Wednesday, 19 February 2025

संसार में रहते हुए शास्त्राज्ञानुसार स्वधर्म का पालन एक युद्ध ही है --

 संसार में रहते हुए शास्त्राज्ञानुसार स्वधर्म का पालन एक युद्ध ही है --

.
प्रातःकाल उठते ही भगवती (जगन्माता) की अनुभूति प्राणतत्व के रूप में होती है, जो प्रेममय और आनंदमय कर देती है। उनका ध्यान बड़ा आनंददायक है, उस से बाहर निकलने का मन नहीं करता। लेकिन थोड़ी देर बाद जब संसार पकड़ लेता है, तब सांसारिक चेतना में आना ही पड़ता है। इसीलिए गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं --
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
अर्थात् -- इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
Therefore meditate always on Me, and fight; if thy mind and thy reason be fixed on Me, to Me shalt thou surely come.
.
स्वनामधन्य भगवन आचार्य शंकर अपने भाष्य में कहते हैं --
"तस्मात् सर्वेषु कालेषु माम् अनुस्मर यथाशास्त्रम्। युध्य च युद्धं च स्वधर्मं कुरु। मयि वासुदेवे अर्पिते मनोबुद्धी यस्य तव स त्वं मयि अर्पितमनोबुद्धिः सन् मामेव यथास्मृतम् एष्यसि आगमिष्यसि असंशयः न संशयः अत्र विद्यते।।किञ्च --,"
भावार्थ -- क्योंकि इस प्रकार अन्तकाल की भावना ही अन्य शरीर की प्राप्ति का कारण है -- इसलिये तूँ हर समय मेरा स्मरण कर और शास्त्राज्ञानुसार स्वधर्मरूप युद्ध भी कर। इस प्रकार मुझ वासुदेव में जिसके मनबुद्धि अर्पित हैं ऐसा तू मुझमें अर्पित किये हुए मनबुद्धि वाला होकर मुझको ही अर्थात् मेरे यथाचिन्तित स्वरूप को ही प्राप्त हो जायगा इसमें संशय नहीं है।
.
हम यह नश्वर देह नहीं, एक शाश्वत आत्मा हैं। आत्मा का स्वधर्म निरंतर परमात्मा का स्मरण है। भगवान श्रीकृष्ण हमें निरंतर अपने स्वधर्म के पालन करने, और स्वधर्म में ही मरने को कहते हैं।
ॐ तत्सत् !! सोहं !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥ श्रीमते रामचंद्राय नमः॥
कृपा शंकर
२४ सितंबर २०२३

भगवान मुझ पर अपनी परम कृपा करें। मेरे हृदय की पीड़ा शांत हो ---

 भगवान मुझ पर अपनी परम कृपा करें। मेरे हृदय की पीड़ा शांत हो ---

.
स्वयं में अपूर्णता का जरा सा भी बोध बड़ा पीड़ादायक होता है। भगवान अपनी परम कृपा कर के मुझे सब कामनाओं से निःस्पृहता प्रदान कर अपने ही स्वरूप में स्थित करें। तभी मेरे हृदय की पीड़ा शांत होगी। तब तक यह जीवन कष्टमय और अशांत ही रहेगा।
गीता में भगवान बाह्य चिंतन को छोड़कर केवल आत्मा में ही स्थित होने को कहते हैं। साथ साथ यह भी बता रहे हैं कि जब तक भोगों की तृष्णा है, तब तक यह संभव नहीं है।
"यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥६:१८॥"
.
भगवान कहते हैं --
"यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥६:१९॥"
इसका भावार्थ होगा कि जैसे वायुरहित स्थान में रखे हुये दीपक की लौ विचलित नहीं होती, वैसी ही हमारे चित्त की गति हो। (भगवान यही अपेक्षा मुझ से रखते हैं)
.
हे प्रभु, आपकी जय हो। अपनी परम कृपा करो। मैं कभी तत्व से विचलित न होऊँ, सदा निरंतर आप में स्थित रहूँ, और विषय-वासनाओं का चिंतन भूल से भी न हो।
"नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये,
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे,
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥"
.
ॐ तत्सत् !! सोहं !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥ श्रीमते रामचंद्राय नमः॥
कृपा शंकर
२५ सितंबर २०२३

Monday, 17 February 2025

(१) भगवान का स्मरण हम कैसे, किस रूप में, और कब करें?

