Thursday, 18 August 2016

धर्मरक्षा हेतु निरंतर अनवरत प्रयास ही मेरी दृष्टी में आध्यात्म है .....

धर्मरक्षा हेतु निरंतर अनवरत प्रयास ही मेरी दृष्टी में आध्यात्म है .....
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मनुष्य का स्वभाविक धर्म है ..... परम तत्व की खोज और उससे एकात्मता; जिसमें निरंतर बाधाएं आती रहती हैं|
आध्यात्म कोई व्यक्तिगत मोक्ष, सांसारिक वैभव, इन्द्रीय सुख या अपने अहंकार की तृप्ति की कामना का प्रयास नहीं है| यह कोई दार्शनिक वाद विवाद या बौद्धिक उपलब्धी भी नहीं है|
उन बाधाओं को दूर करते हुए निरंतर स्वधर्म की रक्षा का प्रयास और परम तत्व से एकात्मता ही आध्यात्म है| इसके लिए सज्जनों की रक्षा और दुर्जनों का विनाश भी आवश्यक है|
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भगवन राम और श्रीकृष्ण का जीवन हमारे लिए आदर्श है| उन जैसे महापुरुषों के गुणों को स्वयं के जीवन में धारण करना, उन की शिक्षा और आचरण का पालन करना ही भगवान की सच्ची आराधना है| भगवान श्रीराम और श्री कृष्ण ने जन्म से ही धर्म रक्षार्थ, संस्थापनार्थ, व संवर्धन हेतु शौर्य संघर्ष व संगठन साधना का आदर्श रखा|
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स्वेच्छा से कारावास में जन्म लेकर प्रभु श्री कृष्ण ने जन्म से ही संघर्ष का मार्ग चुना| उनके स्वयं के परिवार के सदस्य परिजनों में जो विधर्मी तत्व थे जैसे कंस, पूतना का उन्होंने विनाश किया| अपने ग्राम वासियों की विधर्मी, आसुरिक तत्वों से रक्षा बाल्यकाल से ही की| धर्म सम्मत संघर्ष व शौर्य तत्व का सन्देश उन्होंने बाल्यकाल से ही दिया| स्वयं सर्वज्ञानी होते हुए भी उन्होंने संदीपनी मुनि जी के आश्रम में शिक्षा ग्रहण की और आलस्य से ऊपर उठकर सदा साधनारत रहने की शिक्षा दी| कुरुक्षेत्र के युद्ध में सदशक्तियों को संगठित कर विधर्मी तत्वों का विनाश किया|
भगवान श्री राम की ही भाँति इस युद्ध में भी उन्होंने शौर्य संघर्ष, सद शक्तियों से ही करवाया| स्वयं को उन्होंने मार्गदर्शक के रूप में रखा ताकि हिन्दू समाज हिंदुत्व हित संघर्ष करना सीखे, युद्ध करना सीखे व धर्म हित, हिंदुत्व हित तुच्छ भेदभावो से ऊपर उठकर संगठित होना सीखे|
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भगवन श्री कृष्ण ने गीता का ज्ञान अर्जुन को कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि में दिया, इस प्रसंग के आध्यात्मिक सन्देश को समझें कि रणभूमि में उतरे बिना यानि साधना भूमि में उतरे बिना आप आध्यात्म को, स्वयं के ईश्वर तत्व को उसके यथार्थ स्वरुप में अनुभूत नहीं कर सकते|
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धर्म हित यानि हिंदुत्व हित के लिए स्वयं को समर्पित कर देना ही आध्यात्म की पराकाष्ठा है| यह अनुभूत कर कि भविष्य में उनके वंश के लोग विधर्मी प्रवृत्ति के हो जायेंगे उन्होंने लीला रची तथा गांधारी के श्रापवश स्वयं का व स्वयं के वंश का हिंदुत्व हित बलिदान दिया|
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भगवान् राम ने भी धर्मरक्षार्थ यानि हिंदुत्वरक्षार्थ अपने राज्य के वैभव का त्याग किया और भारत में पैदल भ्रमण कर अत्यंन्त पिछड़ी और उपेक्षित जातियों को जिन्हें लोग तिरस्कार पूर्वक वानर और रीछ तक कह कर पुकारते थे, संगठित कर धर्मविरोधियों का संहार किया| लंका का राज्य स्वयं ना लेकर विभीषण को ही दिया| ऋषि मुनियों की रक्षार्थ ताड़का का वध भी किया| वे हजारों वर्षों से हमारे प्रातःस्मरणीय आराध्य हैं|
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स्वयं के भीतर के राम और कृष्ण तत्व से एकात्म ही आध्यात्म है और यही सच्ची साधना है| यही शिवत्व की प्राप्ति है|
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ॐ ॐ ॐ ||

