Sunday, 28 August 2016

इस मातृशक्ति को नमन ......

इस मातृशक्ति को नमन ......

नित्य प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में हमारे मोहल्ले की एक बड़ी संख्या में महिलाऐं हनुमान जी के मंदिर में एकत्र होकर भजन-कीर्तन करते हुए प्रभात-फेरी निकालती हैं| इससे वातावरण बहुत पवित्र रहता है| नित्य यह प्रभात फेरी मेरे घर के सामने से ही निकलती है अतः नित्य प्रातःकाल भजन सुनने को मिल जाते हैं|
हमारे नगर में ऐसी ही दो और प्रभात-फेरियाँ ...... एक तो इंदिरा नगर के नगर-नरेश मंदिर से, और दूसरी नेहरु बाज़ार के श्रीराम मंदिर से निकलती हैं|
यहाँ कभी कभी हरिशरण दास जी नाम के निम्बार्क सम्प्रदाय के एक वैष्णव संत पधारते हैं, जो पूरे नगर को भक्तिमय बना जाते हैं| उन्हीं की प्रेरणा से ये प्रभात-फेरियाँ निकलनी आरम्भ हुई थीं|
मैं उन सब माताओं को साधुवाद देता हूँ जो इन प्रभात-फेरियों में भाग लेती हैं|
जय श्रीकृष्ण !

आध्यात्मिक चुम्बकत्व ..............

आध्यात्मिक चुम्बकत्व ..............
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आत्म-प्रशंसा एक बहुत बड़ा अवगुण है| कभी भूल से भी आत्मप्रशंसा ना करें|
आपके भीतर एक आध्यात्मिक चुम्बकत्व है, वह बिना कुछ कहे ही आपकी महिमा का बखान कर देता है| ध्यान साधना से उस आध्यात्मिक चुम्बकत्व का विकास करें|
वह चुम्बकत्व आप में होगा तो अच्छे लोग ही आपकी तरफ खिंचे चले आयेंगे, आप जहां भी जायेंगे वहां लोग स्वतः ही आपकी और आकर्षित होंगे, आपकी बातें लोग ध्यान से सुनेंगे, आपकी कही हुई बातो को लोग कभी भूलेंगे नहीं और उन पर आपकी बातों का चिर स्थायी प्रभाव पडेगा|
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कभी कभी आप बहुत सुन्दर भाषण और प्रवचन सुनते है, बड़े जोर से प्रसन्न होकर तालियाँ बजाते हैं, पर पांच दस मिनट बाद उसको भूल जाते हैं| वहीं कभी कोई आपको एक मामूली सी बात कह देता है जिसे आप वर्षों तक नहीं भूलते| कभी कोई अति आकर्षक व्यक्ति मिलता है, मिलते ही आप उससे दूर हटना चाहते हैं, पर कभी कभी एक सामान्य से व्यक्ति को भी आप छोड़ना नहीं चाहते, यह उस व्यक्ती के चुम्बकत्व का प्रभाव है|
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आध्यात्मिक चुम्बकत्व क्या है ???
यह आत्मा की एक शक्ति है जो उस हर वस्तु या परिस्थिति को आकर्षित या निर्मित कर लेती है जो किसी को अपने विकास या सुख-शांति के लिए चाहिए|
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आप जहाँ भी जाते हैं और जिन भी व्यक्तियों से मिलते हैं उन के चुम्बकत्व का आपस में विनिमय होता रहता है, इसीलिए अपने शास्त्रों में कुसंग का सर्वथा त्याग करने को कहा गया है| सत्संग की महिमा भी यही है|

जब हम संत महात्माओं के बारे चिंतन मनन करते हैं तब उनका चुम्बकत्व भी हमें प्रभावित करता है| इसीलिए सद्गुरु का और परमात्मा का सदा चिंतन करना चाहिए और मानसिक रूप से सदा उनको अपने साथ रखना चाहिए|
किसी की निंदा या बुराई करने से उसके अवगुण आपमें आते हैं अतः परनिंदा से बचो|
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अपने ह्रदय में निरंतर अपने इष्ट देव/देवी का, व भ्रूमध्य में अपने सद्गुरु का निरंतर ध्यान रखें| इससे आपके आध्यात्मिक चुम्बकत्व का विकास होगा| आप प्रायः शांत और मौन रहें, अपने चुम्बकत्व को बोलने दें|

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||


पुनश्चः  .....

इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। दुर्योधन हमेशा गुरु द्रोणाचार्य से कहते थे कि आप कोई चमत्कार नहीं दिखाते, जिससे युद्ध में हमारे अनुकूल उपलब्धि हो। द्रोण ने कहा कि कृष्ण और अर्जुन को युद्ध से अलग करो, तो मैं कुछ कर सकता हूं। परिणामत: संसप्तकों का एक युद्ध हुआ। इस युद्ध में नियम था कि यदि कोई ललकारे तो युद्ध करना ही पड़ेगा।
युद्ध क्षेत्र से दूर जाकर दुर्योधन ने ललकार लगाई। उस ललकार का उत्तर देने के लिए पांडवों की ओर से सिर्फ महाराज युधिष्ठिर और अभिमन्यु ही आ सके। कौरवों के दल ने इसी समय चक्रव्यूह की रचना की। ऐसे समय यह सब किया गया, जब पांडवों को उसका आभास भी नहीं था। वे अपने-अपने मोर्चों पर जूझते रहे। अंतत: अभिमन्यु को इस षड्यंत्र का सामना करना पड़ा और इस युद्ध में अभिमन्यु मारा गया।
वस्तुत: पांडवों को भान भी नहीं था कि ऐसा कुछ होने वाला है, जिससे गहरी क्षति हो सकती है। केवल धर्मराज और अभिमन्यु रह गए थे, जिन्हें चक्रव्यूह का भेदन करना था।
अभिमन्यु ने चक्रव्यूह का सामना किया। उसने उसके कई भागों पर विजय पाई, लेकिन अंत में मारा गया। जब अन्य पांडव लौटे और उन्हें अभिमन्यु के मरने का पता चला, तो अर्जुन को धर्मराज पर क्रोध आया। उन्होंने उन्हें बुरा-भला कहा।
जब क्रोध शांत हुआ, तब पश्चाताप का दौर आया। अर्जुन ने कहा, अरे, मैंने उस व्यक्ति को ऐसा कहा, जिन्हें धर्मराज कहा जाता है। इसके प्रायश्चित के लिए मुझे आत्मदाह कर लेना चाहिए।
कृष्ण भी बोले, जरूर करना चाहिए। दूर चिता सजाई जाने लगी। सब एक-दूसरे की ओर देख रहे थे कि क्या हो रहा है, पर कोई कुछ बोल नहीं रहा था।
अंत में मुस्कराते हुए कृष्ण ने कहा, आत्मदाह का एक विकल्प भी है कि तुम अपनी प्रशंसा खुद करो। श्रीकृष्ण की बात सुनकर अर्जुन को भान और ज्ञान हुआ। उन्होंने आत्मदाह का निर्णय त्याग दिया। इस प्रकार कृष्ण ने अर्जुन को आत्महत्या से बचा लिया।
यह श्रीकृष्ण का व्यावहारिक दर्शन था। जीवन को यथार्थ में देखने की उनकी दृष्टि थी। यही जीवन की प्रासंगिकता है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है- आत्मप्रशंसा अनल सम, करतब कानन दाह यानी आत्मप्रशंसा वह आग है, जिसमें कर्तव्य का जंगल जल जाता है।

भगवान श्रीकृष्ण निरंतर हमारे कूटस्थ में हैं .....

भगवान श्रीकृष्ण निरंतर हमारे कूटस्थ में हैं .....
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अपनी साँसों से
हमारे मेरुदंडस्थ
सप्तचक्रों की बांसुरी में
सप्तसुरों की तान
बजा रहें हैं |
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हमारे भीतर वे ही साँस ले रहे हैं| उनकी साँस से ही हमारी साँस चल रही है| उनके सप्त स्वरों से मिल कर प्रणव ध्वनि यानि अनाहत नाद ध्यान में हमें निरतर सुनाई दे रही है| ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में वे ही हमारी दृष्टी में निरतर बने हुए हैं| उनका जन्म हमारे चित्त में निरंतर हो रहा है| उनकी चेतना से हमारा चित्त आनंदमय है|
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ॐॐॐ!!

