Saturday, 9 July 2016

जिसने भारतभूमि में जन्म लेकर भी सत्संग नहीं किया, भगवान से प्रेम नहीं किया और परोपकार नहीं किया, वह वास्तव में अभागा है|

जिसने भारतभूमि में जन्म लेकर भी सत्संग नहीं किया, भगवान से प्रेम नहीं किया और परोपकार नहीं किया, वह वास्तव में अभागा है|
>
विश्व में भारत जी एकमात्र ऐसा देश है जहाँ अहैतुकी परम प्रेम और पराभक्ति की अवधारणा है|
भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ समष्टि के कल्याण की कामना की जाती है|
भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ गुरु-शिष्य की परपरा है|
>
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

परमात्मा के मार्ग पर चलने वाले पथिको के लिए .....

परमात्मा के मार्ग पर चलने वाले पथिको के लिए .....
>
भगवान को समर्पित होने पर सबसे पहिले तो हम जाति विहीन हो जाते हैं, फिर वर्ण विहीन हो जाते हैं, घर से भी बेघर हो जाते हैं, देह की चेतना भी छुट जाती है और मोक्ष की कामना भी नष्ट हो जाती है|
>
विवाह के बाद कन्या अपनी जाति, गौत्र और वर्ण सब अपने पति की जाति, गौत्र और वर्ण में मिला देती है| पति की इच्छा ही उसकी इच्छा हो जाती है| वैसे ही परमात्मा को समर्पित होने पर अपना कहने को कुछ भी नहीं बचता, सब कुछ उसी का हो जाता है| 'मैं' और 'मेरापन' भी समाप्त हो जाता है| सब कुछ 'वह' ही हो जाता है|
>
भगवान् की जाति क्या है ?
भगवान् का वर्ण क्या है ?
भगवान् का घर कहाँ है ?
मैं कौन हैं ?
>
इन सब प्रश्नों के उत्तर जिज्ञासु लोग सोचें| मेरे लिए तो ये सब महत्वहीन हैं| पर एक बात तो है कि जो कुछ भी परमात्मा का है ---- सर्वज्ञता, सर्वव्यापकता, सर्वशक्तिमता आदि आदि आदि उन सब पर हमारा भी जन्मसिद्ध अधिकार है| हम उनसे पृथक नहीं हैं|
जो भगवान की जाति है वह ही हमारी जाति है|
जो उनका घर है वह ही हमारा घर है|
जो उनकी इच्छा है वह ही हमारी इच्छा है|
>
Thou and I art one.
Reveal Thyself unto me.
Make me one with Thee.
Make me a perfect child of Thee.
तुम महासागर हो तो मैं जल की एक बूँद हूँ जो तुम्हारे में मिलकर महासागर ही बन जाती है|
तुम एक प्रवाह हो तो मैं एक कण हूँ जो तुम्हारे में मिलकर विराट प्रवाह बन जाता है|
तुम अनंतता हो तो मैं भी अनंत हूँ|
तुम सर्वव्यापी हो तो मैं भी सदा तुम्हारे साथ हूँ|
जो तुम हो वह ही मैं हूँ| मेरा कोई पृथक अस्तित्व नहीं है|
जब मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता तो तुम भी मेरे बिना नहीं रह सकते|
जितना प्रेम मेरे ह्रदय में तुम्हारे प्रति है, उससे अनंत गुणा प्रेम तो तुम मुझे करते हो|
तुमने मुझे प्रेममय बना दिया है|
जहाँ तुम हो वहीँ मैं हूँ, जहाँ मैं हूँ वहीँ तुम हो|
मैं तुम्हारा अमृतपुत्र हूँ, तुम और मैं एक हैं|
ॐ शिवोहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि | ॐ ॐ ॐ ||
>
ॐ शिव | ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
>
(पुनश्चः :- यह ध्यान की एक अनुभूति है जो प्रायः सभी साधकों को होती है)

