Wednesday, 12 October 2016

देशी नस्ल की गायों की ह्त्या और संतों पर हो रहे प्रहार समाज पर भारी पड़ेंगे .....

देशी नस्ल की गायों की ह्त्या और संतों पर हो रहे प्रहार समाज पर भारी पड़ेंगे| अब प्रकृति इन्हें और सहन नहीं करेगी| इनका परिणाम महाविनाश होगा|
भू और खनन माफियाओं ने लगभग सारी गोचर भूमियों का अतिक्रमण कर लिया है| गायों के चरने के स्थान नहीं बचे हैं| बछड़ों के लिए कोई अभयारण्य नहीं हैं| उन्हें जन्मने के कुछ माह पश्चात आवारा फिरने के लिए छोड़ दिया जाता है| गौ वंश की तस्करी हो रही है| कुछ समय पश्चात दूध भी विदेशों से आयात करना पड़ेगा|
एक संत किसी से कोई अपेक्षा रखे बिना, सिर्फ परमात्मा पर आश्रित हो अपनी समष्टि साधना करता है| माफिया लोगों ने संतों को भी सताना शुरू कर दिया है| इसके परिणाम अच्छे नहीं होंगे| यह समाज पर भारी पडेगा|

जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ ........

जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ ........
दोष डुबकी में है, महासागर में नहीं| जब हमें महासागर में मोती ही ढूँढने हैं तो वे समुद्र तट की रेत में लात मारने से नहीं मिलेंगे| उसके लिए समुद्र की गहराई में डुबकी लगानी होगी| जो गहरे पानी में उतरेंगे उन्हें ही मोती मिलेंगे, न कि ऊपरी सतह पर तैरने वालों को|
यदि मोती नहीं मिलते हैं तो इसमें सागर का क्या दोष है? दोष तो डुबकी में है|
परमात्मा को उपलब्ध होने के लिए भी स्वयं को गहराई में उतरना होगा| कोई दूसरा हमारे लिए यह कार्य नहीं कर सकता| किसी के पीछे पीछे भागने से कुछ नहीं होने वाला|
मात्र प्रवचन सुनने, मात्र ग्रंथों का अध्ययन करने या ऊँची ऊँची दार्शनिक बातों से कुछ नहीं होगा| आहुती स्वयं की ही देनी होगी|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

यज्ञ ......