ध्यान साधकों को एक सुझाव .....

जो लोग ध्यान साधना करते हैं उनको मैं मेरे लंबे अनुभव से एक सुझाव देना चाहता हूँ|
आप चाहे किसी भी गुरु परम्परा का अनुसरण करते हों पर नीचे लिखी कुछ बातें आपकी साधना में बहुत सहायक होंगी|
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ध्यान से पूर्व कुछ देर तक तेजी से चलना, फिर सूर्य नमस्कार, अनुलोम-विलोम प्राणायाम और पश्चिमोत्तानासन का अभ्यास करें| प्रार्थना करके पूर्व या उत्तर की ओर मुँह कर के ऊनी कम्बल पर पद्मासन या सिद्धासन में बैठें और आतंरिक प्राणायाम, अजपा-जाप और ओंकार पर ध्यान करें| थोड़े थोड़े अभ्यास से आपका ध्यान बहुत गहरा होने लगेगा| खेचरी मुद्रा भी किसी योग्य योगाचार्य से सीखें और अभ्यास करें| ध्यान में पूर्णता खेचरी मुद्रा की सिद्धि के उपरांत ही आएगी|
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एक ही आसन पर बैठे बैठे यदि थक जाएँ तो फिर दो-तीन बार पश्चिमोत्तानासन आधारित महामुद्रा का अभ्यास करें और गहरी साँसें लें| थकान दूर हो जायेगी| यदि आपकी कमर और गर्दन में तकलीफ है तो डॉक्टर को पूछे बिना कोई भी योगासन ना करें|
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ध्यान के बाद योनी-मुद्रा आदि का अभ्यास करें| जब भी पर्याप्त समय मिले, लंबे समय तक ओंकार पर ध्यान करें और गुरुप्रदत्त मंत्र का यथासंभव अधिकाधिक जाप करें| ध्यान का समापन सर्वस्व के प्रति प्रार्थना कर के ही करें|
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रात्रि को सोने से पूर्व खूब खूब गहरा ध्यान कर के निश्चिन्त होकर जगन्माता की गोद में सो जाएँ| प्रातःकाल परमात्मा का चिंतन करते हुए ही उठें| दिन का प्रारम्भ परमात्मा के ध्यान से ही करें|
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पूरे दिन परमात्मा का अनुस्मरण करते रहें| कुसंग का सर्वदा त्याग, सत्संग और प्रेरणास्पद सद्साहित्य का स्वाध्याय करते रहें|
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अपने विचारों का ध्यान रखें| हम जो कुछ भी हैं वह अपने अतीत के विचारों से हैं| हम भविष्य में वही होंगे जैसे वर्तमान में हमारे विचार हैं|
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सभी को शुभ कामनाएँ | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||

अपने विवेक का सम्मान करें ............

अपने विवेक का सम्मान करें ............
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स्वविवेक के प्रकाश में सारे कार्य करें| जैसा आपका ईश्वरप्रदत्त विवेक कहे वैसा ही करें|
कहीं पर आप कुछ भी पढ़ें, या किसी से कुछ भी सुनें, उस पर तुरंत आँख मींच कर विश्वास ना करे| भगवान ने जो विवेक दिया उसको काम में लायें और सारे कार्य निज विवेक के प्रकाश में करें|
अपने विवेक का सम्मान करें|
ॐ ॐ ॐ ||

