Monday, 12 September 2016

सच्चिदानंद रूप में स्थित हो जाना ही मोक्ष है ......

सच्चिदानंद रूप में स्थित हो जाना ही मोक्ष है ......
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वेदांत के दृष्टिकोण से अपने सच्चिदानंद रूप में स्थित हो जाना ही मोक्ष है| परब्रह्म ही जीव और जगत् के सभी रूपों में व्यक्त है| वही जीवरूप में भोक्ता है और वही जगत रूप में भोग्य है|
साभार: स्वामी मृगेंद्र सरस्वती

मनुष्य की शाश्वत जिज्ञासा .....

मनुष्य की शाश्वत जिज्ञासा .....
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एक बहुत ऊंचे और विराट पर्वत की तलहटी में बसे एक गाँव के लोगों में यह जानने की प्रबल जिज्ञासा थी की पर्वत के उस पार क्या है| बहुत सारे किस्से कहानियाँ प्रचलित थे| कई पुस्तकें लिखी गयी थीं यही बताने को कि पर्वत के उस पार क्या है| बहुत सारे लोग थे जो बताते थे कि पर्वत के उस पार क्या है| पर उनमें से किसी ने भी प्रत्यक्ष देखा नहीं था कि उस पार क्या है| सबकी अपनी मान्यताएं थीं|
कुछ लोगों की मान्यता थी कि वे जो कहते हैं वही सही है, और बाकी सब गलत| कुछ लोगों ने घोषणा कर दी कि जो भी उनकी बात को नहीं मानेगा उसे दंडित किया जाएगा, उसकी ह्त्या भी कर दी जायेगी|
इस सब के बाद भी लोगों की जिज्ञासा शांत नहीं हुई यह जानने को की पर्वत के उस पार क्या है|

एक दिन एक साहसी युवक ने हिम्मत जुटाई और पर्वत पर चढ़ गया| पर्वत पर चढ़ कर और स्वयं देखकर अपने निजी अनुभव से ही उसे पता चला कि पर्वत के उस पार क्या है| उसने पाया कि नीचे की सब प्रचलित बातें अर्थहीन हैं| पर उसने जो अनुभूत किया वह उसका निजी अनुभव था जो उसी के काम का था| अन्य कोई उसकी बात को मान भी नहीं सकता था| उसने नीचे आकर घोषणा कर दी की जिसे यह जानना है कि पर्वत के उस पार क्या है उसे स्वयं को पर्वत पर चढ़कर देखना होगा| किसी ने उसकी बात मानी किसी ने नहीं| कुछ ने उसे द्रोही घोषित कर दिया| पर फिर भी लोगों की जिज्ञासा शांत नहीं हुई|
अपना संसार ही वह गाँव है, और अज्ञान ही वह पर्वत है| उस अज्ञान रुपी पर्वत से ऊपर जाकर ही पता चल सकता है की सत्य क्या है| यह मनुष्य की शाश्वत जिज्ञासा है यह जानने की कि सत्य क्या है| दूसरों के उत्तर इस जिज्ञासा को शांत नहीं कर सकते| एक सुखी व्यक्ति ही यह जान सकता है कि सुख क्या है| एक पीड़ित व्यक्ति यह जानना चाहे कि आनंद क्या है तो उसे स्वयं को आनंदित होना होगा|
आप मुझसे पूछें की चन्द्रमा कहाँ है तो मैं अपनी अंगुली से संकेत कर के बता दूंगा| एक बार चन्द्रमा को देखने के पश्चात मेरी अंगुली का कोई महत्व नहीं रहता|
आप कहीं अनजान जगह जा रहे हैं तो आप अपने साथ एक पथ प्रदर्शक पुस्तिका रखेंगे| पर एक बार गंतव्य स्थान दिखाई पड़ जाने पर उस पुस्तिका का कोई महत्व नहीं रहता और न ही दूसरों के बताये हुए दिशा निर्देशों का|
अपनी जिज्ञासाओं को तृप्त करने के लिए स्वयं को प्रयास और खोज करनी होगी| अन्य कोई आपकी जिज्ञासाओं को शांत नहीं कर सकता|
बस यही मेरे भाव हैं जो मैं व्यक्त करना चाहता था| परम धन्यवाद|
ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
13 सितम्बर 2013

आतंकवाद ......

