Friday, 14 February 2025

“परमतत्त्व ज्ञानगम्य कब होगा ?"

 “परमतत्त्व ज्ञानगम्य कब होगा ?"

(ब्रह्मलीन स्वामी मृगेंद्र सरस्वती "सर्वज्ञ शङ्करेन्द्र" द्वारा २१ फरवरी २०१४ को प्रेषित लेख)
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"इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥१३:१९॥"
नारायण ! भगवान् पहले ज्ञान का निरूपण करते हुए फिर संक्षेप में ज्ञेय का निरूपण किया । ज्ञान और ज्ञेय का निरूपण करते हुए अपने प्रिय सखा अर्जुन को माध्यम बनाकर सारे जगत् को बता तो दिया , लेकिन यह ज्ञानगम्य किसे होगा? अनुभव में परिणत कब होगा? तब भगवान् ने कहा " मद्भक्तः " जो परमेश्वर से अनुपम प्रेम करेगा वही इसका साक्षाद् अनुभव कर सकेगा । भगवान् कहते अनुभव होने पर वह मेरा ही स्वरूप होगा । भगवान् ने परमात्मा के लिए असीम प्रेम मोक्ष का साधन बतलाया ।
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नारायण ! कश्मीर में " पामपुर " नामक ग्राम के आस - पास केशर की खेती होती है । वहाँ प्रायः साढ़े सात सौ वर्ष पूर्व एक कन्या उन्पन्न हुई । जिसका नाम था " पद्मा " । मुस्लिम राज्य था । राजनैतिक उथल - पुथल थी । कन्या ब्राह्मण के घर पैदा हुई थी । उस युग में ब्याह छोटी उम्र में कर दिया जाता था । बारह साल की थी तब उस लड़की का ब्याह हो गया । ससुराल गयी तो वहाँ उसकी सास सौतेली थी , पति की अपनी माँ मर चुकी थी , सौतेली माँ थी । सास को इस लड़की के प्रति कोई सद्भाव नहीं था । हमेशा उसे क्लेश ही देती रहती थी । फिर भी यह लड़की शिकायत करती नहीं थी । अन्यीं को मालूम न पड़े इसलिये सास जब बहु को भोजन परोसती थी तो पहले एक पत्थर रख कर उसे चावल के भात से ढाँक देती थी । घर में सब समझे कि बहू बहुत खाती है । उन्हें क्या पता था कि उसके अन्दर पत्थर रख कर भात से ढँका गया है ! पर वह पद्मा चुपचाप सहती रही । यह तपस्या जीवन में आवश्यक है । जो व्यक्ति हमेशा परिस्थितियों को बदलने में लगा रहता है उसका सारा ध्यान उसी ओर चला जाता है । जो परिस्थिति को सहन करने का अभ्यास डालता है वही किसी उच्च उपलब्धि को कर सकता है । इसलिये उस स्त्री को किसी पर क्रोध भी नहीं आता था , किसी से शिकायत भी नहीं थी ।
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नारायण ! संसार में अनेक सुधारवादी गतिविधियाँ हुई , चाहे भारत में चाहे अन्यत्र , लेकिन जितने सुधारवादी हुए हैं वे कभी परमात्मा के साक्षात्कार के रास्ते पर नहीं जा पाये । वे केवल सुधार में लगे रहे और वह सुधार अन्त में बिगाड़ ही सिद्ध हुआ । ये दोनों मार्ग अलग है । संसार में जो " हेय - उपादेय " बुद्धि रखेगा वह "अहेय - अनुपादेय " ब्रह्मतत्त्व को कभी पा नहीं सकता । जो " अहेय - अनुपादेय " परमार्थतत्त्व को पकड़ना चाहता है वह " हेय - उपादेय " दृष्टि कर नहीं सकता । इसलिये हमारे सभी प्राचीन परम्पराओं में परमात्मतत्त्वसम्बन्धी अनुभवादि आते पर सुधारवादी परम्पराओं में ऐसा कुछ नहीं होता ।
