Wednesday, 29 January 2025

पुरुषोत्तम ---

 पुरुषोत्तम ---

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उपनिषदों का सार श्रीमद्भगवद्गीता है, तो श्रीमद्भगवद्गीता का सार उसका १५वाँ अध्याय (पुरुषोत्तम योग) है। १५ वें अध्याय का भी सार उसका १५ वाँ श्लोक है। दूसरे शब्दों में गीता का सार उसके १५ वें अध्याय का १५ वाँ श्लोक है --
"सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥१५:१५॥"
अर्थात् - मैं ही समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (उनका अभाव) होता है। समस्त वेदों के द्वारा मैं ही वेद्य (जानने योग्य) वस्तु हूँ तथा वेदान्त का और वेदों का ज्ञाता भी मैं ही हूँ॥
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गीता के स्वाध्याय और परमात्मा के ध्यान की आदत पड़ गई है, जिनके बिना जीवन सूना सूना और व्यर्थ लगता है। परमात्मा से प्रेम और उनकी ध्यान-साधना के बिना तो एक दिन भी जीवित रहने की मैं कल्पना भी नहीं कर सकता। आज यदि मैं जीवित हूँ तो परमात्मा से प्रेम के कारण ही जीवित हूँ, अन्यथा एक दिन भी जीने की इच्छा नहीं है। वास्तव में भगवान स्वयं ही मेरे माध्यम से यह जीवन जी रहे हैं।
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योगी लोग कूटस्थ सूर्यमंडल में पुरुषोत्तम का ध्यान करते हैं। मेरे जैसे अकिंचन साधकों की भी यही उपासना है। ये पुरुषोत्तम ही मेरे जीवन हैं। ये ही परमशिव हैं, ये ही विष्णु हैं, और ये ही वेदान्त के ब्रह्म हैं। ध्यान में मैं उनके साथ एक हूँ। भगवान पुरुषोत्तम को ही यह जीवन समर्पित है, जिन्हें मैं परमशिव कहता हूँ।
(इससे पूर्व भगवान यह समझा चुके हैं कि गुणातीत होकर अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति द्वारा ही हम उन्हें प्राप्त हो सकते हैं)
ॐ गुरुभ्यो नमः !! ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
३० जनवरी २०२३

Tuesday, 28 January 2025

इस समय जिस तरह से हमारी अस्मिता (हिंदुत्व) पर प्रहार हो रहा है, मुझे लगता है मुझे कुछ ऐतिहासिक तथ्यों को भी उजागर करना ही होगा ---

 इस समय जिस तरह से हमारी अस्मिता (हिंदुत्व) पर प्रहार हो रहा है, मुझे लगता है मुझे कुछ ऐतिहासिक तथ्यों को भी उजागर करना ही होगा|

