Friday, 21 February 2025

बुद्धि और कुबुद्धि का युग समाप्त होकर धर्म और अधर्म पर चर्चा और विमर्श का युग आरंभ होने वाला है ---

 बुद्धि और कुबुद्धि का युग समाप्त होकर धर्म और अधर्म पर चर्चा और विमर्श का युग आरंभ होने वाला है। मनुष्य की बुद्धि और कुबुद्धि ने जितने भी मत-मतांतर और वाद उत्पन्न किए हैं, वे महत्वहीन होकर सब समाप्त हो जाएँगे।

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अगला युग धर्म-अधर्म पर विमर्श का ही होगा। मनुष्य का चिंतन इन्हीं दो विचारों के मध्य होगा कि धर्म क्या है, और अधर्म क्या है। सारे मज़हब, रिलीजन, और वाद (जैसे साम्राज्यवाद, नाजीवाद, साम्यवाद, समाजवाद, फासीवाद, पूंजीवाद, अल्पसंख्यकवाद आदि आदि) सब महत्वहीन और समाप्त हो जाएँगे। विश्व की अधिकांश जनसंख्या भी समाप्त हो जाएगी। यह होता हुआ आप अपने जीवनकाल में ही देखेंगे। मनुष्य जाति की वर्तमान सभ्यता अधिक से अधिक तीस वर्षों की है। इसकी अनुभूति मुझे अनेक बार हुई है।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२२ नवंबर २०२३

आने वाला समय सत्य-सनातन-धर्म का है ---

आने वाला समय सत्य-सनातन-धर्म का है। अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। शीघ्रातिशीघ्र ही समय समीप आ रहा है। एक महाविनाशलीला के भी हम साक्षी होंगे, लेकिन जो स्वधर्म का पालन करेंगे, उनकी रक्षा होगी। हम शाश्वत आत्मा हैं, यह भौतिक देह नहीं। आत्मा का स्वधर्म है -- परमात्मा को परमप्रेम और समर्पण।

भविष्य में चर्चाओं का मुख्य विषय होगा -- धर्म और अधर्म।
मैं कुछ समय तक अस्थायी रूप से उपलब्ध नहीं रहूँगा। मैं किसको नमन करूँ? जिधर भी देखता हूँ, केवल मेरे प्रभु ही प्रभु हैं। कोई अन्य नहीं है। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
६ दिसंबर २०२३

राम लला तो बिराजमान हो गये हैं, अब रावण का वध भी होगा ---

 राम लला तो बिराजमान हो गये हैं। अब रावण का वध भी होगा।

(प्रश्न) रावण कौन है? ---
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(उत्तर) मार्क्सवाद, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षतावाद, पूंजीवाद, नाजीवाद, फासीवाद, साम्यवाद, अल्पसंख्यकवाद, अगड़ा-पिछड़ावाद, जातिवाद और अन्य सारे वाद -- ये सब आसुरी/राक्षसी भाव हैं, जिन्होंने किसी का भी भला नहीं किया; सब को दुःख ही दुःख दिया है।
चर्चा सिर्फ "धर्म" और "अधर्म" पर ही होनी चाहिए, न कि इन सब वादों पर। युग-परिवर्तन हो रहा है। नए युग में ये सब वाद समाप्त हो जाएँगे। हमारी चेतना में सिर्फ धर्म और अधर्म ही रहेंगे॥ ॐ तत्सत् !!
२६ जनवरी २०२४

Wednesday, 19 February 2025

सृष्टि बीज', 'संहार बीज' और 'अजपा जप' ......

 सृष्टि बीज', 'संहार बीज' और 'अजपा जप' ......