५० वर्ष पूर्व १९६५ में भारत पाक के मध्य हुआ दूसरा युद्ध -----

५० वर्ष पूर्व १९६५ में भारत पाक के मध्य हुआ दूसरा युद्ध -----
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(यह लेख मैंने २३ जून २०१५ को पोस्ट किया था, फिर उसी में थोड़ा सा संशोधन कर के दुबारा ९ जुलाई २०१५ को पोस्ट किया| आज 28 अगस्त २०१५ पूरे भारत में इस युद्ध की पचासवीं वर्षगाँठ मनाई जा रही है अतः इसे तीसरी बार पोस्ट कर रहा हूँ)
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भारत पाक के मध्य १९६५ के व १९७१ के युद्ध की मुझे बड़ी स्पष्ट स्मृतियाँ हैं| १९६२ में चीन से पराजित होने के कारण देश में निराशा व्याप्त थी पर १९६५ के इस युद्ध ने देश में व्याप्त उस निराशा को दूर कर दिया| उस समय देश में जो जोश जागृत हुआ उसकी अब सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है|
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सन १९६५ में देश में अनाज की बहुत कमी थी| राशन में अमेरिका से आयातित लाल रंग का गेंहूँ मिलता था जो अमेरिका में पशुओं को खिलाया जाता था| हम भारतीय लोग वह अनाज खाने को बाध्य थे| पाकिस्तान ने अमेरिका की सहायता से युद्ध की बहुत अच्छी तैयारियाँ कर रखी थीं| उसके पास अमेरिका से प्राप्त नवीनतम टैंक और युद्धक विमान थे| अन्य हथियार भी उसके पास श्रेष्ठतर थे|
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भारत-पाकिस्तान के मध्य अप्रैल १९६५ से सितम्बर १९६५ के बीच छोटी मोटी झड़पें कही न कहीं लगातार होती ही रहती थीं| युद्ध का आरम्भ पाकिस्तान ने ऑपरेशन जिब्राल्टर के नाम से अपने सैनिको को घुसपैठियो के रूप मे भेज कर इस अपेक्षा से किया कि कश्मीर की जनता भारत के विरुद्ध विद्रोह कर देगी| अगस्त १९६५ में ३०,००० पाकिस्तानी सैनिको ने कश्मीर की स्थानीय जनता की वेषभूषा मे नियंत्रण रेखा को पार कर भारतीय कश्मीर मे प्रवेश किया| १ सितम्बर १९६५ को पाकिस्तान ने ग्रैंड स्लैम नामक एक अभियान के तहत सामरिक दृष्टी से महत्वपूर्ण अखनूर, जम्मू नगर और कश्मीर को भारत से जोड़ने वाले महत्वपूर्ण भूभाग पर अधिकार के लिये आक्रमण कर दिया| इस अभियान का उद्देश्य कश्मीर घाटी का शेष भारत से संपर्क तोडना था ताकि भारत की रसद और संचार व्यवस्था भंग कर दी जाय|
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भारत में उस समय सेना के पास गोला बारूद की बहुत कमी थी| १९६२ की पराजय की पीड़ा से देश उबरा भी नहीं था| पाकिस्तान के इस आक्रमण के लिये भारत तैयार नहीं था| पाकिस्तान को भारी संख्या मे सैनिकों और श्रेष्ठतर श्रेणी के टैंको का लाभ मिल रहा था| आरम्भ में भारत को भारी क्षति उठानी पड़ी| युद्ध के इस चरण मे पाकिस्तान बहुत बेहतर स्थिति मे था और पूरी तरह लग रहा था कि कश्मीर पर उसका अधिकार हो जायेगा|
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पाकिस्तान को रोकने के लिये तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने लाहौर पर हमले का आदेश दिया| पाकिस्तान के लिए यह एक अप्रत्याशित प्रत्याक्रमण था| इससे कश्मीर पर पाकिस्तानी सेना का दबाव बहुत कम हो गया| पाकिस्तान ने भी लाहौर पर भारत का दबाव कम करने के लिये खेमकरण पर आक्रमण कर दिया|