 (प्रश्न) : भगवान का स्मरण हम कैसे, किस रूप में, और कब करें?

.
(उत्तर) : यह बहुत ही व्यक्तिगत प्रश्न है जो स्वयं से ही प्रत्येक व्यक्ति को पूछना चाहिए। यदि स्वयं पर विश्वास नहीं है तो जिन को हमने गुरु बनाया है, उन गुरु महाराज से पूछना चाहिए। यदि फिर भी कोई संशय है, तो भगवान पर आस्था रखते हुए स्वयं भगवान से ही पूछना चाहिए। इसके लिए श्रीमद्भगवद्गीता का और उपनिषदों का स्वाध्याय स्वयं करें, और जैसा भगवान ने बताया है, वैसे ही करें। किसी भी तरह का कोई भी संशय निज मानस में नहीं रहना चाहिये। मेरा अनुभव है कि हरेक आध्यात्मिक प्रश्न का उत्तर निश्चित रूप से भगवान से मिलता है। आध्यात्म में कुछ भी अस्पष्ट नहीं है। सब कुछ एकदम स्पष्ट है।
.
मेरी तीर्थयात्रा -- मेरा व्यक्तिगत निजी अनुभव है जो अति दिव्य और अवर्णनीय है। यह यात्रा भगवान स्वयं करते हैं, जिसका मैं एक निमित्त साक्षी मात्र हूँ। यह यात्रा लगातार अविछिन्न रूप से चलती रहती है। मैं इस यात्रा में परमात्मा को केवल समर्पण ही कर सकता हूँ, अन्य कोई विकल्प नहीं है। उन सभी तीर्थयात्रियों को मैं नमन करता हूँ, जो तीर्थों से पवित्र होकर आते हैं। तीर्थों से हमें स्वतः ही वह सत्संग प्राप्त होता है जो अनायास ही ज्ञान, भक्ति और वैराग्य प्रदान करता है। यह पुण्य-कर्म है धर्म-कार्य है और सभी धर्मनिष्ठ लोगों का कर्तव्य है।
.
हिन्दू मंदिरों की संरचना ऐसी होती है जहाँ का वातावरण साधना के अनुकूल होता है, जहाँ जाते ही मन समर्पण और भक्तिभाव से भर जाता है। मंदिर में हम भगवान से कुछ मांगने नहीं, उनको समर्पित होने जाते हैं। यह समर्पण का भाव ही हमारी रक्षा करता है।
. द्वैत-अद्वैत, साकार-निराकार, और सगुण-निर्गुण --- ये सब बुद्धि-विलास की बातें हैं। इनमें कोई सार नहीं है। अपने स्वभाव और प्रकृति के अनुकूल जो भी साधना संभव है, हो, वह अधिकाधिक कीजिये। भगवान को अपना परमप्रेम पूर्ण रूप से दीजिये, यही एकमात्र सार की बात है। कृपा शंकर
१७ फरवरी २०२५