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जब हम सामान्यतः साँस लेते हैं तब स्वाभाविक रूप से "हं" की ध्वनी उत्पन्न होती है, यह ध्वनी 'संहार बीज' है| और जब साँस छोड़ते हैं तब "सः" की ध्वनी उत्पन्न होती है, यह 'सृष्टि बीज' है| जब हम निरंतर चल रही इन ध्वनियों को सजग होकर सुनते हैं तब "हं सः" मन्त्र बनता है| यह एक बहुत उन्नत साधना है जो "अजपा-जप" कहलाती है| साँस लेते समय "हं" का मानसिक जाप, और छोड़ते समय "सः" का मानसिक जाप "अजपा गायत्री" कहलाता है| अचेतन रूप से हर मनुष्य इस मन्त्र का दिन में लगभग २१,६०० बार जाप करता है| अति उन्नत साधकों का क्रम स्वतः बदल जाता है, और यह मन्त्र "हंसः" से "सोहं" हो जाता है|
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इस साधना में साधक भ्रूमध्य में एक प्रकाश की भावना करता है जिसे वह समस्त ब्रह्मांड में फैला देता है और यह भाव रखता है की मैं सर्वव्यापी ज्योतिर्मय हूँ, यह देह नहीं| धीरे धीरे यह प्रकाश निरंतर दिखाई देने लगता है और कूटस्थ में ओंकार की ध्वनी सुनाई देने लगती है| यह एक बहुत उन्नत साधना है अतः परमात्मा को समर्पित होकर पूर्ण भक्तिभाव से करनी चाहिए|
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ॐ तत्सत् ! ॐ शिव ! तत्वमसि ! सोsहं | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
१७ अक्तूबर २०१६

संसार में रहते हुए शास्त्राज्ञानुसार स्वधर्म का पालन एक युद्ध ही है --

 संसार में रहते हुए शास्त्राज्ञानुसार स्वधर्म का पालन एक युद्ध ही है --

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प्रातःकाल उठते ही भगवती (जगन्माता) की अनुभूति प्राणतत्व के रूप में होती है, जो प्रेममय और आनंदमय कर देती है। उनका ध्यान बड़ा आनंददायक है, उस से बाहर निकलने का मन नहीं करता। लेकिन थोड़ी देर बाद जब संसार पकड़ लेता है, तब सांसारिक चेतना में आना ही पड़ता है। इसीलिए गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं --
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
अर्थात् -- इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
Therefore meditate always on Me, and fight; if thy mind and thy reason be fixed on Me, to Me shalt thou surely come.
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स्वनामधन्य भगवन आचार्य शंकर अपने भाष्य में कहते हैं --
"तस्मात् सर्वेषु कालेषु माम् अनुस्मर यथाशास्त्रम्। युध्य च युद्धं च स्वधर्मं कुरु। मयि वासुदेवे अर्पिते मनोबुद्धी यस्य तव स त्वं मयि अर्पितमनोबुद्धिः सन् मामेव यथास्मृतम् एष्यसि आगमिष्यसि असंशयः न संशयः अत्र विद्यते।।किञ्च --,"
भावार्थ -- क्योंकि इस प्रकार अन्तकाल की भावना ही अन्य शरीर की प्राप्ति का कारण है -- इसलिये तूँ हर समय मेरा स्मरण कर और शास्त्राज्ञानुसार स्वधर्मरूप युद्ध भी कर। इस प्रकार मुझ वासुदेव में जिसके मनबुद्धि अर्पित हैं ऐसा तू मुझमें अर्पित किये हुए मनबुद्धि वाला होकर मुझको ही अर्थात् मेरे यथाचिन्तित स्वरूप को ही प्राप्त हो जायगा इसमें संशय नहीं है।
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हम यह नश्वर देह नहीं, एक शाश्वत आत्मा हैं। आत्मा का स्वधर्म निरंतर परमात्मा का स्मरण है। भगवान श्रीकृष्ण हमें निरंतर अपने स्वधर्म के पालन करने, और स्वधर्म में ही मरने को कहते हैं।
ॐ तत्सत् !! सोहं !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥ श्रीमते रामचंद्राय नमः॥
कृपा शंकर
२४ सितंबर २०२३

