Tuesday, 10 June 2025

चित्त की वृत्तियाँ क्या होती हैं? इसे समझ कर ही साधना मार्ग पर आगे बढ़ें।

 चित्त की वृत्तियाँ क्या होती हैं? इसे समझ कर ही साधना मार्ग पर आगे बढ़ें। हमारे चित्त में बारबार जो अधोगामी वासनात्मक विचार उठते हैं, वे ही चित्त की वृत्तियाँ हैं। वासनाएँ बहुत सूक्ष्म होती हैं, जो संकल्प शक्ति से नियंत्रित नहीं होतीं। उसके लिए किसी श्रौत्रीय ब्रहमनिष्ठ सद्गुरु के मार्गदर्शन में ईश्वर की उपासना करनी पड़ती है।

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जिस दिन आपको भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताई हुई समत्व की स्थिति प्राप्त हो जाती है, उसी दिन से आप एक ज्ञानी और सिद्ध-पुरुष हो जाते हैं। जिस दिन से आप को कोई कामनाएँ नहीं होतीं, कोई आकांक्षा नहीं रहती, आप एक जीवनमुक्त महात्मा हैं। १० जून २०२२

परमात्मा ही अपना स्वरूप है ---

 

परमात्मा ही अपना स्वरूप है ---
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हम भगवान के अंश हैं, भगवान से आये हैं और भगवान में ही बापस जायेंगे; इसलिए भगवान से पृथक नहीं हो सकते। हमारी प्रसन्नता और आनंद का स्त्रोत भगवान ही हैं। हमारी पूर्णता भगवान के साथ एक होने में है, इसलिए भगवान ही हमारे सर्वस्व और हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता हैं। भगवान की परिभाषा और पूर्ण व्याख्या विष्णुपुराण में विस्तार से दी हुई है। वहीं से इसे समझें।
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प्रातःकाल उठते ही निवृत होकर ऊनी कंबल के आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा में मुंह कर के ध्यान के आसन पर बैठ जाइए। कमर सीधी रहे। कुछ देर हठयोग के प्राणायाम और शिव-संहिता में दिये हुए महामुद्रा आदि आसनों का अभ्यास करें। फिर स्थिर होकर बैठिए, और हंसःयोग का तब तक अभ्यास कीजिये जब तक भगवान की अनुभूति न हो। हंसःयोग को ही अजपा-जप कहते हैं। यह एक वैदिक साधना है जिसे वेदों में हंसवती ऋक कहा गया है। परमहंस योगानन्द ने अपने पश्चिमी शिष्यों को सिखाने के लिए इसका नाम Haung-Sau Technique कर दिया। पूरा श्रीरुद्रहृदयोपनिषद इसी की महिमा बताता है। यह हंसमंत्र महाचिन्मय है, जिसका मूलबीज वेदों में हंसवती ऋक में दिया है।
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{बाबा रामदेव जी नित्य प्रातःकाल टीवी पर पातंजलि के नाम से जो हठयोग सिखाते हैं, वह विद्या पातंजलि की नहीं, बल्कि घेरण्ड-संहिता, हठयोग-प्रदीपिका और शिव-संहिता जैसे ग्रन्थों की हैं। वे इन ग्रन्थों का नाम नहीं लेते क्योंकि ये ग्रंथ नाथ-संप्रदाय से जुड़े हुए हैं। पातंजलि ने कहीं भी हठयोग की शिक्षा नहीं दी है। आचार्य शंकर के गुरु आचार्य गोविंदपाद अपने पूर्व जन्म में शेषावतार पातंजलि थे।}
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श्रीमद्भगवद्गीता व उपनिषदों में नादानुसंधान (प्रणव यानि ॐ के जप) की विधि का उल्लेख अनेक बार है। पश्चिमी शिष्यों के लिए परमहंस योगानन्द ने इसका नाम Om Technique कर दिया है। ये दोनों विधियाँ मिलकर "शिवयोग" कहलाती हैं। श्रीरुद्रहृदयोपनिषद में विस्तार से इसका उल्लेख है।
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क्रियायोग के अभ्यास से पूर्व इनका अभ्यास किया जाता है। क्रियायोग का वर्णन गीता में, योगदर्शन में, और गुरु गोरखनाथ के साहित्य में भी कूट शब्दों में है, जिसे हर कोई नहीं समझ सकता। इस विद्या को गोपनीय इसलिए रखा गया है क्योंकि इसके अभ्यास से सूक्ष्म दैवीय शक्तियों का जागरण होता है। उस समय साधक के आचार-विचार यदि सही न हों तो लाभ के स्थान पर उसे बहुत अधिक हानि हो सकती है।
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एक बार आप साधना में बैठ जाते हैं तो तब तक न उठें जब तक परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभूतियाँ न हों। आपमें भक्ति और श्रद्धा होगी तो भगवान को आना ही पड़ेगा। उन्हें आने से कोई नहीं रोक सकता। दिन में कम से कम दो बार साधना करें। सप्ताह में एक दिन दीर्घकाल तक करें। परमात्मा का स्मरण हर समय करते रहें। भगवान को पाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, जिससे हमें कोई नहीं रोक सकता। भगवत प्रेमी सब नियमों से ऊपर है। कोई नियम उसके लिए बाधक नहीं है।
"जाके प्रिय न राम बैदेही। तजिये ताहि कोटि बैरी सम, यद्यपि परम स्नेही॥
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आप सब महान आत्माओं को सादर प्रणाम !! आपका यश और कीर्ति अमर रहे।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! जय गुरु !!
कृपा शंकर
१० जून २०२२