Friday, 14 February 2025

ध्यान-साधना व भक्ति द्वारा हम कर्मफलों से स्वयं को मुक्त कर सकते हैं ---

ध्यान-साधना व भक्ति द्वारा हम कर्मफलों से स्वयं को मुक्त कर सकते हैं। यह एक अंधविश्वास है कि कर्मफलों को भोगने को हम बाध्य हैं। यदि हम बीते हुए कल की अपेक्षा आज अधिक आनंदमय हैं तो निश्चित रूप से आध्यात्मिक प्रगति कर रहे हैं, अन्यथा नहीं कर रहे हैं। आध्यात्मिक प्रगति का एकमात्र मापदंड यही है।
.
ब्रह्मज्ञान ही सच्चा प्रकाश है, और ब्रह्मज्ञान में लीन होकर रहना ही श्रेष्ठ तीर्थ है। परमशिव ही हमारे एकमात्र संबंधी हैं, उनमें तन्मय हो जाना ही आनन्द का साधन है। परमात्मा का स्मरण कभी न छूटे, चाहे यह देह इसी समय छूट कर यहीं भस्म हो जाये। परमात्मा के प्रति अहैतुकी (Unconditional) परम प्रेम का उदय, मनुष्य जीवन की महानतम उपलब्धी है। १५ फरवरी २०२५

“परमतत्त्व ज्ञानगम्य कब होगा ?"

 “परमतत्त्व ज्ञानगम्य कब होगा ?"