१९६५ में भारत पाक के मध्य हुआ दूसरा युद्ध -----

५० वर्ष पूर्व १९६५ में भारत पाक के मध्य हुआ दूसरा युद्ध -----
...................................................................................
(यह लेख मैंने २३ जून को लिखा था, उसी में थोड़ा सा संशोधन कर के दुबारा प्रस्तुत कर रहा हूँ)
>
भारत पाक के मध्य १९६५ के व १९७१ के युद्ध की मुझे बड़ी स्पष्ट स्मृतियाँ हैं| १९६२ में चीन से पराजित होने के कारण देश में निराशा व्याप्त थी पर १९६५ के इस युद्ध ने देश में व्याप्त उस निराशा को दूर कर दिया| उस समय देश में जो जोश जागृत हुआ उसकी अब सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है|
>
सन १९६५ में देश में अनाज की बहुत कमी थी| राशन में अमेरिका से आयातित लाल रंग का गेंहूँ मिलता था जो अमेरिका में पशुओं को खिलाया जाता था| हम भारतीय लोग वह अनाज खाने को बाध्य थे| पाकिस्तान ने अमेरिका की सहायता से युद्ध की बहुत अच्छी तैयारियाँ कर रखी थीं| उसके पास अमेरिका से प्राप्त नवीनतम टैंक और युद्धक विमान थे| अन्य हथियार भी उसके पास श्रेष्ठतर थे|
>
भारत-पाकिस्तान के मध्य अप्रैल १९६५ से सितम्बर १९६५ के बीच छोटी मोटी झड़पें कही न कहीं लगातार होती ही रहती थीं| युद्ध का आरम्भ पाकिस्तान ने ऑपरेशन जिब्राल्टर के नाम से अपने सैनिको को घुसपैठियो के रूप मे भेज कर इस अपेक्षा से किया कि कश्मीर की जनता भारत के विरुद्ध विद्रोह कर देगी| अगस्त १९६५ में ३०,००० पाकिस्तानी सैनिको ने कश्मीर की स्थानीय जनता की वेषभूषा मे नियंत्रण रेखा को पार कर भारतीय कश्मीर मे प्रवेश किया| १ सितम्बर १९६५ को पाकिस्तान ने ग्रैंड स्लैम नामक एक अभियान के तहत सामरिक दृष्टी से महत्वपूर्ण अखनूर, जम्मू नगर और कश्मीर को भारत से जोड़ने वाले महत्वपूर्ण भूभाग पर अधिकार के लिये आक्रमण कर दिया| इस अभियान का उद्देश्य कश्मीर घाटी का शेष भारत से संपर्क तोडना था ताकि भारत की रसद और संचार व्यवस्था भंग कर दी जाय|
>
भारत में उस समय सेना के पास गोला बारूद की बहुत कमी थी| १९६२ की पराजय की पीड़ा से देश उबरा भी नहीं था| पाकिस्तान के इस आक्रमण के लिये भारत तैयार नहीं था| पाकिस्तान को भारी संख्या मे सैनिकों और श्रेष्ठतर श्रेणी के टैंको का लाभ मिल रहा था| आरम्भ में भारत को भारी क्षति उठानी पड़ी| युद्ध के इस चरण मे पाकिस्तान बहुत बेहतर स्थिति मे था और पूरी तरह लग रहा था कि कश्मीर पर उसका अधिकार हो जायेगा|
>
पाकिस्तान को रोकने के लिये तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने लाहौर पर हमले का आदेश दिया| पाकिस्तान के लिए यह एक अप्रत्याशित प्रत्याक्रमण था| इससे कश्मीर पर पाकिस्तानी सेना का दबाव बहुत कम हो गया| पाकिस्तान ने भी लाहौर पर भारत का दबाव कम करने के लिये खेमकरण पर आक्रमण कर दिया|
>
तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी की अपील पर देशवासियों ने सप्ताह में एक समय भोजन करना बंद कर दिया और भोजन भी कम मात्रा में खाना आरम्भ कर दिया ताकि देश में भुखमरी ना हो| शास्त्री जी ने -- "जय जवान जय किसान" का नारा दिया और किसानों से अधिक अन्न उगाने की अपील की|
>
इस लड़ाई मे भारतीय सेना के लगभग ३००० और पाकिस्तानी सेना के ३८०० जवान मारे जा चुके थे| भारत ने युद्ध मे ७१० वर्ग किलोमीटर इलाके पर और पाकिस्तान ने २१० वर्ग किलोमीटर इलाके पर कब्जा कर लिया था। भारत के क्ब्जे मे सियालकोट, लाहौर और कश्मीर के उपजाऊ क्षेत्र थे, और पाकिस्तान के कब्जे मे सिंध और छंब के अनुपजाऊ इलाके थे|
इस युद्ध में आजादी के बाद पहली बार भारतीय वायु सेना (आईएएफ) एवं पाकिस्तान वायु सेना (पीएएफ) के विमानों ने एक दुसरे का मुकाबला किया| नौ सेना ने जब तक युद्ध आरम्भ करने की तैयारी की, युद्ध विराम हो गया और कोई नौसैनिक युद्ध नहीं हो पाया|
पश्चिमी राजस्थान के कुछ क्षेत्रों पर पाकिस्तान ने बहुत भयानक बमबारी की थी| उस समय की अनेक स्मृतियाँ स्थानीय लोगों को है|
>
इस युद्ध का लाभ यह हुआ कि भारत का स्वाभिमान बढ़ा| वह निराशा दूर हुई जो १९६२ की पराजय के पश्चात हुई थी| हानि यह हुई कि हमें हमारे प्रिय प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी को खोना पडा| युद्ध में हम जीते तो अवश्य पर दुर्भाग्य से वार्ता की टेबल पर हार गए और जीते हुए क्षेत्र पाकिस्तान को बापस लौटाने पड़े| आज तक यह भी रहस्य बना हुआ है कि शास्त्री जी की ह्त्या हुई थी या स्वाभाविक मौत| किन परिस्थितियों में ताशकंद समझौता हुआ यह भी रहस्य अभी तक बना हुआ है|
>
पाकिस्तान में युद्ध का उन्माद पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने फैलाया था| पाकिस्तान के तत्कालीन सैनिक तानाशाह अय्यूब खान यह युद्ध नहीं चाहते थे पर भुट्टो ने उनके दिमाग में यह बात बैठा दी थी कि भारत को पराजित करने का यही सही समय है| पाकिस्तान को बड़ी निराशा हुई जब उसकी अपेक्षानुसार कश्मीर की जनता ने पाकिस्तान के पक्ष में भारत के विरुद्ध कोई विद्रोह नहीं किया, और भारत के प्रधान मंत्री का राजनीतिक नेतृत्व भी बड़ा अच्छा व सफल रहा| भारत की सेना ने बड़ी वीरता से युद्ध लड़ा| अमेरिका का अप्रत्यक्ष और पूर्ण समर्थन पाकिस्तान को था| अमेरिका को पाकिस्तान की योजना व सैन्य तैयारियों का पूरा पता था पर अमेरिका ने यह युद्ध रुकवाने का कोई प्रयास नहीं किया|
>
देशवासियों के शौर्य, बलिदान और त्याग को हमें नहीं भूलना चाहिए|
जय भारत ! वन्दे मातरम् |