आतंकवाद .....
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आतंकवाद .... एक असत्य और अन्धकार की शक्ति है जो मनुष्य को अपनी वासनाओं और अहंकार की पूर्ती के लिए दिग्भ्रमित कर असत्य और अंधकार में ही उलझाए रखती है|
मनुष्य स्वयं तो असत्य और अन्धकार के आवरण में रहता ही है, पर अन्यों को भी उसी असत्य को सत्य व अन्धकार को प्रकाश मानने को निर्दयता से बलात् बाध्य करता है; यही आतंकवाद है|
इसके कारण मनुष्य के षड़ विकार --- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर्य हैं|
यह सृष्टि के आदिकाल से ही रहा है, कभी कम और कभी अधिक| इसका सबसे नकारात्मक पहलू तो यह है कि अपने मत की पुष्टि के लिए बीच में भगवान और धर्म को भी ले आते हैं| भगवान और धर्म का उपयोग मात्र एक अस्त्र के रूप में किया जाता है|
पिछले दो हज़ार वर्षों के इतिहास को देखो तो आतंकवाद के अनेक रूप रहे हैं|
हूण, शक, मंगोलों, क्रूसेडरों, जिहादियों आदि ने लूट खसोट और साम्राज्य विस्तार के लिए आतंक फैलाया| नाजियों, फासिस्टों, जापानियों व कम्युनिस्टों ने साम्राज्य विस्तार के लिए आतंक फैलाया| अब भी कुछ मतानुयायी अपने संख्या विस्तार के लिए आतंक का सहारा ले रहे हैं जो गलत है|
किसी भी प्रकार के आतंक का विरोध करना चाहिए| इसका समर्थन किसी भी परिस्थिति में ना हो|
पूरे विश्व को अपना परिवार मानकर और सभी के कल्याण की कामना ही आतंकवाद का सही उत्तर है| पर कोई किसी पर बलात् अत्याचार करे तो उसका प्रतिकार भी बलपूर्वक और पूर्ण साहस के साथ होना चाहिए| धन्यवाद |
ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
सितम्बर 13, 2014.

धर्म की अवधारणा का क्षरण ही वर्त्तमान दुःखद परिस्थितियों का कारण है .....

धर्म की अवधारणा का क्षरण ही वर्त्तमान दुःखद परिस्थितियों का कारण है .....
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एक यक्ष प्रश्न सभी भारतीयों से है कि जो भारतीय समाज शान्तिप्रिय था उसमें अचानक ही असहिष्णुता, असंतोष, ईर्ष्या, द्वेष, और लूट- पाट बढ़ने लगी है | इसका मूल कारण क्या है?
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जहां तक मेरी सोच है, पहिले लोगों की आवश्यकता कम थी| थोड़े में ही गुज़ारा कर लेते थे| लोग अपरिग्रह को धर्म मानते थे और संतोष को धन; इसलिए सुखी थे|
अब दिखावे की प्रवृति बढ़ गयी है, टेलिविज़न आने के बाद से लोगों में मेलजोल कम हो हो गया है| समाचारपत्रों और टेलिविज़न में विज्ञापनों को देखकर अधिक से अधिक और पाने की चाह बढ़ गयी है| "धर्म" की अवधारणा का बोध भी कम हो गया है| इसलिए लूट-खसोट और चोरी बढ़ गयी है|
धर्म की अवधारणा का क्षरण ही वर्त्तमान दुःखद परिस्थितियों का कारण है|
क्या हम वास्तव में प्रगति कर रहे हैं?
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कृपा शंकर
13 सितम्बर 2014

हमारे विचार, सोच और भावनाएँ ही हमारे "कर्म" हैं, दोष विषय वासनाओं में नहीं, अपितु उनके चिंतन में है ...

हमारे विचार, सोच और भावनाएँ ही हमारे "कर्म" हैं, दोष विषय वासनाओं में नहीं, अपितु उनके चिंतन में है .....
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यह सृष्टि द्वैत से बनी है| सृष्टि के अस्तित्व के लिए विपरीत गुणों का होना अति आवश्यक है| प्रकाश का अस्तित्व अन्धकार से है और अन्धकार का प्रकाश से|
मनुष्य जैसा और जो कुछ भी सोचता है वह ही "कर्म" बनकर उसके खाते में जमा हो जाता है|
यह सृष्टि हमारे विचारों से ही बनी है| हमारे विचार ही घनीभूत होकर हमारे चारों ओर व्यक्त हो रहे हैं|
ये ही हमारे कर्मों के फल हैं|

