Sunday, 30 October 2016

दीपावली पर जगन्माता से प्रार्थना .....

दीपावली पर जगन्माता से प्रार्थना .....
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हे महाकाली, हमारे राग-द्वेष को नष्ट करो| यह राग-द्वेष हमारी सब बुराइयों का मूल है| इस राष्ट्र भारतवर्ष के भीतर और बाहर के सभी शत्रुओं का समूल नाश करो| सम्पूर्ण भारतवर्ष में कहीं भी अन्धकार और असत्य की शक्तियों का अस्तित्व न रहे|
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हे महालक्ष्मी, हमें सारे सद्गुण दो| इस राष्ट्र को द्विगुणित परम वैभव, सर्वशक्तिसम्पन्नता और परम ऐश्वर्य प्रदान करो| हम तपस्वी, तेजस्वी व शक्तिशाली बनें| हमें तप करने का सामर्थ्य दो| हमें निरंतर ब्रह्मचिंतन और स्वाध्याय करने की शक्ति और प्रेरणा दो|
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हे महासरस्वती, हमें आत्म-ज्ञान दो| इस राष्ट्र भारतवर्ष को आध्यात्म और ज्ञान के शिखर पर आरूढ़ करो| 
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पुनश्चः सभी को दीपावली की शुभ कामनाएँ | दीपावली का पर्व महामंगलमय हो|
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ ॐ ॐ !!

Saturday, 29 October 2016

प्रेम मेरा अस्तित्व है, कोई भावना नहीं .....

प्रेम मेरा अस्तित्व है, कोई भावना नहीं .....
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सब कुछ ब्रह्मस्वरूप है और वही ब्रह्म मेरा साक्षिस्वरूप है| 'ब्रह्म रहस्य' के रूप में चार महावाक्य ..... १. ॐ प्रज्ञानं ब्रह्म, २. ॐ अहं ब्रह्माऽस्मि, ३. ॐ तत्त्वमसि, और ४. ॐ अयमात्मा ब्रह्म हैं|
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हे गुरु रुपी सर्वव्यापी भगवान परमशिव, आपकी दृष्टी में मैं निरंतर हूँ, आप सदा मेरी रक्षा कर रहे हैं| आप ही मेरे ज्योतिर्मय ब्रह्म हैं, आप ही मुझे निरंतर सुनाई देने वाली प्रणव ध्वनी है, आप ही मेरे प्राण हैं, और आप ही मेरे अस्तित्व है|
गुरुरूप में आप सदा मेरे कूटस्थ में हैं और आप ही मुझे ब्रह्मज्ञान दे रहे हैं|
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ध्यान में सदा आप मेरे सम्मुख रहते हैं, पर अब निरंतर हर समय मेरे सजग चैतन्य में रहें| "मैं" "मैं" नहीं अब "आप" ही "आप" हैं| मेरा कोई पृथक अस्तित्व ना हो, कोई भेद न हो| सिर्फ और सिर्फ बस आपका ही अस्तित्व रहे| मुझे अपने साथ एकाकार करो| आपकी पूर्णता मेरी पूर्णता हो| आपकी अनंतता मेरी अनंतता हो|
मैं आपकी शरणागत हूँ| मेरा कल्याण करो| मेरी निरंतर रक्षा करो|
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इस देह का भ्रूमध्य पूर्व दिशा है, सहस्त्रार उत्तर दिशा है, बिंदु विसर्ग पश्चिम दिशा है और उससे नीचे का क्षेत्र दक्षिण दिशा है|
हे परमशिव आप सहस्त्रार में मुझसे अपना ध्यान करवाते हैं जहाँ पूरे ब्रह्मांड से घनीभूत होकर आपकी परम कृपा और ज्ञानगंगा निरंतर तैलधारा की तरह मुझ पर बरसती है|
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मैं आपका परमप्रेम हूँ| प्रेम मेरा स्वभाव है| प्रेम ही मेरा अस्तित्व है, कोई भावना नहीं| उस परमप्रेम में ही आप और मैं एक हैं| कहीं कोई पृथकता नहीं है|
ॐ शिव ! ॐ शिव ! ॐ शिव !
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ ॐ ॐ !!