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तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी की अपील पर देशवासियों ने सप्ताह में एक समय भोजन करना बंद कर दिया और भोजन भी कम मात्रा में खाना आरम्भ कर दिया ताकि देश में भुखमरी ना हो| शास्त्री जी ने -- "जय जवान जय किसान" का नारा दिया और किसानों से अधिक अन्न उगाने की अपील की|
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इस लड़ाई मे भारतीय सेना के लगभग ३००० और पाकिस्तानी सेना के ३८०० जवान मारे जा चुके थे| भारत ने युद्ध मे ७१० वर्ग किलोमीटर इलाके पर और पाकिस्तान ने २१० वर्ग किलोमीटर इलाके पर कब्जा कर लिया था। भारत के क्ब्जे मे सियालकोट, लाहौर और कश्मीर के उपजाऊ क्षेत्र थे, और पाकिस्तान के कब्जे मे सिंध और छंब के अनुपजाऊ इलाके थे|
इस युद्ध में आजादी के बाद पहली बार भारतीय वायु सेना (आईएएफ) एवं पाकिस्तान वायु सेना (पीएएफ) के विमानों ने एक दुसरे का मुकाबला किया| नौ सेना ने जब तक युद्ध आरम्भ करने की तैयारी की, युद्ध विराम हो गया और कोई नौसैनिक युद्ध नहीं हो पाया|
पश्चिमी राजस्थान के कुछ क्षेत्रों पर पाकिस्तान ने बहुत भयानक बमबारी की थी| उस समय की अनेक स्मृतियाँ स्थानीय लोगों को है|
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इस युद्ध का लाभ यह हुआ कि भारत का स्वाभिमान बढ़ा| वह निराशा दूर हुई जो १९६२ की पराजय के पश्चात हुई थी| हानि यह हुई कि हमें हमारे प्रिय प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी को खोना पडा| युद्ध में हम जीते तो अवश्य पर दुर्भाग्य से वार्ता की टेबल पर हार गए और जीते हुए क्षेत्र पाकिस्तान को बापस लौटाने पड़े| आज तक यह भी रहस्य बना हुआ है कि शास्त्री जी की ह्त्या हुई थी या स्वाभाविक मौत| किन परिस्थितियों में ताशकंद समझौता हुआ यह भी रहस्य अभी तक बना हुआ है|
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पाकिस्तान में युद्ध का उन्माद पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने फैलाया था| पाकिस्तान के तत्कालीन सैनिक तानाशाह अय्यूब खान यह युद्ध नहीं चाहते थे पर भुट्टो ने उनके दिमाग में यह बात बैठा दी थी कि भारत को पराजित करने का यही सही समय है| पाकिस्तान को बड़ी निराशा हुई जब उसकी अपेक्षानुसार कश्मीर की जनता ने पाकिस्तान के पक्ष में भारत के विरुद्ध कोई विद्रोह नहीं किया, और भारत के प्रधान मंत्री का राजनीतिक नेतृत्व भी बड़ा अच्छा व सफल रहा| भारत की सेना ने बड़ी वीरता से युद्ध लड़ा| अमेरिका का अप्रत्यक्ष और पूर्ण समर्थन पाकिस्तान को था| अमेरिका को पाकिस्तान की योजना व सैन्य तैयारियों का पूरा पता था पर अमेरिका ने यह युद्ध रुकवाने का कोई प्रयास नहीं किया|
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देशवासियों के शौर्य, बलिदान और त्याग को हमें नहीं भूलना चाहिए|
जय भारत ! वन्दे मातरम् |

कुछ ज्योतिर्मय इतना आलोक लेकर आते हैं ......

कुछ ज्योतिर्मय इतना आलोक लेकर आते हैं कि उनके जाने के बाद भी प्रकाश ही प्रकाश रह जाता है|
हम सब भी उसी ज्योति और प्रेम की अभिव्यक्ति हैं|
जीवन की सार्थकता इसी में हैं कि हम परमात्मा को पूर्णतः समर्पित होकर स्वयं ज्योतिर्मय बनें|
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हम प्रभु को समर्पित पुष्प बनें
जब उसकी उपस्थिति की रश्मियों से
भक्ति पल्लवित होगी
तब उसकी महक
हमारे ह्रदय से
सभी हृदयों में व्याप्त हो जाएगी
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ॐ ॐ ॐ || अयमात्मा ब्रह्म ||