गुरु तत्व रूप में सर्वत्र व्याप्त है ....

गुरु तत्व रूप में सर्वत्र व्याप्त है ....
.
जो नियमित ध्यान साधना करते हैं वे ही इसे ठीक से समझ सकते हैं|
तत्व रूप में गुरु रूप ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त हैं| उनकी सर्वव्यापक आभा सम्पूर्ण समष्टि में है, और सम्पूर्ण समष्टि उनकी ही आभा में समाहित है| सम्पूर्ण अस्तित्व उन्हीं का है, और वे ही सम्पूर्ण अस्तित्व हैं|
.
उनकी उपस्थिति का आभास परमप्रेम और आनंद के साथ कूटस्थ में ज्योतिर्मय ब्रह्म और प्रणव नाद के रूप में होता है| वे सब तरह के नाम-रूपों से परे हैं| उन्हें सीमित नहीं किया जा सकता| वे निराकार और साकार दोनों हैं|
.
मेरे लिए तो साकार रूप में वे मेरे समक्ष नित्य शाम्भवी मुद्रा में पद्मासन में मेरे सहस्त्रार में समाधिस्थ हैं| वे ही मेरे ध्येय हैं और मेरा समर्पण उन्हीं के प्रति है|
मेरे लिए वे ही परमशिव है, विष्णु हैं, नारायण हैं और जगन्माता हैं|
.
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ||

साधना के मार्ग पर शत-प्रतिशत रहें .....