आत्म ज्ञान .....

आत्म ज्ञान .....
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संत जन कहते हैं कि यदि कोई ऐसा ज्ञान है जिसे जानने के पश्चात अन्य कुछ भी जानने को नहीं है तो वह है --- "आत्मज्ञान"| आत्म ज्ञान ही आत्म तत्व है जिसे प्राप्त करने पश्चात अन्य कुछ भी प्राप्त करने को नहीं है| आत्म-तत्व स्वयं को प्राप्त नहीं होता, अपितु मुमुक्षु स्वयं ही आत्म-तत्व को प्राप्त हो जाता है| उसका कोई पृथक अस्तित्व नहीं रहता| वह समष्टि के साथ एकाकार हो जाता हैं|
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यही सच्चिदानंद की प्राप्ति है| ऐसे ज्ञानी के लिए कुछ भी भेद नहीं रहता| उसके लिए दृश्य, दृष्टा और दृष्टि एक ही हो जाती है| यही आत्मसाक्षात्कार है, यही परमात्मा की प्राप्ति है| आत्म तत्व को जानने के लिए पूर्ण समर्पण भाव से श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ आचार्य गुरु के पास जाना चाहिए| उन गुरु आचार्य के द्वारा निर्दिष्ट साधना के द्वारा ही कोई मुमुक्षु आत्म तत्व का साक्षात्कार कर सकता है|
‘तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि:
श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ||’ (मु.उप. १.२.१२)
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गुरु लाभ भी प्रभु कृपा से ही होता है| इसके लिए भक्ति और गहन अभीप्सा चाहिए| उपनिषदों में आत्म तत्व का ज्ञान ही भरा पड़ा है| उपनिषदों को समझना बहुत कठिन है| अतः श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ आचार्य गुरु के सत्संग और मार्गदर्शन में साधना अति आवश्यक है| उपनिषदों का ज्ञान प्रेरणा दे सकता है| ग्रंथों के अध्ययन मनन से सत्संग लाभ भी मिलता है और मुमुक्षत्व भी जागृत होता है|
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ह्रदय में अभीप्सा, प्रेम और समर्पण के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते|
गुरु के मार्गदर्शन में ध्यान साधना से देह की चेतना से ऊपर उठकर अनंत के विस्तार की अनुभूति और उस दिव्य पूर्णता के साथ एकाकार कि अनुभूति आत्म तत्व का बोध कराती है|
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श्री रमण महर्षि का मुख्य उपदेश यह था कि प्रत्येक मुमुक्षु को निरंतर स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए कि ---- "मैं कौन हूँ?" --- (कोSहं) | इसी का निरंतर चिंतन करते करते साधक सोSहं के सोपान तक पहुँच जाता है|
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अष्टावक्र गीता में अष्टावक्र जी कहते हैं कि संसार में चार प्रकार के पुरुष हैं ---- एक ज्ञानी, दूसरा मुमुक्षु, तीसरा अज्ञानी और चौथा मूढ़।
"जो संशय और विपर्यय से रहित होता है और आत्मानंद में आनंदित होता है वही ज्ञानी है।"
अष्टावक्र जी कहते हैं ---
देह को आत्मा मानने से जन्म मरण रूपी संसार चक्र में पुन: पुन: भ्रमण करता पड़ता है| तुम पृथ्वि नही हो और न तुम जलरूप हो, न अग्निरूप हो, न वायु रूप हो और न आकाशरूप हो । अर्थात इन पॉंचो तत्वों में से कोई भी तत्व तुम्हारा स्वंरूप नहीं है और पॉंचो तत्वों का समुदायरूप इंद्रियों का विषय जो यह स्थूल शरीर है वह भी तुम नहीं हो क्योंकि शरीर क्षण क्षण में परिणाम को प्राप्त होता जाता है।
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श्रुति कहती है - अयमात्मा ब्रह़म्। अर्थात जो आत्मा है वही ब्रहम् है, वही ईश्वर है।
जब मुमुक्षु --- स्थूल देह, इंद्रियों के विषयों आदि से परे हट कर साक्षी भाव में स्थित हो कर साक्षी भाव से भी ऊपर उठ जाए उस स्थिति का नाम आत्मज्ञान है|
अध्ययन से आत्मज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता| अध्ययन प्रेरणा दे सकता है और कुछ सीमा तक मार्गदर्शन कर सकता है, उससे अधिक नहीं| किसी के प्रवचन सुनकर भी आत्मज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता| राजा जनक एक अपवाद थे| प्रवचन सुनकर भी प्रेरणा और उत्साह ही प्राप्त हो सकता है|
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संत जन कहते हैं कि आत्म-ज्ञानी महात्मा (जो महत् तत्व से जुड़ा है) के चरण जिस भूमि पर पड़ते हैं वह भूमि पवित्र हो जाती है| वह कुल और परिवार धन्य हो जाता है जहाँ ऐसी महान आत्मा जन्म लेती है|
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ॐ तत्सत् | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||