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नारायण ! एक बार " शिवरात्रि " के पर्व पर पद्मा बर्तन माँजने " वितस्ता नदी " के तट पर गई हुई थी । कश्मीर में शिवरात्रि बड़ी धूम - धाम से मनाते हैं । वितस्ता नदी को ही उर्दू वाले झेलम कहते हैं । वहीं पद्मा की कोई पड़ोसन भी आयी थी । पड़ोसन ने पद्मा से कहा " आज तो शिवरात्रि है , तेरी पाँचों अंगुलियां घी में होँगी ? " पद्मा दुःखी तो थी ही , बोली " शिवरात्रि हो चाहे न हो , मेरी तो शालग्राम की बटिया भली ! " पड़ोसन ने पूछा " क्या मतलब ? " उसने सारा किस्सा सुना दिया । जहाँ ये बाते चल रही थी उसके पास ही आदमियों का घाट था , वहाँ पद्मा के ससुर खड़े थे । उन्होंने सारी बाते सुन ली । घर आकर उन्होंने सास को बहुत डाँटा । पर फल उल्टा निकला । सास और ज्यादा अत्याचार करने लगी । लड़के को सिखाने लगी " पद्मा डाकिनी है । रात में सिंह पर बैठ कर जाती है , लोगों को खाकर आती है । " इत्यादि । पद्मा का धैर्य टूट गया । उसने “ असीम “ से मिलने का ही निश्चय किया ।
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नारायण ! पद्मा घर छोड़कर चल दी । विभिन्न ग्रामों में शिवमन्दिरों में दर्शन करना , महेश्वर की कीर्ति का गान करना , महादेव का ध्यान - पूजन करना , यही उसकी चर्या थी । भगवान् शङ्कर ने उसे दर्शन दिया । उसे तुरंत समझ आ गया कि सारा संसार प्रकृति का ही खेल है । जब प्रकृति का ही खेल है तो इसमें शर्म किसकी करनी है ? उसने वस्त्र पहनना छोड़ दिया , दिगम्बर घूमने लगी । भोजन की चिन्ता न करे । किसी ने जबर्दस्ती मुँह में डाल दिया तो खा लिया , नहीं तो नहीं । छेड़ने वाले कई बार पूछते थे " अरे नंगी क्यों घूमती है ? , हँसकर पद्मा बोलती थी " संसार में कोई पुरुष तो है नहीं ? प्रकृति से बनी सारी शकलें औरत ही हैं । औरत के सामने औरत क्या कपड़ा पहने ? " लोक उसका तात्पर्य क्या समझे । वे केवल हँसते थे । परमात्मा के कालातीत विश्वाधिक रूप का साक्षात्कार करना ही उसे बाकी रह गया था ।
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नारायण ! दक्षिण भारत में विश्वेन्द्र सागर नामक एक ब्रह्मनिष्ठ महात्मा थे । उन्हें भगवान् ने प्रेरणा दी कि कश्मीर में स्थित उस योग्य शिष्य को उपदेश करो । जब किसी में योग्यता आ जाती है तब भगवान् स्वयं उपदेश की व्यवस्था कर देते हैं , गुरु चरण की प्राप्ति हो जाती है । गुरु ढूँढने से नहीं मिला करते । कारण यह है कि गुरु कौन है इसकी परीक्षा आप कैसे कर सकते हो ? गुरु ही अधिकारी शिष्य को ढूँढ़ लेता है । श्री विश्वेन्द्र सागर कश्मीर पहुँचे । उन्हें देखते ही पद्मा जोर से चिल्लाई " अरे आदमी