Saturday, 8 March 2025

परमात्मा को समर्पण किस विधि से करें ?

 परमात्मा को समर्पण किस विधि से करें ? .....

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श्रुति भगवती कहती है ... प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते |
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् || --मुण्डक,2/2/4,
अर्थात प्रणवरूपी धनुष पर आत्मा रूपी बाण चढाकर ब्रह्मरूपी लक्ष्य को प्रमादरहित होकर भेदना चाहिए |
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हे प्रभु, मैं स्वयं को बिना किसी शर्त के आप को सौंप रहा हूँ| तीर से जब बाण छूटता है तब उसका एक ही लक्ष्य होता है| वैसे ही मेरा एकमात्र लक्ष्य आप हैं, अन्य कुछ भी नहीं|
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आप भी मुझ अकिंचन पर अपनी परम कृपा कर के मुझे सदा याद रखें| आपकी यह प्रतिज्ञा है ... "मैं अपने भक्त का मृत्युकाल के समय यदि वे मेरा स्मरण न कर सकें तो मैं स्वयं उनका स्मरण करता हूँ और उन्हे परम गति प्राप्त करा देता हूँ|"
"अहं स्मरामि मद्भक्तं नयामि परमां गतिम् |"
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हे प्रभु, मुझे अब और कुछ भी नहीं कहना है| आप सब जानते हो|
मैं आपका पूर्ण पुत्र हूँ, आपके साथ एक हूँ| ॐ ॐ ॐ ||
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पुनश्चः :--- जब साधक को अपनी चेतना में प्रणव ध्वनि जिसे अनाहत नाद भी कहते हैं, सुननी आरम्भ हो जाए, और ईश्वर लाभ के अतिरिक्त अन्य कोई कामना भी नहीं रहे तो अन्य बीज मन्त्रों के जाप की आवश्यकता नहीं है| फिर साधक इस ध्वनि को ही सुनता रहे और ॐ ॐ ॐ ॐ .... का ही मानसिक जाप करता रहे| इस ध्वनी को सम्पूर्ण सृष्टि में और उससे भी परे विस्तृत कर दे और अपने स्वयं के अस्तित्व को भी उसी में समर्पित कर दे|
एक बार आँख खोलकर अपनी देह को देखो और यह भाव दृढ़ करो कि मैं यह शरीर नहीं हूँ, बल्कि मैं सम्पूर्ण अस्तित्व और उससे भी परे जो है वह सब मैं ही हूँ| अपने आप को उस पूर्णता में समर्पित कर दें| परमात्मा का परम प्रेम यह ओंकार की ध्वनि ही है और वह परम प्रेम जिससे यह सम्पूर्ण सृष्टि बनी है वह परम प्रेम मैं ही हूँ|
ॐ ॐ ॐ ||
८ मार्च २०१७ . पुनश्च: --- जब साधक को अपनी चेतना में प्रणव ध्वनि जिसे अनाहत नाद भी कहते हैं, सुननी आरम्भ हो जाए, और ईश्वर लाभ के अतिरिक्त अन्य कोई कामना भी नहीं रहे तो अन्य बीज मन्त्रों के जाप की आवश्यकता नहीं है| फिर साधक इस ध्वनि को ही सुनता रहे और ॐ ॐ ॐ ॐ .... का ही मानसिक जाप करता रहे| इस ध्वनी को सम्पूर्ण सृष्टि में और उससे भी परे विस्तृत कर दे और अपने स्वयं के अस्तित्व को भी उसी में समर्पित कर दे|
एक बार आँख खोलकर अपनी देह को देखो और यह भाव दृढ़ करो कि मैं यह शरीर नहीं हूँ, बल्कि मैं सम्पूर्ण अस्तित्व और उससे भी परे जो है वह सब मैं ही हूँ| अपने आप को उस पूर्णता में समर्पित कर दें| परमात्मा का परम प्रेम यह ओंकार की ध्वनि ही है और वह परम प्रेम जिससे यह सम्पूर्ण सृष्टि बनी है वह परम प्रेम मैं ही हूँ|

