Saturday, 31 May 2025

भारत माँ अपने द्वीगुणित परम वैभव के साथ अखंडता के सिंहासन पर बैठे, व सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण हो|

 भारत माँ अपने द्वीगुणित परम वैभव के साथ अखंडता के सिंहासन पर बैठे, व सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण हो| हमें न तोअपने अहंकार को तृप्त करने के लिए कोई आधिभौतिक उपलब्धि चाहिए, न ही हमें किसी व्यक्ति को प्रभावित कर उस से वाहवाही लूटनी है चाहे वह संसार की दृष्टि में कितना भी बड़ा व्यक्ति हो|

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वर्तमान युग में मनुष्य की सोच और उसका चिंतन इतना अधिक गिर गया है कि वह सिर्फ दूसरों की या तो हँसी ही उड़ा सकता है, या विरोध और बदनाम ही कर सकता है| किसी से भलाई की उम्मीद नहीं रही है|
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हमारा लक्ष्य भारत को एक आध्यात्मिक हिन्दू राष्ट्र बनाना है जहाँ की राजनीति सनातन धर्म हो| आध्यात्मिक उपासना/साधना से दैवीय शक्तियों को जागृत कर उन्हीं की सहायता लेंगे| किसी मनुष्य से कोई अपेक्षा और आशा नहीं है| सारी प्रेरणा और शक्ति प्रत्यक्ष परमात्मा से ही लेंगे| पूर्वजन्मों के गुरु आशीर्वाद दे रहे हैं, वही पर्याप्त है|
हरिः ॐ तत्सत् !!
३१ मई २०२०

महारानी अहिल्याबाई होल्कर की २९५ वीं जयंती ---

 भारत की एक महान मातृशक्ति और भगवान शिव की मानस पुत्री प्रातःस्मरणीया परम-शिवभक्त महारानी अहिल्याबाई होलकर (३१ मई १७२५ - १३ अगस्त १७९५) को नमन जिन का आज ३१ मई को जन्म हुआ था| हमारा दुर्भाग्य है कि धर्मनिरपेक्षता और हिन्दुद्रोह के कारण इनका इतिहास नहीं पढ़ाया जाता| इनके गौरव और महानता के बारे में जितना लिखा जाए उतना ही कम है|