भगवान को पाने की अभीप्सा, भगवान से परमप्रेम, और एक अतृप्त आध्यात्मिक प्यास -- सनातन धर्म को विजयी बनायेगी ---

 भगवान को पाने की अभीप्सा, भगवान से परमप्रेम, और एक अतृप्त आध्यात्मिक प्यास -- सनातन धर्म को विजयी बनायेगी ---

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मनु-स्मृति में बताए हुए धर्म के दस लक्षणों का विलोम ही असुरत्व है। यह असुरत्व ही सनातन धर्म का सबसे बड़ा शत्रु है। असुरत्व का सबसे बड़ा अस्त्र है -- कामुकता, और देवत्व का सबसे बड़ा अस्त्र है -- आध्यात्मिक प्यास। यह आध्यात्मिक प्यास ही सनातम धर्म की सबसे बड़ी शक्ति है। यह आध्यात्मिक प्यास, अभीप्सा और भगवत्-प्राप्ति के लिए तड़प ही सत्य-सनातन-धर्म को विजय दिलाएगी। सनातन धर्म के सिवाय अन्य सारे अभारतीय मत/पंथ/सम्प्रदाय विपन्न हैं। उनके पास मनुष्य की आध्यात्मिक प्यास को बुझाने के लिए कुछ भी नहीं है।
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यह असत्य का अंधकार तभी तक है, जब तक सनातन धर्म के बारे में विश्व को कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है, और जो भी जानकारी है वह भ्रामक है। हमारी आध्यात्मिक प्यास को ही नष्ट करने के लिए ही आसुरी शक्तियाँ भारत में कामुकता को बढ़ावा दे रही हैं।
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यह धर्मयुद्ध हमें अकेले ही लड़ना पड़ेगा। भगवान हमारे मार्गदर्शक हैं, कोई भी अन्य साथ नहीं है। देवासुर संग्राम है। दैवीय और आसुरी प्रवृत्तियों के बीच संघर्ष है। असुर पथ परम अंधकारमय है, और देवपथ परम ज्योतिर्मय।
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भारत के अधिकांश बड़े-बड़े राजनेता और पूँजीपति हिन्दूद्रोही थे और हैं। वे अंग्रेजों के मानसपुत्र हैं। उद्योगपतियों में सिर्फ एक डालमिया जी ही हिंदुत्वनिष्ठ थे जिन्हें दुर्भावनावश नेहरू ने बर्बाद कर दिया। अच्छी गुणवत्ता का सामान बनाकर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भी हमें पूरे विश्व में छाना होगा। हमें अपने धर्म की शिक्षा भी देनी होगी ताकि हमारा स्वाभिमान जागृत हो।
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सनातन धर्म के पास सबसे बड़ी पूंजी है - "आध्यात्म"। यदि भारत का धर्मविमुख सत्ताधारी वर्ग सही अर्थ में सनातन धर्मनिष्ठ बन जाय तो पूरे विश्व को सनातनी बनने में देर नहीं लगेगी। अमेरिका और ब्रिटेन स्वभाववश भारत के शत्रु हैं। अमरीका और ब्रिटेन आसुरी शक्तियाँ है जो अपने ही बोझ तले दम तोड़ देंगी।
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पश्चिमी जगत के लिए सबसे बड़ा खतरा हिन्दुत्व है, विशेषकर भारत का ब्राह्मणवर्ग। इसलिए योजनाबद्ध तरीके से ब्राह्मणों को धर्म-विमुख और विपन्न बनाया गया है।
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कृपया इस पर विचार करें। भारत विजयी हो, सत्य-सनातन-धर्म विजयी हो !!
जय हिन्दू राष्ट्र !! भारत माता की जय !! हरिः ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१० जून २०२२