भगवान मुझ पर अपनी परम कृपा करें। मेरे हृदय की पीड़ा शांत हो ---

 भगवान मुझ पर अपनी परम कृपा करें। मेरे हृदय की पीड़ा शांत हो ---

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स्वयं में अपूर्णता का जरा सा भी बोध बड़ा पीड़ादायक होता है। भगवान अपनी परम कृपा कर के मुझे सब कामनाओं से निःस्पृहता प्रदान कर अपने ही स्वरूप में स्थित करें। तभी मेरे हृदय की पीड़ा शांत होगी। तब तक यह जीवन कष्टमय और अशांत ही रहेगा।
गीता में भगवान बाह्य चिंतन को छोड़कर केवल आत्मा में ही स्थित होने को कहते हैं। साथ साथ यह भी बता रहे हैं कि जब तक भोगों की तृष्णा है, तब तक यह संभव नहीं है।
"यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥६:१८॥"
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भगवान कहते हैं --
"यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥६:१९॥"
इसका भावार्थ होगा कि जैसे वायुरहित स्थान में रखे हुये दीपक की लौ विचलित नहीं होती, वैसी ही हमारे चित्त की गति हो। (भगवान यही अपेक्षा मुझ से रखते हैं)
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हे प्रभु, आपकी जय हो। अपनी परम कृपा करो। मैं कभी तत्व से विचलित न होऊँ, सदा निरंतर आप में स्थित रहूँ, और विषय-वासनाओं का चिंतन भूल से भी न हो।
"नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये,
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे,
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥"
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ॐ तत्सत् !! सोहं !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥ श्रीमते रामचंद्राय नमः॥
कृपा शंकर
२५ सितंबर २०२३

Monday, 17 February 2025

(१) भगवान का स्मरण हम कैसे, किस रूप में, और कब करें?

 (प्रश्न) : भगवान का स्मरण हम कैसे, किस रूप में, और कब करें?

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(उत्तर) : यह बहुत ही व्यक्तिगत प्रश्न है जो स्वयं से ही प्रत्येक व्यक्ति को पूछना चाहिए। यदि स्वयं पर विश्वास नहीं है तो जिन को हमने गुरु बनाया है, उन गुरु महाराज से पूछना चाहिए। यदि फिर भी कोई संशय है, तो भगवान पर आस्था रखते हुए स्वयं भगवान से ही पूछना चाहिए। इसके लिए श्रीमद्भगवद्गीता का और उपनिषदों का स्वाध्याय स्वयं करें, और जैसा भगवान ने बताया है, वैसे ही करें। किसी भी तरह का कोई भी संशय निज मानस में नहीं रहना चाहिये। मेरा अनुभव है कि हरेक आध्यात्मिक प्रश्न का उत्तर निश्चित रूप से भगवान से मिलता है। आध्यात्म में कुछ भी अस्पष्ट नहीं है। सब कुछ एकदम स्पष्ट है।
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मेरी तीर्थयात्रा -- मेरा व्यक्तिगत निजी अनुभव है जो अति दिव्य और अवर्णनीय है। यह यात्रा भगवान स्वयं करते हैं, जिसका मैं एक निमित्त साक्षी मात्र हूँ। यह यात्रा लगातार अविछिन्न रूप से चलती रहती है। मैं इस यात्रा में परमात्मा को केवल समर्पण ही कर सकता हूँ, अन्य कोई विकल्प नहीं है। उन सभी तीर्थयात्रियों को मैं नमन करता हूँ, जो तीर्थों से पवित्र होकर आते हैं। तीर्थों से हमें स्वतः ही वह सत्संग प्राप्त होता है जो अनायास ही ज्ञान, भक्ति और वैराग्य प्रदान करता है। यह पुण्य-कर्म है धर्म-कार्य है और सभी धर्मनिष्ठ लोगों का कर्तव्य है।
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हिन्दू मंदिरों की संरचना ऐसी होती है जहाँ का वातावरण साधना के अनुकूल होता है, जहाँ जाते ही मन समर्पण और भक्तिभाव से भर जाता है। मंदिर में हम भगवान से कुछ मांगने नहीं, उनको समर्पित होने जाते हैं। यह समर्पण का भाव ही हमारी रक्षा करता है।
. द्वैत-अद्वैत, साकार-निराकार, और सगुण-निर्गुण --- ये सब बुद्धि-विलास की बातें हैं। इनमें कोई सार नहीं है। अपने स्वभाव और प्रकृति के अनुकूल जो भी साधना संभव है, हो, वह अधिकाधिक कीजिये। भगवान को अपना परमप्रेम पूर्ण रूप से दीजिये, यही एकमात्र सार की बात है। कृपा शंकर
१७ फरवरी २०२५