Thursday, 13 February 2025

यह यात्रा "जीव" से "शिव" बनने की है ---

 यह यात्रा "जीव" से "शिव" बनने की है ---

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"शिवो भूत्वा शिवं यजेत्" -- स्वयं शिव बनकर शिव की आराधना करो। जिन्होंने वेदान्त को निज जीवन में अनुभूत किया है वे डंके की चोट --"शिवोहं शिवोहं", "अहं ब्रह्मास्मि" और "अयमात्मा ब्रह्म" कह सकते हैं। जिन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता और उपनिषदों का गहन स्वाध्याय किया है, वे भी अंततः इसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे। तत्व रूप में शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है। गीता के भगवान वासुदेव ही वेदान्त के ब्रह्म हैं, वे ही मेरी चेतना में परमशिव हैं।
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मेरे इस जीवन का अब संध्याकाल है, बहुत कम समय बचा है। करने को तो बहुत कुछ बाकी है, लेकन जितनी और जो उपासना होनी चाहिए, उतनी हो नहीं रही है। अतः सब कुछ भगवान पर छोड़ दिया है। जो करना है वह सब वे ही करेंगे, मेरे वश में कुछ भी संभव नहीं है। स्वयं पर कोई भी भार लेने में असमर्थ हूँ। सारी उपासना, उपास्य और उपासक वे ही हैं। दृष्टि, दृश्य और दर्शन भी वे ही हैं। स्वयं का पता नहीं कि जो सांसें चल रही हैं, वे कब तक चलेंगी। अब तो ये सांसें भी वे ही ले रहे हैं। जन्म-जन्मांतरों के सारे कर्म, उनके फल, सारी बुराइयाँ/अच्छाइयाँ सब कुछ उन्हें बापस सौंप दिया है। स्वयं को भी उन्हें समर्पित कर दिया है। मेरी कोई स्वतंत्र इच्छा नहीं है, जो उन की इच्छा है वह ही मेरी इच्छा है।
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मनुष्य जीवन का मूल उद्देश्य है -- "शिवत्व की प्राप्ति"। हम शिव कैसे बनें? शिवत्व को कैसे प्राप्त करें? इस का उत्तर है -- कूटस्थ में ओंकार रूप में ज्योतिर्मय सर्वव्यापी शिव का ध्यान। यह किसी कामना की पूर्ती के लिए नहीं, बल्कि कामनाओं के नाश के लिए है। आते जाते हर साँस के साथ उनका चिंतन-मनन और समर्पण -- उनकी परम कृपा की प्राप्ति करा कर आगे का मार्ग प्रशस्त करता है। जब मनुष्य की ऊर्ध्व चेतना जागृत होती है तब उसे स्पष्ट ज्ञान हो जाता है कि संसार की सबसे बड़ी उपलब्धि है -- "कामना और इच्छा की समाप्ति"
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"शिव" का अर्थ शिवपुराण के अनुसार -- जिन से जगत की रचना, पालन और नाश होता है, जो इस सारे जगत के कण कण में संव्याप्त है, वे शिव हैं। जो समस्त प्राणधारियों की हृदय-गुहा में निवास करते हैं, जो सर्वव्यापी और सबके भीतर रम रहे हैं, वे शिव हैं। अमरकोष के अनुसार 'शिव' शब्द का अर्थ मंगल एवं कल्याण होता है। विश्वकोष में भी शिव शब्द का प्रयोग मोक्ष में, वेद में और सुख के प्रयोजन में किया गया है। अतः "शिव" का अर्थ हुआ आनन्द, परम मंगल और परम कल्याण। जिसे सब चाहते हैं और जो सबका कल्याण करने वाला है वही "शिव" है।