आ गया ! " वहाँ रोटी बनाने के लिए बड़े - बड़े तन्दूर होते हैं । कपड़े तो थे नहीं अतः " पुरुष " के सामने नग्नता हटाने के लिये वह उसी तन्दूर में घुस गयी । " श्री स्वामी विश्वेन्द्र सागर जी " समझ गये , पहचान लिया उन्होंने । उसे कहा " अरे बाहर आओ । " तन्दूर के अन्दर अग्निमूर्ति भगवान् ने पद्मा को दिव्य वस्त्र पहना दिया जिन्हें पहन कर वह बाहर आयी । धीरे - धीरे महात्मन् ने उसे उपनिषदों का अर्थ समझाया । भगवान् जिस ज्ञेयतत्त्व का उपदेश अर्जुन को संक्षेप में किया था । उस कालातीत विश्वाधिक तत्त्व का श्री स्वामी विश्वेन्द्र सागर जी ने विस्तार से निरूपण किया । श्रवणादि के फलस्वरूप पद्मा की ज्ञाननिष्ठा दृढ़ हो गयी ।
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नारायण ! एक बार अनेक शिष्य बैठे थे , गुरु ने प्रश्न किये " सबसे श्रेष्ठ प्रकाश कौन सा है? " लोगों ने नाना उत्तर दिये । पद्मा ने तो " परमात्मज्ञान ही सच्चा प्रकाश है । " दूसरा प्रश्न था " सबसे प्रधान तीर्थ कौन सा है ? " पद्मा का जवाब था " ब्रह्मज्ञान में लीन होकर रहना ही श्रेष्ठ तीर्थ है । " तीसरा सवाल था " सब सम्बन्धियों में कौन श्रेष्ठ है ? " उसने बताया " परम शिव ही सारे सम्बन्धियों में श्रेष्ठ हैं । " चोथा प्रश्न था " उस परम आनन्द का साधन क्या है ? " उत्तर था " उसमें तन्मय हो जाना ही आनन्द का साधन है । " गुरु जी ने समझ लिया कि पद्मा की निष्ठा पूर्ण हो गयी । उन्होंने उसका " लल्लेश्वरी " नाम रखा । वह सर्वत्र परमात्मज्ञान का उपदेश देते हुए विचरती रही । भाषा - श्लोकों में वह ज्ञान देती थी ।
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नारायण ! लल्लेश्वरी कहा करती थी कि मन एक गधा है ! इसे वश में रखो , नहीं तो केशर की क्यारियाँ चर जायेगा । मन को वश में करना सबसे ज्यादा जरूरी है । शरीररूप क्षेत्र केसर की खेती करने के लिए मिला है । पर सारी योग्यतायें चर जायेगा अगर मन को छूट्टा छोड़ दिया । यह गधा है , अपना भला - बुरा समझता नहीं ।
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नारायण ! इसलिये भगवान् ने अपने श्रीमुख से गीता गाकर कहा कि जो मुझ परमात्मा को प्रेम का एकमात्र आधार बनायेगा वही " एतद् विज्ञाय " इसका अनुभव कर सकेगा । अन्यथा अनुभव होगा नहीं । ऐसा करना कब तक है ? भगवान् कहते हैं " मद्भावायोपद्यते " जब तक परमात्मभाव में स्थिर न हो जाये ।
एक ही परमात्मा अज्ञात , ज्ञे और ज्ञात होता है । हर हालत में , बन्धन अवस्था में भी परमात्मा के सिवाय कुछ नहीं । हम परमात्मा से तब भी दूर नहीं । हमेशा ही हमारा उसमें निवास है । ऐसा नहीं कि अभी दूर है । बाद में मिलेंगे । हम निरन्तर उनकी गोद में हैं , वे हमें निरन्तर सहला रहे हैं । ऐसी भावना रखें ।
श्री माता लल्लेश्वरी को प्रणाम !
नारायण स्मृतिः