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व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में विकटतम कष्ट और प्रतिकूलताओं के पश्चात् भी इन्होने इतने महान कार्य किये जिनकी तुलना नहीं की जा सकती| वर्तमान इंदौर नगर की स्थापना इन्होने ही की थी| इनका विवाह मल्हार राव होलकर के बेटे खाण्डेराव के साथ हुआ था जिनकी शीघ्र ही मृत्यु हो गयी| इनके एकमात्र पुत्र मालेराव भी जीवित नहीं रहे| इनकी एकमात्र कन्या बालविधवा हो गयी और पति की चिता में कूद कर स्वयं के प्राण त्याग दिए| अपने श्वसुर मल्हारराव होलकर की मृत्यु के समय ये मात्र ३१ वर्ष की थी और राज्य संभाला| अपने दुर्जन सम्बन्धियों व कुछ सामंतों के षडयंत्रों और तमाम शोक व कष्टों का दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए इन्होने अपने राज्य का कुशल संचालन किया| अपना राज्य इन्होने भगवान शिव को अर्पित कर दिया और उनकी सेविका और पुत्री के रूप में राज्य का कुशल प्रबंध किया| जीवन के सब शोक व दु:खों को शिव जी के चरणों में अर्पित कर दिया और उनके एक उपकरण के रूप में निमित्त मात्र बन कर जन कल्याण के व्रत का पालन करती रही| उनके सुशासन से इंदौर राज्य ऐश्वर्य और समृद्धि से भरपूर हो गया|
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इन्होने सोमनाथ मंदिर के भग्नावशेषों के बिलकुल निकट एक और सोमनाथ मंदिर बनवाकर प्राण प्रतिष्ठा करा कर पूजा अर्चना और सुरक्षा आदि की व्यवस्था की| वाराणसी का वर्तमान विश्वनाथ मन्दिर, गयाधाम का विष्णुपाद मंदिर आदि जो विध्वंश हो चुके थे, इन्हीं के प्रयासों से बने| हज़ारों दीन दुखियारे बीमार और साधू लोग इन्हें करुणामयी माता कह कर पुकारते थे| सेंकडों असहाय लोगों और साधू-संतों को अन्न-वस्त्र का दान इनकी नित्य की दिनचर्या थी| पूरे भारतवर्ष में अनगिनत मंदिर, सडकें, धर्मशालाएं, अन्नक्षेत्र, सदावर्त, तालाब और नदियों के किनारे पक्के घाट इन्होने बनवाए| नर्मदा तट पर पता नहीं कितने तीर्थों को वे जागृत कर गईं| महेश्वर तीर्थ इन्हीं के प्रयासों से धर्म और विद्द्या का केंद्र बना| अमर कंटक में यात्री निवास और जबलपुर में स्फटिक पहाड़ के ऊपर श्वेत शिवलिंग स्थापित कराया| परिक्रमाकारियों के लिए व्यवस्थाएं कीं| ओम्कारेश्वर में ब्राह्मण पुजारियों की नियुक्ति की| वहाँ प्रतिदिन पंद्रह हज़ार आठ सौ मिटटी के पार्थिव शिवलिंग बना कर पूजे जाते थे, फिर उनका विसर्जन कर दिया जाता था| बद्रीनाथ तीर्थ के मार्ग में बहुत बड़ी भूमि खरीद कर उसे गायों के चरने के लिए छोड़ दिया| उस गाँव का नाम ही अहिल्याबाई गोचर पड़ गया|
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यहाँ दो शब्द उनके श्वसुर मल्हार राव के बारे में भी लिखना उचित रहेगा|
छत्रपति शिवाजी के पोते साहू जी ने एक चित्तपावन ब्राह्मण बालाजी बाजीराव (प्रथम) को पेशवा नियुक्त किया| बालाजी बाजीराव वेश बदल कर बिना सुरक्षा व्यवस्था के तीर्थयात्रा के लिए निकल पड़े| मार्ग के एक गाँव में उनको मुगलों के जासूसों ने पहचान लिया और उनकी हत्या के लिए बीस मुग़ल सैनिक पीछे लगा दिए| मल्हार राव ने कुछ भैंसे पाल रखीं थीं और उस गाँव में दूध बेच कर गुजारा करते थे| वे मुग़ल जासूस भी उन्हीं से दूध खरीदते थे| उनकी आपसी बातचीत से मल्हार राव को सब बातें स्पष्ट हो गईं| उनकी देशभक्ति जागृत हो गयी और चुपके से उनहोंने पेशवा को ढूंढकर सारी स्थिति स्पष्ट कर दी| यही नहीं पेशवा को एक संकरी घाटी में से सुरक्षित निकाल कर भेज दिया और उनकी तलवार खुद लेकर उन बीस मुगलों को रोकने खड़े हो गए| उस तंग घाटी से एक समय में सिर्फ एक ही व्यक्ति निकल सकता था| ज्यों ही कोई मुग़ल सैनिक बाहर निकलता, मल्हार राव की तलवार उसे यमलोक पहुंचा देती| उन्होंने पांच मुग़ल सैनिकों को यमलोक पहुंचा दिया| इसे देख बाकी पंद्रह मुग़ल सैनिक गाली देते हुए बापस लौट गए| उन्होंने मल्हार राव के घर को आग लगा दी, उसके बच्चों और पत्नी की हत्या कर दी व भैंसों को हाँक कर ले गए| मल्हार राव, पेशवा बाजीराव के दाहिने हाथ बन कर उनके साथ हर युद्ध में रहे| समय के साथ बाजीराव विश्व के सफलतम सेनानायक बने| उन्होंने अनेक युद्ध लड़े और कभी पराजित नहीं हुए| वे महानतम हिन्दू सेनानायकों में से एक थे| उन्होंने कभी पराजय का मुंह नहीं देखा| उनकी लू लगने से असमय मृत्यु नहीं होती तो भारत का इतिहास ही अलग होता| पेशवाओं ने वर्त्तमान इंदौर क्षेत्र का राज्य मल्हार राव होलकर को दे दिया था जहाँ की महारानी परम शिवभक्त उनकी पुत्रवधू अहिल्याबाई बनी| हमें गर्व है ऐसी शासिका पर|
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय महादेव महादेव महादेव !!
३१ मई २०२०

हिंदुओं में होने वाले विवाह समारोहों के बारे में मेरे कुछ विचार हैं जिन्हें सराहते तो सब हैं पर पालन कोई नहीं करता :---

(१) दिवा लग्न हों यानि सूरज की रोशनी में विवाह हों ताकि जेनेरेटर और बिजली का फालतू खर्चा बचे, और रात्रि को लोग चैन से सो सकें| बैंड बाजा और नाच-कूद लड़के वाले अपने घर पर करें, कन्या पक्ष के यहाँ नहीं| .