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पूर्वजन्मों में जैसे कर्म किए थे उनके अनुसार इस जन्म में मैं एक ऐसे समाज में जन्मा जो घोर तमोगुण से मुक्त होने के लिए संघर्ष कर रहा था। जहाँ मेरा यानि इस शरीर का जन्म हुआ वह झुंझुनूं (राजस्थान) एक तमोगुणी गाँव (अब तो नगर है) है। वहाँ का समाज अब भी तमोगुण-प्रधान है। कुछ लोग अवश्य रजोगुणी हैं, लेकिन सतोगुणी तो कोई दो लाख में से एक व्यक्ति ही मिलेगा। जो स्वयं को श्रेष्ठ समझते हैं, उन लोगों की दृष्टि पराए धन और यौन-वासनाओं की पूर्ति पर ही रहती है। स्वयं को धार्मिक दिखाकर, यानि अच्छे बनने का ढोंग रचकर कैसे दूसरों को ठगा जाए, यही यहाँ के लोगों का चिंतन है।
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मेरा यह पूरा जीवन तो इसी प्रयास में खप गया कि कैसे तमोगुण से मुक्त हुआ जाए।
पता नहीं, भगवान श्रीकृष्ण का यह आदेश जीवन में कब फलीभूत होगा --
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥२:४५॥"
अर्थात् -- "हे अर्जुन वेदों का विषय तीन गुणों से सम्बन्धित (संसार से) है, तुम त्रिगुणातीत, निर्द्वन्द्व, नित्य सत्त्व (शुद्धता) में स्थित, योगक्षेम से रहित, और आत्मवान् बनो॥"
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आचार्य शंकर ने अपने भाष्य में जो इसकी व्याख्या की है उसका सार है कि विवेक बुद्धि से रहित कामपरायण पुरुषों के लिए वेद त्रैगुण्यविषयक यानि तीनों गुणों के कार्यरूप संसार को ही प्रकाशित करनेवाले हैं। परंतु हे अर्जुन, तूँ असंसारी, निष्कामी, तथा निर्द्वन्द्व हो। सुख-दुःख के हेतु जो परस्पर विरोधी युग्म हैं, उनका नाम द्वन्द्व है, उनसे रहित हो, और नित्य सत्त्वस्थ तथा निर्योगक्षेम हो। अप्राप्त वस्तु को प्राप्त करने का नाम योग है, और प्राप्त वस्तु के रक्षण का नाम क्षेम है। योगक्षेम को प्रधान मानने वाले की कल्याणमार्ग में प्रवृत्ति होनी अत्यन्त कठिन है, अतः तू योगक्षेम को न चाहने वाला हो। आत्मवान् हो अर्थात् (आत्मविषयों में) प्रमादरहित हो। तुझ स्वधर्मानुष्ठान में लगे हुये के लिये यह उपदेश है।
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शैव आगमों के आचार्य भगवान दुर्वासा ऋषि हैं। मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ। उन्होंने मुद्गल ऋषि को आशीर्वाद दिया था कि तुम्हारे वंश में कभी कोई भूख से नहीं मरेगा। तपस्यारत मुद्गल ऋषि कई दिनों से भूखे थे। कई दिनों के बाद उन्हें खाने को कुछ आहार मिला। जब वे भोजन करने बैठे तब आचमन करते ही दुर्वासा ऋषि पधारे। उन्होंने वह भोजन दुर्वासा ऋषि को करा दिया। दुर्वासा वह सारा भोजन कर लिए, और जाते जाते मुद्गल ऋषि को तो भूख-प्यास से मुक्त कर गए और यह आशीर्वाद भी दे गए कि तुम्हारे वंश में कभी कोई भूख से नहीं मरेगा। तब से कोई भी मुद्गल गौत्रीय ब्राह्मण कभी भूख से तो नहीं मरा है। मुझे आज से साठ वर्ष पूर्व ही गृह त्याग कर विरक्त हो जाना चाहिए था। जीवन के ये इतने वर्ष व्यर्थ ही गए। लेकिन मेरे प्रारब्ध में जो था, वही हुआ। और जन्म लेने की इच्छा अब नहीं है। भगवान यदि फिर जन्म दे तो भक्ति, ज्ञान और वैराग्य अपनी पूर्णता में जन्म के समय से ही हो। मैं जीव नहीं, जीवनमुक्त अवस्था में परमशिव को ही व्यक्त करूँ।
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भगवान ने ही यह सब लिखा दिया। उन्हीं को यह जीवन समर्पित है।
ॐ तत्सत् ! ॐ स्वस्ति !
ॐ नमःशिवाय ॐ नमःशिवाय ॐ नमःशिवाय !! महादेव महादेव महादेव !!
शिवोहं शिवोहं, अहं ब्रह्मास्मि, अयमात्मा ब्रह्म !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
झुंझुनूं (राजस्थान)
१४ फरवरी २०२३