(ब्रह्मलीन स्वामी मृगेंद्र सरस्वती "सर्वज्ञ शङ्करेन्द्र" द्वारा २१ फरवरी २०१४ को प्रेषित लेख)
.
"इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥१३:१९॥"
नारायण ! भगवान् पहले ज्ञान का निरूपण करते हुए फिर संक्षेप में ज्ञेय का निरूपण किया । ज्ञान और ज्ञेय का निरूपण करते हुए अपने प्रिय सखा अर्जुन को माध्यम बनाकर सारे जगत् को बता तो दिया , लेकिन यह ज्ञानगम्य किसे होगा? अनुभव में परिणत कब होगा? तब भगवान् ने कहा " मद्भक्तः " जो परमेश्वर से अनुपम प्रेम करेगा वही इसका साक्षाद् अनुभव कर सकेगा । भगवान् कहते अनुभव होने पर वह मेरा ही स्वरूप होगा । भगवान् ने परमात्मा के लिए असीम प्रेम मोक्ष का साधन बतलाया ।
.
नारायण ! कश्मीर में " पामपुर " नामक ग्राम के आस - पास केशर की खेती होती है । वहाँ प्रायः साढ़े सात सौ वर्ष पूर्व एक कन्या उन्पन्न हुई । जिसका नाम था " पद्मा " । मुस्लिम राज्य था । राजनैतिक उथल - पुथल थी । कन्या ब्राह्मण के घर पैदा हुई थी । उस युग में ब्याह छोटी उम्र में कर दिया जाता था । बारह साल की थी तब उस लड़की का ब्याह हो गया । ससुराल गयी तो वहाँ उसकी सास सौतेली थी , पति की अपनी माँ मर चुकी थी , सौतेली माँ थी । सास को इस लड़की के प्रति कोई सद्भाव नहीं था । हमेशा उसे क्लेश ही देती रहती थी । फिर भी यह लड़की शिकायत करती नहीं थी । अन्यीं को मालूम न पड़े इसलिये सास जब बहु को भोजन परोसती थी तो पहले एक पत्थर रख कर उसे चावल के भात से ढाँक देती थी । घर में सब समझे कि बहू बहुत खाती है । उन्हें क्या पता था कि उसके अन्दर पत्थर रख कर भात से ढँका गया है ! पर वह पद्मा चुपचाप सहती रही । यह तपस्या जीवन में आवश्यक है । जो व्यक्ति हमेशा परिस्थितियों को बदलने में लगा रहता है उसका सारा ध्यान उसी ओर चला जाता है । जो परिस्थिति को सहन करने का अभ्यास डालता है वही किसी उच्च उपलब्धि को कर सकता है । इसलिये उस स्त्री को किसी पर क्रोध भी नहीं आता था , किसी से शिकायत भी नहीं थी ।
.
नारायण ! संसार में अनेक सुधारवादी गतिविधियाँ हुई , चाहे भारत में चाहे अन्यत्र , लेकिन जितने सुधारवादी हुए हैं वे कभी परमात्मा के साक्षात्कार के रास्ते पर नहीं जा पाये । वे केवल सुधार में लगे रहे और वह सुधार अन्त में बिगाड़ ही सिद्ध हुआ । ये दोनों मार्ग अलग है । संसार में जो " हेय - उपादेय " बुद्धि रखेगा वह "अहेय - अनुपादेय " ब्रह्मतत्त्व को कभी पा नहीं सकता । जो " अहेय - अनुपादेय " परमार्थतत्त्व को पकड़ना चाहता है वह " हेय - उपादेय " दृष्टि कर नहीं सकता । इसलिये हमारे सभी प्राचीन परम्पराओं में परमात्मतत्त्वसम्बन्धी अनुभवादि आते पर सुधारवादी परम्पराओं में ऐसा कुछ नहीं होता ।
.
नारायण ! एक बार " शिवरात्रि " के पर्व पर पद्मा बर्तन माँजने " वितस्ता नदी " के तट पर गई हुई थी । कश्मीर में शिवरात्रि बड़ी धूम - धाम से मनाते हैं । वितस्ता नदी को ही उर्दू वाले झेलम कहते हैं । वहीं पद्मा की कोई पड़ोसन भी आयी थी । पड़ोसन ने पद्मा से कहा " आज तो शिवरात्रि है , तेरी पाँचों अंगुलियां घी में होँगी ? " पद्मा दुःखी तो थी ही , बोली " शिवरात्रि हो चाहे न हो , मेरी तो शालग्राम की बटिया भली ! " पड़ोसन ने पूछा " क्या मतलब ? " उसने सारा किस्सा सुना दिया । जहाँ ये बाते चल रही थी उसके पास ही आदमियों का घाट था , वहाँ पद्मा के ससुर खड़े थे । उन्होंने सारी बाते सुन ली । घर आकर उन्होंने सास को बहुत डाँटा । पर फल उल्टा निकला । सास और ज्यादा अत्याचार करने लगी । लड़के को सिखाने लगी " पद्मा डाकिनी है । रात में सिंह पर बैठ कर जाती है , लोगों को खाकर आती है । " इत्यादि । पद्मा का धैर्य टूट गया । उसने “ असीम “ से मिलने का ही निश्चय किया ।
.