जब भी परमात्मा के प्रति प्रेम की अनुभूति होती है, वह सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त है .....

जब भी परमात्मा के प्रति प्रेम की अनुभूति होती है, वह सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त है .....
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आध्यात्म में आधे-अधूरे समर्पण से काम नहीं चलता| पूरी डुबकी ही लगानी पडती है| परमात्मा के बारे में हम उतना ही जान सकते हैं जितना हमारा मन कल्पना कर सकता है और बुद्धि सोच सकती है, पर हमारा मन और हमारी बुद्धि दोनों ही अति अति अति अल्प और सीमित है| उससे हम असीम अनंत को नहीं समझ सकते| यहाँ श्रुति भगवती को और महापुरुषों के वचनों को ही प्रमाण मानना पड़ता है|
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जब भी परमात्मा की याद आये वह क्षण ही सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त है| जिस समय दोनों नासिकाओं से साँस चल रही हो वह ध्यान करने का सर्वश्रेष्ठ समय है| मेरा तो अनुभव यही है कि लम्बे समय तक यानि कम से कम तीन-चार घंटों तक लगातार ध्यान करने से जो दिव्य प्रेम और आनंद की अनुभूतियाँ होती हैं, वे ही परमात्मा की अनुभूतियाँ हैं| एक साधक को यदि हो सके तो प्रतिदिन कुल कम से कम चार घंटों तक ध्यान करना चाहिए और सप्ताह में एक दिन तो कम से कम छः से आठ घंटों तक ध्यान करना चाहिए|
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जब दोनों नासिकाओं से साँस चल रही हों, वह ध्यान का सर्वश्रेष्ठ समय होता है| यदि नासिकाओं के साथ कोई समस्या है तो नाड़ीशोधन के हठयोग में नेति आदि के कई प्रयोग हैं जो किसी हठयोग शिक्षक से सीख सकते हैं| ध्यान से पूर्व यथासंभव सूर्य-नमस्कार जैसे कुछ हलके व्यायाम और महामुद्रा (पश्चिमोत्तान पर आधारित) आदि का अभ्यास और अनुलोम-विलोम आदि करना चाहिए| एक ही आसन में बैठे बैठे पैर दुखने लगें तब फिर महामुद्रा का अभ्यास करना चाहिए| योनिमुद्रा और खेचरी का भी शनेः शनेः अभ्यास करते रहना चाहिए|
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जब भी हो सके तो संधिक्षणों में कुछ देर परमात्मा का चिंतन मनन, स्मरण या कुछ साधना अवश्य करनी चाहिए| संधिक्षणों में की गयी साधना को संध्या कहते हैं|

आप सब में हृदयस्थ परमात्मा को नमन |
ॐ तत्सत् | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||

मेरी आस्था अब सिर्फ भगवान् और उनके भक्तों पर ही है ......