मुझे निमित्त बनाकर भगवान स्वयं ही अपनी साधना कर रहे हैं ---

 जीवन के इस संध्याकाल में जहां भी भगवान ने मुझे रखा है, वहीं पर भगवान से मुझे अब मानसिक रूप से निरंतर साधना/उपासना की प्रेरणा मिल रही है। मुझे निमित्त बनाकर भगवान स्वयं ही अपनी साधना कर रहे हैं। लौकिक जीवन में मेरे आदर्श श्री श्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय हैं। भगवान श्रीकृष्ण की परमकृपा से मुझे पूरा मार्गदर्शन प्राप्त है। किसी भी तरह का कोई संशय नहीं है। यह अवशिष्ट जीवन भगवान को पूर्णतः समर्पित है। भगवान स्वयं ही यह जीवन जी रहे हैं, और जीयेंगे।

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मेरे लिए अभी और लिखने के लिए कुछ नहीं बचा है। जो कुछ भी लिखने की प्रेरणा भगवान से मिली, वह सब खूब लिखा है। अब इस संसार से मन पूर्णतः तृप्त हो गया है, किसी भी तरह की कोई आकांक्षा नहीं रही है। इस बचे हुए जीवनकाल में भगवान जिन-जिन संत-महात्माओं और सदगृहस्थों से मिलवायेंगे उन सब से अवश्य मिलूँगा। जहाँ कोई बहुत प्रेम से बुलायेंगे, तो वहाँ भी क्षमतानुसार अवश्य जाऊँगा। यह अंतःकरण भगवान को समर्पित है।
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सारा अवशिष्ट जीवन भगवान के ध्यान, उपासना और स्वाध्याय में ही बीत जायेगा। जब भी भगवान का आदेश होगा तब ब्रह्मरंध्र के मार्ग से स्वयं ही इस शरीर का त्याग कर के सचेतन रूप से भगवान के धाम चले जायेंगे।
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥ (गीता)
"अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्‌।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥८:२१॥" (गीता)
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम्
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ (कठोपनिषद २-२-१५)
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१२ फरवरी २०२५



वियोग का असह्य कष्ट ---

 मैं वियोग के एक ऐसे असह्य कष्ट में हूँ, जिसके निवारण के किसी उपाय का मुझे बोध नहीं है। समय निकला जा रहा है, मेरी बात को समझने वाला भी कोई नहीं है।

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मेरे बाईं ओर अंधकार से घिरे अपने वाहन भैंसे पर बिराजमान यमराज मुस्कराते हुये मेरी ओर देख रहे हैं। उनके भैंसे के गले में बँधी घंटी की ध्वनि बड़ी कर्कश है, लेकिन उसमें भी एक बड़ा प्रबल आकर्षण है, जो भोगों की आकांक्षा है।
मेरे दाहिने ओर प्रकाशमय स्वयं भगवान शिव अपने धर्मरूपी वाहन वृष के ऊपर बैठे हुए अभय मुद्रा में मुझे निर्भय होने का आश्वासन दे रहे हैं। उनके वाहन बैल के गले में बँधी घंटी से प्रणव की ध्वनि आ रही है। उनके प्रकाशमय सौम्य जटामंडल में भगवती गंगा की शीतलता है -- जो मेरा आत्मतत्त्व है।
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मैंने शिव का वरण कर लिया है, अब कोई विकल्प नहीं रहा है। संसार के किसी काम का नहीं हूँ, फिर भी शाश्वत शिव के साथ एक हूँ। ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ फरवरी २०२५