सनातन हिन्दू धर्म की विशेषता ....

सनातन हिन्दू धर्म की विशेषता ----
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इस विषय पर अनेक पुस्तकें लिखी जा चुकी है| पर मैं यहाँ दो पंक्तियों में ही सनातन हिन्दू धर्म की विशेषता बता रहा हूँ|
परमात्मा से अहैतुकी परम प्रेम, परमात्मा को पाने की अभीप्सा और तड़प, परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण व त्याग, सर्वस्व के कल्याण की कामना व प्रार्थना, गुरु-शिष्य परम्परा, स्वरुची अनुसार परमात्मा के विभिन्न रूपों की उपासना , उदारता और सहनशीलता -------------- ये सब सनातन हिन्दू धर्म में ही है, अन्यत्र कहीं भी नहीं|
भारत हिन्दू राष्ट्र है और रहेगा| अन्धकार और असत्य अनेक बार फैला है पर सदा उसका अंत ही हुआ है| सनातन हिन्दू धर्म का सूर्य विश्व के समस्त अन्धकार और अज्ञानता को दूर करेगा|
वह देश जहाँ महाराजा पृथु जैसे सम्राट हुए जिन्होंने पूरी पृथ्वी पर राज्य किया, जिनके कारण इस ग्रह का नाम ही पृथ्वी पड़ा; जिस देश में भगवान श्री राम और भगवान श्री कृष्ण जैसे अवतार हुए, जहाँ याज्ञवल्क्य, अगस्त्य, वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे अनगिनत ऋषि हुए, दिलीप जैसे गौ रक्षक महाराजा, महाराज शिवी जैसे न्यायी राजा, भगवन सनत्कुमार जैसे ब्रह्मज्ञ, नारद, ध्रुव, प्रहलाद और हनुमानजी जैसे भक्त हुए, जहाँ वेद, वेदांगों, पुराणों, षड्दर्शनों, रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथों की रचनाएँ हुईं, जहाँ भीष्म जैसे दृढ़व्रती महारथी और अर्जुन जैसे अनगिनत वीरों ने जन्म लिया, वह भूमि सदा सदा के लिए असत्य के अन्धकार में नहीं रह सकती|
एक प्रचंड आध्यात्मिक शक्ति का उदय हो रहा है जो पुनश्चः एक विराट ब्रह्मतेज और क्षात्रत्व
को जन्म देगी| भारत माँ अपने परम वैभव के साथ पुनश्च अखण्डता के सिंहासन पर आसीन होंगी|
घर घर में वेदों के स्वर गूंजेंगे, यहाँ जन्म लेने वाली प्रत्येक आत्मा महान होगी| ईश्वर की अब यही इच्छा है अतः इसे अब कोई नहीं रोक सकता| यह अन्धकार अधिक समय तक नहीं रहेगा| आप चाहो या ना चाहो इस सत्य के आप साक्षी ही नहीं भागीदार भी बनोगे|
जय जननी, जय भारत, जय सनातन हिन्दू धर्म !!! ॐ तत्सत्|

दीपावली की शुभ कामनाएँ .....