मैं अपने अनुभवों से जीवन के जिस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ उससे -------
(1) सभी राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं पर से मेरी आस्था उठ चुकी है| आजकल जिस तरह के उनके संचालक हैं उनके मनोभाव और विचार मुझे स्वतः ही उनसे दूर कर देते हैं|
(2) समाज के अधिकाँश लोगों पर से भी मेरी आस्था हट चुकी है और उनसे मोहभंग हो गया है| कोई क्या कह रहा है इससे कुछ असर नहीं पड़ता, पर उनके विचारों का प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता|
(3) सिर्फ आध्यात्म जगत के लोग ही मुझे आकर्षित करते हैं जिनके ह्रदय में प्रभु के प्रति कूट कूट कर प्रेम भरा पड़ा है| उनके ह्रदय में परमात्मा है इसलिए वे मुझे प्रिय हैं|
(4) मेरी आस्था अब सिर्फ भगवान् और उनके भक्तों पर ही है| भक्त का अर्थ है अहैतुकी परम प्रेमी|
भगवान ही अब धर्म की पुनर्स्थापना करेंगे| भारत में अनेक महापुरुषों ने जन्म लिया है और अनेक और जन्मेंगे जो भारत को परम वैभव पर पहुँचाएँगे|
(5) शीघ्र ही भारत में राष्ट्रवाद का विस्तार होगा| अनेक क्रन्तिकारी घटनाएँ घटेंगी| अज्ञान और अन्धकार की शक्तियों और दुष्टों का विनाश होगा| भारत माँ अपने द्विगुणित परम वैभव के साथ अखंडता के सिंहासन पर विराजमान होंगी|
(6) मैं अधिकांशतः उपलब्ध नहीं रहूँगा| अपना अधिकतम समय देने के लिए और भी कार्य हैं|
सभी का आभार और धन्यवाद ! सभी को प्रणाम !
ॐ शिव| ॐ ॐ ॐ ||

गुरु कभी साथ नहीं छोड़ते .......

जब आप जीवन में विपरीततम परिस्थितियों से घिर जाओ, कहीं आशा की किरण दिखाई न दे, चारों ओर अंधकार ही अंधकार हो तब आपके गुरु या इष्ट देव ही हैं जो आप का साथ नहीं छोड़ते| बाकि सारी दुनिया आपका साथ छोड़ दे पर गुरु और इष्ट देव कभी आप का साथ नहीं छोड़ सकते| आप ही उन्हें भुला सकते हो पर वे नहीं|
उनसे मित्रता बनाकर रखो| वे इस जन्म से पूर्व भी आपके साथ थे और इसके बाद भी आपके साथ रहेंगे| उनका साथ शाश्वत है| उनकी सत्ता सूक्ष्म जगत में भी है और वे आपके आगे के भी सभी जन्मों में आपके साथ रहेंगे| यह आप के ऊपर है की आप उन्हें अनुभूत कर पाओ या नहीं|
अपनी सारी पीडाएं, सारे दु:ख, सारे कष्ट उन्हें सौंप दो| वे ही हैं जो आपके माध्यम से दुखी हैं| वे ही कष्ट बन कर आये हैं, और वे ही समाधान बन कर आयेंगे|
उन्हें मत भूलो, वे भी आपको नहीं भूलेंगे| निरंतर उनका स्मरण करो| जब भूल जाओ तब याद आते ही फिर उन्हें स्मरण करना आरम्भ कर दो| आपके सुख दुःख सभी में वे आपके साथ रहेंगे|
अपने ह्रदय का समस्त प्रेम उन्हें बिना किसी शर्त के दो| यह उन्हीं का प्रेम था जो आप को माँ बाप के माध्यम से मिला| यह उन्हीं का प्रेम था जो आपको भाई, बहिनों, सगे सम्बन्धियों और मित्रों व अपरिचितों के माध्यम से मिला| उन्ही के प्रेम से आपको वह शक्ति मिली जिससे आप वर्त्तमान में जो कुछ भी हैं|
वह कौन है जो आपके ह्रदय में धड़क रहा है? वह कौन है जो आपकी देह में सांस ले रहा है? वह कौन है जो आपकी आँखों से देख रहा है? वह कौन है जिससे आपके देह की समस्त क्रियाएँ संपन्न हो रही है? वह कौन है जिसने आपको सोचने समझने की शक्ति दी है? यह वह आपका मित्र ही है जिसने स्वयम को छिपा रखा है पर हर समय आपके साथ है| हमेशा उसे सचेतन अपने साथ रखो|
ॐ तत्सत्|

श्रावणी पूर्णिमा यानि रक्षा बंधन पर्व की सभी को शुभ कामनाएँ .......