द्वैत-भाव से की गयी उपासना, अद्वैत भाव से अधिक आनंददायक है ---

अद्वैत-भाव से की गई साधना से द्वैत-भाव अधिक आनंददायक है, क्योंकि अद्वैत-दर्शन में विरह-रस नहीं है। विरह का भी एक आनंद है। भगवान भी निशाना लेकर बड़े यत्न से खींच-खींच कर साधते हुए अपने प्रेम का बाण चलाते हैं, जो चित्त के आर-पार हो जाता है। उनकी यह सधी हुई मार ही हमारी वेदना है।

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विरह की अग्नि असहनीय है। भगवान से अलग हो चुकी आत्मा को स्वप्न में भी सुख नहीं मिलता है। दिन और रात, धूप और छाँह -- कहीं भी सुख नहीं है। प्राण तो उनके विरह में ही तप कर समाप्त हो जायेंगे। इस पीड़ा को या तो मारने वाला जानता है, या फिर इसे भोगने वाला ही। विरह को ही वियोग अवस्था कहते हैं। भगवान् के विरह में हृदय में इतना ताप होता है कि सम्पूर्ण अग्नि और सूर्य भी वैसी जलन नहीं पैदा कर सकते। वियोग संयोग का पोषक होने के कारण रसस्वरूप है। हिन्दी साहित्य भरा पड़ा है विरह की साहित्यिक रचनाओं से।
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गीता में भगवान कहते हैं --
"मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥१२:२॥"
अर्थात् - मुझमें मन को एकाग्र करके नित्ययुक्त हुए जो भक्तजन परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे, मेरे मत से, युक्ततम हैं अर्थात् श्रेष्ठ हैं॥
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"क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥१२:५॥"
अर्थात् - परन्तु उन अव्यक्त में आसक्त हुए चित्त वाले पुरुषों को क्लेश अधिक होता है, क्योंकि देहधारियों से अव्यक्त की गति कठिनाईपूर्वक प्राप्त की जाती है॥"
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सभी को नमन !! ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
१३ फरवरी २०२५