Friday, 7 March 2025

पंचमुखी महादेव का रहस्य ---

 पंचमुखी महादेव का रहस्य ---

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मुझे पंचमुखी महादेव पर कुछ लिखने की प्रेरणा भगवान से हो रही है, इसीलिए लिख रहा हूँ। इसे वे ही उन्नत साधक समझ पाएंगे, जो योगमार्ग की साधना करते हैं। योगमार्ग की उच्चतम साधना ही पंचमुखी महादेव के ध्यान द्वारा दर्शन, उनमें समर्पण और उनकी परमज्योति का भेदन है, जिसके पश्चात जीव स्वयं शिव हो जाता है। उसका कोई पृथक अस्तित्व नहीं रहता। सारे योगी पञ्चमुखी महादेव का ही ध्यान करते हैं।
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गुरु की आज्ञा से हम भ्रूमध्य में ध्यान करते हैं। ध्यान करते करते गुरुकृपा से एक दिन एक ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होती है, उसका रंग आरंभ में धुंधला सफेद होता है, जो कुछ महीनों पश्चात बहुत प्रखर गहरा चमकीला सफेद हो जाता है। वह ज्योति एक सफेद पञ्चकोणीय नक्षत्र में परिवर्तित हो जाती है जिसके चारों ओर एक नीला आवरण होता है। वह नीला आवरण - एक स्वर्णिम आवरण से घिरा रहता है। यह पञ्चकोणीय नक्षत्र ही अपने इन श्वेत, नीले और स्वर्णिम आवरणों के साथ -- पञ्चमुखी महादेव हैं, जो योगियों के आराध्य हैं। इनके ध्यान से स्वतः ही प्रणव का नाद सुनाई देने लगता है।
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यह स्वर्णिम आभा -- सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा जी की है। यह नीली आभा -- भगवान विष्णु जी की है, और यह चमकीले श्वेत पंचकोणीय श्वेत नक्षत्र -- स्वयं भगवान परमशिव हैं, जो पंचमुखी महादेव के रूप में दर्शन दे रहे हैं। ये ही मेरे आराध्य देव हैं, जिनका ध्यान मुझे निमित्त बनाकर निरंतर वे स्वयं कर रहे हैं। हर समय उन्हीं की चेतना में रहना ही मेरी उपासना है। उनके सिवाय मुझे कुछ भी अन्य का ज्ञान नहीं है।
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त्रिनेत्रधारी पञ्चमुखी महादेव के पांचों मुखों के नाम — सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान हैं, जिनसे पांच तत्वों -- जल, वायु, अग्नि, आकाश, और पृथ्वी की उत्पत्ति हुई है। भगवान शिव के ये पांच मुख -- पंचतत्व हैं।
सद्योजात -- पृथ्वी-तत्व मूलाधार चक्र है। वामदेव -- जल-तत्व स्वाधिष्ठान चक्र है। अघोर -- अग्नि-तत्व मणिपुर चक्र है। तत्पुरुष -- वायु-तत्व अनाहत चक्र है। ईशान -- आकाश-तत्व विशुद्धि चक्र है।
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शास्त्रों में इन पांचों मुखों की आराधना के पृथक पृथक बीजमंत्र और मंत्र हैं, जिनका जप इनकी आराधना के लिए किया जाता है।
इनकी साधना की विधि और मंत्र जानने के लिए किन्हीं ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय आचार्य की शरण लेनी होगी। बड़ी विनम्रता से उनके श्रीचरणों में बैठकर उपदेश और आदेश लें। जितना मुझे बताने का आदेश मिला, उतना ही मैंने लिखा है।
भगवान परमशिव को नमन !!
महादेव महादेव महादेव !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
९ मार्च २०२३

"You be what I am" ---

 

"You be what I am"
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जिन्होंने कभी जन्म ही नहीं लिया, उनकी कभी मृत्यु भी नहीं हो सकती। वे परमशिव के साथ एक हैं। उन का ध्यान हमें इस देह की चेतना से मुक्त कर सकता है।
महादेव महादेव महादेव ! ॐ ॐ ॐ !!
एक दिन ध्यान में अचानक ही गुरु महाराज की परम तेजस्वी छवि सामने आई। उनके चेहरे पर अवर्णनीय तेज था। उन्होंने मुझे खूब देर तक देखा, और आंग्ल भाषा में एक आदेश दिया -- "You be what I am", और चले गए। उनके कहने का पूरा अभिप्राय मैँ समझ गया। उनके कहने का अभिप्राय था कि - "मैं ईश्वर के साथ एक हूँ, तुम भी ईश्वर को प्राप्त करो, अन्य बातों की ओर ध्यान मत दो, जो मैं हूँ वह तुम बनो।"
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उस दिन से मुझे बोध हो गया कि गुरु कोई शरीर नहीं होता। वे एक तत्व होते हैं जो विभिन्न देहों में हमारे मार्गदर्शन के लिए आते हैं। तब से उनसे पृथकता का बोध कभी नहीं हुआ। ईश्वर में वे मेरे साथ एक है, और मैं भी उनके साथ एक हूँ। मेरे इस जीवन का एकमात्र लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति है, अन्य सब विक्षेप है। हम एक निमित्त मात्र हैं, सारी साधना तो हमें माध्यम बना कर भगवान स्वयं कर रहे हैं। वे ही गुरु हैं जो हम से कभी पृथक नहीं हो सकते।
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ॐ तत्सत् !! ॐ गुरु !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
७ मार्च २०२३