दीपावली की शुभ कामनाएँ .....
हम सब का अज्ञान नष्ट हो| हमारे धन में निरंतर वृद्धि हो| मेरा एकमात्र धन तो ब्रह्म चिंतन और स्वाध्याय है| अन्य किसी धन की कामना नहीं है|
ज्योतिषांज्योति कूटस्थ ज्योति निरंतर प्रज्ज्वलित रहे|
ॐ तत्सत् ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ ॐ ॐ !!

ध्यान किसका करें ?

***** ध्यान किसका करें ? *****
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ध्यान उसी का करना चाहिए जिसका न तो कभी जन्म हुआ है और न कभी मृत्यु होगी| वह कौन और क्या है जिसने न तो कभी जन्म लिया है, और न कभी मृत्यु को प्राप्त होगा? .....
जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु तो अवश्य ही होगी|
पर जिसने कभी जन्म ही नहीं लिया, क्या वह मृत्यु को प्राप्त कर सकता है?
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हमारा अजन्मा स्वरुप क्या है जो कभी जन्म ही नहीं लेता?
जो अनादि और अनंत है, जिसने कभी जन्म ही नहीं लिया, हमारा वह अजन्मा स्वरुप, शुद्ध अजन्मा भाव क्या है?
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वह शिव भाव है|
सर्वव्यापी भगवान परम शिव में परम प्रेममय हो कर पूर्ण समर्पण करना ही उच्चतम साधना है|
वही मुक्ति है, और वही लक्ष्य है|
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अपने विचारों के प्रति सतत् सचेत रहिये| जैसा हम सोचते हैं वैसे ही बन जाते हैं|
हमारे विचार ही हमारे "कर्म" हैं, जिनका फल भोगना ही पड़ता है|
मन की हर इच्छा, हर कामना एक कर्म या क्रिया है जिसकी प्रतिक्रया अवश्य होती है| यही कर्मफल का नियम है|
अतः हम स्वयं को मुक्त करें ..... सब कामनाओं से, सब संकल्पों से, सब विचारों से, और निरंतर शिव भाव में रहें|
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परमात्मा से अहैतुकी परम प्रेम, परमात्मा को पाने की अभीप्सा और तड़प, परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण व त्याग, समष्टि के कल्याण की कामना व प्रार्थना, और कुछ भी नहीं|
ॐ तत्सत् ! ॐ शिव ! ॐ ॐ ॐ !!

ओमकार का जप ....

ॐ ॐ ॐ || ॐ ॐ ॐ || ॐ ॐ ॐ || ॐ ॐ ॐ ||
ॐकार का मानसिक जाप ऐसे करो जैसे आप किसी झरने के मध्य में हो| निरंतर आ रही सबसे तेज ध्वनि को सुनते रहो और ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ का मानसिक जाप करते रहो| वह ध्वनि तेल धारा के सामान अविछिन्न हो|
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भूल जाओ की आप यह देह हो| आप सर्वव्यापी आत्मा हो| सारी अनंतता और पूर्णता आप स्वयं ही हो| अपने अस्तित्व का लय उस ध्वनी में ही कर दो|
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जिस तरह से झरने का जल ऊपर से नीचे निरंतर प्रवाहित हो रहा है वैसे ही आशुतोष भगवान परमशिव दक्षिणामूर्ति की कृपा आप के सहस्त्रार चक्र पर पूरे ब्रह्मांड से एकत्र होकर बरस रही है|
ॐ नमः शिवाय |
ॐ ॐ ॐ ||