नारायण ! पद्मा घर छोड़कर चल दी । विभिन्न ग्रामों में शिवमन्दिरों में दर्शन करना , महेश्वर की कीर्ति का गान करना , महादेव का ध्यान - पूजन करना , यही उसकी चर्या थी । भगवान् शङ्कर ने उसे दर्शन दिया । उसे तुरंत समझ आ गया कि सारा संसार प्रकृति का ही खेल है । जब प्रकृति का ही खेल है तो इसमें शर्म किसकी करनी है ? उसने वस्त्र पहनना छोड़ दिया , दिगम्बर घूमने लगी । भोजन की चिन्ता न करे । किसी ने जबर्दस्ती मुँह में डाल दिया तो खा लिया , नहीं तो नहीं । छेड़ने वाले कई बार पूछते थे " अरे नंगी क्यों घूमती है ? , हँसकर पद्मा बोलती थी " संसार में कोई पुरुष तो है नहीं ? प्रकृति से बनी सारी शकलें औरत ही हैं । औरत के सामने औरत क्या कपड़ा पहने ? " लोक उसका तात्पर्य क्या समझे । वे केवल हँसते थे । परमात्मा के कालातीत विश्वाधिक रूप का साक्षात्कार करना ही उसे बाकी रह गया था ।
.
नारायण ! दक्षिण भारत में विश्वेन्द्र सागर नामक एक ब्रह्मनिष्ठ महात्मा थे । उन्हें भगवान् ने प्रेरणा दी कि कश्मीर में स्थित उस योग्य शिष्य को उपदेश करो । जब किसी में योग्यता आ जाती है तब भगवान् स्वयं उपदेश की व्यवस्था कर देते हैं , गुरु चरण की प्राप्ति हो जाती है । गुरु ढूँढने से नहीं मिला करते । कारण यह है कि गुरु कौन है इसकी परीक्षा आप कैसे कर सकते हो ? गुरु ही अधिकारी शिष्य को ढूँढ़ लेता है । श्री विश्वेन्द्र सागर कश्मीर पहुँचे । उन्हें देखते ही पद्मा जोर से चिल्लाई " अरे आदमी आ गया ! " वहाँ रोटी बनाने के लिए बड़े - बड़े तन्दूर होते हैं । कपड़े तो थे नहीं अतः " पुरुष " के सामने नग्नता हटाने के लिये वह उसी तन्दूर में घुस गयी । " श्री स्वामी विश्वेन्द्र सागर जी " समझ गये , पहचान लिया उन्होंने । उसे कहा " अरे बाहर आओ । " तन्दूर के अन्दर अग्निमूर्ति भगवान् ने पद्मा को दिव्य वस्त्र पहना दिया जिन्हें पहन कर वह बाहर आयी । धीरे - धीरे महात्मन् ने उसे उपनिषदों का अर्थ समझाया । भगवान् जिस ज्ञेयतत्त्व का उपदेश अर्जुन को संक्षेप में किया था । उस कालातीत विश्वाधिक तत्त्व का श्री स्वामी विश्वेन्द्र सागर जी ने विस्तार से निरूपण किया । श्रवणादि के फलस्वरूप पद्मा की ज्ञाननिष्ठा दृढ़ हो गयी ।
.
नारायण ! एक बार अनेक शिष्य बैठे थे , गुरु ने प्रश्न किये " सबसे श्रेष्ठ प्रकाश कौन सा है? " लोगों ने नाना उत्तर दिये । पद्मा ने तो " परमात्मज्ञान ही सच्चा प्रकाश है । " दूसरा प्रश्न था " सबसे प्रधान तीर्थ कौन सा है ? " पद्मा का जवाब था " ब्रह्मज्ञान में लीन होकर रहना ही श्रेष्ठ तीर्थ है । " तीसरा सवाल था " सब सम्बन्धियों में कौन श्रेष्ठ है ? " उसने बताया " परम शिव ही सारे सम्बन्धियों में श्रेष्ठ हैं । " चोथा प्रश्न था " उस परम आनन्द का साधन क्या है ? " उत्तर था " उसमें तन्मय हो जाना ही आनन्द का साधन है । " गुरु जी ने समझ लिया कि पद्मा की निष्ठा पूर्ण हो गयी । उन्होंने उसका " लल्लेश्वरी " नाम रखा । वह सर्वत्र परमात्मज्ञान का उपदेश देते हुए विचरती रही । भाषा - श्लोकों में वह ज्ञान देती थी ।
.
नारायण ! लल्लेश्वरी कहा करती थी कि मन एक गधा है ! इसे वश में रखो , नहीं तो केशर की क्यारियाँ चर जायेगा । मन को वश में करना सबसे ज्यादा जरूरी है । शरीररूप क्षेत्र केसर की खेती करने के लिए मिला है । पर सारी योग्यतायें चर जायेगा अगर मन को छूट्टा छोड़ दिया । यह गधा है , अपना भला - बुरा समझता नहीं ।
.
नारायण ! इसलिये भगवान् ने अपने श्रीमुख से गीता गाकर कहा कि जो मुझ परमात्मा को प्रेम का एकमात्र आधार बनायेगा वही " एतद् विज्ञाय " इसका अनुभव कर सकेगा । अन्यथा अनुभव होगा नहीं । ऐसा करना कब तक है ? भगवान् कहते हैं " मद्भावायोपद्यते " जब तक परमात्मभाव में स्थिर न हो जाये ।
एक ही परमात्मा अज्ञात , ज्ञे और ज्ञात होता है । हर हालत में , बन्धन अवस्था में भी परमात्मा के सिवाय कुछ नहीं । हम परमात्मा से तब भी दूर नहीं । हमेशा ही हमारा उसमें निवास है । ऐसा नहीं कि अभी दूर है । बाद में मिलेंगे । हम निरन्तर उनकी गोद में हैं , वे हमें निरन्तर सहला रहे हैं । ऐसी भावना रखें ।
श्री माता लल्लेश्वरी को प्रणाम !
नारायण स्मृतिः