शिवरात्रि की अनंत शुभ कामनाएँ ---

 शिवरात्रि की अनंत शुभ कामनाएँ ---

"ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च।
मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च॥"
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जीवन का मूल उद्देश्य है -- शिवत्व की प्राप्ति। शिवत्व को कैसे प्राप्त करें? इस का उत्तर है -- कूटस्थ में ओंकार रूप में परमशिव का ध्यान। यह किसी कामना की पूर्ती के लिए नहीं, बल्कि कामनाओं के नाश के लिए है। आते जाते हर साँस के साथ उनका चिंतन-मनन और समर्पण -- उनकी परम कृपा की प्राप्ति करा कर आगे का मार्ग प्रशस्त कराता है। जब मनुष्य की ऊर्ध्व चेतना जागृत होती है, तब उसे स्पष्ट ज्ञान हो जाता है कि संसार की सबसे बड़ी उपलब्धि है -- कामना और इच्छा की समाप्ति।
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जीवन में अंधकारमय प्रतिकूल झंझावात आते ही रहते हैं, जिनसे हमें विचलित नहीं होना चाहिए। इनसे तो हमारी प्रखर चेतना ही जागृत होती है, व अंतर का सौंदर्य और भी अधिक निखर कर बाहर आता है। किसी भी परिस्थिति में अपनी नियमित आध्यात्मिक उपासना न छोड़ें। बड़ी कठिनाई से हमें भगवान की भक्ति का यह अवसर मिला है। कहीं ऐसा न हो कि हमारी ही उपेक्षा से भगवान को पाने की हमारी अभीप्सा ही समाप्त हो जाए। कभी भी विचलित न हों। हम सब सच्चिदानंद परमात्मा परमशिव की ही अभिव्यक्तियाँ हैं।
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श्रुति भगवती कहती है -- ‘शिवो भूत्वा शिवं यजेत्’ यानि शिव बनकर शिव की उपासना करो। जिन्होने वेदान्त को निज जीवन में अनुभूत किया है वे तो इस तथ्य को समझ सकते हैं, पर जिन्होने गीता का गहन स्वाध्याय किया है वे भी अंततः इसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे। तत्व रूप में शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है। गीता के भगवान वासुदेव ही वेदान्त के ब्रह्म हैं। वे ही परमशिव हैं।
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"शिव" का अर्थ शिवपुराण के अनुसार -- जिन से जगत की रचना, पालन और नाश होता है, जो इस सारे जगत के कण कण में संव्याप्त है, वे शिव हैं। जो समस्त प्राणधारियों की हृदय-गुहा में निवास करते हैं, जो सर्वव्यापी और सबके भीतर रम रहे हैं, वे ही शिव हैं।
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साधना की दृष्टि से हिन्दू धर्म में चार रात्रियों का बड़ा महत्व है -- कालरात्रि (दीपावली), दारुणरात्रि (होली), मोहरात्रि (जन्माष्टमी), और महारात्रि (महाशिवरात्रि)। इन रात्रियों को की गई उपासना कई गुना अधिक फलदायी होती हैं। महाशिवरात्रि शिव तत्व की उपासना के लिए है। अगम्य और अति गूढ शिव तत्व को समझाने के लिए अनेक कथा-कहानियाँ रची गई हैं। महत्व साधना का है, न कि किसी प्रकार के आडंबर का।
महाशिवरात्रि पर दिन में थोड़ा विश्राम कर लें, और रात भर शिवभाव में स्थित होकर शिव की उपासना करें। शिवकृपा होगी।
कृपा शंकर
७ मार्च २०२४

Tuesday, 4 March 2025

माया के आवरण को भेद कर हरिः चरणों को भजो

 महात्माओं के सत्संग में बार बार कहा जाता है कि -- "माया के आवरण को भेद कर हरिः चरणों को भजो"।