(२) बारात में दस-पंद्रह से अधिक बाराती न हों| कन्या पक्ष पर वर पक्ष के अधिक से अधिक दस-पंद्रह लोगों को भोजन कराने की ज़िम्मेदारी हो|
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(3) हर विवाह की रजिस्ट्री हो| दहेज के हर सामान की और नकद दिये हुए रुपयों की वीडियो रिकॉर्डिंग हो और विवाह की रजिस्ट्री मे इसका उल्लेख हो ताकि कन्या पक्ष बाद मे निरपराध वर पक्ष पर झूठे मुकदमे न कर सके| आजकल महिला अत्याचार और दहेज के लगभग सारे मामले झूठे होते हैं| ऐसी परिस्थिति ही पैदा न हो कि झूठी मुकदमेबाजी हो| . आगे से स्थायी रूप से विवाह समारोहों में भी अधिकतम २२ व्यक्तियों की ही अनुमति का नियम बन जाये तो पूरे समाज का बहुत अधिक कल्याण हो जाएगा। ११ व्यक्ति कन्या पक्ष के और ११ व्यक्ति वर पक्ष के, बस इतना ही बहुत है, इस से अधिक किसी भी परिस्थिति में नहीं। कन्या का विवाह करते करते उसके माँ-बाप की कमर टूट जाती है, और वर पक्ष का लालच कभी कम नहीं होता।

३१ मई 2020

सारा जगत ब्रह्ममय यानि प्राण और ऊर्जा का स्पंदन है, जिसका निरंतर विस्तार हो रहा है।

 सारा जगत ब्रह्ममय यानि प्राण और ऊर्जा का स्पंदन है, जिसका निरंतर विस्तार हो रहा है। सारी सृष्टि ही परमशिव है। भगवान विष्णु स्वयं ही यह विश्व बन गए हैं। सारी सृष्टि विभिन्न आवृतियों पर ऊर्जा का स्पंदन है, जो प्राण से चैतन्य है। वह अनंत विस्तार और उससे भी परे ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में परमशिव हैं, वे ही मेरे उपास्य हैं। "सियाराम मय सब जग जानी करहुं प्रणाम जोरि जुग पानी॥" "ॐ विश्वं विष्णु:-वषट्कारो भूत-भव्य-भवत- प्रभुः।"

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"ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥"
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३१ मई २०२२

अहिल्याबाई होल्कर की २९७वीं जयंती

आज पुण्यश्लोका, प्रातःस्मरणीया, एक महानतम भारतीय नारी योद्धा व शासिका, भगवान शिव की मानसपुत्री, इंदौर नगर जी स्थापिका, मालवा की महारानी, अहिल्याबाई होल्कर की २९७वीं जयंती है। इनका जन्म ३१ मई १७२५ को महाराष्ट्र के चांडी (वर्तमान अहमदनगर) गांव में हुआ था। इन्होने विपरीततम परिस्थितियों में महानतम कार्य किए। इनका यश और कीर्ति सदा अमर रहेंगे।

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इनका विवाह मल्हार राव होलकर के बेटे खाण्डेराव के साथ हुआ था जिनकी शीघ्र ही मृत्यु हो गयी। इनके एकमात्र पुत्र मालेराव भी जीवित नहीं रहे। इनकी एकमात्र कन्या बालविधवा हो गयी और पति की चिता में कूद कर स्वयं के प्राण त्याग दिए। अपने श्वसुर मल्हारराव होलकर की म्रत्यु के समय ये मात्र ३१ वर्ष की थीं, और राज्य संभाला। अपने दुर्जन सम्बन्धियों व कुछ सामंतों के षडयंत्रों और तमाम शोक व कष्टों का दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए इन्होने अपने राज्य का कुशल संचालन किया।
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अपना राज्य इन्होने भगवान शिव को अर्पित कर दिया और उनकी सेविका और पुत्री के रूप में राज्य का कुशल प्रबंध किया। राजधानी इंदौर उन्हीं की बसाई हुई नगरी है। जीवन के सब शोक व दु:खों को शिव जी के चरणों में अर्पित कर उनके एक उपकरण के रूप में निमित्त मात्र बन कर जन-कल्याण के व्रत का पालन करती रही। उनके सुशासन से इंदौर राज्य ऐश्वर्य और समृद्धि से भरपूर हो गया।
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अहिल्याबाई ने सोमनाथ मंदिर के भग्नावशेषों के बिलकुल निकट एक और सोमनाथ मंदिर बनवाकर प्राण प्रतिष्ठा करा कर पूजा अर्चना और सुरक्षा आदि की व्यवस्था की। वाराणसी का वर्तमान विश्वनाथ मन्दिर, गयाधाम का विष्णुपाद मंदिर आदि जो विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा विध्वंश हो चुके थे, इन्हीं के प्रयासों से पुनर्निर्मित हुए। हज़ारों दीन दुखियारे बीमार और साधू इन्हें करुणामयी माता कह कर पुकारते थे। सेंकडों असहाय लोगों और साधू-संतों को अन्न वस्त्र का दान इनकी नित्य की दिनचर्या थी। पूरे भारतवर्ष में अनगिनत मंदिर, सडकें, धर्मशालाएं, अन्नक्षेत्र, सदावर्त, तालाब और नदियों के किनारे पक्के घाट इन्होने बनवाए। नर्मदा तट पर पता नहीं कितने तीर्थों को वे जागृत कर गईं। महेश्वर तीर्थ इन्हीं के प्रयासों से धर्म और विद्द्या का केंद्र बना। अमरकंटक में यात्री निवास और जबलपुर में स्फटिक पहाड़ के ऊपर श्वेत शिवलिंग स्थापित कराया। परिक्रमाकारियों के लिए व्यवस्थाएं कीं। ओम्कारेश्वर में ब्राह्मण पुजारियों की नियुक्ति की। वहां प्रतिदिन पंद्रह हज़ार आठ सौ मिटटी के शिवलिंग बना कर पूजे जाते थे, फिर उनका विसर्जन कर दिया जाता था। बदरीनाथ के मार्ग में एक गाँव आता है जिसका नाम गोचर है। वहाँ की भूमि को खरीद कर उन्होंने गायों के चरने के लिए छोड़ दिया।
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पेशवा बाजीराव ने मालवा क्षेत्र का राज्य मल्हार राव होलकर को दे दिया था, जहाँ की महारानी परम शिवभक्त उनकी पुत्रवधू अहिल्याबाई बनी। हमें गर्व है ऐसी महान शासिका पर। इति॥ ॐ नमः शिवाय !!
कृपा शंकर
३१ मई २०२२

एक दुर्धर्ष आध्यात्मिक शक्ति -- भारत के उत्थान में कार्यरत हो चुकी है, जिसे रोकने का सामर्थ्य किसी में भी नहीं है।

मेरी जागृत अंतश्चेतना और अंतःप्रभा मुझे बार-बार आश्वस्त कर रही हैं कि एक दुर्धर्ष आध्यात्मिक शक्ति -- भारत के उत्थान में कार्यरत हो चुकी है, जिसे रोकने का सामर्थ्य किसी में भी नहीं है।
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असत्य और अंधकार की शक्तियों का पराभव, धर्म की पुनःप्रतिष्ठा और वैश्वीकरण सुनिश्चित हैं। गुरुकृपा से मुझे पूरा मार्गदर्शन मिल रहा है, जिसका अनुसरण मुझे ही करना है।
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अनंत मंगलमय शुभ कामनाएँ !! ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३१ मई २०२३

संयमित मन मनुष्य का मित्र है, और स्वेच्छाचारी मन उसका शत्रु। स्वयं के सबसे अच्छे मित्र बनें, और स्वयं पर सबसे अधिक विश्वास करें।

 संयमित मन मनुष्य का मित्र है, और स्वेच्छाचारी मन उसका शत्रु। स्वयं के सबसे अच्छे मित्र बनें, और स्वयं पर सबसे अधिक विश्वास करें। मन को निरंतर परमात्मा में स्थिर कर के रखें।

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हमारे जीवन में हमारा सब से बड़ा संघर्ष और युद्ध हमारी अपनी स्वयं की चेतना के भीतर होता है। इसके लिए हमें अपने बच्चों को और स्वयं को भी प्रशिक्षित करना होगा। बच्चों को डरा-धमका कर न रखें। हरेक बालक में कम से कम इतना तो साहस विकसित करें की वह बिना किसी भय के अपने मन की बात अपने माँ-बाप को, अपने से बड़ों को, और अपने अध्यापकों को कह सके।
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हमारा सबसे बड़ा शत्रु हमारा अपना स्वयं का भय है, जिस के साथ हमारा सबसे बड़ा युद्ध होता है। कभी कभी हम अपने स्वयं के परम शत्रु बन जाते हैं, इससे बड़ा शत्रु अन्य कोई भी नहीं है। स्वयं के सबसे अच्छे मित्र बनें, और स्वयं पर सबसे अधिक विश्वास करें।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने इस विषय को बहुत अच्छी तरह से समझाया है। भगवान कहते हैं --
"उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥६:५॥"
"बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥६:६॥"
"जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥६:७॥"
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हमें अपने भाग्य यानि कर्मफल पर आश्रित न होकर कर्तव्य कर्म करने चाहियें। मनुष्य को अपने द्वारा अपना स्वयं का उद्धार करना चाहिये क्योंकि आत्मा ही आत्मा का मित्र है, और आत्मा (मनुष्य स्वयं) ही आत्मा का (अपना) शत्रु है। जिसने आत्मा (इंद्रियों,आदि) को आत्मा के द्वारा जीत लिया है, उस पुरुष का आत्मा उसका मित्र होता है, परन्तु अजितेन्द्रिय के लिए आत्मा शत्रु के समान स्थित होता है। शीत-उष्ण, सुख-दु:ख तथा मान-अपमान में जो प्रशान्त रहता है, ऐसे जितात्मा पुरुष के लिये परमात्मा नित्य-प्राप्त है।
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ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३१ मई २०२४