यदि हम बीते हुए कल की अपेक्षा आज अधिक आनंदमय हैं तो निश्चित रूप से आध्यात्मिक प्रगति कर रहे हैं, अन्यथा नहीं ---

यदि हम बीते हुए कल की अपेक्षा आज अधिक आनंदमय हैं तो निश्चित रूप से आध्यात्मिक प्रगति कर रहे हैं, अन्यथा नहीं कर रहे हैं। आध्यात्मिक प्रगति का एकमात्र मापदंड यही है।

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ब्रह्मज्ञान ही सच्चा प्रकाश है, और ब्रह्मज्ञान में लीन होकर रहना ही श्रेष्ठ तीर्थ है। परमशिव ही हमारे एकमात्र संबंधी हैं, उनमें तन्मय हो जाना ही आनन्द का साधन है।
परमात्मा का स्मरण कभी न छूटे, चाहे यह देह इसी समय छूट कर यहीं भस्म हो जाये। परमात्मा के प्रति अहैतुकी (Unconditional) परम प्रेम का उदय, मनुष्य जीवन की महानतम उपलब्धी है।
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आने वाले कल के सूर्योदय की तरह अज्ञान के अंधकार पर हमारी विजय सुनिश्चित है। इसमें कोई संदेह नहीं है। हम दुर्बल नहीं हैं। हमें अपने आप में, अपने कार्य पर, और ईश्वर पर विश्वास है। जीवन में सर्वप्रथम भगवान को प्राप्त करो फिर उनकी चेतना में अन्य सारे कर्म करो। भगवान को प्राप्त करने का अधिकारी सिर्फ भगवान का भक्त है, जिसने भगवान में अपने सारे भावों का अर्पण कर दिया है।
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जिसने भगवान को प्राप्त कर लिया है, वह व्यक्ति इस पृथ्वी पर चलता-फिरता देवता है। यह पृथ्वी भी ऐसे व्यक्ति को पाकर सनाथ व धन्य हो जाती है। जहाँ भी उसके चरण पड़ते हैं वह स्थान पवित्र हो जाता है। वह स्थान, परिवार व कुल -- धन्य है जहाँ ऐसी पवित्र आत्मा जन्म लेती हैं।
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ॐ तत्सत्
कृपा शंकर
१५ फरवरी २०२३

हमारे सब अभावों/दुःखों/कष्टों/पीड़ाओं का एकमात्र कारण हमारी आध्यात्मिक दरिद्रता है, कोई अन्य कारण नहीं ---

 हमारे सब अभावों/दुःखों/कष्टों/पीड़ाओं का एकमात्र कारण हमारी आध्यात्मिक दरिद्रता है, कोई अन्य कारण नहीं।

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हर समय परमात्मा का स्मरण करते हुए, पूर्ण सत्यनिष्ठा से परमात्मा की उपासना नित्य कम से कम २+२ = ४ घंटे की जाये, तब संतुष्टि मिलती है। सप्ताह में कम से कम एक दिन तो ८ घंटे का समय परमामा की साधना में व्यतीत किया जाना चाहिये। केवल बातों से, पुस्तकें पढ़ने, या प्रवचन/उपदेश सुनने से काम नहीं बनेगा। परमात्मा के ऊर्ध्वस्थ महासागर में गहरी डुबकी लगा कर स्वयं को विलीन (समर्पित) करना पड़ेगा।
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जब मन में लगन और पीड़ा होगी तब भगवान स्वयं आगे का मार्ग दिखायेंगे। आप सब महान आत्माओं / महापुरुषों को नमन !!
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
१४ फरवरी २०२५

