भगवान की भक्त हो गयी हैं|
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इन महात्मा जी की हमारे नगर पर अत्यंत कृपा रही है| इनकी प्रेरणा से नगर में दो अन्य स्थानों से भी हरिनाम संकीर्तन करते हुए प्रभात फेरियाँ निकलती हैं जिनमें बहुत अच्छी संख्या रहती हैं| गीता, भागवत और रामायण की अनेक कथाएँ भी समय समय पर होने लगी हैं| भक्तिभाव बहुत अधिक बढ़ा है|
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November 06, 2015

हम भगवान की दृष्टी में क्या हैं, बस इसी का महत्व है .......

हम भगवान की दृष्टी में क्या हैं, बस इसी का महत्व है .......
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आध्यात्म पथ के पथिक अपने पथ में आने वाली किसी भी बाधा की "आलोचना", "निंदा" और "शिकायत" नहीं करते| "विक्षेप" और "आवरण" आएँगे और चले जाएँगे| कौन क्या कहता है या क्या सोचता है इसका कोई महत्त्व नहीं है, हम भगवान की दृष्टी में क्या हैं, बस इसी का महत्व है| सारी बाधाएँ विकास के लिए मिले हुए अवसर हैं|
अपने "कूटस्थ चैतन्य" में प्रयासपूर्वक प्रभु को निरंतर रखो| कर्ता वे हैं, हम नहीं| वे हमारे माध्यम से निरंतर बह रहे हैं, वे हमें ऊपर उठा रहे हैं, हम उन्हें अपने को ऊपर उठाने का अवसर दें| हमारा कार्य सिर्फ "अहैतुकी परम प्रेम" और "समर्पण" है| बाकी तो सारी साधना वे ही कर रहे हैं|
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ॐ नमः शिवाय| ॐ शिव| ॐ ॐ ॐ ||

परमात्मा से विमुखता ही हमारे सब दुखों का कारण है ....

परमात्मा से विमुखता ही हमारे सब दुखों का कारण है .....
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"कह हनुमंत विपति प्रभु सोई | जब तव सुमिरन भजन न होई ||"
जब तक भगवान का भजन, स्मरण और गहन ध्यान नहीं होता तब तक बड़ी भयंकर पीड़ा रहती है| भगवान के वियोग से बड़ी विपत्ती और कोई हो ही नहीं सकती| सुख शांति और समृद्धि परमात्मा में ही है, अन्यत्र कहीं भी नहीं है| जब हम अन्यत्र कहीं और अपनी प्रसन्नता के लिए देखते हैं तो कहीं भी प्रसन्नता नहीं मिलती| हमारी प्रसन्नता सिर्फ रुपये पैसे पर ही निर्भर नहीं है| हमारे पास जो कुछ भी है हमें उससे प्रसन्न रहना चाहिए| जो भी सम्पन्नता/विपन्नता जैसी भी है उसे वैसी ही स्वीकार करनी चाहिए| हमारी चेतना में कोई अभाव नहीं है, अतः पूरी दुनिया हमारी ही है| हमारे पास जो कुछ भी है हम उससे संतुष्ट रहें|
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मैं स्वयँ के प्रति ईमानदार बनने का प्रयास कर रहा हूँ, अतः भगवान ने जो समय दिया है उसे मैं उन्हीं को बापस लौटाना चाहता हूँ| यह समय मेरा नहीं है अपितु उन्हीं से उधार मिला हुआ है जिस का मूलधन ब्याज समेत चुकाना तो पड़ेगा ही| व्यवस्था उसके ब्याज की भी वे ही करेंगे|
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इस विश्व में जो कुछ भी दिखाई देता है वह लम्बाई, चौडाई और मोटाई में गहरा दिखाई देता है| पर जब मैं एक अन्य आयामविहीन दृष्टिकोण से देखता हूँ तो सब कुछ एक चेतना ही प्रतीत होती है| सारी सृष्टि एक चेतना, यानि परमात्मा के मन का विचार मात्र है| मैं यह देह नहीं बल्कि सर्वस्व हूँ|
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सृष्टिकर्ता की कोई कामना नहीं है, वे अपनी सर्वव्यापकता में ही खोये हुए हैं और संतुष्ट है| उनकी सर्वव्यापकता ही मैं हूँ, मैं ही उनका स्वप्न हूँ, और मैं ही उनका विचार हूँ| सब कुछ उन्हीं की सर्वव्यापक चेतना है| मैं उनकी चेतना ही हूँ|
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सार की बात यह है कि परमात्मा से विमुखता ही सब दुखों का कारण है|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

राम नाम सत्य है .....