करणी सेना के विरुद्ध यदि सरकार करवाई करती है तो सभी हिन्दुओं को एकजूट होना होगा| यह सभी हिन्दुओं के स्वाभिमान की बात है|
क्या भंसाली ने ये तथ्य भी फिल्माये हैं?..
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(1) अल्लाउद्दीन खिलजी अपने चाचा जलालुद्दीन खिलजी को मारकर गद्दी पर बैठा था| उसने अपने चाचा के सर को काटकर अपने महल के दरवाजे पर टंगवा दिया था ताकि लोग आतंकित हों|
(2) उसने अपने पुरुष प्रेमी मलिक कफूर को हिंजड़ा घोषित कर के अपना सेनापति भी बना दिया था| वास्तव में अल्लाउद्दीन खिलजी का ही प्रेमी मलिक कफूर था| वह वास्तव में हिंजड़ा नहीं था| अल्लाउद्दीन को पुरुषों से प्रेम करवाने का बहुत शौक था| उसने अपने हरम में हज़ारों निरीह हिन्दू महिलाओं के साथ साथ अनेक निरीह सुन्दर लड़के भी रखे हुए थे जिनका यौन शोषण करने के बाद उनको बलात् हिजड़ा बना दिया जाता था|
(3) अल्लाउद्दीन के बाद उसका बेटा जब गद्दी पर बैठा तब वह लड़कियों के ही कपड़े पहिनता था, लड़कियों की ही तरह दरबार में नाचता था| उसने अपनी हीन भावना को छिपाने के लिए हरम में एक हज़ार से ऊपर निरीह मजबूर हिन्दू स्त्रियों को रखा हुआ था| कुछ राजपूतो ने उसका वध करने के लिए उसका विश्वास प्राप्त किया और उसको एक दिन अकेले में घेर लिया| वह भागकर अपने हरम की एक हज़ार औरतों में छिप गया| पर राजपूतों ने उसको ढूँढ ही लिया और उसका वध कर दिया| इससे पहिले उन्होंने मलिक कफूर को भी ऐसे ही अकेले में ढूँढ कर मार दिया था|
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(4) अल्लाउद्दीन के समय लाखों हिन्दुओं की हत्याएं और नरसंहार हुआ था| लाखों हिन्दू भारत छोड़कर दक्षिण-पूर्वी एशिया में शरणार्थी होकर चले गए थे|
सारे हिन्दू शासक बिखरे हुए थे, उनमें एकता नहीं थी| अल्लाउद्दीन ने एक एक कर के उत्तरी भारत के प्रायः सभी राजाओं को हरा दिया था| जैसलमेर के किले में उस के सेनापती मलिक कफूर को बंदी भी बना लिया गया था पर वह अपनी धूर्तता से छूट गया|
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(5) रणथम्बोर के किले की दो वर्ष तक अल्लाउद्दीन ने घेरेबंदी कर के रखी थी| वहाँ के हिन्दू राजा हमीर चौहान ने कभी पराजय नहीं मानी| जब किले में खाद्य सामग्री समाप्त हो गयी तब वहाँ की मातृशक्ति ने जौहर की तैयारी कर ली और राजपुरोहित को छोड़कर सभी पुरुष अंतिम युद्ध के लिए अल्लाउद्दीन की फौज पर टूट पड़े| राजा हमीर उस युद्ध में पराजित नहीं हुए थे जैसे की पढ़ाया जाता है| अल्लाउद्दीन पराजित होकर भाग गया था| शाम का समय था| राजा हमीर के बचे हुए सैनिक बापस किले में लौट रहे थे| कुछ सैनिकों ने भूलवश अल्लाउद्दीन की फौज के झंडे अपने हाथों में ले रखे थे| ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था| ऊपर से रानियों ने अल्लाउद्दीन की फौज के झंडे देखकर सोचा कि राजा हमीर पराजित हो गए हैं और आतताई फौज आ रही है| किले की हज़ारों महिलाऐं अपने बच्चों के साथ किले की जौहर बावड़ी की जलती हुई प्रचंड अग्नि में कूद पडीं और स्वयं को भस्म कर लिया| राजा हमीर ने जब देखा कि पूरी मातृशक्ति नहीं रही है तब उसने भी अपने इष्ट देव भगवान शिव के मन्दिर में जाकर अपना भी सर काटकर अपने इष्टदेव को चढ़ा दिया| २९ जनवरी २०१७

जैसे जैसे मैं अपने आध्यात्म मार्ग पर आगे बढ़ रहा हूँ ---

 जैसे जैसे मैं अपने आध्यात्म मार्ग पर आगे बढ़ रहा हूँ, निज चेतना से द्वैत की भावना शनैः शनैः समाप्त हो रही है| जड़ और चेतन में अब कोई भेद नहीं दिखाई देता| अब तो कुछ भी जड़ नहीं है, सारी सृष्टि ही परमात्मा से चेतन है| कण कण में परमात्मा की अभिव्यक्ति है| इस भौतिक संसार की रचना जिस ऊर्जा से हुई है, उस ऊर्जा का हर कण, हर खंड और हर प्रवाह परमात्मा की ही अभिव्यक्ति है|

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वर्त्तमान में संसार के जितने भी मत-मतान्तर व मज़हब हैं, उन सब से परे श्रुति भगवती का कथन है ..... "सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत | अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत ||छान्दोग्योपनिषद्.३.१४.१||
अर्थात यह ब्रह्म ही सबकुछ है| यह समस्त संसार उत्पत्तिकाल में इसी से उत्पन्न हुआ है, स्थिति काल में इसी से प्राण रूप अर्थात जीवित है और अनंतकाल में इसी में लीन हो जायेगा| ऐसा ही जान कर उपासक शांतचित्त और रागद्वेष रहित होकर परब्रह्म की सदा उपासना करे| जो मृत्यु के पूर्व जैसी उपासना करता है, वह जन्मांतर में वैसा ही हो जाता है|
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कुछ भी मुझ से परे नहीं है| मेरे मन से ही मेरी यह सृष्टि है| मेरा मन ही मेरे बंधन का कारण है और यही मेरे मोक्ष का कारण होगा| उस चैतन्य की सत्ता के साथ मैं एक हूँ, उस से परे सिर्फ माया है| ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ जनवरी २०१८