साधना के मार्ग पर शत-प्रतिशत रहें .....
.
अपने ह्रदय में जो प्रचंड अग्नि जल रही है उसे दृढ़ निश्चय और सतत् प्रयास से निरंतर प्रज्ज्वलित रखिए|
आधे-अधूरे मन से किया गया कोई प्रयास सफल नहीं होगा|
साधना निश्चित रूप से सफल होगी, चाहे यह देह रहे या न रहे ...... इस दृढ़ निश्चय के साथ साधना करें, आधे अधूरे मन से नहीं|
.
परमात्मा का स्मरण करते करते यदि मरना भी पड़े तो वह इस नारकीय सांसारिक जीवन जीने से तो अच्छा है|

ॐ तत्सत् | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||

एक विचार .....

एक विचार .....
-------------
भारत में समाज और राष्ट्र की अवधारणा दुर्भाग्य से लगभग चौदह-पंद्रह सौ वर्षों पूर्व क्षीण हो गयी थी| वह एक घोर अज्ञान व अन्धकार का युग था इसीलिए हमें पिछले एक हज़ार वर्षों में पराजित और विदेशी लुटेरों का शिकार होना पडा| इसका दोष हम दूसरों पर नहीं डाल सकते| यदि पर्वत शिखर से बहता हुआ जल नीचे खड्डों में आता है तो खड्डे पहाड़ से क्या शिकायत कर सकते है? स्वयं की रक्षा के लिए खड्डे को ही शिखर बनना पडेगा| निर्बल को सब सताते हैं| संगठित और सशक्त राष्ट्र की ओर आँख उठाकर देखने का साहस किसी में नहीं होता|
>
भारत में जब तक राष्ट और समाज हित की अवधारणा थी, तब तक किसी का साहस नहीं हुआ भारत की ओर आँख उठाकर देखने का| बिना किसी पूर्वाग्रह के यदि हम इतिहास का अध्ययन और विश्लेषण करें तो पायेंगे कि हमारी ही कमी थी जिसके कारण हम गुलाम हुए| वे कारण अब भी अस्तित्व में हैं पर कुछ कुछ चेतना अब धीरे धीरे समाज में आ रही है|
>
आप चाहे कितनी भी सद्भावना सब के लिए रखो पर हिंसक और दुष्ट प्राणियों के साथ नही रह सकते| ऐसे ही हमारे सारे कार्य यदि राष्ट्रहित में हों तो हमें प्रगति के शिखर पर जाने से कोई नहीं रोक सकता| इस बिंदु पर सब को स्वयं मंथन करना पड़ेगा|
>
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में सब राष्ट्र अपना निज हित देखते हैं| कोई किसी का स्थायी शत्रु और मित्र नहीं होता| जो भावुकता में निर्णय लिए जाते हैं वे आत्म घातक होते हैं| वैसे ही यदि हम अपने लोभ लालच, जातिवाद और प्रांतवाद से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में कार्य करें तो हमें विकसित होने से कोई नहीं रोक सकता|
>
भारत का वेदान्त दर्शन समष्टि के हित की बात करता है| यदि पूरा विश्व ही समष्टि के हित की सोचे तो यह सृष्टि ही स्वर्ग बन जाएगी पर ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि यह सृष्टि विपरीत गुणों से बनी है| सारा भौतिक जगत ही सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा से निर्मित है| बुराई और भलाई दोनों ही विद्यमान रहेगी| हमें ही इस द्वंद्व से ऊपर उठना पडेगा|
>
सभी निजात्मगण को नमन| सब का कल्याण हो|
>
ॐ तत्सत ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ ॐ ॐ ||

मेरुदंड के चक्रों पर बीज मन्त्रों से मानसिक जप की विधि .....