Thursday, 13 February 2025

यह यात्रा "जीव" से "शिव" बनने की है ---

 यह यात्रा "जीव" से "शिव" बनने की है ---

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"शिवो भूत्वा शिवं यजेत्" -- स्वयं शिव बनकर शिव की आराधना करो। जिन्होंने वेदान्त को निज जीवन में अनुभूत किया है वे डंके की चोट --"शिवोहं शिवोहं", "अहं ब्रह्मास्मि" और "अयमात्मा ब्रह्म" कह सकते हैं। जिन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता और उपनिषदों का गहन स्वाध्याय किया है, वे भी अंततः इसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे। तत्व रूप में शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है। गीता के भगवान वासुदेव ही वेदान्त के ब्रह्म हैं, वे ही मेरी चेतना में परमशिव हैं।
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मेरे इस जीवन का अब संध्याकाल है, बहुत कम समय बचा है। करने को तो बहुत कुछ बाकी है, लेकन जितनी और जो उपासना होनी चाहिए, उतनी हो नहीं रही है। अतः सब कुछ भगवान पर छोड़ दिया है। जो करना है वह सब वे ही करेंगे, मेरे वश में कुछ भी संभव नहीं है। स्वयं पर कोई भी भार लेने में असमर्थ हूँ। सारी उपासना, उपास्य और उपासक वे ही हैं। दृष्टि, दृश्य और दर्शन भी वे ही हैं। स्वयं का पता नहीं कि जो सांसें चल रही हैं, वे कब तक चलेंगी। अब तो ये सांसें भी वे ही ले रहे हैं। जन्म-जन्मांतरों के सारे कर्म, उनके फल, सारी बुराइयाँ/अच्छाइयाँ सब कुछ उन्हें बापस सौंप दिया है। स्वयं को भी उन्हें समर्पित कर दिया है। मेरी कोई स्वतंत्र इच्छा नहीं है, जो उन की इच्छा है वह ही मेरी इच्छा है।
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मनुष्य जीवन का मूल उद्देश्य है -- "शिवत्व की प्राप्ति"। हम शिव कैसे बनें? शिवत्व को कैसे प्राप्त करें? इस का उत्तर है -- कूटस्थ में ओंकार रूप में ज्योतिर्मय सर्वव्यापी शिव का ध्यान। यह किसी कामना की पूर्ती के लिए नहीं, बल्कि कामनाओं के नाश के लिए है। आते जाते हर साँस के साथ उनका चिंतन-मनन और समर्पण -- उनकी परम कृपा की प्राप्ति करा कर आगे का मार्ग प्रशस्त करता है। जब मनुष्य की ऊर्ध्व चेतना जागृत होती है तब उसे स्पष्ट ज्ञान हो जाता है कि संसार की सबसे बड़ी उपलब्धि है -- "कामना और इच्छा की समाप्ति"
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"शिव" का अर्थ शिवपुराण के अनुसार -- जिन से जगत की रचना, पालन और नाश होता है, जो इस सारे जगत के कण कण में संव्याप्त है, वे शिव हैं। जो समस्त प्राणधारियों की हृदय-गुहा में निवास करते हैं, जो सर्वव्यापी और सबके भीतर रम रहे हैं, वे शिव हैं। अमरकोष के अनुसार 'शिव' शब्द का अर्थ मंगल एवं कल्याण होता है। विश्वकोष में भी शिव शब्द का प्रयोग मोक्ष में, वेद में और सुख के प्रयोजन में किया गया है। अतः "शिव" का अर्थ हुआ आनन्द, परम मंगल और परम कल्याण। जिसे सब चाहते हैं और जो सबका कल्याण करने वाला है वही "शिव" है।