शोकगीत के रूप में लिखी गई हिन्दी भाषा की एक प्रसिद्ध साहित्यिक रचना ---

 शोकगीत के रूप में लिखी गई हिन्दी भाषा की एक प्रसिद्ध साहित्यिक रचना ---

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बसंत पंचमी के दिन सन १८९९ में जन्मे हिन्दी के प्रसिद्ध कवि पं.सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" ने अपनी पुत्री सरोज की मृत्यु पर "सरोज स्मृति" नाम का शोकगीत एक बहुत लंबी कविता के रूप में लिखा था| उन्हें अपनी प्रिय पुत्री के निधन पर इतनी गहरी वेदना हुई जिसकी करुणात्मक अभिव्यक्ति मर्माहत कर देने वाले काव्य के रूप में उन्होने की है| उनके वेदनात्मक गहन भावों का और शब्दों का चयन इतना अनुपम है कि उसकी किसी भी साहित्य में कोई बराबरी नहीं हो सकती| ऐसा शोक-गीत हिन्दी में दूसरा नहीं है| इस कविता में जीवन के संघर्ष से छनकर आयी हुई साहस, विद्रोह, वात्सल्य, अवसाद और ग्लानि की मिली-जुली अनुभूतियाँ उद्भूत होती हैं| कहीं-कहीं से कुछ पंक्तियाँ उद्धृत कर रहा हूँ ..... (पूरी कविता बहुत अधिक लंबी है)
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मुझ भाग्यहीन की तू संबल
युग वर्ष बाद जब हुई विकल
दुःख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूँ आज, जो नही कही
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अस्तु मैं उपार्जन को अक्षम
कर नहीं सका पोषण उत्तम
कुछ दिन को, जब तू रही साथ,
अपने गौरव से झुका माथ,
पुत्री भी, पिता-गेह में स्थिर,
छोड़ने के प्रथम जीर्ण अजिर।
आँसुओं सजल दृष्टि की छलक
पूरी न हुई जो रही कलक
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मुझ भाग्यहीन की तू सम्बल
युग वर्ष बाद जब हुई विकल,
दुख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!
हो इसी कर्म पर वज्रपात
यदि धर्म, रहे नत सदा माथ
इस पथ पर, मेरे कार्य सकल
हो भ्रष्ट शीत के-से शतदल!
कन्ये, गत कर्मों का अर्पण
कर, करता मैं तेरा तर्पण!
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यहाँ लेखक ने अपनी पुत्री सरोज का तर्पण अपने सारे संचित अच्छे कर्मों का उसे अर्पण कर के किया है| आज उनकी यह रचना सामने आई जिसे आंशिक रूप से पढ़कर ही मैं भावुक हो उठा| एक पिता द्वारा दिए गए तर्पण से उच्च तर्पण हो ही नहीं सकता|

शब्दार्थों पर नहीं, आध्यात्मिक अर्थों पर विचार करें ---

 शब्दार्थों पर नहीं, आध्यात्मिक अर्थों पर विचार करें कि --

(१) हरिःकृपा क्या होती है? तथा
(२) "श्रीहरिः" व "हरिःॐ" का अर्थ क्या होता है?
इन प्रश्नों का उत्तर सरल नहीं है। आप अपनी सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा का उपयोग करेंगे तब जाकर आप को समझ में आयेगा। "हरिः" भी एक अनुभूति है, और "ॐ" भी एक अनुभूति है जो बहुत गहरे ध्यान में होती हैं।
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आंशिक रूप से नहीं, अपनी समग्रता में भगवान का अनुसंधान कीजिये। हमारा जन्म ही भगवत्-प्राप्ति के लिए हुआ है, जो अंततः सभी को होगी। सब पर भगवान श्रीहरिः की कृपा बनी रहे। हमारा एकमात्र संबंध भगवान से है, क्योंकि इस जन्म से पूर्व भगवान ही हमारे साथ थे, और इस जन्म के पश्चात भी भगवान ही हमारे साथ होंगे। वे ही माँ-बाप, सगे-संबंधियों, व मित्रों के रूप में आये। वह भगवान का ही प्रेम था जो इन सब के माध्यम से हमें प्राप्त हुआ। एक दिन अचानक ही बिना किसी पूर्व सूचना के, सब कुछ यहीं छोड़कर उनके पास जाना ही पड़ेगा, अतः अभी से उनसे मित्रता कर लो। बाद में मित्रता का अवसर नहीं मिलेगा।
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दूसरों का धन ठगने, उनको लूटने, या उनका गला काटने के लिये भगवान का नाम मत लो, अन्यथा नर्क की भयावह यंत्रनाएँ आपकी प्रतीक्षा कर रही हैं। । कोई भी बचाने नहीं आयेगा।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! हरिःॐ !!
कृपा शंकर
२९ जनवरी २०२४
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पुनश्च: --- मेरे पास लगभग नित्य ही किसी न किसी दुःखी व्यक्ति का फोन आता है। उनको मैं कुछ कह भी नहीं सकता, उनके लिए प्रार्थना ही कर सकता हूँ।धोखाधड़ी और दुःख-कष्टों का शिकार मैं भी हूँ। लेकिन सब कुछ "श्री कृष्ण-समर्पण" कर के मैं प्रसन्न हूँ।
जय शंकर प्रसाद की कालजयी रचना "कामायनी" की ये पंक्तियाँ सदा याद रखो --
"जिसे तुम समझे हो अभिशाप,
जगत की ज्वालाओं का मूल;
ईश का वह रहस्य वरदान,
कभी मत इसको जाओ भूल॥"