यज्ञ का अर्थ बहुत विस्तृत है| जैसा मैं समझ सका हूँ उसके अनुसार मेरी व्यक्तिगत मान्यता है कि ..... जो भी कार्य समष्टि के कल्याण के लिए किया जाता है, वह यज्ञ है| समष्टि के लिए सर्वश्रेष्ठ कार्य जो कोई कर सकता है वह है ..... परमात्मा से अहैतुकी परम प्रेम विकसित करने और परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पित होने का निरंतर प्रयास| यह मेरी दृष्टी में सबसे बड़ा यज्ञ है क्योंकि इसमें अपने अहं यानि मानित्व की आहुती अपने प्रियतम प्रभु को दी जाती है| जब अहं समाप्त हो जाता है तब केवल परमात्मा ही बचते हैं| यही समष्टि की सबसे बड़ी सेवा और सबसे बड़ा यज्ञ है|
ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् |
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना ||
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इस जीवन में माता पिता की सेवा और सम्मान प्रथम यज्ञ है| उसके बिना अन्य यज्ञ सफल नहीं होते| वे लोग भाग्यशाली हैं जिन्हें माता पिता की सेवा का अवसर मिलता है| माता पिता का तिरस्कार करने वाले से उसके पितृगण प्रसन्न नहीं होते| उसके घर में कोई सुख शांति नहीं होती और उसके सारे यज्ञ कर्म विफल होते हैं|
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इस ग्रह पृथ्वी के देवता 'अग्नि' हैं| भूगर्भ में जो अग्नि है उसी के कारण पृथ्वी पर जीवन है| उस भूगर्भस्थ अग्नि के कारण ही हमें सब प्रकार के रत्न, धातुएँ और वनस्पति प्राप्त होती हैं| इसीलिए सृष्टि में इस पृथ्वी लोक पर जहाँ हमारा वर्तमान अस्तित्व है वहाँ परमात्मा का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक "अग्नि" ही है| उस "अग्नि" में हम समष्टि के कल्याण के लिए कुछ विशिष्ट मन्त्रों के साथ आहुतियाँ देते हैं वह यज्ञ का एक रूप है|
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एक विशिष्ट विधि द्वारा प्राण में अपान, और अपान में प्राण कि आहुतियाँ देते हैं, वह भी यज्ञ का एक रूप है| फिर प्रणव का मानसिक जप करते हुए ज्योतिर्मय नाद ब्रह्म में लय होकर अपने अस्तित्व का अर्पण करते हैं, वह भी यज्ञ है|
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परोपकार के लिए हम जो भी कार्य करते हैं वह भी यज्ञ की श्रेणी में आता है| भगवान की भक्ति भी एक यज्ञ है| परमात्मा की चर्चा "ज्ञान यज्ञ" है|
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कस्मै देवाय हविषा विधेम? हम किस देवता की प्रार्थना करें और किस देवता के लिए हवन करें, यजन करें, प्रार्थना करें? कौन सा देव है,जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा कर सके, हमको शांति प्रदान कर सके , हमें ऊँचा उठाने में सहायता दे सके? किस देवता को प्रणाम करें? ऐसा देव कौन है?