Tuesday, 11 February 2025

सहज योग ---

'सहज' ,,,,, का अर्थ क्या होता है ? सहज का अर्थ ..... आसान या स्वभाविक नहीं है।

सहज' का अर्थ है ..... 'सह+ज' ..... यानि जो साथ में जन्मा है| साथ में जो जन्मा है उसके माध्यम से या उसके साथ योग ही सहज योग है|
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कोई भी प्राणी जब जन्म लेता है तो उसके साथ जिसका जन्म होता है वह है उसका श्वास| अत: श्वास-प्रश्वास ही सह+ज यानि 'सहज' है|
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महर्षि पतंजलि ने चित्त की वृत्तियों के निरोध को 'योग' परिभाषित किया है| चित्त और उसकी वृत्तियों को समझना बड़ा आवश्यक है| उसको समझे बिना आगे बढना ऐसे ही है जैसे प्राथमिक कक्षाओं को उतीर्ण किये बिना माध्यमिक में प्रवेश लेना|
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चित्त है आपकी चेतना का सूक्ष्मतम केंद्र बिंदु जिसे समझना बड़ा कठिन है|
चित्त स्वयं को दो प्रकार से व्यक्त करता है ---- एक तो मन व वासनाओं के रूप में, और दूसरा श्वास-प्रश्वास के रूप में|
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मन व वासनाओं को पकड़ना बड़ा कठिन है| हाँ, साँस को पकड़ा जा सकता है|
योगी लोग कहते हैं कि मानव देह और मन के बीच की कड़ी --- 'प्राण' है|
चंचल प्राण ही मन है| प्राणों को स्थिर कर के ही मन पर नियन्त्रण किया जा सकता है|
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भारत के योगियों ने अपनी साधना से बड़े बड़े महान प्रयोग किये और योग-विज्ञान को प्रकट किया| योगियों ने पाया की श्वास-प्रश्वास कोई स्वतंत्र क्रिया नहीं है बल्कि सूक्ष्म देह में प्राण प्रवाह की ही प्रतिक्रिया है| जब तक देह में प्राणों का प्रवाह है तब तक साँस चलेगी| प्राण प्रवाह बंद होते ही साँस भी बंद हो जायेगी|
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योगियों की स्वयं पर प्रयोग कर की गयी महानतम खोज इस तथ्य का पता लगना है कि श्वास-प्रश्वास पर ध्यान कर के प्राण तत्व को नियंत्रित किया जा सकता है, और प्राण तत्व पर नियन्त्रण कर के मन पर विजय पाई जा सकती है, मन पर विजय पाना वासनाओं पर विजय पाना है| यही चित्त वृत्तियों का निरोध है|
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फिर चित्त को प्रत्याहार यानि अन्तर्मुखी कर एकाग्रता द्वारा कुछ सुनिश्चित धारणा द्वारा ध्यान किया जा सकता है, और ध्यान द्वारा समाधि लाभ प्राप्त कर परम तत्व यानि परमात्मा के साथ 'योग' यानि समर्पित होकर जुड़ा या उपलब्ध हुआ जा सकता है|
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फिर इस साधना में सहायक हठ योग आदि का आविष्कार हुआ| फिर यम नियमों की खोज हुई|
फिर इस समस्त प्रक्रिया को क्रमबद्ध रूप से सुव्यवस्थित कर योग विज्ञान प्रस्तुत किया गया|
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मूल आधार है श्वास-प्रश्वास पर ध्यान| यही सहज (सह+ज) योग है|
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बौद्ध मतानुयायी साधकों ने इसे विपासना यानि विपश्यना और अनापानसति योग कहा जिसमें साथ में कोई मन्त्र नहीं होता है|
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योगदर्शन व तंत्रागमों और शैवागमों में श्वास-प्रश्वास के साथ दो बीज मन्त्र .... 'हँ' और 'स:' जोड़कर एक धारणा के साथ ध्यान करते हैं| इसे अजपाजाप कहते हैं|
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पतंजलि के योगदर्शन में यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) और नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान) की अनिवार्यता इसलिए कर दी गयी क्योंकि योग साधना से कुछ सूक्ष्म शक्तियों का जागरण होता है| यदि साधक के आचार विचार सही नहीं हुए तो या तो उसे मस्तिष्क की कोई गंभीर विकृति हो सकती है या सूक्ष्म जगत की आसुरी शक्तियां उस को अपने अधिकार में लेकर अपना उपकरण बना सकती हैं|
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उपरोक्त सभी तथ्यों को सुव्यवस्थित कर योग विज्ञान प्रस्तुत किया गया|
मूल आधार है श्वास-प्रश्वास पर ध्यान| यही सहज (सह+ज) योग है|
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सूक्ष्म प्राणायाम एक दुधारी तलवार की तरह है| यदि साधक के आचार-विचार सही हैं तो वे उसे देवता बना देते है, और यदि साधक कुविचारी है तो वह असुर यानि राक्षस बन जाता है| इसीलिए सूक्ष्म प्राणायाम साधना को गोपनीय रखा गया है| वह गुरु द्वारा प्रत्यक्ष शिष्य को प्रदान की जाती है| गुरु भी यह विद्या शिष्य की पात्रता देखकर ही देता है|)
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भारत की विश्व को सबसे बड़ी देन -- आध्यात्म, विविध दर्शन शास्त्र, अहैतुकी परम प्रेम यानि भक्ति व समर्पण की अवधारणा, वेद, वेदांग, पुराणादि अनेक ग्रन्थ, सब के उपकार की भावना के साथ साथ योग दर्शन भी है जिसे भारत की आस्तिक और नास्तिक (बौद्ध, जैन आदि) दोनों परम्पराओं ने स्वीकार किया है||
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ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ | ॐ शिव शिव शिव शिव शिव | अयमात्मा ब्रह्म ||
कृपा शंकर १२ फरवरी २०१६

चाहे कितना भी असत्य रूपी अंधकार हो, दुःख के बादल कितने भी घने हों, पर कभी निराश न हों ---