श्रावणी पूर्णिमा यानि रक्षा बंधन पर्व की सभी को शुभ कामनाएँ .......
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रक्षा बंधन पर बहुत सारे लेख और साहित्य उपलब्ध है, अतः उस पर और अधिक नहीं लिखना चाहता| पर कुछ विस्मृत होती जा रही बातों को अपनी सीमित बुद्धि से आवश्यक समझ कर लिख रहा हूँ| कोई अशुद्धि होगी तो उसमें सुधार करूँगा|
(1) यह ब्राह्मणों का सबसे बड़ा पर्व है ....
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ब्राह्मण लोग इस दिन श्रावणी कर्म करते हैं| ब्राह्मणों के लिए यह श्रावणी कर्म अनिवार्य है| इस कर्म में अभिमंत्रित करके पूजे हुए पूजे गए यज्ञोपवीत (जनेऊ) ही ब्राह्मण पहिनते हैं, अन्य नहीं| बिना अभिमंत्रित किये हुए जनेऊ पहिनने का निषेध है|
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जनेऊ यानि यज्ञोपवीत कोई धागा मात्र नहीं होता| इसमें ओंकार रूप में परमात्मा और अग्नि आदि विभिन्न देवताओं का आह्वान किया जाता है| ब्राह्मण लोग प्रति वर्ष रक्षाबंधन के दिन श्रावणी कर्म में वर्ष भर के लिए जनेऊ अभिमंत्रित कर लेते हैं| ब्राह्मण लोग इस दिन आत्मशुद्धि के लिए अभिषेक और हवन करते हैं|
वैदिक काल से ही ब्राह्मण लोग पवित्र नदियों या तालाबों के तट पर आत्मशुद्धि का यह कर्म मनाते आये हैं| इस कर्म में आंतरिक व बाह्य शुद्धि गोबर, मिट्टी, भस्म, अपामार्ग, दूर्वा, कुशा एवं मंत्रों द्वारा की जाती है| पंचगव्य महाऔषधि है| श्रावणी कर्म में दूध, दही, घृत, गोबर, गोमूत्र प्राशन कर अंतःकरण को शुद्ध किया जाता है| यह कर्म ब्राह्मण के शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि करता है|
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विधिवत यज्ञोपवीत धारण करने के पश्चात ही कोई द्विज बनता है| द्विज को ही वेदपाठ करने का अधिकार है| गायत्री मन्त्र का जाप करने का अधिकार भी उसी को है जो विधिवत रूप से यज्ञोपवीत धारण कर के द्विज बना है| अन्यों को गायत्री मन्त्र के जप का अधिकार नहीं है| द्विज (यानि जिसने विधिवत यज्ञोपवीत धारण कर रखा है) की पत्नी भी गायत्री मन्त्र के जाप की अधिकारिणी है, अन्य स्त्रियाँ नहीं|
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श्रावण की पूर्णिमा को ब्राह्मण लोग श्रावणी कर्म क्यों करते हैं इसका कारण निम्न है.....
एक कल्पांत में वेदों का ज्ञान लुप्त हो गया था| मधु और कैटभ नाम के राक्षसों ने ब्रह्मा जी से भी वेदों को छीन लिया और रसातल में छिप गए| ब्रह्मा जी ने वेदोद्धार के लिए भगवान विष्णु की स्तुति की| स्तुति सुन कर भगवान विष्णु ने हयग्रीव के रूप में अवतार लिया और श्रावण की पूर्णिमा के ही दिन ब्रह्माजी को वेदों का ज्ञान दिया| हयग्रीव विद्या और बुद्धि के देवता हैं| तभी से वेदपाठी विप्र श्रावणी पूर्णिमा के ही दिन यह उपाकर्म करते हैं|
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(2) संघ के प्रमुख उत्सवों में से यह एक उत्सव है ......
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इस दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक भगवा ध्वज को रक्षा बंधन (राखी) बाँध कर राष्ट्र रक्षा का संकल्प लेते हैं|
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(3) ऐतिहासिक व सामाजिक रूप से राखी का त्योहार .....
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पुराणों में बर्णन मिलता है कि देव और दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ तब दानव हावी होते नज़र आने लगे| देवराज इन्द्र घबरा कर बृहस्पति के पास गये| वहाँ बैठी इन्द्र की पत्नी इंद्राणी सब सुन रही थी| उसने रेशम का धागा मन्त्रों की शक्ति से अभिमंत्रित करके अपने पति के हाथ पर बाँध दिया| वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था| इन्द्र उस लड़ाई में इसी धागे की मन्त्र शक्ति से ही विजयी हुए| उसी दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन यह धागा बाँधने की प्रथा चली आ रही है|