मनु-स्मृति में बताए हुए धर्म के दस लक्षणों का विलोम ही असुरत्व है। यह असुरत्व ही सनातन धर्म का सबसे बड़ा शत्रु है। असुरत्व का सबसे बड़ा अस्त्र है -- कामुकता, और देवत्व का सबसे बड़ा अस्त्र है -- आध्यात्मिक प्यास। यह आध्यात्मिक प्यास ही सनातम धर्म की सबसे बड़ी शक्ति है। यह आध्यात्मिक प्यास, अभीप्सा और भगवत्-प्राप्ति के लिए तड़प ही सत्य-सनातन-धर्म को विजय दिलाएगी। सनातन धर्म के सिवाय अन्य सारे अभारतीय मत/पंथ/सम्प्रदाय विपन्न हैं। उनके पास मनुष्य की आध्यात्मिक प्यास को बुझाने के लिए कुछ भी नहीं है।
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यह असत्य का अंधकार तभी तक है, जब तक सनातन धर्म के बारे में विश्व को कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है, और जो भी जानकारी है वह भ्रामक है। हमारी आध्यात्मिक प्यास को ही नष्ट करने के लिए ही आसुरी शक्तियाँ भारत में कामुकता को बढ़ावा दे रही हैं।
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यह धर्मयुद्ध हमें अकेले ही लड़ना पड़ेगा। भगवान हमारे मार्गदर्शक हैं, कोई भी अन्य साथ नहीं है। देवासुर संग्राम है। दैवीय और आसुरी प्रवृत्तियों के बीच संघर्ष है। असुर पथ परम अंधकारमय है, और देवपथ परम ज्योतिर्मय।
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भारत के अधिकांश बड़े-बड़े राजनेता और पूँजीपति हिन्दूद्रोही थे और हैं। वे अंग्रेजों के मानसपुत्र हैं। उद्योगपतियों में सिर्फ एक डालमिया जी ही हिंदुत्वनिष्ठ थे जिन्हें दुर्भावनावश नेहरू ने बर्बाद कर दिया। अच्छी गुणवत्ता का सामान बनाकर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भी हमें पूरे विश्व में छाना होगा। हमें अपने धर्म की शिक्षा भी देनी होगी ताकि हमारा स्वाभिमान जागृत हो।
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सनातन धर्म के पास सबसे बड़ी पूंजी है - "आध्यात्म"। यदि भारत का धर्मविमुख सत्ताधारी वर्ग सही अर्थ में सनातन धर्मनिष्ठ बन जाय तो पूरे विश्व को सनातनी बनने में देर नहीं लगेगी। अमेरिका और ब्रिटेन स्वभाववश भारत के शत्रु हैं। अमरीका और ब्रिटेन आसुरी शक्तियाँ है जो अपने ही बोझ तले दम तोड़ देंगी।
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पश्चिमी जगत के लिए सबसे बड़ा खतरा हिन्दुत्व है, विशेषकर भारत का ब्राह्मणवर्ग। इसलिए योजनाबद्ध तरीके से ब्राह्मणों को धर्म-विमुख और विपन्न बनाया गया है।
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कृपया इस पर विचार करें। भारत विजयी हो, सत्य-सनातन-धर्म विजयी हो !!
जय हिन्दू राष्ट्र !! भारत माता की जय !! हरिः ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१० जून २०२२

जो कुछ भी हमें प्राप्त होता है, यहाँ तक कि परमात्मा की प्राप्ति भी "श्रद्धा और विश्वास" से ही होती है|

 जो कुछ भी हमें प्राप्त होता है, यहाँ तक कि परमात्मा की प्राप्ति भी "श्रद्धा और विश्वास" से ही होती है| रामचरितमानस के आरंभ में मंगलाचरण में ही बताया गया है .....

"भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ| याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाःस्वान्तःस्थमीश्वरम्||"
"वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्| यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते||"
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हमारी श्रद्धा और विश्वास ही भवानी शंकर हैं| कोई भी साधना श्रद्धा और विश्वास के कारण ही फलवती होती है| बिना श्रद्धा और विश्वास के किसी भी मंत्र के जप का, यहाँ तक कि गायत्री मंत्र के जप का भी फल नहीं मिलता है| भगवान कभी किसी की कामनाओं की पूर्ति नहीं करते| कामनाओं की पूर्ती स्वयं की श्रद्धा और विश्वास से ही होती हैं, किसी देवी-देवता, पीर-फ़कीर, या किसी मज़ार पर जाने से नहीं|
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सारा ब्रह्मांड भगवान की विभूति है| हमें ध्यान भी भगवान के विराट रूप का ही करना चाहिए| यह भाव रहना चाहिए कि यह समस्त ब्रह्मांड "मैं" हूँ, यह भौतिक देह नहीं| रामचरितमानस में बताए हुए सारे प्राणी .... "तन खीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें" कैसे भी हों, हमारी चेतना के ही भाग हैं, हमसे पृथक नहीं|
भगवान की श्रद्धा और विश्वास फलवती होंगे तभी सारे आध्यात्मिक रहस्य भी अनावृत हो जाएँगे जो मनुष्य की बुद्धि से नहीं हो सकते|
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परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति आप सब को नमन| ॐ तत्सत् ||
कृपा शंकर
१० जून २०२०

भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण हमारे सब दुःख दूर करें .....

जो भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण की उपासना करते हैं और उनके अनुग्रह को प्राप्त करना चाहते हैं, वे बिना किसी संकोच के उनके बीज मंत्र "ॐ क्लीं"
का खूब मानसिक जप कर सकते हैं| मंत्र जप के समय कमर सीधी हो, मुख पूर्व या उत्तर दिशा में हो, दृष्टि भ्रूमध्य पर हो, और पूरा ध्यान आज्ञाचक्र में भगवान श्रीकृष्ण पर हो| प्रयास करते रहें कि उन के सिवाय और कोई छवि अपने समक्ष न आवे| मन में यही भाव रहे कि भगवान श्रीकृष्ण की पूर्ण कृपा मुझ पर हो रही है, उनका पूर्ण प्रेम मुझे प्राप्त हो रहा है और मेरे सब दुःख दूर हो रहे हैं| अर्धरात्रि में इस मंत्र के जप का बहुत अधिक महत्व है| दिन में भी जब भी समय मिले इस मंत्र का यथासंभव अधिकाधिक जप करते रहें| यह मंत्र "गोपाल सहस्त्रनाम" में भी है| इस मंत्र को काम बीज कहते हैं| यह माँ महाकाली का, माँ कात्यायिनी का, और कामदेव का बीज मंत्र भी है| देवी अथर्वशीर्ष में और नवार्ण मंत्र में यह बीज मंत्र माँ महाकाली के लिए है|
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इस मंत्र में अनेक सिद्धियाँ हैं, लेकिन मैं यहाँ जो बता रहा हूँ वह सिर्फ भगवान श्रीकृष्ण के अनुग्रह के लिए है, अन्य किसी उद्देश्य के लिए नहीं|
ॐ तत्सत् ||
१० जून २०२०

भीषण गर्मी का यह भी कारण हो सकता है .....

 भीषण गर्मी का यह भी कारण हो सकता है .....