परमात्मा की सृष्टि में कुछ भी बुरा या अच्छा नहीं है| कामना ही बुरी है|
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं -- "ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते।"
विषय मिलने पर विषय का प्रयोग आसक्ति को पैदा नहीं करेगा। परन्तु जब हम विषय को मन में सोचते हैं तो उसके प्रति कामना जागृत होगी|
यह कामना ही हमारा "बुरा कर्म" है, और निष्काम रहना ही "अच्छा कर्म" है|
हम बुराई बाहर देखते हैं, अपने भीतर नहीं|
हम विषयों को दोष देते है| पर दोष विषयों में नहीं बल्कि उनके चिंतन में है|
कामनाएं कभी पूर्ण नहीं होतीं|
उनसे ऊपर उठने का एक ही उपाय है, और वह है --------- "निरंतर हरि का स्मरण|"
सांसारिक कार्य भी करते रहो पर प्रभु को समर्पित होकर|
"मच्चितः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात् तरिष्यसि|"
अपने आप को ह्रदय और मन से मुझे दे देने से तूँ समस्त कठिनाइयों और संकटों को मेरे प्रसाद से पार कर जाएगा|
इस समर्पण पर पूर्व में प्रस्तुति दी जा चुकी है|
आगे और लिखना मेरी सीमित और अल्प क्षमता से परे है| मेरे में और क्षमता नहीं है|
और अब आप कुछ भी अर्थ लगा लो, यह आप पर निर्भर है|
यह कोई उपदेश नहीं है, स्वयं को व्यक्त करने का मेरा स्वभाव है|
सभी को शुभ कामनाएँ| ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
13 सितम्बर 2014

जिसने काम जीता उसने जगत जीता .....

आध्यात्म पथ के साधकों के लिए ......
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>>>>> "जिसने काम जीता उसने जगत जीता |" <<<<<
वह चक्रवर्ती सम्राट है |
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और मुझे कुछ नहीं कहना है | आप सब समझदार हो | अतः साधू, सावधान !
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ !!

राजस्थान के लोक देवता रामसा पीर बाबा रामदेव जी .....