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दानवेन्द्र राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयत्न किया तो इन्द्र आदि देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की| भगवान विष्णु वामन अवतार लेकर ब्राह्मण का वेष धारण कर राजा बलि से भिक्षा माँगने पहुँचे| गुरु के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी| भगवान ने तीन पग में सारा आकाश पाताल और धरती नापकर राजा बलि को रसातल में भेज दिया|
बलि ने अपनी भक्ति के बल से भगवान को रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया| भगवान के घर न लौटने से परेशान लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय बताया| लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उसे रक्षाबन्धन यानि राखी बाँध कर अपना भाई बनाया और उससे दक्षिणा के रूप में अपने पति को माँग कर अपने साथ ले आयीं| उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी|
इसीलिए कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधते हुए निम्न मंत्र का उच्चारण करते हैं .....
"येन बद्धो बली राजा, दानवेन्द्रो महाबल: | तेन त्वां प्रति बच्नामी, रक्षे मा चल मा चलः ||" अर्थात् रक्षा के जिस साधन (राखी) से अतिबली राक्षसराज बली को बाँधा गया था, उसी से मैं तुम्हें बाँधता हूँ | हे रक्षासूत्र ! तू भी अपने कर्त्तव्यपथ से न डिगना अर्थात् इसकी सब प्रकार से रक्षा करना|
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भारतवर्ष पर जब अरबों और मध्य एशिया से आये अति क्रूर मुसलमानों के आक्रमण आरम्भ हुए तब आक्रमणकारी अपने साथ महिलाओं को तो लाये नहीं थे| वे हिन्दुओं की ह्त्या कर उनकी महिलाओं को छीन ले जाते थे| तब से हिन्दू बहिनें अपने भाइयों को राखी बाँधकर उनसे अपनी रक्षा का वचन लेने लगीं|
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(4) रक्षा सूत्र बनाने की विधि .....
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पुराने ज़माने में राखी इन पाँच चीजों से बनती थी ......
(१) दूर्वा (घास) (२) अक्षत (चावल) (३) केसर (४) चन्दन (५) सरसों के दाने|
इन ५ वस्तुओं को रेशम के कपड़े में बांधकर कलावा बना देते थे|
इसके पीछे यह प्रतीकात्मक भावना थी .....
(१) दूर्वा ....दुर्वा गणेश जी को प्रिय है| मेरे भाई या जिसके भी हम राखी बाँध रहे हैं, उसके जीवन से भी विघ्नों का नाश हो और उसका वंश तेजी से बढे|
(२) अक्षत .... धर्म के प्रति उसकी श्रद्धा कभी क्षत ना हो|
(३) केसर .... वह तेजस्वी बनो|
(४) चन्दन .... उसके जीवन में शीतलता बनी रहे| उसके गुणों की सुगंध सर्वत्र फैले|
(५) सरसों के दाने .... वह शत्रुओं के प्रति तीक्ष्ण बने|
इस प्रकार इन पांच वस्तुओं से बनी हुई एक राखी को संकल्प कर के बांधते थे|
महाभारत में यह रक्षा सूत्र माता कुंती ने अपने पोते अभिमन्यु को बाँधा था| जब तक यह धागा अभिमन्यु के हाथ में था तब तक उसकी रक्षा हुई, धागा टूटने पर अभिमन्यु की मृत्यु हुई|
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अब तो यह भाई-बहिन के प्रेम के प्रतीक का त्यौहार बन गया है|
मैं समस्त मातृशक्ति और विप्रगण को इस पावन पर्व की बधाई और शुभ कामना प्रेषित करता हूँ| भगवान आप सब की और सत्य सनातन धर्म की रक्षा करें|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