मेरी समझ से ये वे देव हैं जिन्होनें मुझ में ही नहीं, पूरी सृष्टि में स्वयं को व्यक्त कर रखा है| उन्हीं परब्रह्म का ध्यान मेरे लिए "साधना" है|
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अपने ह्रदय में परमात्मा को पाने की प्रचंड अग्नि प्रज्ज्वलित कर शिवभाव में स्थित होकर प्रणव की चेतना से युक्त होकर हर साँस में सोsहं-हंसः भाव से उस प्रचंड अग्नि में अपने अस्तित्व की आहुतियाँ देकर प्रभु की सर्वव्यापकता और अनंतता में विलीन हो जाना सबसे बड़ा यज्ञ है|
अपने सम्पूर्ण अस्तित्व का प्रभु में पूर्ण समर्पण कर उनके साथ एकाकार हो जाना ही यज्ञ कि परिणिति है|
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ॐ तत्सत् | ॐ शिव | शिवोहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर

जन्म और मृत्यु से परे ...........

जन्म और मृत्यु से परे ...........
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जन्म और मृत्यु से परे एक ऐसी चेतना जागृत हो जहाँ जन्म, मृत्यु और पृथकता का बोध एक स्वप्न हो जाये| जहाँ कुछ भी मुझ से पृथक ना हो, परमात्मा की पूर्णता और अनंतता ही मेरा अस्तित्व हो| मैं यह देह नहीं अपितु सर्वव्यापी परम चैतन्य हूँ| इस पृथ्वी से लाखों करोड़ों अरबों प्रकाशवर्ष दूर स्थित ऐसे नक्षत्र मंडल भी हैं, जहाँ से जब प्रकाश चला था तब पृथ्वी का अस्तित्व ही नहीं था, और जब तक उनका प्रकाश पृथ्वी तक पहुंचेगा तब तक इस पृथ्वी का अस्तित्व भी नहीं रहेगा| वे नक्षत्र मंडल और उनका प्रकाश भी मैं ही हूँ|
यह समस्त अस्तित्व मेरा घर है, यह समस्त सृष्टि मेरा परिवार है|
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हे प्रभु, हे परमशिव आप और मैं एक हैं, जो भी थोड़ी बहुत अज्ञानता और पृथकता का बोध है उसे समाप्त करो| आपकी अनंतता और पूर्णता ही मैं रहूँ|
हे जगन्माता, करुणा कर के इन अज्ञान रुपी ग्रंथियों ..... ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि और रूद्रग्रंथि ..... का भेदन करो|
आप ही इस देह में अवस्थित हैं| अपनी महिमा को व्यक्त करो| मैं आपकी शरणागत हूँ|
मुझे आपके परम प्रेम, ज्ञान, भक्ति, और वैराग्य के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं चाहिए|
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इस राष्ट्र भारत के भीतर व बाहर के सभी शत्रुओं का नाश करो| भारत की अस्मिता की रक्षा हो| भारतवर्ष अपने परम वैभव को प्राप्त करे|
सम्पूर्ण समष्टि का, सब प्राणियों का कल्याण हो| आपकी जय हो|
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ॐ तत्सत् | अयमात्मा ब्रह्म | तत्वमसि | सोsहं | ॐ ॐ ॐ ||

गृहस्थ जीवन और परमात्मा का साक्षात्कार .....