Monday, 27 January 2025

भगवान हमारी चेतना में हैं, कहीं बाहर नहीं, सारा ब्रह्मांड, सारी सृष्टि हमारी चेतना में है ---

 भगवान की बड़ी कृपा है कि मन में भटकाने वाले तरह तरह के विचार आने बंद हो गए हैं। पाप-पुण्य और धर्म-अधर्म का भी अब कोई महत्व नहीं रहा है। आध्यात्मिक अनुभूतियाँ भी महत्वहीन हो गई हैं। भगवान हैं, इसी समय हैं, सर्वदा और सर्वत्र हैं; जो चेतना से कभी लुप्त नहीं होते। उनका आनंद अपने आप ही सर्वदा सर्वत्र व्याप्त हो रहा है, उनसे भी कुछ नहीं चाहिए। किसी से कुछ भी कोई अपेक्षा नहीं है। वे पूर्ण तृप्ति और पूर्ण संतुष्टि हैं।

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भगवान हमारी चेतना में हैं, कहीं बाहर नहीं। सारा ब्रह्मांड,सारी सृष्टि हमारी चेतना में है। भगवान कोई ऊपर से उतर कर आने वाली चीज नहीं है, हमें स्वयं को ही भगवान की चेतना में जाकर उनके साथ एक होना पड़ता है।
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व्यष्टि द्वारा समष्टि को समर्पण -- सबसे बड़ी साधना है। इससे चित्त सदा शांत और क्रियाशील रहेगा। प्रमाद ही मृत्यु है। अवचेतन मन को संस्कारित किये बिना हम भगवान की भक्ति, धारणा, ध्यान, समर्पण आदि कुछ भी नहीं कर सकते। इस के लिए आवश्यक है -- भगवान के साथ निरंतर सत्संग।
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प्रकृति अपने नियमों के अनुसार चल रही है। उन नियमों को न जानना हमारी अज्ञानता है। भगवान को सदा याद रखेंगे तो वे भी हमें सदा याद रखेंगे, मृत्यु के समय भी। भगवान यदि कहीं हैं तो वे हमारे हृदय में ही हैं, अन्यत्र कहीं भी नहीं। सारी सृष्टि ही हमारा हृदय है, जिसका केंद्र सर्वत्र है, लेकिन परिधि कहीं भी नहीं। वे एक श्रद्धा, विश्वास, निष्ठा और अनुभूति हैं। उन का अस्तित्व किसी के विश्वास/अविश्वास पर निर्भर नहीं है। वे अपरिभाष्य हैं, उन को किसी परिभाषा में नहीं बाँध सकते। वे हमारे अस्तित्व हैं, जिन्हें जाने बिना हमारा जीवन अतृप्त है। उन्हें जानने का प्रयास स्वयं को जानने का प्रयास है। उन की कृपा सभी प्राणियों पर निरंतर है। हम उन के साथ एक, और उन की पूर्णता हैं।
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ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२८ जनवरी २०२४

सर्वाधिक महत्व एक ही बात का है -- वह है "निरंतर भगवान का स्मरण", प्रातःकाल उठते ही भगवान का कीर्तन और ध्यान करें ---

 (१) सर्वाधिक महत्व एक ही बात का है -- वह है "निरंतर भगवान का स्मरण"। गीता में भगवान कहते हैं --

"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
अर्थात् -- इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
Therefore meditate always on Me, and fight; if thy mind and thy reason be fixed on Me, to Me shalt thou surely come.
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(२) प्रातःकाल उठते ही भगवान का कीर्तन और ध्यान करें। तत्पश्चात् दिन का आरंभ करें। रात्रीशयन से पूर्व भी भगवान का कीर्तन और ध्यान करें। परिणाम आप के जीवन को आनंदमय और धन्य बना देंगे।
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जीवन में सदा प्रसन्न रहें। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२८ जनवरी २०२४