विश्व के विनाश की औत विश्वयुद्ध की सब भविष्यवाणियाँ झूठी हैं .....

सन १९७६ ई.से मुझे एक शौक सा जागृत हुआ जिसे मैं शौक नहीं एक अति तीब्र जिज्ञासा का जन्म कहूंगा, मैंने हर प्रकार की रहस्यमय साधनाओं, दर्शन, सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक विचारधाराओं, इतिहास, भूगोल व आध्यात्म की आसानी से उपलब्ध उन सभी पुस्तकों को ढूँढ ढूँढ कर पढ़ना आरम्भ कर दिया जिनको समझना मेरी अल्प बुद्धि की सीमा में था|
जब और भी अधिक समय मिलता तब मैं विभिन्न महत्वपूर्ण लोगों से मिलने जुलने और उनके विचारों को जानने का प्रयास करता| विश्व के अनेक देशों में जाने के बहुत अवसर मिले जिनका मैनें पूरा लाभ उठाया और अति प्रबल बौद्धिक जिज्ञासा को यथासंभव शांत किया| प्रकृति का सौम्यतम और विकरालतम रूप भी देखा| पूरे विश्व का भूगोल मस्तिष्क में समा गया कि विश्व के किस भाग में कैसा जीवन और कैसी परिस्थितियाँ है आदि आदि|
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देश-विदेश के लोगों की अनेक भविष्यवाणियाँ पढ़ीं और उनसे उस समय प्रभावित भी हुआ| पर वे सारी भविष्यवाणियाँ झूठी सिद्ध हुईं| आज तक मैंने जितनी भी भविष्यवाणियाँ पढ़ीं हैं वे सब झूठी थीं| अनेक लोगों को मैंने फर्जी पाया जिनको मैं गहराई वाला समझता था| आजकल एक रूझान सा चल रहा है विश्व युद्ध और विश्व के विनाश के बारे में लिखने का| अब में पिछले एक-दो वर्षों की घटनाओं का विश्लेषण कर के कह सकता हूँ कि ऐसा कुछ नहीं होगा| न तो कोई विश्व युद्ध होने वाला है और न कोई महाविनाश| ऐसी परिस्थितयाँ वर्त्तमान में अनेक बार उत्पन्न हुईं हैं पर मनुष्य अभी इतना विवेकशील हो गया है कि कैसी भी विकट परिस्थिति हो उसका समाधान निकाल लेता है| आगे मनुष्य के विवेक का और भी अधिक विकास होगा|
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अतः कुछ नहीं होने वाला है| जब तक जीवित हो तब तक प्रसन्न रहो| जब मृत्यु आ जायेगी तब वह अपना काम करेगी, उसके बारे में सोच कर क्यों दुखी होना? आध्यात्म में कुछ पूर्व जन्मों के संस्कार ही थे जिनसे वेदान्त दर्शन और भक्ति का उदय हुआ जिसे मैं अपने जीवन की एकमात्र उपलब्धी मानता हूँ| जिसे हम बाहर ढूंढते हैं वह तो हम स्वयं ही हैं| आगे आने वाला समय अच्छा ही अच्छा होगा| जीवन का एक अंधकारमय कालखंड भी था जिसमें मैं मार्क्सवादी हो गया था| पर उस अन्धकार से शीघ्र ही बाहर निकल आया| अब तो मैं सभी से परमात्मा की भक्ति और ध्यान साधना की बातें ही करता हूँ|
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आप सब में भी मुझे प्रभु के ही दर्शन होते हैं| आप सब मेरे ही निजात्मगण हैं| आप सब को नमन ! जन्माष्टमी आने वाली है| अभी से तैयारियाँ आरम्भ कर दीजिये अपनी भक्ति यानि परम प्रेम को व्यक्त करने के लिए|
तत्व रूप में शिव, विष्णु और शक्ति एक ही हैं| महत्व सिर्फ प्रेम और समर्पण का है|
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

Monday, 15 August 2016

शरणागति की महिमा .....