राम नाम सत्य है .....
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मृत्यु एक अटल सत्य है| जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु भी होगी ही| जब किसी की शव यात्रा जा रही होती है तब मृतक के परिजन "राम नाम सत्य है" कहते हुए ही जाते हैं| ऐसी मान्यता है कि भौतिक मृत्यु के उपरांत जीवात्मा की उसके पुण्यों/पापों के अनुसार गति होती है| अधिकाँश मनुष्यों के अच्छे पुण्य नहीं होते अतः वे अपनी मृत देह के आसपास भटकते रहते हैं, और अपनी वासना की पूर्ति हेतु औरों की देह में प्रवेश करने का प्रयास करते हैं| राम का नाम लेने से उपस्थित लोगों के ऊपर एक रक्षा-कवच का निर्माण होता है जो उनकी रक्षा करता है|
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राम का नाम न केवल सत्य है, बल्कि भारतीय जन मानस में रचा बसा भी है| यही कारण है कि परस्पर अभिवादन में 'राम-राम', कोई त्रुटि होने पर क्षोभ व्यक्त करने के लिए भी 'राम राम', आश्चर्य प्रकट करने के लिए 'हे राम', संकटग्रस्त होने पर सहायता की अपेक्षा में भी 'हे राम' और अंतिम यात्रा में तो "राम नाम सत्य है" कहते ही हैं|
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राम नाम जीवन का मंत्र है, मृत्यु का नहीं| राम, भगवान शिव के आराध्य हैं| राम ही हमारे जीवन की ऊर्जा हैं| जो रोम रोम में बसे हुए हैं वे राम है| जिसमें योगिगण निरंतर रमण करते हैं वे राम हैं| ‘रा’ शब्द परिपूर्णता का बोधक है और ‘म’ शब्द परमेश्वर का वाचक है| चाहे निर्गुण हो या सगुण, "राम" शब्द एक महामंत्र है|
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राम नाम निर्विवाद रूप से सत्य है| राम नाम के निरंतर जाप से सद्गति प्राप्त होती है|
जय श्रीराम ! जय श्रीराम ! जय श्रीराम !

मिथिलेश द्विवेदी जी को श्रद्धांजली ......

....श्रद्धांजली ....
समझ में नहीं आ रहा क्या लिखूँ .....
अति दुखद समाचार ..........
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मुझे यह लिखते हुए अत्यंत खेद हो रहा है कि हमारे अति प्रिय शुभचिन्तक मित्र, ऋषितुल्य, संत ह्रदय, परम विद्वान्, प्रखर साधक, प्रख्यात लेखक, विचारक व पत्रकार माननीय श्री मिथिलेश द्विवेदी जी हमें छोड़कर शिवलोक गमन कर गए हैं|
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उनसे मित्रता होना मैं जीवन की एक उपलब्धि मानता हूँ|
मुझे कभी भी कोई भी आध्यात्मिक या दार्शनिक जिज्ञासा या शंका होती तो वे तुरंत उसका समाधान कर देते थे| माँ भगवती सरस्वती की उनपर अपार कृपा थी| अनेक आध्यात्मिक व धार्मिक विषयों पर उनसे बहुत अविस्मरणीय चर्चाएँ होती रहती थीं|
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उन्होंने कुछ समय पूर्व ही "मो राम मामुद्धर राम चरितामृत" नामक ग्रन्थ की रचना की थी| अभी भगवान श्रीकृष्ण पर भी एक ग्रन्थ की रचना करने वाले थे|
अभी उनकी एक स्मृति ही रह गयी है|
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यह दुनिया एक चलाचली का मेला है| जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु भी होती है| जीवन क्षणभंगुर है| किसकी कौनसी सांस अंतिम होगी, कुछ कह नहीं सकते| जो आया है वह जाएगा भी|
पर कुछ प्रकाशपुंज ऐसे होते हैं जिनके चले जाने के बाद भी उनकी आभा लम्बे समय तक बनी रहती है| मिथिलेश जी भी एक ऐसे ही प्रकाशपुंज थे|
.उनको मेरी श्रद्धांजली| उनकी कीर्ति अमर रहे| हर हर महादेव|

05 नवम्बर 2015