यदि हम बीते हुए कल की अपेक्षा आज अधिक आनंदमय हैं तो निश्चित रूप से आध्यात्मिक प्रगति कर रहे हैं, अन्यथा नहीं ---

यदि हम बीते हुए कल की अपेक्षा आज अधिक आनंदमय हैं तो निश्चित रूप से आध्यात्मिक प्रगति कर रहे हैं, अन्यथा नहीं कर रहे हैं। आध्यात्मिक प्रगति का एकमात्र मापदंड यही है।

.
ब्रह्मज्ञान ही सच्चा प्रकाश है, और ब्रह्मज्ञान में लीन होकर रहना ही श्रेष्ठ तीर्थ है। परमशिव ही हमारे एकमात्र संबंधी हैं, उनमें तन्मय हो जाना ही आनन्द का साधन है।
परमात्मा का स्मरण कभी न छूटे, चाहे यह देह इसी समय छूट कर यहीं भस्म हो जाये। परमात्मा के प्रति अहैतुकी (Unconditional) परम प्रेम का उदय, मनुष्य जीवन की महानतम उपलब्धी है।
.
आने वाले कल के सूर्योदय की तरह अज्ञान के अंधकार पर हमारी विजय सुनिश्चित है। इसमें कोई संदेह नहीं है। हम दुर्बल नहीं हैं। हमें अपने आप में, अपने कार्य पर, और ईश्वर पर विश्वास है। जीवन में सर्वप्रथम भगवान को प्राप्त करो फिर उनकी चेतना में अन्य सारे कर्म करो। भगवान को प्राप्त करने का अधिकारी सिर्फ भगवान का भक्त है, जिसने भगवान में अपने सारे भावों का अर्पण कर दिया है।
.
जिसने भगवान को प्राप्त कर लिया है, वह व्यक्ति इस पृथ्वी पर चलता-फिरता देवता है। यह पृथ्वी भी ऐसे व्यक्ति को पाकर सनाथ व धन्य हो जाती है। जहाँ भी उसके चरण पड़ते हैं वह स्थान पवित्र हो जाता है। वह स्थान, परिवार व कुल -- धन्य है जहाँ ऐसी पवित्र आत्मा जन्म लेती हैं।
.
ॐ तत्सत्
कृपा शंकर
१५ फरवरी २०२३

हमारे सब अभावों/दुःखों/कष्टों/पीड़ाओं का एकमात्र कारण हमारी आध्यात्मिक दरिद्रता है, कोई अन्य कारण नहीं ---

 हमारे सब अभावों/दुःखों/कष्टों/पीड़ाओं का एकमात्र कारण हमारी आध्यात्मिक दरिद्रता है, कोई अन्य कारण नहीं।

.
हर समय परमात्मा का स्मरण करते हुए, पूर्ण सत्यनिष्ठा से परमात्मा की उपासना नित्य कम से कम २+२ = ४ घंटे की जाये, तब संतुष्टि मिलती है। सप्ताह में कम से कम एक दिन तो ८ घंटे का समय परमामा की साधना में व्यतीत किया जाना चाहिये। केवल बातों से, पुस्तकें पढ़ने, या प्रवचन/उपदेश सुनने से काम नहीं बनेगा। परमात्मा के ऊर्ध्वस्थ महासागर में गहरी डुबकी लगा कर स्वयं को विलीन (समर्पित) करना पड़ेगा।
.
जब मन में लगन और पीड़ा होगी तब भगवान स्वयं आगे का मार्ग दिखायेंगे। आप सब महान आत्माओं / महापुरुषों को नमन !!
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
१४ फरवरी २०२५