कोई गृहस्थ व्यक्ति जो अपने बाल बच्चों, सगे सम्बन्धियों व मित्रों के साथ रहता है, क्या सत्य यानि ईश्वर का साक्षात्कार कर सकता है ?
शास्त्रों में सुख, सम्पति, परिवार और बड़ाई को राम भक्ति में बाधक माना है|
वानप्रस्थ आश्रम पुस्तकों में ही सीमित रह गया है| 50 वर्ष की आयु में कोई वानप्रस्थ बनता दिखाई नहीं देता| मरते दम तक सभी गृहस्थ ही रहते हैं| तथाकथित पारिवारिक उत्तरदायित्व कभी पीछा ही नहीं छोड़ते|
सहयोग न मिलने के पश्चात भी क्या कोई अपने सहयोगी को उसी प्रकार लेकर चल सकता है जिस प्रकार पृथ्वी चन्द्रमा को लेकर सूर्य की परिक्रमा करती है ?
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विभिन्न देहों में मेरे ही प्रियतम निजात्मन,
मैंने मात्र चर्चा हेतु मंचस्थ मनीषियों और विद्वानों से प्रश्न किया था कि .....
(1) कोई गृहस्थ व्यक्ति जो अपने बाल बच्चों, सगे सम्बन्धियों व मित्रों के साथ रहता है, क्या वह सत्य यानि ईश्वर का साक्षात्कार कर सकता है ?
(2) क्या कोई अपने सहयोगी को उसी प्रकार लेकर चल सकता है जिस प्रकार पृथ्वी चन्द्रमा को लेकर सूर्य की परिक्रमा करती है ?
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मेरी दृष्टी में ये अति गहन प्रश्न हैं पर उनका उत्तर मेरे दृष्टिकोण से बड़ा ही सरल है जिसे मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ .....
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विवाह हानिकारक नहीं होता है| पर उसमें नाम रूप में आसक्ति आ जाए कि मैं यह शरीर हूँ, मेरा साथी भी शरीर है, तब दुर्बलता आ जाती है और इस से अपकार ही होता है| वैवाहिक संबंधों में शारीरिक सुख की अनुभूति से ऊपर उठना होगा| सुख और आनंद किसी के शरीर में नहीं हैं| भौतिक देहों में सुख ढूँढने वाला व्यक्ति ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता|
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यह अपने अपने दृष्टिकोण पर निर्भर करता है कि हमारा वैवाहिक जीवन कैसा हो| इसमें सुकरात के, संत तुकाराम व संत नामदेव आदि के उदाहरण विस्तार भय से यहाँ नहीं दे रहा|
हम ईश्वर की ओर अपने स्वयं की बजाय अनेक आत्माओं को भी साथ लेकर चल सकते हैं| ये सारे के सारे आत्मन हमारे ही हैं| परमात्मा के साथ तादात्म्य स्थापित करने से पूर्व हम अपनी चेतना में अपनी पत्नी, बच्चों और आत्मजों के साथ एकता स्थापित करें| यदि हम उनके साथ अभेदता स्थापित नहीं कर सकते तो सर्वस्व (परमात्मा) के साथ भी अपनी अभेदता स्थापित नहीं कर सकते|
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क्रिया और प्रतिक्रया समान और विपरीत होती है| यदि मैं आपको प्यार करता हूँ तो आप भी मुझसे प्यार करेंगे| जिनके साथ आप एकात्म होंगे तो वे भी आपके साथ एकात्म होंगे ही| आप उनमें परमात्मा के दर्शन करेंगे तो वे भी आप में परमात्मा के दर्शन करने को बाध्य हैं|
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पत्नी को पत्नी के रूप में त्याग दीजिये, आत्मजों को आत्मजों के रूप में त्याग दीजिये, और मित्रों को मित्र के रूप में देखना त्याग दीजिये| उनमें आप परमात्मा का साक्षात्कार कीजिये| स्वार्थमय और व्यक्तिगत संबंधों को त्याग दीजिये और सभी में ईश्वर को देखिये| आप की साधना उनकी भी साधना है| आप का ध्यान उन का भी ध्यान है| आप उन्हें ईश्वर के रूप में स्वीकार कीजिये|
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और भी सरल शब्दों में सार की बात यह है की पत्नी को अपने पति में परमात्मा के दर्शन करने चाहियें, और पति को अपनी पत्नी में अन्नपूर्णा जगन्माता के| उन्हें एक दुसरे को वैसा ही प्यार करना चाहिए जैसा वे परमात्मा को करते हैं| और एक दुसरे का प्यार भी परमात्मा के रूप में ही स्वीकार करना चाहिए| वैसा ही अन्य आत्मजों व मित्रों के साथ होना चाहिए| इस तरह आप अपने जीवित प्रिय जनों का ही नहीं बल्कि दिवंगत प्रियात्माओं का भी उद्धार कर सकते हो| अपने प्रेम को सर्वव्यापी बनाइए, उसे सीमित मत कीजिये|
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आप में उपरोक्त भाव होगा तो आप के यहाँ महापुरुषों का जन्म होगा|
यही एकमात्र मार्ग है जिस से आप अपने बाल बच्चों, सगे सम्बन्धियों व मित्रों के साथ ईश्वर का साक्षात्कार कर सकते है, अपने सहयोगी को भी उसी प्रकार लेकर चल सकते है जिस प्रकार पृथ्वी चन्द्रमा को लेकर सूर्य की परिक्रमा करती है|
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मैं कोई अधिक पढ़ा लिखा विद्वान् नहीं हूँ, न ही मेरा भाषा पर अधिकार है और न ही मेरी कोई लिखने की योग्यता है| अपने भावों को जितना अच्छा व्यक्त कर सकता था किया है|
ईश्वर की प्रेरणा से ही यह लिख पाया हूँ| कोई भी यदि इन भावों को और भी अधिक सुन्दरता से कर सकता है और करना चाहे तो वह स्वतंत्र है|
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आप सब विभिन्न देहों में मेरी ही निजात्मा हैं, मैं आप सब को प्रेम करता हूँ और सब में मेरे प्रभु का दर्शन करता हूँ| आप सब को प्रणाम|
ॐ तत्सत् |
कृपा शंकर
October 13, 2013