 भगवान श्रीकृष्ण का आदेश है -----

"क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते| क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप||२:३||"
"हे पार्थ क्लीव (कायर) मत बनो| यह तुम्हारे लिये अशोभनीय है, हे परंतप हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ||"
"O Partha, yield not to unmanliness. This does not befit you. O scorcher of foes, arise, giving up the petty weakness of the heart."
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चाहे कितना भी असत्य रूपी अंधकार हो, दुःख के बादल कितने भी घने हों, पर कभी निराश न हों| मनुष्य अकेला कभी पैशाचिक/आसुरी जगत का सामना नहीं कर सकता, उसे देवताओं की सहायता लेनी ही पड़ेगी| इस सृष्टि में पता नहीं कितनी बार असुरों का राज्य हुआ है, पर देवताओं ने कभी साहस नहीं खोया| कैसे भी संगठित होकर बार बार उन्होने अपने खोये हुए साम्राज्य को बापस पाया है| वेद भी अनेक बार लुप्त हुए हैं, जिनका ज्ञान फिर से भगवान ने दिया है| कर्ता भगवान को बनाओं और अपने धर्मक्षेत्र/कुरुक्षेत्र में डटे रहो| भगवान हमारे साथ हैं| याद रहे .....
"यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः| तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम||१८:७८||"
"जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन है वहीं पर श्री, विजय, विभूति और ध्रुव नीति है, ऐसा मेरा मत है||"
"Wherever there is Kṛishṇa, the master of all mystics, and wherever there is Arjuna, the supreme archer, there will also certainly be opulence, victory, extraordinary power, and morality."
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किसी भी तरह की आत्मनिंदा या आत्महीनता के भाव से हम मुक्त हों| अपेक्षाएं सदा दुःखदायी होती हैं| किसी भी परिस्थिति में निज विवेक के प्रकाश में जो भी सर्वश्रेष्ठ है, वह हम करें, और उसका परिणाम ईश्वर को सौंप दें| यह सृष्टि द्वन्द्वात्मक विपरीत गुणों से बनी है| यह अंधकार और प्रकाश का खेल है| दोनों ही शाश्वत हैं| इस द्वन्द्व से ऊपर उठें| जो सर्वश्रेष्ठ है, उसका चिंतन करें, उसका परिणाम भी सर्वश्रेष्ठ होगा| सर्वश्रेष्ठ चिंतन परमात्मा का है, उसे निज जीवन का केंद्रविंदु बनायें| अतः भगवान को कर्ता बनाकर, उन्हें अपने हृदय में बिराजमान कर, पूर्ण समर्पित हो, इस विकट रणभूमि में युद्धरत रहो| सारा मार्ग वे दिखायेंगे, रक्षा भी करेंगे| विजय हमारी सुनिश्चित है|
ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ ||
१२ फरवरी २०२०

असत्य और अंधकार की शक्तियों से हमारा एक युद्ध निरंतर चल रहा है ---

असत्य और अंधकार की शक्तियों से हमारा एक युद्ध निरंतर चल रहा है, जिससे हम बच नहीं सकते। यह युद्ध तो लड़ना ही पड़ेगा। हम हर साँस के साथ असत्य के अंधकार पर प्रहार कर रहे हैं। अपना सारथी भगवान पार्थसारथी को बना लो, फिर देखो, विजय ही विजय है।

"यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥१८: ७८॥"
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हे गुरु महाराज, आप धन्य हो। आपने मुझे एक घोर अंधकारमय नर्ककुंड से निकाल कर इस ज्योतिर्मय सन्मार्ग पर डाल दिया है, और अब भगवान का साक्षात्कार भी करवा रहे हो। आपकी परम कृपा से मुझे किसी भी तरह का कोई संशय नहीं रहा है। आपकी जय हो। मुझे आपके परमप्रेम के सिवाय और कुछ भी नहीं चाहिए। स्वयं परमशिव ही यह जीवन जी रहे हैं। ॐ ॐ ॐ !!
१२ फरवरी २०२३