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पूर्वजन्मों में जैसे कर्म किए थे उनके अनुसार इस जन्म में मैं एक ऐसे समाज में जन्मा जो घोर तमोगुण से मुक्त होने के लिए संघर्ष कर रहा था। जहाँ मेरा यानि इस शरीर का जन्म हुआ वह झुंझुनूं (राजस्थान) एक तमोगुणी गाँव (अब तो नगर है) है। वहाँ का समाज अब भी तमोगुण-प्रधान है। कुछ लोग अवश्य रजोगुणी हैं, लेकिन सतोगुणी तो कोई दो लाख में से एक व्यक्ति ही मिलेगा। जो स्वयं को श्रेष्ठ समझते हैं, उन लोगों की दृष्टि पराए धन और यौन-वासनाओं की पूर्ति पर ही रहती है। स्वयं को धार्मिक दिखाकर, यानि अच्छे बनने का ढोंग रचकर कैसे दूसरों को ठगा जाए, यही यहाँ के लोगों का चिंतन है।
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मेरा यह पूरा जीवन तो इसी प्रयास में खप गया कि कैसे तमोगुण से मुक्त हुआ जाए।
पता नहीं, भगवान श्रीकृष्ण का यह आदेश जीवन में कब फलीभूत होगा --
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥२:४५॥"
अर्थात् -- "हे अर्जुन वेदों का विषय तीन गुणों से सम्बन्धित (संसार से) है, तुम त्रिगुणातीत, निर्द्वन्द्व, नित्य सत्त्व (शुद्धता) में स्थित, योगक्षेम से रहित, और आत्मवान् बनो॥"
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आचार्य शंकर ने अपने भाष्य में जो इसकी व्याख्या की है उसका सार है कि विवेक बुद्धि से रहित कामपरायण पुरुषों के लिए वेद त्रैगुण्यविषयक यानि तीनों गुणों के कार्यरूप संसार को ही प्रकाशित करनेवाले हैं। परंतु हे अर्जुन, तूँ असंसारी, निष्कामी, तथा निर्द्वन्द्व हो। सुख-दुःख के हेतु जो परस्पर विरोधी युग्म हैं, उनका नाम द्वन्द्व है, उनसे रहित हो, और नित्य सत्त्वस्थ तथा निर्योगक्षेम हो। अप्राप्त वस्तु को प्राप्त करने का नाम योग है, और प्राप्त वस्तु के रक्षण का नाम क्षेम है। योगक्षेम को प्रधान मानने वाले की कल्याणमार्ग में प्रवृत्ति होनी अत्यन्त कठिन है, अतः तू योगक्षेम को न चाहने वाला हो। आत्मवान् हो अर्थात् (आत्मविषयों में) प्रमादरहित हो। तुझ स्वधर्मानुष्ठान में लगे हुये के लिये यह उपदेश है।
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शैव आगमों के आचार्य भगवान दुर्वासा ऋषि हैं। मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ। उन्होंने मुद्गल ऋषि को आशीर्वाद दिया था कि तुम्हारे वंश में कभी कोई भूख से नहीं मरेगा। तपस्यारत मुद्गल ऋषि कई दिनों से भूखे थे। कई दिनों के बाद उन्हें खाने को कुछ आहार मिला। जब वे भोजन करने बैठे तब आचमन करते ही दुर्वासा ऋषि पधारे। उन्होंने वह भोजन दुर्वासा ऋषि को करा दिया। दुर्वासा वह सारा भोजन कर लिए, और जाते जाते मुद्गल ऋषि को तो भूख-प्यास से मुक्त कर गए और यह आशीर्वाद भी दे गए कि तुम्हारे वंश में कभी कोई भूख से नहीं मरेगा। तब से कोई भी मुद्गल गौत्रीय ब्राह्मण कभी भूख से तो नहीं मरा है। मुझे आज से साठ वर्ष पूर्व ही गृह त्याग कर विरक्त हो जाना चाहिए था। जीवन के ये इतने वर्ष व्यर्थ ही गए। लेकिन मेरे प्रारब्ध में जो था, वही हुआ। और जन्म लेने की इच्छा अब नहीं है। भगवान यदि फिर जन्म दे तो भक्ति, ज्ञान और वैराग्य अपनी पूर्णता में जन्म के समय से ही हो। मैं जीव नहीं, जीवनमुक्त अवस्था में परमशिव को ही व्यक्त करूँ।
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भगवान ने ही यह सब लिखा दिया। उन्हीं को यह जीवन समर्पित है।
ॐ तत्सत् ! ॐ स्वस्ति !
ॐ नमःशिवाय ॐ नमःशिवाय ॐ नमःशिवाय !! महादेव महादेव महादेव !!
शिवोहं शिवोहं, अहं ब्रह्मास्मि, अयमात्मा ब्रह्म !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
झुंझुनूं (राजस्थान)
१४ फरवरी २०२३