***** दशहरे की शुभ कामनाएँ ***** "सीता को पा कर ही हम रावण का नाश कर सकते हैं, और तभी राम से जुड़ सकते हैं" .....

***** दशहरे की शुभ कामनाएँ *****
"सीता को पा कर ही हम रावण का नाश कर सकते हैं,
और तभी राम से जुड़ सकते हैं" .....
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हमारा प्रथम, अंतिम और एकमात्र शत्रु कहीं बाहर नहीं, हमारे भीतर ही अवचेतन मन में छिपा बैठा विषय वासना रुपी रावण है|
हमारे ह्रदय के एकमात्र राजा राम हैं| उन्होंने ही सदा हमारी ह्रदय भूमि पर राज्य किया है, और सदा वे ही हमारे राजा रहेंगे| अन्य कोई हमारा राजा नहीं हो सकता| वे ही हमारे परम ब्रह्म हैं|
हमारे ह्रदय की एकमात्र महारानी सीता जी हैं| वे हमारे ह्रदय की अहैतुकी परम प्रेम रूपा भक्ति हैं| वे ही हमारी गति हैं| वे ही सब भेदों को नष्ट कर हमें राम से मिला सकती हैं| अन्य किसी में ऐसा सामर्थ्य नहीं है|
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हमारी पीड़ा का एकमात्र कारण यह है कि हमारी सीता का रावण ने अपहरण कर लिया है| हम सीता को अपने मन के अरण्य में गलत स्थानों पर ढूँढ रहे हैं और रावण के प्रभाव से दोष दूसरों को दे रहे हैं, जब कि कमी हमारे प्रयास की है| यह मायावी रावण ही हमें भटका रहा है| सीता जी को पा कर ही हम रावण का नाश कर सकते हैं, और तभी राम से जुड़ सकते हैं|
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राम से एकाकार होने तक इस ह्रदय की प्रचंड अग्नि का दाह नहीं मिटेगा, और राम से पृथक होने की यह घनीभूत पीड़ा हर समय निरंतर दग्ध करती रहेगी| राम ही हमारे अस्तित्व हैं और उनसे एक हुए बिना इस भटकाव का अंत नहीं होगा| उन से जुड़कर ही हमारे वेदना का अंत होगा और तभी हम कह सकेंगे ..... "शिवोSहं शिवोSहं अहं ब्रह्मास्मि"|
= कृपा शंकर =
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पुनश्चः .... इस राष्ट्र में धर्म रूपी बैल पर बैठकर भगवान शिव ही विचरण करेंगे, और भगवान श्रीकृष्ण की ही बांसुरी बजेगी जो नवचेतना को जागृत करेगी| सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा होगी व असत्य और अन्धकार की शक्तियों का निश्चित रूप से नाश होगा| ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
= कृपा शंकर =
October 11, 2014

मैं ज्योतिषांज्योति पूर्ण प्रकाश हूँ .....

मैं ज्योतिषांज्योति पूर्ण प्रकाश हूँ .....
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मंचस्थ निजात्मन, आप सब विभिन्न रूपों में मेरी ही निजात्मा हो| आप सब को मेरे ह्रदय का सम्पूर्ण अनंत अहैतुकी प्रेम समर्पित है|

धर्म और राष्ट्र के उत्थान के लिए आप जैसे प्रत्येक सच्चे भारतीय को अपनी दीनता और हीनता का परित्याग कर अपने निज देवत्व को जागृत करना होगा| क्षुद्रात्मा पर परिछिन्न माया के आवरण को हटाना होगा|

"आप पूर्ण प्रकाश हैं| आप ज्योतियों की ज्योति -- ज्योतिषांज्योति हो|
आपके संकल्प और दिव्य प्रकाश से ही सम्पूर्ण संसार का विस्तार हुआ है| आप कोई ख़ाक के पुतले और दीन हीन नहीं हो|"

"आप सम्पूर्ण समष्टि, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड हो| सम्पूर्ण सृष्टि ही आपका शरीर है|
आपका अभ्युदय ही सृष्टि का अभ्युदय है और सृष्टि का उत्कर्ष ही आपका उत्कर्ष है|
आपके अन्तस्थ सूर्य का प्रकाश ही एकमात्र प्रकाश, प्रकाशों का प्रकाश -- ज्योतिषांज्योति है|"
जब आप साँस लेते हो तो सम्पूर्ण सृष्टि साँस लेती है, जब आप साँस छोड़ते हो तो सम्पूर्ण सृष्टि साँस छोड़ती है| जब आप जागते हो तो सारी सृष्टि जागती है, आप सोते हो तो सारी सृष्टि सोती है| आपकी प्रगति ही सारी सृष्टि की प्रगति है|

निरंतर निदिध्यासन करते रहिये --- "मैं प्रकाशों का प्रकाश हूँ", "तत्वमसि", "सोsहं"|
आप उस ज्योतिषांज्योति से स्वयं को एकाकार कीजिये| यही आपका वास्तविक तत्व है| तब आप में कोई भय, आक्रोष और दु:ख नहीं रहेगा|

"सर्वत्र आप ही तो हो| आपका निज प्रकाश निरंतर, अविचल और शाश्वत है|
यह संसार तो छोटी मोटी तरंगों और भंवरों से अधिक नहीं है|
आप परिपूर्ण और मूर्तमान आनंद हैं|"

अपनी उच्चतर क्षमताओं को विकसित करने के लिए इसी विचार को निरंतर बल देना होगा --- "तत्वमसि, सोsहं"|| ॐ ॐ ॐ !!

= कृपा शंकर =
October 11, 2013.