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भीषणतम गर्मी का मुख्य कारण मुझे तो यह लगता है :--- पिछले कुछ वर्षों में सड़कों का और राजमार्गों का अभूतपूर्व रूप से खूब निर्माण हुआ है, और उनके स्थान पर लगे लाखों-लाखों वृक्षों को इस आश्वासन पर काटा गया कि वे फिर से लगा दिए जायेंगे, पर वे कभी बापस लगाए नहीं गये। लाखों-लाखो वृक्षों की अंधाधुंध कटाई हुई है, अतः गर्मी पड़ना तो स्वाभाविक था। राजमार्गों के आसपास सजावटी नहीं बल्कि ऐसे पेड़ खूब लगाए जायें जो पर्यावरण की दृष्टी से सर्वोत्तम हों। फिर प्रकृति भी अनुकूल होगी।

हमारे देश के कृषि वैज्ञानिकों के पास वह तकनीक है जिससे बंजर पड़ी हुई भूमि को ड्रोन की सहायता से सीड-बोम्बिंग द्वारा हराभरा बनाया जा सकता है| वहाँ जल के अभाव को दूर करने के लिए कृत्रिम वर्षा भी कराई जा सकती है और ड्रोन की सहायता से देखभाल भी की जा सकती है| पर राजनीतिक इच्छाशक्ति और संकल्प का अभाव है| देश में बंजर भूमि पर वैज्ञानिक पद्धति से खूब वृक्षारोपण किया जाए और सडकों के किनारे किनारे भी वैज्ञानिक पद्धति से छायादार और पर्यावरण की दृष्टी से अनुकूल वृक्ष लाखों-लाखों की संख्या में लगाए जाएँ|
कृपा शंकर
१० जून २०१९

पाश द्वारा आवद्ध सारे संसारी मनुष्य पशु ही हैं जो जन्म से नाना प्रकार के पाशों में बंधे हुए हैं ---

पाश द्वारा आवद्ध सारे संसारी मनुष्य पशु ही हैं जो जन्म से नाना प्रकार के पाशों में बंधे हुए हैं। जब तक जीव सब प्रकार के पाशों यानि बंधनों से मुक्त होकर अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त नहीं होता, वह पशु ही है। शिष्य की देह में जो आध्यात्मिक चक्र हैं उन पर जन्म-जन्मान्तर के कर्मफल वज्रलेप की तरह चिपके हुए हैं। इस लिए जीव को शिव का बोध नहीं होता। गुरु अपने शिष्य के चित्त में प्रवेश कर के उस के अज्ञानमय आवरण को गला देते हैं। जब शिष्य के अंतर में दिव्य चेतना स्फुरित होती है, तब वह साक्षात शिव भाव को प्राप्त होता है। गुरु की चैतन्य शक्ति के बिना यह संभव नहीं है| शिष्य चाहे कितना भी पतित हो, सदगुरु उसे ढूंढ निकालते हैं| फिर चेला जब तक अपनी सही स्थिति में नहीं आता, गुरु को चैन नहीं मिलता है| इसी को दया कहते हैं| यही गुरु रूप में शिवकृपा है| हे गुरुरूप शिव, अपनी परम कृपा करो और निज चरणों में आश्रय दो|

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आदि शंकराचार्य विरचित शिव स्तव :--
पशूनां पतिं पापनाशं परेशं, गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम्।
जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं, महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम्॥
महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं, विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम्।
विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं, सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम्॥
गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं, गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम्।
भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं, भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्॥
शिवाकान्त शंभो शशाङ्कार्धमौले, महेशान शूलिञ्जटाजूटधारिन्।
त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूपः, प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप॥
परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं, निरीहं निराकारमोंकारवेद्यम्।
यतो जायते पाल्यते येन विश्वं, तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्॥
न भूमिर्नं चापो न वह्निर्न वायु- र्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा।
न गृष्मो न शीतं न देशो न वेषो, न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीडे॥
अजं शाश्वतं कारणं कारणानां, शिवं केवलं भासकं भासकानाम्।
तुरीयं तमःपारमाद्यन्तहीनं, प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम्॥
नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते, नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते।
नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य, नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य ॥
प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ, महादेव शंभो महेश त्रिनेत्र।
शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे, त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्यः॥
शंभो महेश करुणामय शूलपाणे, गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन्।
काशीपते करुणया जगदेतदेक- स्त्वंहंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि॥
त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे, त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ।
त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश, लिङ्गात्मके हर चराचरविश्वरूपिन्॥
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ॐ नमः शिवाय ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
१० जून २०१८