मुझे निमित्त बनाकर भगवान स्वयं ही अपनी साधना कर रहे हैं ---

 जीवन के इस संध्याकाल में जहां भी भगवान ने मुझे रखा है, वहीं पर भगवान से मुझे अब मानसिक रूप से निरंतर साधना/उपासना की प्रेरणा मिल रही है। मुझे निमित्त बनाकर भगवान स्वयं ही अपनी साधना कर रहे हैं। लौकिक जीवन में मेरे आदर्श श्री श्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय हैं। भगवान श्रीकृष्ण की परमकृपा से मुझे पूरा मार्गदर्शन प्राप्त है। किसी भी तरह का कोई संशय नहीं है। यह अवशिष्ट जीवन भगवान को पूर्णतः समर्पित है। भगवान स्वयं ही यह जीवन जी रहे हैं, और जीयेंगे।

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मेरे लिए अभी और लिखने के लिए कुछ नहीं बचा है। जो कुछ भी लिखने की प्रेरणा भगवान से मिली, वह सब खूब लिखा है। अब इस संसार से मन पूर्णतः तृप्त हो गया है, किसी भी तरह की कोई आकांक्षा नहीं रही है। इस बचे हुए जीवनकाल में भगवान जिन-जिन संत-महात्माओं और सदगृहस्थों से मिलवायेंगे उन सब से अवश्य मिलूँगा। जहाँ कोई बहुत प्रेम से बुलायेंगे, तो वहाँ भी क्षमतानुसार अवश्य जाऊँगा। यह अंतःकरण भगवान को समर्पित है।
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सारा अवशिष्ट जीवन भगवान के ध्यान, उपासना और स्वाध्याय में ही बीत जायेगा। जब भी भगवान का आदेश होगा तब ब्रह्मरंध्र के मार्ग से स्वयं ही इस शरीर का त्याग कर के सचेतन रूप से भगवान के धाम चले जायेंगे।
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥ (गीता)
"अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्‌।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥८:२१॥" (गीता)
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम्
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ (कठोपनिषद २-२-१५)
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१२ फरवरी २०२५



वियोग का असह्य कष्ट ---

 मैं वियोग के एक ऐसे असह्य कष्ट में हूँ, जिसके निवारण के किसी उपाय का मुझे बोध नहीं है। समय निकला जा रहा है, मेरी बात को समझने वाला भी कोई नहीं है।

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मेरे बाईं ओर अंधकार से घिरे अपने वाहन भैंसे पर बिराजमान यमराज मुस्कराते हुये मेरी ओर देख रहे हैं। उनके भैंसे के गले में बँधी घंटी की ध्वनि बड़ी कर्कश है, लेकिन उसमें भी एक बड़ा प्रबल आकर्षण है, जो भोगों की आकांक्षा है।
मेरे दाहिने ओर प्रकाशमय स्वयं भगवान शिव अपने धर्मरूपी वाहन वृष के ऊपर बैठे हुए अभय मुद्रा में मुझे निर्भय होने का आश्वासन दे रहे हैं। उनके वाहन बैल के गले में बँधी घंटी से प्रणव की ध्वनि आ रही है। उनके प्रकाशमय सौम्य जटामंडल में भगवती गंगा की शीतलता है -- जो मेरा आत्मतत्त्व है।
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मैंने शिव का वरण कर लिया है, अब कोई विकल्प नहीं रहा है। संसार के किसी काम का नहीं हूँ, फिर भी शाश्वत शिव के साथ एक हूँ। ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ फरवरी २०२५

द्वैत-भाव से की गयी उपासना, अद्वैत भाव से अधिक आनंददायक है ---

अद्वैत-भाव से की गई साधना से द्वैत-भाव अधिक आनंददायक है, क्योंकि अद्वैत-दर्शन में विरह-रस नहीं है। विरह का भी एक आनंद है। भगवान भी निशाना लेकर बड़े यत्न से खींच-खींच कर साधते हुए अपने प्रेम का बाण चलाते हैं, जो चित्त के आर-पार हो जाता है। उनकी यह सधी हुई मार ही हमारी वेदना है।

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विरह की अग्नि असहनीय है। भगवान से अलग हो चुकी आत्मा को स्वप्न में भी सुख नहीं मिलता है। दिन और रात, धूप और छाँह -- कहीं भी सुख नहीं है। प्राण तो उनके विरह में ही तप कर समाप्त हो जायेंगे। इस पीड़ा को या तो मारने वाला जानता है, या फिर इसे भोगने वाला ही। विरह को ही वियोग अवस्था कहते हैं। भगवान् के विरह में हृदय में इतना ताप होता है कि सम्पूर्ण अग्नि और सूर्य भी वैसी जलन नहीं पैदा कर सकते। वियोग संयोग का पोषक होने के कारण रसस्वरूप है। हिन्दी साहित्य भरा पड़ा है विरह की साहित्यिक रचनाओं से।
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गीता में भगवान कहते हैं --
"मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥१२:२॥"
अर्थात् - मुझमें मन को एकाग्र करके नित्ययुक्त हुए जो भक्तजन परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे, मेरे मत से, युक्ततम हैं अर्थात् श्रेष्ठ हैं॥
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"क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥१२:५॥"
अर्थात् - परन्तु उन अव्यक्त में आसक्त हुए चित्त वाले पुरुषों को क्लेश अधिक होता है, क्योंकि देहधारियों से अव्यक्त की गति कठिनाईपूर्वक प्राप्त की जाती है॥"
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सभी को नमन !! ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
१३ फरवरी २०२५