शरणागति की महिमा ........
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यह सृष्टि त्रिगुणात्मक है| पूरी प्रकृति और समस्त जीवों की सृष्टि और चेतना ..... सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण ..... इन तीन गुणों से निर्मित है| जिस भी प्राणी में जो गुण अधिक होता है उसकी सोच और चिंतन वैसा ही होता है|
मैंने जीवन में देखा और अनुभूत किया है कि गीता का अध्ययन करने वाले सतोगुण प्रधान व्यक्ति को ज्ञानयोग या भक्तियोग ही अच्छा लगता है, रजोगुण प्रधान व्यक्ति को कर्मयोग अच्छा लगता है, और तमोगुण प्रधान व्यक्ति को मरने मारने के अलावा और कुछ समझ में नहीं आता|
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भगवन श्रीकृष्ण अपने भक्त को गीता के दुसरे अध्याय के ४५ वें श्लोक में निस्त्रेगुण्य यानि त्रिगुणातीत बनने, तीनों गुणों से परे जाने का आदेश देते हैं ....
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन |
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान ||"
समस्त दुःखों और क्लेशों का कारण ही कर्मबंधन है| जब तक मनुष्य इन तीनों गुणों से बंधा हुआ है वह कभी मुक्त नहीं हो सकता|
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त्रिगुणातीत कैसे हों, इसका उत्तर मेरी सीमित और अल्प बुद्धि से मात्र "शरणागति" है जिसका वर्णन भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के अठारहवें अध्याय के ६६वें श्लोक में किया है| भगवान की शरण लेकर ही हम तीनों गुणों से परे जाकर कर्मफलों से मुक्त हो सकते हैं| यही आध्यात्मिक जीवनमुक्ति है|
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ||
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इस श्लोक में भगवान् ने सम्पूर्ण धर्मों का त्याग करके अपनी शरण में आने की आज्ञा दी है, जिसे अर्जुन ने ‘करिष्ये वचनं तव’ कहकर स्वीकार किया और अपने क्षात्र-धर्म के अनुसार युद्ध भी किया है|
जब अर्जुन ‘शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्’ (गीता २/७) कहकर भगवान की शरण हुए तो उस शरणागति में कुछ ना कुछ कमी रही ही होगी जिसकी पूर्ति अठारहवें अध्याय के ६६वें श्लोक में हुई|
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भगवान् कहते हैं कि सम्पूर्ण धर्मों का आश्रय, धर्म के निर्णय का विचार छोड़कर अर्थात् क्या करना है और क्या नहीं करना है—इसको छोड़कर केवल एक मेरी ही शरण में आ जा|
स्वयं भगवान् के शरणागत हो जाना—यह सम्पूर्ण साधनों का सार और भक्ति की पराकाष्ठा है| इसमें शरणागत भक्त को अपने लिये कुछ भी करना शेष नहीं रहता; जैसे पतिव्रता स्त्री का अपना कोई काम नहीं रहता। वह अपने शरीर की सार-सँभाल भी पति के लिये ही करती है। वह घर, कुटुम्ब, वस्तु, पुत्र-पुत्री और अपने कहलाने वाले शरीर को भी अपना नहीं मानती, प्रत्युत पतिदेव का मानती है, उसी प्रकार शरणागत भक्त भी अपने मन,बुद्धि और देह आदि को भगवान् के चरणों में समर्पित करके निश्चिन्त, निर्भय, निःशोक और निःशंक हो जाता है।
जब हमें उनके श्री चरणों में आश्रय मिल जाए तो फिर और चाहिए भी क्या?
देवाधिदेव भगवान शिव भी झोली फैलाकर नारायण से माँग रहे हैं कि हे मेरे श्रीरंग अर्थात् श्री के साथ रमण करने वाले मुझे यह भिक्षा दो कि आपके चरणों की शरणागति कभी न छूटे|
"बार बार बर माँगऊ हरषिदेइ श्रीरंग |
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सत्संग ||"
अनपायनी शब्द का अर्थ है- शरणागति !
ऐसी ही शरणागति की महिमा | हम अधिक से अधिक भगवान का ध्यान करें और उनके श्रीचरणों में समर्पित होकर शरणागत हों|
भगवान श्रीकृष्ण हमारे चैतन्य में निरंतर अवतरित हों, एक क्षण के लिए भी उनकी विस्मृति ना हो| उनसे पृथक हमारा कोई अस्तित्व ना रहे|
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हे प्रभो ! आपकी सृष्टि में कोई दुःख, भय और ताप ना हो, धर्म की पुनर्स्थापना हो और सब प्राणी सुखी हों|
"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने | प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः ||"
सभी को शुभ कामनाएँ और सादर सप्रेम अभिनन्दन !
ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर