Tuesday, 6 May 2025

फेसबुक से सकारात्मक लाभ ....

 फेसबुक से सकारात्मक लाभ ....

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लगभग साढे चार वर्ष पूर्व मैनें मेरे एक आध्यात्मिक मित्र के आग्रह पर फेसबुक पर खाता खोला था| स्वयं को व्यक्त करने की एक तड़प थी अवचेतन मन में जो इस मंच पर आने से पूर्ण हुई है|
आरम्भ में कुछ दिन तो समझ में नहीं आया कि क्या करना चाहिए| पर धीरे धीरे समान विचारों के देश विदेश के अनेक बहुत ही अच्छे अच्छे मित्र मिलने लगे जिनसे बहुतअधिक प्रोत्साहन मिला|
अनेक विद्वान् मनीषियों, विचारकों, साधू-संतों व भक्तिमती विदुषी मातृशक्ति से भी परिचय और आत्मीयता हुई जो अन्यथा नहीं हो सकती थी| समान विचारों के इतने मित्र भी अन्यथा नहीं मिल सकते थे|
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कुल मिलाकर मैं इस मंच से पूर्ण संतुष्ट हूँ| एक बात तो निश्चित है कि फेसबुक मेरे लिए एक उपकरण है, मैं इसका उपकरण या दास नहीं| इसे अपने ऊपर हावी नहीं होने दूँगा|
मैं सिर्फ राष्ट्रवादी व आध्यात्मिक लोगों से ही संपर्क रखता हूँ|
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मैं अपने सभी मित्रों, शुभचिंतकों और आत्मीयजनों का आभारी हूँ| आप सब मेरे निजात्मगण हैं|
आप सब में हृदयस्थ भगवान नारायण को प्रणाम !
ॐ नमः शिवाय | जय श्रीराम !
भारत माता की जय !
६ मई २०१६

हारिये ना हिम्मत, बिसारिये न हरिः नाम ---

 हारिये ना हिम्मत, बिसारिये न हरिः नाम ---

जब भी समय मिले, कूटस्थ सूर्यमण्डल में पुरुषोत्तम का ध्यान करें। आध्यात्म की परावस्था में रहें। सारा जगत ही ब्रह्ममय है। किसी भी परिस्थिति में परमात्मा की उपासना न छोड़ें। पता नहीं कितने जन्मों में किए हुए पुण्य कर्मों के फलस्वरूप हमें भक्ति का यह अवसर मिला है। कहीं ऐसा न हो कि हमारी उपेक्षा से परमात्मा को पाने कीअभीप्सा ही समाप्त हो जाए।

राष्ट्र की रक्षा हमारा धर्म है। धर्म की रक्षा उसके पालन से ही होगी। तभी भगवान हमारी रक्षा करेंगे। अपने स्वधर्म पर हम अडिग रहें।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं ---
"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३:३५॥"
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥२:४०॥"
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एक नए युग का आरंभ हो चुका है। गत दो सहस्त्र वर्षों से संतुलन आसुरी शक्तियों के पक्ष में था। अब संतुलन दैवीय शक्तियों के पक्ष में हो गया है। भारत से असत्य और अंधकार की शक्तियों का शनैः शनैः ह्रास सुनिश्चित है। हम अपने स्वधर्म पर डटे रहें और असत्य का सामना करते हुए सत्य को राष्ट्र व निज जीवन में अवतरित करें। "हम एक परमवैभवशाली नए भारत का निर्माण करेंगे।"
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
६ मई २०२०

बुद्ध ने कभी कोई धर्म अलग से नहीं चलाया। उनके उपदेश सनातन धर्म के ही उपदेश थे ---

 बुद्ध ने कभी कोई धर्म अलग से नहीं चलाया। उनके उपदेश सनातन धर्म के ही उपदेश थे

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कल ५ मई २०२३ को बुद्ध पूर्णिमा थी। सिद्धांत रूप से बौद्ध मत बहुत अच्छा होगा, लेकिन आज तक जीवन में मुझे कोई भी ऐसा बौद्ध मतानुयायी नहीं मिला है जिससे मैं प्रभावित हुआ हूँ। कई बौद्ध देशों का भ्रमण मैंने किया है जैसे सिंहल द्वीप (श्रीलंका), श्याम (थाइलेंड), दक्षिण कोरिया, जापान, चीन और ताईवान। वहाँ के कुछ अनुभव भी हैं।
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एक तो सारे बौद्ध मतानुयायी गोमांस का भक्षण करते हैं। कोरिया और चीन में तो कुत्ते का मांस भी खाते हैं। जापान के लोग कहने को तो बौद्ध मतानुयायी हैं, लेकिन उनका इतिहास देखो तो उनके आचरण में अत्यधिक हिंसा ही हिंसा और यौनाचार ही यौनाचार की प्रधानता रही है। व्यावहारिक रूप से बौद्ध मत इस समय विश्व में कहीं भी नहीं दिखाई दे रहा है। सब नाम के ही बौद्ध हैं। श्रीलंका के बौद्ध गुरु, हिंदुओं से पता नहीं क्यों द्वेष रखते हैं? जब कि बौद्ध मत का प्रचार-प्रसार सारे विश्व में हिन्दू ब्राह्मणों ने ही किया था।
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श्रीलंका, थाइलेंड, म्यानमार व अन्य दक्षिणपूर्वी देशों में हीनयान बौद्धमत है। चीन, ताइवान, कोरिया, मंगोलिया और जापान में महायान बौद्धमत है। तिब्बत में वज्रयान बौद्धमत है। इस्लाम के आगमन से पूर्व पूरा मध्य एशिया, अफगानिस्तान और तुर्की भी बौद्ध महायान मत के अनुयायी थे।
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बुद्ध के देहावसान से पाँच सौ वर्षों तक बुद्ध की शिक्षाएं कहीं भी नहीं लिखी गई थीं। उनके पाँच सौ वर्षों के बाद श्रीलंका के अनुराधापुर में एक सभा हुई थी जिसमें हुई चर्चाओं को पाली भाषा में लिपिबद्ध किया गया। जिन्होंने उन चर्चाओं को स्वीकार किया वे हीनयान कहलाये, और जिन्होंने उन्हे अस्वीकार किया वे महायान कहलाये। वज्रयान बौद्ध मत तो हिन्दू धर्म की दस महाविद्याओं में से एक छिन्नमस्ता देवी की आराधना का अपभ्रन्स और परिवर्तित विकृत रूप है। उनके ध्यान मंत्र "ॐ मणिपद्मे हुं" का अर्थ तो यही है। ॐ ईश्वर का वाचक है, हुं छिन्नमस्ता का बीजमंत्र है जिनका निवास मणिपुर चक्र के पद्म में है। यह मंत्र उनका ध्यानमंत्र है, जिसका अर्थ है - मैं मणिपुर पद्म (सूक्ष्म देह में नाभि के पीछे का भाग) में भगवती छिन्नमस्ता का ध्यान करता हूँ। तिब्बत के लामा लोग हिमाचल के ऊना जिले में स्थित चिंत्यपूर्णी मंदिर में बहुत आते रहे हैं। यह माँ छिन्नमस्ता का ही मंदिर है। सूक्ष्म देह में सुषुम्ना की उपनाड़ी वज्रा में साधना के कारण यह वज़्रयान कहलाता है।
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चीन में पढ़ाया जाता है कि चीन में बौद्ध मत सन ००६७ ई. में भारत से कश्यप मातंग और धर्मारण्य नाम के दो ब्राह्मण लाए थे। लेकिन व्यावहारिक रूप से चीन के सबसे प्रतापी सम्राट कुबलई खान तक चीन में हिन्दू धर्म ही था। कूबलई खान का दादा चंगेज़ खान एक महान हिन्दू सम्राट था। उसके नाम का मंगोलियन भाषा में सही उच्चारण "गंगेश हान" है। उसका वास्तविक नाम गंगेश हान था। श्रीकृष्ण के ही एक नाम "कान्ह" का प्रचलन उस क्षेत्र में खूब था। कान्ह का अपभ्रन्स "हान" हुआ जो एक अति सम्माननीय उपाधि थी। "खान" शब्द, "हान" का ही अपभ्रन्स है।
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सम्राट कूबलई खान ने बौद्ध मत स्वीकार कर लिया था। उन्होंने ही प्रथम दलाई लामा की नियुक्ति की थी। उनका राज्य उत्तर में सइबेरिया की बाइकाल झील से दक्षिण में विएतनाम, और पूर्व में कोरिया से पश्चिम में कश्यप सागर (पृथ्वी का २०% भाग) तक था। उनके प्रभाव से बौद्ध मत उस क्षेत्र में खूब फैला।
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ईसा की पाँचवी या छठी सदी में बोधिधर्म नाम के एक साधु भारत से चीन के हुनान प्रांत के शाओलिन मंदिर में गए थे। वहाँ कुछ समय रहने के पश्चात वे जापान गए। जापान में बौद्ध मत उन बोधिधर्म नाम के साधु ने ही फैलाया।
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भारत से बौद्ध मत के ब्राह्मण हिन्दू प्रचारक जब दक्षिण-पूर्व एशिया में गए तो उन्होंने एक विशाल नदी को देखा, जिसका नाम उन्होंने "माँ गंगा" रखा। उस नदी "माँ गंगा" का ही नाम अपभ्रन्स होते होते "मेकोन्ग" नदी पड़ गया जो उस क्षेत्र की जीवन रेखा है।
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एक बार दक्षिण कोरिया में मैं एक बहुत ऊंचे पर्वत पर स्थित एक बौद्ध मठ में घूमने गया। साथ में एक स्थानीय मित्र को ले गया जिसे अंग्रेजी भाषा का बहुत अच्छा ज्ञान था। उसके माध्यम से वहाँ के प्रमुख साधु से खूब बातचीत की। बहुत भले व्यक्ति थे जिन्होंने मेरा खूब सत्कार किया। उन्होंने मुझे पढ़ने को कोरियन भाषा में कुछ साहित्य भी दिया जो मेरे लिए तो काला अक्षर भैंस बराबर था। वहाँ अनेक साधु वहाँ की भाषा में कुछ मंत्रों का पाठ कर रहे थे। मैंने बड़े ध्यान से उन मंत्रों को सुना। बीच बीच में कुछ संस्कृत के शब्द भी थे।
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भारत के जो नव बौद्ध हैं, वे हर समय हिंदुओं की विशेष कर के ब्राह्मणों की तो निंदा ही निंदा करते रहते हैं। क्या परनिंदा और द्वेष ही उनका धर्म है? बुद्ध ने तो कभी भी कहीं पर भी द्वेष और परनिंदा के उपदेश नहीं दिए हैं। जो भी है और जैसे भी है, मैं तो सभी की प्रशंसा और सभी को नमन ही करता हूँ। सभी में परमात्मा की अभिव्यक्ति हो। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
६ मई २०२३
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पुनश्च: --- संस्कृत का "कैवल्य" शब्द अपभ्रन्स होते होते चीनी भाषा में कुबलई हो गया। चीन के अंतिम महान हिन्दू सम्राट कूबलई खान का वास्तविक नाम "कैवल्य हान" था। उन्होंने बौद्धों को प्रश्रय दिया था, और स्वयं भी बौद्ध हो गए थे। उनके पश्चात चीन से मंगोल साम्राज्य ही नष्ट हो गया था।

Sunday, 4 May 2025

झुंझुनूं जिले के ब्राह्मण समाज को एक बहुत बड़ी क्षति ---

झुंझुनूं जिले के ब्राह्मण समाज को एक बहुत बड़ी क्षति ---
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रामानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के संस्कृत व्याकरण विभाग के पीठाध्यक्ष 95+ वर्षीय परम श्रद्धेय ब्राह्मण शिरोमणि पं.बद्री प्रसाद जी पपूरना के निधन पर मैं उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ| उन को हमारे यहाँ के संत समाज ने छ: महीनों पूर्व ही झुंझुनू में ब्रह्म शिरोमणि पद से सम्मानित किया था| कार्यक्रम में शेखावाटी क्षेत्र के सभी संतगण और समाज के सभी प्रबुद्ध गण उपस्थित थे|
वे राजस्थान ब्राह्मण महासभा झुंझुनूं जिले के मुख्य संरक्षक थे| राजस्थान के झुंझुनू जिले की खेतड़ी तहसील के गाँव पपूरना के रहने वाले थे और 95+ वर्ष की आयु में भी विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करते हुए जयपुर में रामानंद संस्कृत विश्व विद्यालय में पीठाध्यक्ष थे|
उनकी स्मृति स्पष्ट थी और उनका व्यक्तित्व भी प्रेरणादायक था| ऐसे महान तपस्वी साधक और परम विद्वान के गौ लोक गमन से हमारे समाज के सभी लोग दू:खी हैं|
ये एक सफल साधक और सदाचारी विद्वान थे |त्रिकाल संध्या २१ माला गायत्री मन्त्र का तथा ६० माला गोपालमंत्र का जप करते थे |
आपने लगभग ३ मास से भोजन करना बंद कर दिया था| कहते थे की अब शरीर छूटने का समय आ चूका है |
इनका परिवार हमेशा संत महापुरुषों के साथ जुडा रहा |आपके लिखे अनेक ग्रन्थ हैं|आप राष्ट्रपति से भी पुरुष्कृत हुए थे| ये उस राष्ट्रपति का सौभाग्य है|
मैं उन्हें निम्न संस्थाओं के अध्यक्षों की और से भी अधिकृत रूप से श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ ---
(१) अन्नक्षेत्र संस्थान झुंझुनू के संस्थापक और संरक्षक श्री श्री १०८ बाबा आनंद गिरी महाराज (फलाहारी), मुक्तेश्वर महादेव मंदिर, झुंझुनू| (इनके आयोजकत्व में ही संत समाज ने पंडित जी को सम्मानित किया था)
(२) राजस्थान ब्राह्मण महासभा झुंझुनू जिले के अध्यक्ष और प्रसिद्द नेत्र चिकित्सक मेरे अग्रज डा.दया शंकर बावलिया|
राजस्थान ब्राह्मण महासभा झुंझुनू जनपद अगले कुछ दिनों में एक शोक सभा का भी आयोजन करेगी|
कृपा शंकर
५ मई २०१३


भारत की प्राचीन गुरुकुल आधारित शिक्षा-व्यवस्था, और गौ-आधारित कृषि-व्यवस्था, -- ही भारत को अपने प्राचीन गौरव और परम वैभव को प्राप्त करा सकती है।

 भारत की प्राचीन गुरुकुल आधारित शिक्षा-व्यवस्था, और गौ-आधारित कृषि-व्यवस्था, -- ही भारत को अपने प्राचीन गौरव और परम वैभव को प्राप्त करा सकती है।

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अंग्रेजों ने भारतीय सभ्यता को खत्म करने के लिये भारतीय गुरुकुल प्रणाली और भारतीय कृषि प्रणाली समाप्त कर दी। भारतीय कृषि की रीढ़ तोड़ने के लिये गोहत्या शुरू की गई। भारत में गायों की हत्या के कारण गोबर के रूप में खाद, और गोमूत्र के रूप में कीटनाशक मिलने बंद हो गए। इसी तरह गुरुकुलों पर प्रतिबंध लगाकर गुरुकुलों को आग लगाकर नष्ट कर दिया गया। हजारों आचार्यों की हत्याएं की गईं, ब्राह्मणों से उनके ग्रंथ छीन कर जला दिये गए। ब्राह्मणों को इतना धनहीन कर दिया गया कि वे अपने बच्चों को पढ़ाने में भी असमर्थ हो गए। आज जो भी ग्रंथ बचे हैं, वे इसलिए बचे हैं कि ब्राह्मणों ने रट-रट कर उन्हें कंठस्थ कर लिया था।
५ मई २०२१

मेरा एकमात्र कर्तव्य परमात्मा के प्रकाश को अपनी पूरी क्षमता और सत्यनिष्ठा से फैलाना है। उस से बड़ा और कोई कर्तव्य मेरे लिए नहीं है। चारों ओर के वर्तमान घटनाक्रम से मैं भ्रमित और विचलित सा हो गया था। यह मेरी कमी थी। अब स्वयं को संयत कर लिया है। यह सृष्टि भगवान की है, मेरी नहीं। मेरे बिना भी उनकी सृष्टि चलेगी। भगवान को मेरी सलाह की कोई आवश्यकता नहीं है। मुझे जब उनसे स्पष्ट आश्वासन और मार्गदर्शन प्राप्त है, तब मेरा किसी भी बात पर उद्वेलित होना मेरी कमी है, जो अब और नहीं होनी चाहिए। अपनी भूल सुधार रहा हूँ। मैं सोशियल मीडिया पर रहूँ या न रहूँ, आप अपने में हृदयस्थ सर्वव्यापक ईश्वर के साथ मुझे हर समय निरंतर पाओगे। एक माइक्रोसेकंड के लिए भी मैं आपसे दूर नहीं हूँ। 

गीता का सन्देश भारत का प्राण है। गीता के उपदेश ही भारत को विजयी बनायेंगे। जीवन की हर समस्या का समाधान गीता में है।
"यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥१८:७८॥"
जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन है वहीं पर श्री, विजय, विभूति और ध्रुव नीति है। ऐसा मेरा मत है।

ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !! ५ मई २०२१



हम भगवान के किस रूप की, कौन सी साधना, किस विधि से करें? ---

हम भगवान के किस रूप की, कौन सी साधना, किस विधि से करें? ---
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उपरोक्त प्रश्न का उत्तर हम निज विवेक से अपने स्वभाव, क्षमता, आकांक्षा/अभीप्सा और उपलब्ध साधनों का आंकलन करके ही पा सकते हैं। जहाँ स्वयं का विवेक काम नहीं करता, वहाँ भगवान से मार्गदर्शन की प्रार्थना करें। जहाँ भगवान से भी कोई मार्गदर्शन नहीं मिलता वहाँ किन्हीं ऐसे संत-महात्मा से मार्गदर्शन ले सकते हैं जिन पर हमारी श्रद्धा हो। बिना श्रद्धा के तो कुछ भी नहीं मिलेगा। यदि श्रद्धा नहीं है तो परोपकार का ही कुछ काम करें।
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और कुछ भी नहीं कर सकते तो किसी का बुरा नहीं करें, और अपनी संतुष्टि के लिए कोई समाज सेवा का कार्य करते रहें। आजकल अनेक संस्थाएँ हैं जो समाजसेवा का काम करती हैं, जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने आनुषंगिक संगठनों के साथ। और भी अन्य सैंकड़ों संस्थाएँ हैं जिन में आपका मन लगा रहेगा। किसी धार्मिक क्षेत्र में काम करने की इच्छा है तो अनेक धार्मिक संस्थाएँ हैं। देश के हर भाग में अनेक मंदिर हैं जहाँ चमत्कार घटित होते हैं और लाखों श्रद्धालु हर वर्ष आते हैं। वहाँ भी समय समय पर जाते रहें। मन लगा रहेगा। रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों का स्वाध्याय करते रहें।
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ब्रह्मज्ञान तो हरिःकृपा से ही प्राप्त होता है। लाखों में से एक व्यक्ति की ही रुचि ईश्वर को उपलब्ध होने में होती है। अन्य तो भगवान के साथ व्यापार ही करते हैं। गीता में भगवान कहते हैं --
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥"
अर्थात् - बहुत जन्मों के अन्त में (किसी एक जन्म विशेष में) ज्ञान को प्राप्त होकर कि 'यह सब वासुदेव है' ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है; ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है॥ कृपा शंकर ५ मई २०२३