मेरुदंड के चक्रों पर बीज मन्त्रों से मानसिक जप की विधि .....
>
निम्न साधना-विधि गंभीर निष्ठावान योग मार्ग के साधकों के लिए है| अन्य इसका प्रयोग न करें| साधना काल में यम-नियमों का पालन अनिवार्य है, अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि ही होगी|
ऊनी कम्बल पर पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर शिवनेत्र होकर यानि दृष्टी भ्रूमध्य पर रखते हुए ध्यान आज्ञाचक्र पर रखें| मेरुदंड सदा उन्नत रहे, शरीर शिथिल और ठुड्डी भूमि के समानांतर रहे|
गुदा का तनिक संकुचन कर मूलाधार पर मानसिक जप करें -- "लं".
तनिक ऊपर उठाकर स्वाधिष्ठान पर -- "वं".
मणिपुर पर -- रं".
अनाहत पर -- "यं".
विशुद्धि पर -- "हं".
आज्ञा पर -- "ॐ".
सहस्त्रार पर कुछ अधिक जोर से -- "ॐ".
कुछ पल भर रुककर विपरीत क्रम से जाप करते हुए नीछे आइये| पल भर रुकिए और इस प्रक्रिया को सहज रूप से जितनी बार कर सकते हैं कीजिये|
.
बीज मन्त्रों के जाप में कठिनाई हो तो इनके स्थान पर "ॐ" का जाप कर सकते हैं|
इस जाप के समय दृष्टी भ्रूमध्य पर ही रहे|
जाप के उपरांत शांत होकर बैठ जाइए और खूब देर तक ॐ की ध्वनि को सुनते रहें| खूब देर शांत होकर बैठें| इन बीज मन्त्रों के जाप से सूक्ष्म शक्तियों का जागरण होता है|
.
एक प्रयोग जो मैंने किया था और जिससे मुझे बहुत लाभ मिला वह यहाँ बता रहा हूँ| जब आपकी सांस भीतर जा रही हो उस समय मेरु दंड में सुषुम्ना नाडी में मूलाधार से ऊपर उठते हुए हर चक्र पर हनुमान जी का ध्यान करें| ऐसा भाव करें की श्री हनुमान जी की शक्ति आपकी सुषुम्ना नाडी में आरोहण कर रही है| जब सांस बाहर जा रही हो उस समय यह भाव करें कि सुषुम्ना के बाहर पीछे की ओर से श्री हनुमान जी की शक्ति अवरोहण कर रही है| सांस लेते समय पुनश्चः आरोहण, और सांस छोड़ते समय अवरोहण हो रहा है| साथ साथ उपरोक्त जाप भी चलता रहे| जाप को आज्ञा चक्र या सहस्त्रार पर ही पूर्ण करें|
हनुमान जी महावीर हैं, जब वे साधक के साथ हों तो कोई बाधा नहीं आ सकती|
पर आपका आचार-विचार शुद्ध हो अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि ही होगी|
.
सहस्त्रार और आज्ञा चक्र पर जो ज्योति (ज्योतिर्मय ब्रह्म) दिखाई देती है वही श्री गुरु के चरण हैं| उसमें समर्पण ही श्री गुरु-चरणों में समर्पण है|
आज्ञाचक्र ही योगियों का ह्रदय होता है, इस ह्रदय में निरंतर गुरु रूप में सर्वव्यापी ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करें| यह प्रयोग मैंने अजपा-जाप के साथ भी किया है और इस से बहुत लाभ मिला है| भगवान से उनके प्रेम के अतिरिक्त अन्य किसी भी तरह की कामना ना करें|
.
साधना के मार्ग पर शत-प्रतिशत रहें| अपने ह्रदय में जो प्रचंड अग्नि जल रही है उसे दृढ़ निश्चय और सतत् प्रयास से निरंतर प्रज्ज्वलित रखिए| आधे-अधूरे मन से किया गया कोई प्रयास सफल नहीं होगा| साधना निश्चित रूप से सफल होगी, चाहे यह देह रहे या न रहे ...... इस दृढ़ निश्चय के साथ साधना करें, आधे अधूरे मन से नहीं| परमात्मा का स्मरण करते करते यदि मरना भी पड़े तो वह इस नारकीय सांसारिक जीवन जीने से तो अच्छा है|

ॐ तत्सत् | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||