राजस्थान के लोक देवता रामसा पीर बाबा रामदेव जी .....
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भाद्रपद शु.प.दूज से आरम्भ हुए बाबा रामदेव जी के मेले का आज समापन है|
बाबा रामदेव जी राजस्थान के एक लोक देवता हैं। 15वी शताब्दी के आरम्भ में भारत में लूट खसोट, छुआछूत, हिंदू-मुस्लिम झगडों आदि के कारण स्थितियाँ बड़ी अराजक बनी हुई थीं। ऐसे विकट समय में पश्चिम राजस्थान के पोकरण नामक प्रसिद्ध नगर के पास रुणिचा नामक स्थान में तोमर वंशीय राजपूत और रुणिचा के शासक अजमाल जी के घर भादो शुक्ल पक्ष दूज के दिन वि•स• 1409 को बाबा रामदेव पीर अवतरित हुए (द्वारकानाथ ने राजा अजमल जी के घर अवतार लिया, जिन्होंने लोक में व्याप्त अत्याचार, वैर-द्वेष, छुआछूत का विरोध कर अछूतोद्धार का सफल आन्दोलन चलाया।
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बाबा रामदेव ने अपने अल्प जीवन के तेंतीस वर्षों में वह कार्य कर दिखाया जो सैकडो वर्षों में भी होना सम्भव नही था। सभी प्रकार के भेद-भाव को मिटाने एवं सभी वर्गों में एकता स्थापित करने की पुनीत प्रेरणा के कारण बाबा रामदेव जहाँ हिन्दुओ के देव है तो मुस्लिम भाईयों के लिए रामसा पीर। मुस्लिम भक्त बाबा को रामसा पीर कह कर पुकारते हैं। वैसे भी राजस्थान के जनमानस में पॉँच वीरों की प्रतिष्ठा है जिनमे बाबा रामसा पीर का विशेष स्थान है।
पाबू हडबू रामदेव माँगळिया मेहा।
पांचू वीर पधारजौ ए गोगाजी जेहा।।
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बाबा रामदेव ने छुआछूत के खिलाफ कार्य कर सिर्फ़ दलितों का पक्ष ही नही लिया वरन उन्होंने दलित समाज की सेवा भी की। डाली बाई नामक एक दलित कन्या का उन्होंने अपने घर बहन-बेटी की तरह रख कर पालन-पोषण भी किया। यही कारण है आज बाबा के भक्तो में एक बहुत बड़ी संख्या दलित भक्तों की है। बाबा रामदेव पोकरण के शासक भी रहे लेकिन उन्होंने राजा बनकर नही अपितु जनसेवक बनकर गरीबों, दलितों, असाध्य रोगग्रस्त रोगियों व जरुरत मंदों की सेवा भी की। यही नही उन्होंने पोकरण की जनता को भैरव राक्षस के आतंक से भी मुक्त कराया। प्रसिद्ध इतिहासकार मुंहता नैनसी ने भी अपने ग्रन्थ "मारवाड़ रा परगना री विगत" में इस घटना का जिक्र करते हुए लिखा है- भैरव राक्षस ने पोकरण नगर आतंक से सूना कर दिया था, लेकिन बाबा रामदेव के अदभूत एवं दिव्य व्यक्तित्व के कारण राक्षस ने उनके आगे आत्म-समर्पण कर दिया था और बाद में उनकी आज्ञा अनुसार वह मारवाड़ छोड़ कर चला गया। बाबा रामदेव ने अपने जीवन काल के दौरान और समाधि लेने के बाद कई चमत्कार दिखाए जिन्हें लोक भाषा में परचा देना कहते है। इतिहास व लोक कथाओं में बाबा द्वारा दिए ढेर सारे परचों का जिक्र है। जनश्रुति के अनुसार मक्का के मौलवियों ने अपने पूज्य पीरों को जब बाबा की ख्याति और उनके अलौकिक चमत्कार के बारे में बताया तो वे पीर बाबा की शक्ति को परखने के लिए मक्का से रुणिचा आए। बाबा के घर जब पांचो पीर खाना खाने बैठे तब उन्होंने बाबा से कहा की वे अपने खाने के बर्तन (सीपियाँ) मक्का ही छोड़ आए है और उनका प्रण है कि वे खाना उन सीपियों में खाते है तब बाबा रामदेव ने उन्हें विनयपूर्वक कहा कि उनका भी प्रण है कि घर आए अतिथि को बिना भोजन कराये नही जाने देते और इसके साथ ही बाबा ने अलौकिक चमत्कार दिखाया जो सीपी जिस पीर कि थी वो उसके सम्मुख रखी मिली।
इस चमत्कार (परचा) से वे पीर इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने बाबा को पीरों का पीर स्वीकार किया। आख़िर जन-जन की सेवा के साथ सभी को एकता का पाठ पढाते बाबा रामदेव ने भाद्रपद शुक्ला एकादशी वि.स . 1442 को जीवित समाधी ले ली। श्री बाबा रामदेव जी की समाधी संवत् 1442 को रामदेव जी ने अपने हाथ से श्रीफल लेकर सब बड़े बुढ़ों को प्रणाम किया तथा सबने पत्र पुष्प् चढ़ाकर रामदेव जी का हार्दिक तन मन व श्रद्धा से अन्तिम पूजन किया। रामदेव जी ने समाधी में खड़े होकर सब के प्रति अपने अन्तिम उपदेश देते हुए कहा 'प्रति माह की शुक्ल पक्ष की दूज को पूजा पाठ, भजन कीर्तन करके पर्वोत्सव मनाना, रात्रि जागरण करना। प्रतिवर्ष मेरे जन्मोत्सव के उपलक्ष में तथा अन्तर्ध्यान समाधि होने की स्मृति में मेरे समाधि स्तर पर मेला लगेगा। मेरे समाधी पूजन में भ्रान्ति व भेद भाव मत रखना। मैं सदैव अपने भक्तों के साथ रहूँगा। इस प्रकार श्री रामदेव जी महाराज ने समाधि ली।' आज भी बाबा रामदेव के भक्त दूर- दूर से रुणिचा उनके दर्शनार्थ और अराधना करने आते है। वे अपने भक्तों के दु:ख दूर करते हैं, मुराद पूरी करते हैं। हर साल लगने मेले में तो लाखों की तादात में जुटी उनके भक्तो की भीड़ से उनकी महत्ता व उनके प्रति जन समुदाय की श्रद्धा का आकलन आसानी से किया जा सकता है।
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(संकलन : विकिपीडिया से)