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माया का आवरण तो समझ में आता है। विषय भोगों की कामना, अभिमान, लोभ, और गलत आचरण व गलत विचार - ये ही माया के आवरण हो सकते हैं। अब प्रश्न उठता है कि हरिः के चरण क्या हैं? कोई चित्र या प्रतीक तो हरिः का चरण नहीं हो सकता। इस विषय पर खूब विचार किया है। जिस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ, वही लिख रहा हूँ। मेरे लेखों को अनेक महात्मा पढ़ कर मुझ पर अनुग्रह करते हैं।वे भी कुछ प्रकाश डालने की कृपा करें।
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ध्यान साधना में भ्रूमध्य में दिखाई देने वाली ब्रह्मज्योति धीरे धीरे कुछ काल पश्चात सहस्त्रारचक्र में दिखाई देने लगती है। उसके साथ साथ एक नाद भी सुनाई देने लगता है। वह ज्योति और नाद ही भगवान श्रीहरिः के चरणकमल हैं। भगवान श्रीहरिः ही सद्गुरु हैं, वे सब गुरुओं के गुरु हैं। उस ज्योति और नाद का ध्यान ही भगवान और श्रीगुरु महाराज के चरम कमलों का ध्यान है। उसी में समर्पण, गुरुचरणों में समर्पण व शरणागति है।
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आप सब महान आत्माओं का अनुग्रह और कृपा मुझ अकिंचन पर बनी रहे। आपके आशीर्वचनों से ही मेरा कल्याण हो सकता है। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
५ मार्च २०२२

ॐ नमो नृसिंहाय, हिरण्यकशिपोर्वक्षस्थल विदारनाय ---

 ॐ नमो नृसिंहाय, हिरण्यकशिपोर्वक्षस्थल विदारनाय ---

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हिरण्यकशिपु इसी समय मेरे भीतर जीवित है। मेरा लोभ और अहंकार ही हिरण्यकशिपु है। भगवान नृसिंह ने जिस तरह हिरण्यकशिपु को अपनी गोद में लेटाकर उसका वक्षस्थल विदीर्ण कर दिया था, वैसे ही वे मेरे लोभ व अहंकार रूपी हिरण्यकशिपु को मार डालें। कुछ बचे तो उन का प्रेम ही बचे, बाकी सब नष्ट हो जाये।
भारत के भीतर और बाहर के सभी शत्रुओं का नाश हो। भारत में कहीं भी असत्य का अंधकार न रहे। यही होली की शुभ कामनाएँ हैं !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
मार्च २०२३

Thursday, 27 February 2025

हमारे निज जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो ---

 (१) हमारे निज जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो।

(२) सनातन-धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण हो।
(३) भारत में व्याप्त असत्य के अंधकार का पूरी तरह पराभव हो, और भारत एक सत्यनिष्ठ, धर्मसापेक्ष, अखंड हिन्दू-राष्ट्र बने, जहाँ की राजनीति सत्य-सनातन-धर्म हो।
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हिन्दुत्व क्या है? -- हिन्दुत्व एक ऊर्ध्वमुखी चेतना है जिसका लक्ष्य जीवन में भगवत्-प्राप्ति है। वह प्रत्येक व्यक्ति हिन्दू है जिसके हृदय में भगवान के प्रति परमप्रेम है, जिसका आचरण सत्यनिष्ठ है और जो निज जीवन में भगवान को प्राप्त करना चाहता है; चाहे वह इस पृथ्वी पर कहीं भी रहता हो। आत्मा की शाश्वतता, कर्मफल, पुनर्जन्म, भक्ति, आध्यात्म और ईश्वर की उपासना -- ये ही सनातन सिद्धान्त हैं, जिनसे यह सृष्टि चल रही है।
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इन्हीं उद्देश्यों के लिए हमारी आध्यात्मिक साधना है, जिसके लिए परमात्मा से पूरा मार्गदर्शन प्राप्त है। इसके अतिरिक्त मुझ अभी तो इस समय और कुछ भी नहीं कहना है।
ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत् !!
२५ सितंबर २०२१ . पुनश्च: --- सभी प्रबुद्ध लोगों से एक प्रार्थना है कि हिन्दुत्व को एक सीमित भौगोलिकता में परिभाषित न कर, इसे सार्वभौमिक बनाएँ। आत्मा की शाश्वतता, कर्मफलों का सिद्धांत, पुनर्जन्म, और ईश्वर के अवतारों में आस्था ---- ये सनातन धर्म के आधार हैं। जो भी व्यक्ति इन्हें मानता है, वह स्वतः ही हिन्दू है चाहे वह इस पृथ्वी के किसी भी भाग पर रहता हो। मनु-स्मृति में धर्म के दस लक्षण दिए हैं। उनका विलोम ही अधर्म है।