भारत माँ अपने द्वीगुणित परम वैभव के साथ अखंडता के सिंहासन पर बैठे, व सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण हो| हमें न तोअपने अहंकार को तृप्त करने के लिए कोई आधिभौतिक उपलब्धि चाहिए, न ही हमें किसी व्यक्ति को प्रभावित कर उस से वाहवाही लूटनी है चाहे वह संसार की दृष्टि में कितना भी बड़ा व्यक्ति हो|
Saturday, 31 May 2025
भारत माँ अपने द्वीगुणित परम वैभव के साथ अखंडता के सिंहासन पर बैठे, व सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण हो|
महारानी अहिल्याबाई होल्कर की २९५ वीं जयंती ---
भारत की एक महान मातृशक्ति और भगवान शिव की मानस पुत्री प्रातःस्मरणीया परम-शिवभक्त महारानी अहिल्याबाई होलकर (३१ मई १७२५ - १३ अगस्त १७९५) को नमन जिन का आज ३१ मई को जन्म हुआ था| हमारा दुर्भाग्य है कि धर्मनिरपेक्षता और हिन्दुद्रोह के कारण इनका इतिहास नहीं पढ़ाया जाता| इनके गौरव और महानता के बारे में जितना लिखा जाए उतना ही कम है|
हिंदुओं में होने वाले विवाह समारोहों के बारे में मेरे कुछ विचार हैं जिन्हें सराहते तो सब हैं पर पालन कोई नहीं करता :---
(१) दिवा लग्न हों यानि सूरज की रोशनी में विवाह हों ताकि जेनेरेटर और बिजली का फालतू खर्चा बचे, और रात्रि को लोग चैन से सो सकें| बैंड बाजा और नाच-कूद लड़के वाले अपने घर पर करें, कन्या पक्ष के यहाँ नहीं| .
सारा जगत ब्रह्ममय यानि प्राण और ऊर्जा का स्पंदन है, जिसका निरंतर विस्तार हो रहा है।
सारा जगत ब्रह्ममय यानि प्राण और ऊर्जा का स्पंदन है, जिसका निरंतर विस्तार हो रहा है। सारी सृष्टि ही परमशिव है। भगवान विष्णु स्वयं ही यह विश्व बन गए हैं। सारी सृष्टि विभिन्न आवृतियों पर ऊर्जा का स्पंदन है, जो प्राण से चैतन्य है। वह अनंत विस्तार और उससे भी परे ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में परमशिव हैं, वे ही मेरे उपास्य हैं। "सियाराम मय सब जग जानी करहुं प्रणाम जोरि जुग पानी॥" "ॐ विश्वं विष्णु:-वषट्कारो भूत-भव्य-भवत- प्रभुः।"
अहिल्याबाई होल्कर की २९७वीं जयंती
आज पुण्यश्लोका, प्रातःस्मरणीया, एक महानतम भारतीय नारी योद्धा व शासिका, भगवान शिव की मानसपुत्री, इंदौर नगर जी स्थापिका, मालवा की महारानी, अहिल्याबाई होल्कर की २९७वीं जयंती है। इनका जन्म ३१ मई १७२५ को महाराष्ट्र के चांडी (वर्तमान अहमदनगर) गांव में हुआ था। इन्होने विपरीततम परिस्थितियों में महानतम कार्य किए। इनका यश और कीर्ति सदा अमर रहेंगे।
एक दुर्धर्ष आध्यात्मिक शक्ति -- भारत के उत्थान में कार्यरत हो चुकी है, जिसे रोकने का सामर्थ्य किसी में भी नहीं है।
संयमित मन मनुष्य का मित्र है, और स्वेच्छाचारी मन उसका शत्रु। स्वयं के सबसे अच्छे मित्र बनें, और स्वयं पर सबसे अधिक विश्वास करें।
संयमित मन मनुष्य का मित्र है, और स्वेच्छाचारी मन उसका शत्रु। स्वयं के सबसे अच्छे मित्र बनें, और स्वयं पर सबसे अधिक विश्वास करें। मन को निरंतर परमात्मा में स्थिर कर के रखें।